

जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालयी नदियों के प्रवाह में तेजी आने के कारण फ्लैश फ्लड का तबाही वाला रूप देखने को मिल रहा है।
स्रोत : फेसबुक
पिछले महीने ग्लेशियर झील के फटने से नेपाल में आई फ्लैश फ्लड से मची तबाही ने सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया। वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक आने वाले दिनों में हमें हिमालय के इलाकों में बर्बादी के ऐसे कई मंजर देखने को मिल सकते हैं। इसकी वजह है जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी नदियों का मिजाज बदलना।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) जैसे देश के प्रमुख संस्थानों और ICIMOD जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं के अध्ययनों में हिमाचल और लद्दाख की नदियों के बहाव व प्रकृति में बदलावों के कारण इनमें तलछट (Sediment) बढ़ने और उनके किनारों के कमजोर होने की बात सामने आई है। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलूरू, अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र अहमदाबाद, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र गोवा के अध्ययन भी बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ तापमान बढ़ने के कारण हिमालय के ग्लेशियर पिघलने और पानी की मात्रा तक सीमित नहीं है। इससे नदी में तलछट बढ़ने और किनारों की स्थिरता कमजोर होने के कारण कई घाटियों में नदी का बहाव बदल रहा है। यह हिमालयी इलाकों में भूस्खलन और फ्लैश फ्लड के खतरों को बढ़ा रहा है। इससे लेह-लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में मानव बस्तियों पर खतरा बढ़ता जा रहा है।
यूरेक अलर्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन इन नदी प्रणालियों के लिए खतरा बन रहा है। 1980 से 2020 तक के उपग्रह चित्रों और जमीनी अवलोकनों का उपयोग करते हुए किए गए इस अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में नदियां तेजी से अपना रास्ता बदल रही हैं और उनके किनारे कमजोर होकर ढह रहे हैं। सैटेलाइट डेटा से पता चलाकि ग्लोबल वार्मिंग और कम वनस्पति के प्रभाव से इन नदियों के मार्ग बदलने की दर में 33% तक की वृद्धि हुई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पिघलते ग्लेशियर और जमी हुई जमीन के पिघलने से हिमालयी नदियाँ पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से अपना मार्ग बदल रही हैं, जिससे बाढ़, कटाव और सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढाँचों को नुकसान का खतरा बढ़ रहा है। इससे मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों के निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए चिंता बढ़ रही है।
14 मई 2026 को जर्नल साइंस में प्रकाशित अध्ययन अध्ययन बताता है कि नदियों का भूभाग पर प्रवाह यह दर्शाता है कि वे पर्यावरणीय परिवर्तनों पर कैसे प्रतिक्रिया करती हैं। नदी की गति बाढ़, कटाव, तलछट परिवहन और नदी तटों की स्थिरता को प्रभावित करती है। इस अध्ययन के मुताबिक ऊपरी हिमालयी क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जहां नदी के घुमाव और भू-आकृति विज्ञान जैसी नदी संबंधी प्रक्रियाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने का अवसर मिलता है। इस तरह यहां जलवायु परिवर्तन के कारण नदी के प्रवाह में बदलाव का गहरा प्रभाव को साफ तौर पर देखा जा सकता है।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने समय के साथ नदी मोड़ों में होने वाले बदलावों की सीमा को मापा और नदी में होने वाले अन्य परिवर्तनों का पता लगाया। इसमें नदी के बहाव के तरीके और मार्गों में मुख्य रूप से तीन तरह के बदलाव देखने को मिले -
कटऑफ : जहां नदी एक नया, छोटा मार्ग बनाती है और अपने पुराने चैनल के एक हिस्से को छोड़ देती हैं।
एवल्शन : जहां नदी अचानक अपना मार्ग बदलकर एक नए चैनल में प्रवेश करती हैं।
चैनल-पैटर्न ट्रांजिशन : जहां नदियां एकल चैनलों और कई परस्पर जुड़े चैनलों के बीच बदलती हैं।
इस अध्ययन में जमे हुए पहाड़ी इलाकों से बहने वाली लगभग 1,582 किलोमीटर लंबी नदी धाराओं के 1,079 मोड़ों का विश्लेषण किया गया। विश्लेषण से पता चला कि पिछले चार दशकों में नदियों की गति में तीव्र वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर, 1980 और 2020 के बीच नदी के प्रवाह में परिवर्तन की दर में 33% की वृद्धि हुई, जबकि स्वतंत्र रूप से बहने वाली नदियों के मोड़ों में लगभग 97% की वृद्धि देखी गई। इस अवधि के दौरान नदी के कटाव, मार्ग परिवर्तन और नदी के मार्ग में बदलाव की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह बदलाव हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और जमी हुई जमीन के पिघलने से काफी हद तक मेल खाते हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग यानी बढ़ते तापमान के कारण नदियों में के बहाव में हो रहे बदलाव से इनमें गाद की मात्रा बढ़ रही है, जबकि जमे हुए नदी किनारे कमजोर हो रहे हैं। ये सभी परिवर्तन मिलकर नदियों को अधिक अस्थिर बना रहे हैं।
