केवल नगरपालिका के पानी के बिल के आधार पर यह नहीं समझा जा सकता कि भारत में किसी परिवार के लिए पानी का खर्च कितना बोझ है।

केवल नगरपालिका के पानी के बिल के आधार पर यह नहीं समझा जा सकता कि भारत में किसी परिवार के लिए पानी का खर्च कितना बोझ है।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय शहरों में बढ़ सकते हैं पानी के दाम, जानिए कैसे?

बढ़ती गर्मी, सूखा और अनिश्चित होते जल स्रोत भारतीय शहरों में पानी की लागत बढ़ा सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस बढ़ती कीमत का बोझ कौन उठाएगा और इसका सबसे अधिक असर किन परिवारों पर पड़ेगा?
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जलवायु परिवर्तन और पानी की बात होती है तो आमतौर पर चर्चा सूखे, बाढ़, घटते भूजल और अनियमित बारिश के इर्द-गिर्द होती है। लेकिन इस संकट का एक आर्थिक पहलू भी है, जिस पर भारत में अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।

दरअसल पानी की कमी अब लोगों की जेब पर सीधे तौर पर बोझ डालने लगी है। इसका असर शहरों में दिखने लगा है, जो आने वाले समय में और गंभीर हो सकता है। यानि कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में शहरों में पानी की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।

जैसे-जैसे जमीन के ऊपर ऊंची इमारतें खड़ी हो रही हैं, वैसे-वैसे नीचे स्थित एक्व‍िफर नष्‍ट या क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। ऐसे में शहरी बोरवेल अब बिलकुल भी भरोसेमंद नहीं रह गए हैं।

ऐसे में शहरों को पानी के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ेंगे। उन्हें दूर की नदियों से पानी लाना पड़ सकता है या गहरे भूजल पर उनकी निर्भरता बढ़ सकती है।

जुलाई 2026 में जर्नल Nature Sustainability में प्रकाशित एक नया अध्ययन इसी मुद्दे की ओर ध्यान खींचता है। इस शोध में अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित सांता क्रूज़ शहर को केस स्टडी बनाया गया है। अध्ययन में जलवायु परिवर्तन, पुराने होते जल ढांचे, घरेलू मांग और जलापूर्ति संस्थाओं के निवेश के बीच संबंध की पड़ताल की गई है।

शोध में यह देखा गया है कि इन सभी कारकों का पानी की उपलब्धता और उसे बनाए रखने की क्षमता पर क्या असर पड़ सकता है। आसान शब्दों में, इसका मतलब है कि पर्याप्त और सुरक्षित पानी का खर्च किसी परिवार की आय पर कितना बोझ डालता है।

अध्ययन के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं : 

  • शोध बताता है कि केवल जलवायु परिवर्तन के कारण ही भविष्य में 7 से 16 फ़ीसद और परिवार ऐसे हो सकते हैं, जिनके लिए पानी का खर्च वहन करना मुश्किल होगा।

  • वर्तमान में सांता क्रूज़ के करीब 19 फ़ीसद परिवार पानी पर अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी की तय की गई खर्च सीमा से अधिक खर्च कर रहे हैं।

  • मध्यम स्तर के जलवायु परिवर्तन की स्थिति में यह आंकड़ा 26 फ़ीसद तक पहुंच सकता है, जबकि अधिक सूखे की स्थिति में 35 फ़ीसद तक बढ़ सकता है।

  • अधिक गंभीर जल संकट से निपटने के लिए शहर को नया और महंगा जल ढांचा तैयार करना पड़ सकता है। अध्ययन के अनुसार, ऐसी स्थिति में मध्य सदी तक औसत घरेलू पानी का बिल लगभग दोगुना हो सकता है।

  • लेकिन सांता क्रूज़ भारत नहीं है। यहां जल आपूर्ति की व्यवस्था, लोगों की आय, पानी की कीमत तय करने का तरीका और सुरक्षित पानी तक पहुंच की असमानता बिल्कुल अलग है। 

इस अध्ययन के आंकड़ों को सीधे भारतीय शहरों पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी यह अध्ययन भारत के लिए एक जरूरी सवाल उठाता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में पानी उपलब्ध कराने की बढ़ती कीमत कौन चुकाएगा?

