

ओजोन परत की चर्चा सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV-B) किरणों से मनुष्य को बचाने के संदर्भ में होती है। लेकिन ओजोन की बात केवल त्वचा, आंखों और मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है।
UNEP के अनुसार, ओजोन में बदलाव से सतह तक पहुंचने वाली UV-B विकिरण की मात्रा बदलती है, जिसका प्रभाव जलीय खाद्य-श्रृंखला और मत्स्य संसाधनों पर पड़ सकता है।
इसका एक महत्वपूर्ण संबंध पानी और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र से भी है। ओजोन परत में कमी का मतलब पृथ्वी की सतह तक अधिक UV-B विकिरण पहुंचना है और इसका असर नदियों, झीलों, समुद्रों और इनमें रहने वाले सूक्ष्म जीवों से लेकर मछलियों तक पर पड़ सकता है।
समताप मंडल में मौजूद ओजोन एक तरह का प्राकृतिक फिल्टर है। यह सूर्य से आने वाली UV-B किरणों के एक बड़े हिस्से को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से रोकता है। यदि ओजोन परत कमजोर होती है, तो अधिक UV-B विकिरण धरती तक पहुंच सकता है। इसका असर सिर्फ जमीन पर मौजूद जीवों पर नहीं, बल्कि पानी की सतह के नीचे मौजूद जीवों पर भी पड़ता है।
UNEP के Environmental Effects Assessment Panel के अनुसार, UV-B विकिरण समुद्री और मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में रहने वाले फाइटोप्लैंकटन, शैवाल, छोटे जलीय जीवों और मछलियों के शुरुआती जीवन-चरणों को प्रभावित कर सकता है। फाइटोप्लैंकटन जलीय खाद्य-श्रृंखला की बुनियाद हैं, इसलिए उनमें होने वाला बदलाव आगे चलकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
पानी सूर्य की UV किरणों को पूरी तरह रोक नहीं देता। पानी कितना साफ या गंदला है, उसमें घुला हुआ जैविक पदार्थ कितना है और पानी की गहराई कितनी है, इन सब चीजों पर निर्भर करता है कि UV विकिरण कितनी गहराई तक पहुंच पाएगा।
UNEP की 2024 की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट बताती है कि पानी में मौजूद घुला हुआ जैविक पदार्थ UV विकिरण को अवशोषित करता है। इसलिए पानी की रासायनिक और भौतिक स्थितियों में बदलाव से यह भी बदल सकता है कि UV विकिरण पानी के अंदर कितनी दूर तक पहुंचेगा।
UNEP के अनुसार, ओजोन के ऊर्ध्वाधर वितरण में बदलाव वायुमंडल की तापमान संरचना को प्रभावित कर सकता है और इसके परिणामस्वरूप मौसम तथा जलवायु, जिसमें वर्षा के पैटर्न भी शामिल हैं, प्रभावित हो सकते हैं।
जलवाष्प भी वायुमंडल में ओजोन रसायन को प्रभावित करती है। समताप मंडल में मौजूद जलवाष्प ओजोन रसायन और तापमान से जुड़ी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाती है। NASA के शोध के अनुसार, समताप मंडलीय जलवाष्प की मात्रा में बदलाव ओजोन, सतही जलवायु और समताप मंडलीय तापमान को प्रभावित कर सकता है।
UV विकिरण पानी में मौजूद कुछ जैविक पदार्थों और प्रदूषकों के रासायनिक विघटन में भी भूमिका निभाता है। UNEP के 2024 के आकलन में बताया गया है कि UV-B में बदलाव से पानी में कुछ प्रदूषकों के photochemical breakdown की प्रक्रिया बदल सकती है। कुछ परिस्थितियों में इससे प्रदूषक तेजी से टूट सकते हैं, लेकिन उनके टूटने से बनने वाले उत्पाद भी पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ओजोन दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि पृथ्वी का पर्यावरण अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ नहीं है। आसमान में मौजूद ओजोन परत, सूर्य की UV-B किरणें, वायुमंडल, जलवायु और पृथ्वी के जल निकाय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
ओजोन परत की रक्षा इसलिए सिर्फ त्वचा कैंसर या आंखों को UV से बचाने का सवाल नहीं है। यह समुद्रों, झीलों और नदियों में मौजूद उन जीवों की सुरक्षा से भी जुड़ा है जो जलीय खाद्य-श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। UNEP के आकलनों में बढ़ी हुई UV-B विकिरण के जलीय जीवों, खाद्य-श्रृंखला और जैव-भूरासायनिक चक्रों पर संभावित प्रभावों को दर्ज किया गया है।
एक रिपोर्ट के अनुसार ओज़ोन एक गैस है, जिसका रासायनिक सूत्र O₃ है। यानी इसके एक अणु में ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। इसके विपरीत, जिस ऑक्सीजन को हम सांस के जरिए लेते हैं, वह O₂ होती है, जिसमें ऑक्सीजन के दो परमाणु होते हैं। O₃ की यही अलग रासायनिक संरचना इसे अत्यधिक प्रतिक्रियाशील गैस बनाती है।
