CGWB के हालिया आकलन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 449 अरब घन मीटर भूजल रिचार्ज होता है। जबकि निकाले जाने वाले पानी की मात्रा लगभग 241 अरब घन मीटर है।

CGWB के हालिया आकलन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 449 अरब घन मीटर भूजल रिचार्ज होता है। जबकि निकाले जाने वाले पानी की मात्रा लगभग 241 अरब घन मीटर है।

चित्र: DNA India

मुंबई का जल संकट: कितनी तेजी से खाली हो रहा है ज़मीन के नीचे का पानी?

बढ़ते कंक्रीटीकरण और अनियंत्रित दोहन के बीच दम तोड़ता शहरी भूजल: समय रहते 'भूजल बजट' और कड़े प्रबंधन से ही बचेगी बात।
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  • अनियंत्रित बोरवेल और टैंकरों के कारण शहरों में कितनी पानी निकाला जा रहा है, इसका कोई सटीक आंकड़ा नहीं है।

  • बांधों में पानी कम होते ही मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहर पूरी तरह भूजल पर निर्भर हो जाते हैं।

  • सीमेंट के बढ़ते जाल से पानी जमीन में नहीं जाता और जलस्तर गिरने से तटीय इलाकों में खारापन बढ़ रहा है।

मुंबई का हालिया संकट: सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं

मई 2025 में जब मुंबई के सात जलाशयों में उपलब्ध पानी का भंडार उनकी कुल क्षमता के लगभग 14 फ़ीसद तक सिमट गया, तब बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को शहर में 10 फ़ीसद जल कटौती लागू करनी पड़ी। 

इसी दौरान निजी टैंकर संचालकों की हड़ताल ने हजारों आवासीय सोसायटियों, निर्माण परियोजनाओं और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की चिंता बढ़ा दी। संकट के इन दिनों में एक बार फिर यह सवाल सामने आया कि जब सतही जल स्रोत दबाव में आते हैं, तब मुंबई जैसे महानगरों का सहारा आखिर क्या होता है? इसका जवाब है ज़मीन के नीचे छुपा हुआ भूजल।

मुंबई का हालिया संकट केवल एक शहर की कहानी नहीं है। यह उस व्यापक चुनौती का संकेत है जिसका सामना भारत के अधिकांश बड़े शहर कर रहे हैं। बढ़ती आबादी, अनिश्चित मानसून, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जल मांग के बीच भूजल शहरी जल सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण लेकिन कम समझा गया आधार बनता जा रहा है।

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<div class="paragraphs"><p>CGWB के हालिया आकलन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 449 अरब घन मीटर भूजल रिचार्ज होता है। जबकि निकाले जाने वाले पानी की मात्रा लगभग 241 अरब घन मीटर है।</p></div>

भारत में भूजल का गणित: आंकड़े और नीति आयोग की चेतावनी

भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के अनुसार देश हर वर्ष लगभग 245 अरब घन मीटर भूजल का दोहन करता है। हालांकि इसका अधिकांश हिस्सा कृषि क्षेत्र में उपयोग होता है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में भी भूजल पर निर्भरता तेजी से बढ़ रही है।

CGWB के हालिया आकलन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 449 अरब घन मीटर भूजल रिचार्ज होता है। जबकि निकाले जाने वाले पानी की मात्रा लगभग 241 अरब घन मीटर है। 

राष्ट्रीय स्तर पर यह स्थिति संतुलित दिख सकती है, लेकिन सभी क्षेत्रों की हालत एक जैसी नहीं है। कई शहरों और उपनगरी इलाकों में भूजल उससे कहीं तेज़ी से निकाला जा रहा है जितनी तेजी से वह रिचार्ज हो रहा है। 

नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद सहित भारत के 21 बड़े शहर भूजल संकट के गंभीर खतरे का सामना कर सकते हैं। रिपोर्ट में इसका भी ज़िक्र है कि इस संकट का असर लगभग 10 करोड़ की आबादी पर पड़ सकता है।

जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “शहरों की जल योजनाएं आमतौर पर बांधों और पाइपलाइन नेटवर्क पर केंद्रित रहती हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि भूजल शहरी जल व्यवस्था का एक समानांतर और अक्सर अनियंत्रित स्रोत बन चुका है। समस्या यह है कि हम इसका उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन इसकी निगरानी पर्याप्त नहीं है।”

मुंबई: सतही जल का भ्रम और अनियंत्रित भूजल का सच

मुंबई की आधिकारिक जलापूर्ति मुख्य रूप से भातसा, मोडक सागर, तानसा, विहार, तुलसी और अन्य जलाशयों से होती है। बीएमसी प्रतिदिन लगभग 3,950 मिलियन लीटर पानी शहर को उपलब्ध कराती है।

फिर भी शहर के कई हिस्सों में भूजल की भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से उपनगरों, निर्माण वाली जगहों, औद्योगिक क्षेत्रों और टैंकर नेटवर्क में बड़ी मात्रा में पानी बोरवेलों से निकाला जाता है।