भारत में 'पानी का बिल' शायद सही पैमाना ही नहीं है

केवल नगरपालिका के पानी के बिल के आधार पर यह नहीं समझा जा सकता कि भारत में किसी परिवार के लिए पानी का खर्च कितना बोझ है। कई परिवारों को नियमित और पर्याप्त पाइप जलापूर्ति नहीं मिलती। ऐसे परिवारों को पानी की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भर होना पड़ता है।

शहरी भारत में पानी तक पहुंच और परिवारों के जल खर्च पर 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन भी इस समस्या की ओर ध्यान दिलाता है। यह अध्ययन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय यानी NSSO के 76वें दौर के आंकड़ों पर आधारित था।

इसमें पाया गया कि पानी तक पहुंच की असमानता परिवारों के जल खर्च को भी प्रभावित करती है। इसका मतलब है कि कम नगरपालिका बिल हमेशा सस्ते पानी का प्रमाण नहीं होता। कोई परिवार बहुत कम जल शुल्क चुका सकता है।

<div class="paragraphs"><p>जल संकट की आर्थिक कीमत हमेशा नगरपालिका के बिल में दिखाई नहीं देती। कई परिवारों के लिए यह टैंकर के बढ़े हुए दाम के रूप में सामने आती है। </p></div>

जल संकट की आर्थिक कीमत हमेशा नगरपालिका के बिल में दिखाई नहीं देती। कई परिवारों के लिए यह टैंकर के बढ़े हुए दाम के रूप में सामने आती है।

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शहरों में बढ़ रहा टैंकरों पर खर्च 

यह भी संभव है कि उसे नगरपालिका से पानी का कोई बिल ही न मिलता हो। फिर भी उसे टैंकर, पानी के कैन या दूसरे निजी स्रोतों पर काफी पैसा खर्च करना पड़ सकता है।

भारतीय मानव बस्ती संस्थान यानी IIHS की एक रिपोर्ट भी इस अंतर को दिखाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में टैंकर से मिलने वाला पानी नगरपालिका या निजी बोरवेल के पानी से 3 से 50 गुना तक महंगा हो सकता है।

पानी को पीने लायक बनाने में अतिरिक्त खर्च 

घरेलू फिल्टर और पानी पंप करने में खर्च होने वाली बिजली भी परिवारों का जल खर्च बढ़ा सकती है। ऐसे खर्च नगरपालिका के पानी के बिल में दिखाई नहीं देते।

यही कारण है कि भारत में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि नगरपालिका का पानी कितना महंगा है। असली सवाल यह है कि एक परिवार को अपनी रोजमर्रा की जरूरत के लिए पर्याप्त और सुरक्षित पानी जुटाने पर कुल कितना खर्च करना पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। सूखा, बढ़ती गर्मी और अनिश्चित बारिश मौजूदा जल स्रोतों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ सकती है। 

इसका आर्थिक बोझ खास तौर पर उन परिवारों के लिए गंभीर हो सकता है, जिनकी आय पहले से सीमित है।

बेंगलुरु ने दिखाया कि जल संकट सीधे परिवार के बजट तक कैसे पहुंचता है

वर्ष 2024 में बेंगलुरु ने गंभीर जल संकट का सामना किया। कमजोर मानसून के बाद भूजल स्तर गिर गया था। कावेरी बेसिन के जलाशयों में भी पानी कम था। इसका असर शहर की जलापूर्ति पर पड़ा।

संकट बढ़ने के साथ निजी टैंकरों की कीमत भी बढ़ गई। फरवरी 2024 में कुछ लोगों को 12,000 लीटर के एक टैंकर के लिए 2,000 रुपये तक देने पड़े। एक महीने पहले यही टैंकर करीब 1,200 रुपये में मिल रहा था। यानी एक महीने में कीमत लगभग 67 फ़ीसद बढ़ गई।

यह उदाहरण एक महत्वपूर्ण बात सामने लाता है। जल संकट की आर्थिक कीमत हमेशा नगरपालिका के बिल में दिखाई नहीं देती। कई परिवारों के लिए यह टैंकर के बढ़े हुए दाम के रूप में सामने आती है।