ओज़ोन प्राकृतिक रूप से वायुमंडल में बनती और टूटती रहती है। ऊपरी वायुमंडल में सूर्य की पराबैंगनी किरणें ऑक्सीजन के अणुओं को तोड़ती हैं। इससे बने ऑक्सीजन परमाणु दूसरे O₂ अणुओं के साथ प्रतिक्रिया करते हैं और O₃ यानी ओज़ोन बनता है। इसी प्रक्रिया के कारण समताप मंडल में ओज़ोन की एकाग्रता बनी रहती है।
वायुमंडल में ओज़ोन मुख्य रूप से दो अलग-अलग जगहों पर मिलती है - समताप मंडल (Stratosphere) और क्षोभमंडल (Troposphere)।
समताप मंडल पृथ्वी की सतह से लगभग 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला है। वायुमंडल में मौजूद लगभग 90 प्रतिशत ओज़ोन समताप मंडल में पाई जाती है। इसी क्षेत्र में ओज़ोन की अपेक्षाकृत अधिक सांद्रता वाली पट्टी को हम ओज़ोन परत कहते हैं।
दूसरी ओर, पृथ्वी की सतह के करीब स्थित क्षोभमंडल में मौजूद ओज़ोन को ग्राउंड-लेवल ओज़ोन कहा जाता है। यह प्राकृतिक रूप से भी बन सकती है, लेकिन शहरों और प्रदूषित क्षेत्रों में इसका निर्माण मुख्य रूप से नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) के सूर्य के प्रकाश में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से होता है।
समताप मंडल में मौजूद ओज़ोन पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (UV) विकिरण में UV-B का बड़ा हिस्सा ओज़ोन परत द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। इससे पृथ्वी की सतह तक पहुंचने वाली हानिकारक UV-B विकिरण की मात्रा कम होती है।
अगर यह सुरक्षा कमजोर हो जाए और अधिक UV-B पृथ्वी की सतह तक पहुंचे, तो इसका असर मनुष्य के स्वास्थ्य के साथ-साथ पौधों, समुद्री जीवों और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ सकता है। UV-B का अत्यधिक संपर्क त्वचा कैंसर और मोतियाबिंद जैसे स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है।
ओज़ोन की खासियत यह है कि वह कहां मौजूद है, इससे उसका पर्यावरणीय प्रभाव काफी बदल जाता है। समताप मंडल में ओज़ोन सूर्य की हानिकारक UV विकिरण को रोककर जीवन की रक्षा करती है। लेकिन पृथ्वी की सतह के पास मौजूद अधिक मात्रा वाली ओज़ोन एक वायु प्रदूषक है। यह आंखों और श्वसन तंत्र में जलन पैदा कर सकती है और पौधों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। ग्राउंड-लेवल ओज़ोन स्मॉग का एक प्रमुख घटक है।
सूर्य लगातार ऊर्जा और विकिरण पृथ्वी की ओर भेजता है। इसमें पराबैंगनी यानी UV radiation भी शामिल है। UV radiation को आम तौर पर UVA, UVB और UVC में बांटा जाता है।
ओज़ोन मुख्य रूप से UV-B को अवशोषित करती है, जबकि UVC को ओज़ोन और सामान्य ऑक्सीजन मिलकर लगभग पूरी तरह रोक लेते हैं। पृथ्वी तक पहुंचने वाली UV-B की मात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका जैविक प्रभाव काफी अधिक
1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ मानव निर्मित रसायन समताप मंडल में पहुंचकर ओज़ोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और कुछ अन्य ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थ शामिल थे।
समताप मंडल में पहुंचने के बाद सूर्य की UV विकिरण इन रसायनों को तोड़ सकती है और उनसे क्लोरीन तथा ब्रोमीन जैसे परमाणु निकल सकते हैं। ये परमाणु ओज़ोन अणुओं को तोड़ने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं। एक क्लोरीन परमाणु बड़ी संख्या में ओज़ोन अणुओं को नष्ट कर सकता है।
ओज़ोन की चर्चा अक्सर त्वचा और आंखों के स्वास्थ्य तक सीमित रह जाती है, लेकिन इसका संबंध पानी और जलीय जीवन से भी है।
अगर ओज़ोन परत कमजोर होती है तो पृथ्वी की सतह तक पहुंचने वाली UV-B विकिरण बढ़ सकती है। इसका असर समुद्रों, झीलों और अन्य जल निकायों में मौजूद कुछ सूक्ष्म जीवों और जलीय खाद्य-श्रृंखला पर पड़ सकता है। विशेष रूप से फाइटोप्लैंकटन जैसे जीव UV विकिरण के प्रति संवेदनशील होते हैं और वे जलीय खाद्य-श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इसलिए ओज़ोन परत की स्थिति का संबंध केवल आसमान से नहीं, बल्कि जल पारिस्थितिकी तंत्र से भी है।
हर साल 16 सितंबर को विश्व ओज़ोन दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी के पर्यावरण में कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं जो हमारी आंखों से दिखाई नहीं देतीं, लेकिन उनका प्रभाव हमारे जीवन पर बहुत बड़ा है।
ओज़ोन दिखाई नहीं देती, फिर भी समताप मंडल में इसकी मौजूदगी पृथ्वी तक पहुंचने वाली UV विकिरण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वहीं जमीन के पास अधिक मात्रा में मौजूद ओज़ोन स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए समस्या बन सकती है।
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