मुंबई में भूजल पर निर्भरता का कोई स्पष्ट आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। लेकिन, सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, शहर में 17,000 से अधिक कुएं, बोरवेल और रिंग वेल व्यावसायिक जल आपूर्ति से जुड़े हैं। 

इसके बावजूद मई 2025 तक केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) ने केवल 619 जल स्रोतों को ही अनुमति दी थी। इससे साफ़ होता है कि भूजल निकासी का बड़ा हिस्सा अभी भी पूरी तरह निगरानी में नहीं है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार फिलहाल मुंबई के अधिकांश हिस्सों में भूजल पर तत्काल संकट के संकेत नहीं हैं। लेकिन शहर के विस्तार और बढ़ती पानी की मांग ने नई चिंताएं पैदा की हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल भूजल की मात्रा पर नहीं, बल्कि उसके उपयोग और निगरानी पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

नियमित जलापूर्ति व्यवस्था से मिलने वाला पानी पूरे मुंबई शहर के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसा अनुमान है कि शहर की दैनिक मांग लगभग 4,665 मिलियन लीटर है, जबकि लगभग 4,100 मिलियन लीटर ही पानी मिलता है। 

इस अंतर को भरने में टैंकरों और भूजल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि टैंकरों की हड़ताल या आपूर्ति में किसी भी तरह की रुकावट का असर तुरंत शहर के हजारों उपभोक्ताओं पर पड़ने लगता है।

CAG की 2021 की समीक्षा
में सामने आया कि कई परियोजनाएं जरूरी अनुमति के बिना भूजल का उपयोग कर रही थीं।

बेंगलुरु और चेन्नई से सबक: जब सूखने लगे बोरवेल

यदि भूजल संकट को समझना हो तो बेंगलुरु और चेन्नई महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। बेंगलुरु जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (BWSSB) के अनुसार शहर की लगभग एक-तिहाई आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूजल पर निर्भर है।

2024 में शहर के कई इलाकों में हजारों बोरवेल सूख गए थे, जिसके बाद टैंकरों की मांग और कीमत दोनों बढ़ गई थीं। वहीं चेन्नई ने 2019 में “डे-ज़ीरो” जैसी स्थिति का सामना किया था, जब शहर के चार प्रमुख जलाशय लगभग खाली हो गए थे। उस समय बड़ी संख्या में लोग भूजल और टैंकरों पर निर्भर हो गए थे। लेकिन अत्यधिक दोहन के कारण कई इलाकों में भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया।

जल विशेषज्ञ विश्वनाथ श्रीकांतैया कहते हैं, “शहरों में भूजल को अक्सर निजी संसाधन समझा जाता है, जबकि यह एक साझा सार्वजनिक संपदा है। जब हजारों लोग बिना समन्वय के पानी निकालते हैं, तो पूरा जलभंडार प्रभावित होता है।”

डेटा की भारी कमी और पानी की गिरती गुणवत्ता (अदृश्य खतरा)

भूजल संकट की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह दिखाई नहीं देता। CGWB देशभर में निगरानी कुओं के माध्यम से भूजल स्तर का आकलन करता है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में वास्तविक निकासी का सटीक डेटा अक्सर उपलब्ध नहीं होता। कितने बोरवेल सक्रिय हैं, प्रतिदिन कितना पानी निकाला जा रहा है और किन इलाकों में जलस्तर तेजी से गिर रहा है। कई शहरों में इन सवालों से जुड़े जवाब अब भी स्पष्ट नहीं हैं।

CAG की 2021 की समीक्षा में सामने आया कि कई परियोजनाएं जरूरी अनुमति के बिना भूजल का उपयोग कर रही थीं। कई मामलों में नियमों का पालन भी नहीं किया जा रहा था। यह दिखाता है कि भूजल संकट केवल पानी की कमी का नहीं, बल्कि उसके उपयोग की निगरानी और प्रबंधन का भी है।

विश्व बैंक और विभिन्न शोध संस्थानों की रिपोर्टें बताती हैं कि भारत के अधिकांश शहरों में भूजल उपयोग का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक और अपर्याप्त रूप से दर्ज है। यही कारण है कि संकट अक्सर तब सामने आता है जब बोरवेल सूखने लगते हैं या जल गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है।

तटीय शहरों पर खारे पानी का मंडराता संकट

भूजल संकट को अक्सर केवल पानी की उपलब्धता के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसकी गुणवत्ता से भी उतना ही गहरा संबंध है। कई बार जलस्तर नीचे जाने के साथ पानी की गुणवत्ता में भी बदलाव आने लगता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट और लवणता जैसी समस्याएं पहले से दर्ज की जा चुकी हैं।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि पानी कितना उपलब्ध है, बल्कि यह भी कि वह पीने और उपयोग के लिए कितना सुरक्षित है।