बेंगलुरु की जल व्यवस्था कावेरी और भूजल, दोनों पर निर्भर है। शहर की जल जरूरत पूरी करने में भूजल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। 2024 के संकट के दौरान शहर के हजारों बोरवेल सूख गए थे।

कावेरी से पानी लाना भी आसान नहीं है। बेंगलुरु समुद्र तल से 900 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर बसा है। कावेरी का पानी टीके हल्ली से शहर तक पहुंचाने के लिए उसे लगभग 450 मीटर ऊपर पंप करना पड़ता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर बिजली की जरूरत होती है।

चेन्नई: पानी की सुरक्षा के लिए समुद्र की ओर, लेकिन किस कीमत पर?

बेंगलुरु का उदाहरण बताता है कि जल संकट टैंकरों की कीमत बढ़ा सकता है। चेन्नई का अनुभव एक अलग सवाल उठाता है। जब पारंपरिक जल स्रोत कम भरोसेमंद हो जाएं, तो नए स्रोतों से पानी जुटाने की कीमत कितनी बढ़ सकती है?

चेन्नई की जल व्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर रही है। शहर को पानी देने वाले प्रमुख जलाशय बारिश से भरते हैं। इसलिए कमजोर मानसून और लंबे सूखे का सीधा असर जलापूर्ति पर पड़ सकता है।

वर्ष 2019 में चेन्नई ने गंभीर जल संकट का सामना किया। शहर के चार प्रमुख जलाशय लगभग सूख गए थे। कई इलाकों में लोगों को टैंकरों और दूसरे वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना पड़ा। इस संकट ने दिखाया कि बारिश की कमी एक बड़े शहर की जल व्यवस्था को कितनी तेजी से प्रभावित कर सकती है।

इस असुरक्षा को कम करने के लिए चेन्नई ने समुद्री पानी को मीठा बनाने वाले संयंत्रों में निवेश बढ़ाया है। शहर में मिनजुर का 100 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) क्षमता वाला संयंत्र है। नेम्मेली में 110 और 150 MLD क्षमता वाले दो संयंत्र बनाए गए हैं।

अब पेरूर में 400 MLD क्षमता का एक और बड़ा संयंत्र बनाया जा रहा है। तमिलनाडु सरकार के 2025-26 के नीतिगत दस्तावेज के अनुसार, इस परियोजना की लागत 6,078.40 करोड़ रुपये है। इसके पूरा होने पर चेन्नई की समुद्री पानी को मीठा बनाने की क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी होगी।

लेकिन इस अतिरिक्त जल सुरक्षा की अपनी आर्थिक और ऊर्जा लागत है।

फरवरी 2026 में चेन्नई मेट्रो वाटर के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, एक किलोलीटर समुद्री पानी को मीठा करने में 50 से 60 रुपये खर्च होते हैं। इसके मुकाबले झीलों से मिलने वाले एक किलोलीटर पानी की आपूर्ति पर करीब 8 रुपये खर्च होते हैं।

इन आंकड़ों के आधार पर, समुद्री पानी को मीठा करने की लागत झील के पानी की तुलना में लगभग 6 से 7.5 गुना अधिक है। यही वजह है कि जलाशयों में पर्याप्त पानी होने पर महंगे समुद्री पानी पर निर्भरता कम की जा सकती है। फरवरी 2026 में चेन्नई मेट्रो वाटर ने इसी कारण नेम्मेली के 150 MLD संयंत्र का उत्पादन घटाया था।

समुद्री पानी को मीठा बनाने में बिजली की भी बड़ी भूमिका है। परियोजना से जुड़ी जानकारी के अनुसार, नेम्मेली के 110 MLD संयंत्र में एक घन मीटर पानी तैयार करने के लिए औसतन 3.6 से 3.78 किलोवाट-घंटा बिजली खर्च होती है। यानी पानी की लागत ऊर्जा की कीमत से भी जुड़ी हुई है।

