

महासागरों की कार्बन डाईऑक्साइड सोखने की क्षमता में बदलाव मौसम और बारिश को प्रभावित कर रहा है।
फोटो : विकी कॉमंस
ग्लोबल वॉर्मिंग से ग्लेशियरों के पिघलने के कारण जहां महासागरों का जल स्तर बढ़ रहा है, वहीं इनके तापमान में भी बढ़ोतरी हो रही है। इससे मौसम और जलवायु से जुड़ी अनिश्चितताएं बढ़ती जा रही हैं। यह बदलाव भारत के दक्षिण में स्थित हिन्दी महासागर में भी काफी तेजी से उभरता दिखाई दे रहा है। यह भारत में वर्षा कराने वाली मानसून प्रणाली को प्रभावित करने के साथ मौसम की अनिश्चितता को भी बढ़ा रहा है। इस कारण मौसम विज्ञानियों के लिए मौसम का पूर्वानुमान लगाना दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा है। यह बात जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में छपी एक रिसर्च रिपोर्ट में सामने आई है।
दुनिया के महासागर वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) सोखकर क्लाइमेट चेंज को धीमा करने में मदद करते हैं। वायुमंडल में मौजूद CO₂ एक ग्रीनहाउस गैस होने के कारण धरती पर हो रही तापमान वद्धि यानी ग्लोबल वॉर्मिंग का मुख्य कारण है। रिसर्च के मुताबिक महासागरों की CO₂ सोखने की क्षमता घटती जा रही है और हिंद महासागर में यह अपेक्षाकृत ज्यादा देखने को मिल रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि हिंद महासागर के दायरे आसपास के इलाकों में मौसमी पैटर्न बदल रहे हैं। साथ ही इससे मौसम की अनिश्चितता भी बढ़ रही है। भारत के तीन तरफ से हिंद महासागर से घिरा होने के कारण इसपर इस बदलाव का ज्यादा असर पड़ने की संभावना है।
रिसर्च बताती है कि CO₂ समुद्र और वायुमंडल के बीच लगातार घूमती रहती है। जब समुद्र का पानी जितना CO₂ छोड़ता है, उससे ज़्यादा सोख लेता है, तो समुद्र कार्बन सिंक की तरह काम करता है। ऐसा करके महासागर बड़ी मात्रा में CO₂ (ग्रीनहाउस गैस) को जमा कर लेता है। अगर महासागरों द्वारा CO₂ का यह अवशोषण न किया जाए, तो यह वायुमंडल में ही बनी रहेगी, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की गति बढ़ जाएगी।
रिसर्च के मुताबिक महासागरों का तापमान और जलस्तर बढ़ने के कारण होने वाले बदलावों से न केवल CO₂ का अवशोषण घट रहा है, बल्कि कई बार यह लेन-देन उल्टा होता भी दिख रहा है। यानी समुद्र अपने पानी में घुली हुई CO₂ को वापस हवा में छोड़ रहा है। इसकी वजह यह है कि ठंडा पानी आम तौर पर गर्म पानी की तुलना में ज़्यादा घुला हुआ CO₂ रख सकता है, जिससे एटमॉस्फियर से एब्जॉर्प्शन को बढ़ावा मिलता है, जबकि गर्म पानी गैस को बाहर निकलने के लिए बढ़ावा दे सकता है।
रिसर्च के मुताबिक यह संतुलन कई चीज़ों से प्रभावित हो रहा है, जिसमें पानी का तापमान, हवाएं और समुद्र का सर्कुलेशन शामिल हैं। तापमान, हवाओं और पानी की गति में मौसमी बदलाव के कारण ये प्रक्रिया पूरे साल बदलती रहती है। यानी, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि पानी में पहले से कितनी CO₂ घुली हुई है और समुद्र की धाराएं कार्बन-रिच पानी को सतह पर कैसे लाती हैं।
ग्लोबल कार्बन बजट 2024 के अनुसार, 2014 और 2023 के बीच इंसानों की वजह से हुए कुल CO₂ एमिशन का लगभग 26% समुद्र ने सोख लिया। हालांकि, रिसर्च से पता चलता है कि 2016 के बाद से इसकी और कार्बन सोखने की क्षमता में बहुत कम बढ़ोतरी हुई है, इसका एक कारण क्लाइमेट में बदलाव का बढ़ना है। भारतीय वैज्ञानिकों के एक रिसर्च के मुताबिक पिछले चार दशकों में हुई समुद्र के कार्बन सोखने की क्षमता उल्लेखनीय रूप से प्रभावित हुई है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इंफॉर्मेशन सर्विसेज के डॉ. अपूर्वा पद्माम्भ जोशी और उनके साथियों ने अपनी रिसर्च में 1980 से 2019 तक के डेटा का एनालिसिस करके यह पता लगाया कि हिंद महासागर में मौसमी CO₂ एक्सचेंज कैसे विकसित हुआ। उन्होंने पाया कि इक्वेटोरियल हिंद महासागर में मौसमी बदलाव 48% और दक्षिणी हिंद महासागर में 23% बढ़ गया। महासागर के अरब सागर वाले इलाके में मौसमी बदलाव में 14% की कमी आई, जिससे कार्बन एक्सचेंज में मौसमी उतार-चढ़ाव के बीच कम अंतर का पता चलता है। बंगाल की खाड़ी में मौसमी बदलाव में लगभग 7% की मामूली बढ़ोतरी देखी गई।