अध्ययन में पाया गया कि हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में बहने वाली चंद्रा नदी में तापमान वृद्धि का बड़ा असर पड़ रहा है। बारालाचा ला दर्रे (Bara-lacha la pass) के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में मौजूद ग्लेशियरों से निकलने वाली इस नदी में लाहौल क्षेत्र के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों और खोकसर, सिसू और गोंधला जैसे से इलाकों होकर गुजरने के दौरान इसके बहाव की रफ्तार हाल के वर्षों में बढ़ गई है । गर्मियों में हवा का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर चंद्रा नदी का बहाव औसतन 22 घन मीटर प्रति सेकंड बढ़ा। नदी के कुल बहाव में भूजल की हिस्सेदारी 38.3 फीसदी, ग्लेशियर पिघलने की 30.9 फीसदी और मौसमी बर्फ पिघलने की 30.6 फीसदी रही। बारिश का योगदान बेहद कम था। इससे स्पष्ट है कि ऊंची हिमालयी घाटियों में नदी का बहाव तापमान और जमी हुई जल संपदा में बदलाव से सीधे प्रभावित हो रहा है।
हिमाचल के चंद्रा-भागा नदी तंत्र से जुड़े 251 ग्लेशियरों पर हुए अध्ययन में 1993 से 2019 के बीच ग्लेशियर क्षेत्र 996 से घटकर 973 वर्ग किलोमीटर रह गया। यानी 23 वर्ग किलोमीटर की कमी हुई। ग्लेशियर क्षेत्र घटने की औसत दर 1993-2000 में 0.025 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष थी, जो 2010-2019 में बढ़कर 0.036 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष हो गई। ग्लेशियरों पर जमा मलबे के क्षेत्र में भी 15.2% वृद्धि दर्ज हुई।
गौरतलब है कि लाहौल घाटी के तांडी (Tandi) नामक स्थान पर चंद्रा नदी का संगम भागा नदी (Bhaga River) से होता है। इन दोनों नदियों के मिलन से ही प्रसिद्ध चिनाब नदी (Chenab River) का जन्म होता है, जिसका प्रारंभिक नाम चंद्रभागा भी है।
हिमाचल प्रदेश की सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों का मिजाज जलवायु परिवर्तन के कारण बदलता जा रहा है।
फ़ोटो : विकि कॉमन्स
हिमालय क्षेत्र का अध्ययन करने वाली अंतर-सरकारी संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (International Centre for Integrated Mountain Development : ICIMOD ) की एक हालिया रिपोर्ट इस बारे में एक गंभीर चेतावनी देती है। आईसीआईएमओडी की एचकेएच ग्लेशियर आउटलुक 2026 रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। इसके कारण सन 2000 के बाद से ग्लेशियरों के आकार में कमी यानी द्रव्यमान हानि (Mass loss) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 50 वर्षों से अधिक के अवलोकन से पता चलता है कि लगभग 89% दर्ज वर्षों में ग्लेशियर द्रव्यमान संतुलन नकारात्मक रहा है, जो निरंतर गिरावट को दर्शाता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पानी की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। ग्लेशियर झील विस्फोट से बाढ़ (GLOF) का खतरा बढ़ रहा है। इससे भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन और म्यांमार में इन जल प्रणालियों पर निर्भर लगभग दो अरब लोगों की आजीविका खतरे में पड़ रही है।
अध्ययन के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र भूवैज्ञानिक रूप से सबसे युवा और अत्यंत नाजुक है। इसने 21वीं सदी में महत्वपूर्ण तापमान वृद्धि का अनुभव किया है, जिसकी दर 0.15 डिग्री सेल्सियस से 0.60 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक तक है। यह वैश्विक औसत 0.74 डिग्री सेल्सियस प्रति शताब्दी से कहीं अधिक है।
इस अध्ययन से पता चलता है कि हाल ही में नेपाल में रसुवा की फ्लैश फ्लड की घटना हिमालय में बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणालियां (Early warning systems) विकसित करने का संदेश देती है। यह घटना हमें बताती है कि हिमालयी इलाकों में बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन जैसी अचानक आने वाली आपदाओं का सामाना करने के लिए तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। संस्था ने कहा कि पर्याप्त समय मिलने पर चेतावनी प्रणालियां जान बचा सकती हैं, लेकिन वे अचानक हिमस्खलन या मलबा प्रवाह से बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान को नहीं रोक सकतीं।
हिमालय के भारतीय हिस्से पर ICIMOD द्वारा किए गए क्लाइमेट ट्रेंड्स के अध्ययन में कहा गया है कि हिमालय में ब्लैक कार्बन की बढ़ती सांद्रता एक गंभीर चिंता का विषय है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