इसका मतलब यह नहीं है कि चेन्नई को समुद्री पानी को मीठा बनाने वाले संयंत्रों से बचना चाहिए। मानसून पर निर्भर शहर के लिए ये संयंत्र एक अतिरिक्त और अपेक्षाकृत भरोसेमंद जल स्रोत दे सकते हैं। खास तौर पर सूखे और जलाशयों में पानी की कमी के समय इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

<div class="paragraphs"><p>सूखा, बढ़ती गर्मी और अनिश्चित बारिश मौजूदा जल स्रोतों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ सकती है। </p></div>

सूखा, बढ़ती गर्मी और अनिश्चित बारिश मौजूदा जल स्रोतों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ सकती है।

फ़ोटो: इंडिया वाटर पोर्टल/फ़्लिकर

लेकिन यह सुरक्षा मुफ्त नहीं है। पेरूर जैसे बड़े संयंत्रों के निर्माण पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। उन्हें चलाने के लिए लगातार ऊर्जा की जरूरत होती है। पानी को शहर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने का खर्च भी इसमें जुड़ता है।

यहीं से जलवायु परिवर्तन से निपटने की बढ़ती लागत और लोगों के लिए पानी का खर्च एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। यदि बदलती जलवायु के कारण पारंपरिक स्रोत कम भरोसेमंद होते हैं, तो शहरों को महंगे जल स्रोतों पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। इससे पानी उपलब्ध कराने की कुल लागत बढ़ सकती है।

ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि बढ़ी हुई लागत का बोझ सरकार, पानी की आपूर्ति करने वाली संस्था और उपभोक्ताओं के बीच कैसे बँटेगा।

चेन्नई का अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है। यह दिखाता है कि भविष्य की जल सुरक्षा केवल नए स्रोत खोजने का सवाल नहीं है। 

यह भी देखना होगा कि उनसे मिलने वाले पानी की आर्थिक और ऊर्जा लागत कितनी है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि महंगे जल स्रोतों के कारण सुरक्षित पानी कम आय वाले परिवारों की पहुंच से बाहर न हो जाए।

क्या गरीब परिवार वास्तव में पानी के लिए ज्यादा कीमत चुकाते हैं?

पानी की बढ़ती कीमत का असर सभी परिवारों पर एक जैसा नहीं पड़ता। इसका बोझ इस बात पर भी निर्भर करता है कि परिवार की आय कितनी है।

दिल्ली में 2025 में किया गया पानी तक पहुंच का एक ऑडिट इस असमानता की तस्वीर पेश करता है। यह सर्वे 12 अनौपचारिक बस्तियों के 500 परिवारों के बीच किया गया था।

ऑडिट में कम आय वाले परिवारों पर पानी के खर्च का भारी बोझ सामने आया। सर्वे में शामिल 34 फ़ीसद परिवार अपनी मासिक आय का 15 फ़ीसद तक पीने का पानी हासिल करने पर खर्च कर रहे थे। इन परिवारों की मासिक आय 6,000 से 10,000 रुपये के बीच थी।

कई परिवारों का पानी पर होने वाला मासिक खर्च 500 से 1,500 रुपये के बीच था। करीब 80 फ़ीसद लोगों ने बताया कि उन्हें अक्सर या कभी-कभी पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। गर्मियों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि पानी की एक ही कीमत का असर सभी परिवारों पर समान नहीं होता। कम आय वाले परिवार के लिए पानी पर होने वाला खर्च उसके बजट का बड़ा हिस्सा बन सकता है।

लेकिन भारतीय शहरों में पानी की यह असमानता केवल आय से तय नहीं होती। परिवार कहां रहता है और उसके घर तक नियमित जलापूर्ति पहुंचती है या नहीं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

दिल्ली के ऑडिट में शामिल परिवारों में 34 फ़ीसद निजी जल विक्रेताओं पर निर्भर थे। वहीं 29 फ़ीसद परिवार दिल्ली जल बोर्ड के टैंकरों और 21 फ़ीसद वाटर एटीएम से पानी लेते थे।

यहां एक विडंबना सामने आती है। कम आय वाले कई परिवारों के घरों तक नियमित पाइप जलापूर्ति नहीं पहुंचती। ऐसे में उन्हें वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। पर्याप्त और सुरक्षित पानी हासिल करना उनके लिए अधिक महंगा हो सकता है।