शहरों में भूजल को अक्सर निजी संसाधन समझा जाता है, जबकि यह एक साझा सार्वजनिक संपदा है। जब हजारों लोग बिना समन्वय के पानी निकालते हैं, तो पूरा जलभंडार प्रभावित होता है।

विश्वनाथ श्रीकांतैया, जल विशेषज्ञ, बायोम एनवायरमेंटल ट्रस्ट

तटीय शहरों में यह चुनौती और बढ़ जाती है। अध्ययन बताते हैं कि जरूरत से ज्यादा भूजल निकालने पर समुद्र का खारा पानी भूजल में मिल सकता है। इससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।

मुंबई, चेन्नई और अन्य तटीय शहरों के लिए यह चिंता का विषय है। ऐसे शहरों में भूजल की निगरानी केवल मात्रा के लिहाज से नहीं, बल्कि गुणवत्ता के लिहाज से भी होनी चाहिए। यही कारण है कि विशेषज्ञों द्वारा भूजल प्रबंधन जल स्तर के अलावा उसकी नियमित जांच से भी जोड़ने की सलाह देते हैं।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और विभिन्न जलवायु अध्ययनों के अनुसार मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कम दिनों में अत्यधिक वर्षा और लंबे शुष्क अंतराल अब अधिक सामान्य होते जा रहे हैं।

कंक्रीटीकरण और जलवायु परिवर्तन: बारिश तो है, पर रिचार्ज नहीं

दिलचस्प बात यह है कि कई शहरों में भारी बारिश होने के बावजूद भूजल संकट बना रहता है। मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में तेजी से बढ़ते कंक्रीटीकरण ने प्राकृतिक रिचार्ज क्षेत्रों को सीमित कर दिया है। तालाब, झीलें, आर्द्रभूमियां और खुली जमीन लगातार कम होती गई हैं।

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के कई अध्ययनों में पाया गया है कि शहरीकरण के कारण वर्षा जल का बड़ा हिस्सा जमीन में समाने के बजाय सीधे बह जाता है। इससे भूजल रिचार्ज की क्षमता घटती है। 

कई शहरों में वर्षा जल संचयन अनिवार्य है। लेकिन इसके ज़मीन पर सही तरह से लागू होने को लेकर सवाल बने हुए हैं। यही कारण है कि कई शहर एक ही समय में मानसून में बाढ़ और गर्मियों में जल संकट दोनों ही तरह के संकट का सामना कर रहे हैं।

जल संकट सबको बराबर प्रभावित नहीं करता

शहरी जल संकट का प्रभाव सभी वर्गों पर समान नहीं पड़ता। जिन आवासीय परिसरों के पास निजी बोरवेल या टैंकर खरीदने की क्षमता है, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं। 

दूसरी ओर सार्वजनिक जलापूर्ति पर निर्भर बस्तियां और निम्न आय वर्ग सबसे पहले प्रभावित होते हैं। इसलिए भूजल का सवाल केवल पानी तक सीमित नहीं है। यह शहरों में समान पहुंच और न्याय से भी जुड़ा है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और विभिन्न जलवायु अध्ययनों के अनुसार मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कम दिनों में अत्यधिक वर्षा और लंबे शुष्क अंतराल अब अधिक सामान्य होते जा रहे हैं।

ऐसी परिस्थितियों में भूजल एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। लेकिन अगर रिचार्ज की तुलना में दोहन अधिक होता रहे, तो यह सुरक्षा कवच भी कमजोर पड़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के दौर में भूजल दुनिया भर में जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक प्रबंधन और नियमित निगरानी आवश्यक है।

समाधान की राह: 'भूजल बजट' और वैज्ञानिक प्रबंधन की जरूरत

विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी जल सुरक्षा को केवल बांधों और पाइपलाइन नेटवर्क के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। भूजल को जल प्रबंधन की मुख्यधारा में शामिल करना होगा।

इसके लिए बोरवेलों का अनिवार्य पंजीकरण, भूजल निकासी की निगरानी, वर्षा जल संचयन का प्रभावी क्रियान्वयन, शहरी जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण और सार्वजनिक डेटा प्रणाली विकसित करना जरूरी है। 

कई विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि शहरों को अपने “भूजल बजट” तैयार करने चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितना पानी निकाला जा रहा है और कितना पुनर्भरित हो रहा है।

मानसून आने के बाद मुंबई का मौजूदा संकट कुछ समय के लिए कम हो सकता है। शहरों की जल सुरक्षा को केवल जलाशयों में उपलब्ध पानी से नहीं समझा जा सकता। जब भी सतही जल व्यवस्था दबाव में आती है, शहर चुपचाप भूजल की ओर मुड़ जाते हैं। 

भूजल शहरों की जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है। लेकिन इसकी निगरानी, संरक्षण और रिचार्ज पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में कई शहरों को पानी की मात्रा और गुणवत्ता दोनों मोर्चों पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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