इस प्रकार रिसर्च के नतीजों से पता चला कि हिंद महासागर बदलते क्लाइमेट हालात पर एक जैसा रिस्पॉन्ड नहीं कर रहा है और पूरे इलाके में कार्बन एक्सचेंज का समय और तेज़ी बदल रही है। रिसर्चर्स ने यह भी पाया कि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और इक्वेटोरियल हिंद महासागर में एटमॉस्फियर में CO₂ का औसत उत्सर्जन (एवरेज रिलीज) कम हुआ, जबकि दक्षिणी हिंद महासागर में CO₂ अवशोषण (एब्ज़ॉर्प्शन) बढ़ा। यह फ़र्क इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इससे पता चलता है कि मौसमी बदलाव (सीज़नल वेरिएशन) में बदलाव का मतलब यह नहीं है कि कोई इलाका ओवरऑल ज़्यादा कार्बन एब्ज़ॉर्ब कर रहा है।
महासागर में कुछ इस तरह चलता है कार्बन अवशोषण का चक्र।
फोटो : विकी कॉमंस
हिंद महासागर सागर के भूमध्य रेखा के करीबी (इक्वेटोरियल) इलाकों और दक्षिणी भाग में सतह के पानी और ऊपर के वायुमंडल में CO₂ के स्तर के बीच के अंतर ने बदलाव में एक बड़ी भूमिका निभाई। क्योंकि यह अंतर ही महासागर के दोनों क्षेत्रों के बीच CO₂ के मूवमेंट की दिशा और ताकत तय करता है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में, हवा की रफ्तार ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई, क्योंकि हवाएं गैसों को समुद्र और एटमॉस्फियर के बीच की बाउंड्री पार करने में मदद करती हैं। इसलिए हवा की कंडीशन में बदलाव इस बात पर असर डाल सकता है कि कितना CO₂ एक्सचेंज होता है और यह एक्सचेंज पूरे साल कैसे बदलता है। रिसर्च में प्रशांत और अटलांटिक महासागरों के कुछ हिस्सों में सीज़नल CO₂ एक्सचेंज में इसी तरह की बढ़ोतरी देखी गई। नई खोजों से पता चलता है कि सीज़नल कार्बन एक्सचेंज में बदलाव सिर्फ़ एक महासागर तक ही सीमित नहीं हैं, जिससे यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि ये पैटर्न दुनिया भर में कैसे बदल रहे हैं।
रिसर्च के नतीजे इस बात की एक विस्तृत तस्वीर पेश करते हैं कि ग्लोबल कार्बन साइकिल में हिंद महासागर की भूमिका कैसे बदल रही है। हालांकि सिर्च यह नहीं कहती कि पूरा महासागर कम CO₂ सोख रहा है, लेकिन वे यह बताती है कि कार्बन एक्सचेंज में बदलाव से मौसमी प्रक्रियाओं में बदलाव हो रहा है, जो मौसम के पूर्वानुमान को मुश्किल बना रहा है। इसलिए, जैसे-जैसे इंसानी गतिविधियों से वायुमंडल में CO₂ घुलती रहेगी, उससे ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ़ एक नेचुरल बफर के तौर पर महासागरों की भूमिका कमजोर पड़ती जाएगी।
रिसर्च के मुताबिक मौसम के हिसाब से CO₂ एक्सचेंज में बदलाव का समुद्री इकोसिस्टम पर भी असर पड़ सकता है। जब समुद्री पानी CO₂ सोखता है, तो यह ज़्यादा एसिडिक हो जाता है, जिससे कार्बोनेट आयन कम हो जाते हैं, जिनकी ज़रूरत कोरल और दूसरे जीवों को अपने कंकाल और शेल बनाने के लिए होती है । मौसमी हालात में बार-बार क्लाइमेट की वजह से होने वाले बहुत ज़्यादा बदलाव सेंसिटिव समुद्री माहौल पर दबाव डाल सकते हैं, जिससे प्रजातियों के फैलाव, बायोडायवर्सिटी और इकोसिस्टम की प्रोडक्टिविटी में रुकावट आ सकती है। क्लाइमेट के अनुमानों के लिए यह फ़र्क मायने रखता है। हालांकि, समुद्री इकोसिस्टम अक्सर सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव से ठीक हो सकते हैं, लेकिन बार-बार बहुत ज़्यादा बदलाव होने से रिकवरी में देरी हो सकती है, जिससे कमज़ोर समुद्री जीवों, इको सिस्टम और समुद्री पर्यावरण पर असर लंबे समय तक रह सकता है।
रिसर्च के अनुसार प्रशांत महासागर में अलनीनो और हिंद महासागर में इंडियन ओशन डायपोल जैसी घटनाएं भी बारिश को प्रभावित करती हैं। इन पर नज़र डाले बिना केवल समुद्र के तापमान से मानसून का सटीक पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र का तापमान बढ़ने से अलनीनो की स्थिति बन सकती है, जिसका असर भारत में मानसूनी बारिश पर पड़ता है।
वहीं, हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के तापमान में अंतर को इंडियन ओशन डायपोल कहते हैं। सामान्यतः इसके सकारात्मक चरण में भारत में अच्छी बारिश की संभावना मानी जाती है। शोध के मुताबिक, 1968 से 1982 के दौरान हिंद महासागर के तापमान में बदलाव और मध्य भारत की बारिश के बीच नकारात्मक संबंध था। यानी समुद्र के तापमान में बदलाव के कारण मध्य भारत में कम बारिश हुई, लेकिन 1985 के आसपास यह संबंध नकारात्मक से सकारात्मक हो गया। इसी तरह 1992 से 2006 के दौरान इसी तरह के समुद्री बदलाव अधिक बारिश से जुड़े मिले।
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