पानी की एक और कीमत है, जो किसी बिल में दिखाई नहीं देती। वह है इसे जुटाने में लगने वाला समय।

दिल्ली के इसी ऑडिट में करीब 37 फ़ीसद लोगों ने बताया कि पानी के लिए लंबी कतारों में इंतजार करने से उनका काम प्रभावित हुआ। कई लोगों के कई घंटे भी इसी में निकल गए। कम आय वाले परिवारों के लिए समय का यह नुकसान आर्थिक बोझ को और बढ़ा सकता है।

इसलिए पानी की वास्तविक कीमत केवल रुपये में नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि उसे जुटाने में कितना समय और श्रम लगता है।

जलवायु परिवर्तन इस पहले से मौजूद असमानता को और गंभीर बना सकता है। सूखे, अत्यधिक गर्मी और कमजोर मानसून के दौरान स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे समय में निजी पानी की मांग और कीमत भी बढ़ सकती है। बेंगलुरु के 2024 के जल संकट में टैंकरों की बढ़ती कीमत इसका एक उदाहरण थी।

हालांकि शहरी जल असमानता के लिए अकेले जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार नहीं है। असमान जलापूर्ति, कमजोर बुनियादी ढांचा, भूजल का अत्यधिक दोहन और अनौपचारिक बस्तियों में पर्याप्त सेवाओं की कमी पहले से मौजूद समस्याएं हैं। जलवायु परिवर्तन इन्हें और गंभीर बना सकता है।

यानी एक ही जल संकट पूरे शहर को प्रभावित कर सकता है, लेकिन उसकी कीमत सभी लोग समान रूप से नहीं चुकाते। किसी के लिए इसका मतलब पानी का इस्तेमाल थोड़ा कम करना हो सकता है। किसी दूसरे परिवार के लिए इसका अर्थ पीने और खाना बनाने के लिए पर्याप्त पानी जुटाने की चिंता हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शहरों को भविष्य में पानी कहां से मिलेगा। उतना ही जरूरी सवाल यह है कि उस पानी की कीमत कौन चुका पाएगा और कौन पीछे छूट जाएगा।

भारत में पानी के वास्तविक खर्च पर आंकड़ों की कमी

भारत में भूजल स्तर, जलाशयों, पाइप जलापूर्ति और घरेलू कनेक्शन से जुड़े कई तरह के आंकड़े उपलब्ध हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल का स्पष्ट जवाब अब भी मुश्किल है। एक शहरी परिवार पर्याप्त और सुरक्षित पानी हासिल करने पर वास्तव में कितना खर्च करता है?

ऐसे नियमित और विस्तृत आंकड़े सीमित हैं, जो पानी तक पहुंच और परिवारों के वास्तविक जल खर्च की पूरी तस्वीर दे सकें।

यह कमी एक बड़ी समस्या पैदा करती है। इससे यह समझना मुश्किल होता है कि जल संकट का आर्थिक बोझ किन परिवारों पर सबसे अधिक पड़ता है। यह पता लगाना भी कठिन होता है कि सूखे या अत्यधिक गर्मी के दौरान यह खर्च कितना बढ़ जाता है।

इसलिए शहरों को केवल नल कनेक्शन की संख्या या आपूर्ति किए गए पानी की मात्रा नहीं मापनी चाहिए। परिवारों के पानी पर होने वाले वास्तविक खर्च को भी दर्ज किया जाना चाहिए। 

इसमें वैकल्पिक स्रोतों पर होने वाला खर्च शामिल होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि परिवार अपनी आय का कितना हिस्सा पर्याप्त और सुरक्षित पानी हासिल करने पर खर्च करते हैं।

पानी की उपलब्धता और नियमितता भी महत्वपूर्ण है। किसी घर में नल कनेक्शन होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। यह भी पता होना चाहिए कि उस नल में कितनी नियमितता से और कितनी मात्रा में पानी आता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे आंकड़ों की जरूरत और बढ़ जाती है। बदलती बारिश, लंबे सूखे और बढ़ती गर्मी शहरों की जल व्यवस्था पर नया दबाव डाल सकते हैं। लेकिन इन बदलावों का आर्थिक असर सभी परिवारों पर समान नहीं होगा। इसे समझने के लिए अलग-अलग आय वर्गों का वास्तविक जल खर्च जानना जरूरी है।