इसके हालिया अध्ययन 'हिमालयी ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन का प्रभाव: 23-वर्षीय रुझान विश्लेषण' में बताया गया है कि ब्लैक कार्बन हिमालयी क्रायोस्फीयर को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, विशेष रूप से बर्फ की सतह के तापमान को बढ़ाने और बर्फ की गहराई को कम करने में। इस अध्ययन से पता चला है कि पूर्वी और मध्य हिमालय में ब्लैक कार्बन की सांद्रता में हाल के दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ब्लैक कार्बन डीजल इंजन, लकड़ी, कोयले और फसल के अवशेषों (पराली) के अधूरे जलने से पैदा होने वाला एक बारीक कण (धुआं) है। इसका मुख्य कारण इंडो-गंगा के मैदान में बायोमास जलाने और जीवाश्म ईंधन के उपयोग से होने वाला उत्सर्जन है। जब यह हवा के साथ उड़कर ग्लेशियरों की सफेद बर्फ पर जमा हो जाता है, तो बर्फ काली पड़ने लगती है। इससे बर्फ सूरज की गर्मी को सोखने लगती है (क्योंकि काला रंग गर्मी सोखता है) और ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते हैं।
अध्ययन में आगे यह भी बताया गया है कि हिमालय में बर्फ की सतह के तापमान में पिछले दो दशकों में लगातार वृद्धि का रुझान देखा गया है, जिसका बर्फ और ग्लेशियरों की स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। बर्फ की सतह का औसत तापमान 2000 से 2009 के बीच -11.27°C से बढ़कर 2020 से 2023 के दौरान -7.13°C हो गया है। इन 23 वर्षों की अवधि का औसत -8.57°C रहा है। यह तापमान वृद्धि आंशिक रूप से ब्लैक कार्बन जैसे प्रकाश-अवशोषित कणों के जमाव के कारण हो रही है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के अध्ययन में बताया गया है कि तापमान में वृद्धि, ब्लैक कार्बन की उपस्थिति के साथ मिलकर, हिमालय में बर्फ के तापीय तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
लद्दाख पर 2026 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार 1975 से 2024 के बीच क्षेत्र के तापमान में औसतन प्रति वर्ष 0.02 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज हुई। बर्फ पिघलने का समय भी पहले हो रहा है। अध्ययन में ग्लेशियरों के द्रव्यमान में लगातार कमी और झरनों के बहाव में गिरावट दर्ज की गई। ऊपरी सिंधु की सहायक नदियों में कुल बहाव का 62% से 72% हिस्सा बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी से जुड़ा है। लद्दाख के स्टोक क्षेत्र में 2003 से 2019 के अध्ययन के अनुसार वार्षिक नदी बहाव में बर्फ पिघलने की हिस्सेदारी 65%, ग्लेशियर पिघलने की 19% और बारिश की 16% रही। इस दौरान ग्लेशियर क्षेत्र में 4.2% कमी दर्ज हुई। स्टोक के 300 से अधिक परिवारों की सिंचित खेती के लिए पिघला पानी महत्वपूर्ण है। ऐसे में बर्फ के जल्दी पिघलने से अल्प अवधि में बहाव बढ़ सकता है, लेकिन ग्लेशियरों के लगातार घटने से लंबे समय में गर्मियों के पानी का आधार कमजोर पड़ सकता है।
एक अध्ययन में यह भी बताया गया है कि हिमालयी नदियां आर्कटिक की नदियों की तुलना में ग्लोबल वॉर्मिंग पर अलग तरह से प्रतिक्रिया करती हैं। इसकी वजह दोनों जगहों के प्राकृतिक हालात में अंतर होना है। आर्कटिक क्षेत्रों में जहां, पेड़-पौधे अक्सर नदी के किनारों को बांधे रखने और नदी के बहाव को धीमा करने में मदद करते हैं। इसके विपरीत, कम वनस्पति वाले हिमालयी भूभागों में पिघलती बर्फ के कारण होने वाले कटाव और नदी के किनारों के ढहने के प्रति अधिक संवेदनशीलता देखने को मिलती है। इस कारण हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों में होने वाले बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो जाता है।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि तेजी से अस्थिर हो रही नदियों के कारण जल सुरक्षा, बाढ़ के खतरे, गाद से संबंधित आपदाएं और नदी तटों पर स्थित बुनियादी ढांचे पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। अध्ययन के मुताबिक हिमालयी नदियों की गतिशीलता में तेजी से हिमालयी जल स्रोतों पर निर्भर अरबों लोगों के लिए जल सुरक्षा, गाद से संबंधित आपदाओं और नदी तट के बुनियादी ढांचे की स्थिरता के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
IIT इंदौर और JNU के वैज्ञानिकों ने भी अपने अध्ययन में पाया कि तापमान में वृद्धि और कम वनस्पति के कारण हिमालयी नदियां तेजी से अपना रास्ता बदल रही हैं और उनके किनारे कमजोर होकर ढह रहे हैं। नदी के उन हिस्सों में, जो प्राकृतिक रूप से बहने के लिए स्वतंत्र थे, प्रवास लगभग दोगुना हो गया, यानी लगभग 97% की वृद्धि हुई। नदियों ने अपना मार्ग भी अधिक बार बदला। इस मार्ग परिवर्तन के कारण मिट्टी के कटाव और भूस्खलन में तीव्रता देखने को मिली है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों के मिजाज में यह बदलाव हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान, सिकुड़ते ग्लेशियरों और जमी हुई ज़मीन के पिघलने से काफी हद तक मेल खाते हैं।
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