जब तक इस बारे में नियमित और विस्तृत आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक यह समझना मुश्किल होगा कि जलवायु परिवर्तन के कारण परिवारों के लिए पानी का खर्च कितना बढ़ रहा है।

जलवायु अनुकूलन का खर्च कौन उठाएगा?

जलवायु परिवर्तन शहरों के जल स्रोतों पर दबाव बढ़ा सकता है। ऐसे में जल व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नए बुनियादी ढांचे और वैकल्पिक जल स्रोतों पर निवेश बढ़ सकता है।

लेकिन हर नए समाधान के साथ एक बुनियादी सवाल जुड़ा है - इसकी कीमत कौन चुकाएगा?

नई जल परियोजनाओं पर बड़ी रकम खर्च होती है। इसके बाद उन्हें चलाने और रखरखाव की लागत भी आती है। सरकार इस खर्च को सार्वजनिक धन से चुका सकती है। 

पानी की आपूर्ति करने वाली संस्था कर्ज ले सकती है। लागत का कुछ हिस्सा जल शुल्क के जरिए उपभोक्ताओं से भी वसूला जा सकता है। कई मामलों में इन सभी तरीकों का मिला-जुला इस्तेमाल होता है।

इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पानी उपलब्ध कराने की पूरी लागत उपभोक्ताओं से वसूली जाए। यह भी तय करना होगा कि किससे कितनी कीमत ली जाए। साथ ही, हर व्यक्ति को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए किफायती पानी उपलब्ध होना चाहिए।

भारत में यह सवाल और जटिल है। कई शहरों में पानी की आपूर्ति करने वाली संस्थाएं पहले से वित्तीय दबाव में हैं। पानी को साफ करने, पंप करने और घरों तक पहुंचाने में खर्च आता है। कई जगह जल शुल्क इस पूरी लागत को पूरा नहीं करता।

लेकिन केवल जल शुल्क बढ़ाना भी समाधान नहीं है। इससे सीमित आय वाले परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। दूसरी ओर, पानी की आपूर्ति करने वाली संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जो इन दोनों चिंताओं के बीच संतुलन बनाए।

बुनियादी जरूरत के लिए पर्याप्त पानी किफायती रहना चाहिए। इसके लिए प्रगतिशील जल शुल्क की व्यवस्था अपनाई जा सकती है। इसमें बुनियादी जरूरत का पानी कम कीमत पर मिले और अधिक खपत पर ज्यादा शुल्क लगे।

लेकिन ऐसी व्यवस्था अपने आप न्यायपूर्ण नहीं हो जाती। यदि कम आय वाले कई परिवार एक ही कनेक्शन साझा करते हैं, तो उनकी कुल खपत अधिक दिखाई दे सकती है। 

इससे उन्हें ऊँची दर पर पानी का भुगतान करना पड़ सकता है। इसलिए जल शुल्क तय करते समय परिवार की आय, कनेक्शन की स्थिति और वास्तविक खपत को ध्यान में रखना जरूरी है।

किसी जलवायु अनुकूलन परियोजना का आकलन केवल उसकी लागत और उससे मिलने वाले पानी के आधार पर नहीं होना चाहिए। 

यह भी देखना होगा कि उसका लाभ किन समुदायों को मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा। साथ ही, यह सुनिश्चित करना होगा कि कम आय वाले परिवार सुरक्षित पानी से वंचित न हों।

भारत के शहरों को भविष्य में पानी पर अधिक निवेश करना पड़ सकता है। लेकिन केवल निवेश बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी तय करना होगा कि उसकी आर्थिक कीमत किससे और किस अनुपात में वसूली जाए।

जलवायु अनुकूलन तभी न्यायपूर्ण होगा, जब वह शहर को पानी की कमी से बचाए और सुरक्षित पानी को लोगों की पहुंच से बाहर भी न होने दे।

शहरों को क्या करना चाहिए?

जलवायु परिवर्तन के दौर में शहरों की जल सुरक्षा का अर्थ केवल पर्याप्त पानी जुटाना नहीं है। पानी सुरक्षित और भरोसेमंद भी होना चाहिए। उसकी कीमत भी ऐसी होनी चाहिए, जिसे लोग चुका सकें।

सबसे पहले शहरों को नियमित रूप से यह पता लगाना चाहिए कि अलग-अलग आय वर्गों के परिवार पानी पर वास्तव में कितना खर्च करते हैं।

इसमें वैकल्पिक स्रोतों पर होने वाला खर्च और पानी जुटाने में लगने वाला समय भी शामिल हो।

दूसरा जरूरी कदम है कि शहर अपनी जल योजनाओं में भविष्य के जलवायु जोखिमों को शामिल करें। नई परियोजनाएं केवल आज की मांग के आधार पर नहीं बननी चाहिए। 

यह भी देखना होगा कि बदलती बारिश, लंबे सूखे और बढ़ती गर्मी से पानी की उपलब्धता और लागत पर क्या असर पड़ेगा। साथ ही, इन परिस्थितियों में नई परियोजनाएं कितनी भरोसेमंद रहेंगी।

हर जल संकट का जवाब कोई नई और महंगी परियोजना नहीं होना चाहिए। दूर की नदियों से पानी लाने या समुद्री पानी को मीठा बनाने से पहले शहरों को अपने स्थानीय जल स्रोतों की स्थिति देखनी चाहिए।

झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा शहरी जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण से स्थानीय स्तर पर पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है। इससे भूजल पर दबाव कम करने में भी मदद मिल सकती है।

इसके साथ शहरों को पाइपलाइन में होने वाले पानी के नुकसान को कम करना होगा। उपचारित अपशिष्ट जल का सुरक्षित दोबारा इस्तेमाल भी जरूरी है। इससे पीने योग्य साफ पानी की मांग कम करने में मदद मिल सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर शहर बड़ी परियोजनाओं से बच सकता है। चेन्नई जैसे तटीय महानगरों में समुद्री पानी को मीठा बनाना जल स्रोतों में विविधता ला सकता है। 

लेकिन ऐसी परियोजनाओं का आकलन केवल उनसे मिलने वाले अतिरिक्त पानी के आधार पर नहीं होना चाहिए। उनकी पूरी लागत और पर्यावरणीय व सामाजिक प्रभाव भी सार्वजनिक होने चाहिए। केवल निर्माण लागत बताना पर्याप्त नहीं है।

परियोजना को चलाने, बिजली देने, रखरखाव करने और पानी पहुँचाने में होने वाला दीर्घकालिक खर्च भी सामने आना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यह आर्थिक बोझ कौन उठाएगा और क्या भविष्य में इसका असर घरेलू जल शुल्क पर पड़ सकता है।

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यह आर्थिक बोझ कौन उठाएगा और क्या भविष्य में इसका असर घरेलू जल शुल्क पर पड़ सकता है।

सबसे जरूरी बात यह है कि कम आय वाले परिवारों को जल नीति के केंद्र में रखा जाए। किसी जलवायु अनुकूलन योजना की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि उससे कितना अतिरिक्त पानी मिला।

यह भी देखना होगा कि सबसे कमजोर परिवारों को पर्याप्त और सुरक्षित पानी मिल रहा है या नहीं। आपूर्ति की नियमितता और पानी की कीमत भी इस आकलन का हिस्सा होनी चाहिए।

भारत के शहरों के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें बदलती जलवायु के बीच पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी है। साथ ही यह भी देखना है कि सुरक्षित पानी लोगों की पहुंच से बाहर न हो जाए।

भविष्य की जल सुरक्षा की असली कसौटी केवल यह नहीं होगी कि किसी शहर के पास कितना पानी है। यह भी देखना होगा कि हर परिवार को पर्याप्त और सुरक्षित पानी नियमित रूप से मिलता है या नहीं, और क्या उसकी कीमत लोगों की पहुंच में है।

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