तेजी से चढ़ते पारे ने भारत में फरवरी में ही दिल्‍ली-एनसीआर के लोग महसूस कर रहे गर्मी। 

तेजी से चढ़ते पारे ने भारत में फरवरी में ही दिल्‍ली-एनसीआर के लोग महसूस कर रहे गर्मी। 

स्रोत : आईडब्‍लूपी

कहां खो गया वसंत : फरवरी में ही पारा 30 डिग्री के पार, दिल्ली-एनसीआर में गर्मी ने दी दस्‍तक

जलवायु परिवर्तन और ग्‍लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते असर के कारण तापमान में हो रही बढ़ोतरी, बदल रहा है मौसम का पैटर्न। राजधानी सहित देश के कई महानगरों में अभी से दिखने लगा है हीट आइलैंड इफेक्‍ट का असर।
Published on
8 min read

करीब दो महीने की ठंड की ठिठुरन के बाद फरवरी का महीना एक राहत और सुकून भरा अहसास लेकर आता है। दिसंबरी-जनवरी की शीत लहर और बर्फीली ठिठुरन के बाद अब हवाओं में एक मंद सी शीतलता और तापमान में हल्‍की बढ़ोतरी के कारण वातावरण में एक खुशनुमा अहसास होता है। न जाड़ा, न गर्मी, बस तन-मन को सुकून देने वाला वसंत का सुहावना मौसम। यही वजह है कि लोक परंपरा में वसंत ऋतु को इतना महत्‍व दिया गया है और उसकी शान में सैकड़ों लोकगीत रचे गए हैं। पर, जलवायु परिवर्तन की मार वसंत के इस खुशनुमा अहसास को छीनती-निगलती जा रही है। 

ग्‍लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते असर के कारण तापमान में तेज़ बदलाव के कारण अब जनवरी की ठंड के बाद फरवरी में सीधे गर्मी का अहसास हो रहा है। राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली-एनसीआर उत्‍तर भारत के बड़े इलाके में फरवरी में तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री अधिक रहने के कारण लोगों को गर्मी महसूस होने लीगी है। फरवरी के महीने में ही गर्मी की इस दस्‍तक से शीतल-सुखदायी मौसम वाली वसंत ऋतु कहीं गुम हो गई सी लग रही है।

आमतौर पर सर्दी धीरे-धीरे सुहावने वसंत ऋतु में तब्दील हो जाती है और फिर गर्मी का मौसम शुरू होता है। पर, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हालिया आंकड़ों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में फरवरी के तापमान में असामान्य वृद्धि देखने को मिल रही है। इसके कारण फरवरी का मौसम में सर्दियों के बाद वसंत ऋतु में संक्रमण काल के बजाय सीधे गर्मी की दस्‍तक जैसा महसूस हो रहा है। मौसम विभाग के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि  दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के एक बड़े इलाके में इस साल यानी 2026 में शायद वसंत का सुहावना मौसम देखने को नहीं मिलेगा। 

अधिकतम तापमान में 2°C तक की वृद्धि

आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार पिछले 24 घंटों में दिल्ली-एनसीआर में न्यूनतम तापमान में 1°C से 4°C तक की वृद्धि हुई है, जबकि अधिकतम तापमान में 2°C तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में न्यूनतम तापमान 13°C से 14°C के बीच दर्ज किया गया, जबकि अधिकतम तापमान 26°C से 29°C के बीच रहा। कई क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान सामान्य से 3.1 डिग्री सेल्सियस से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। 

दिल्ली और उससे सटे इलाकों में तापमान औसत से 1.6 डिग्री सेल्सियस से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। पिछले दो दिनों में दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तरी मैदानी इलाकों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे मार्च या अप्रैल के मौसम जैसी परिस्थितियां बन गई हैं। बुधवार (18 फरवरी) को राजधानी के कई हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया, जिससे फरवरी के दूसरे सप्ताह में असामान्य रूप से गर्मी का माहौल बना।

मौसम विज्ञानियों का कहना है कि तापमान में यह वृद्धि वैश्विक स्‍तर पर महसूस किए जा रहे बदलावों के अनुरूप ही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) पहले ही 2025 को अबतक के सबसे गर्म वर्षों में से एक बता चुका है। 

अब फरवरी में तामपान के ऊंचे स्‍तर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि फरवरी 2026 भी असामान्य रूप से गर्म हो सकता है। मौसम विभाग के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में 12 फरवरी को तापमान लगभग 27 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जबकि 13 फरवरी को अधिकतम तापमान 26 डिग्री सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है। न्यूनतम और अधिकतम तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि जारी रहने की संभावना है।

बन सकता है गर्मी का नया रिकॉर्ड

खासकर दिल्ली जैसे उत्तरी शहरों में, जहां तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, दिन शुरुआती गर्मी जैसे लग रहे हैं, जिससे लोगों को ऊनी कपड़ों के बजाय हल्के कपड़े पहनकर बाहर निकलना पड़ रहा है क्योंकि तापमान सामान्य से काफी ऊपर चढ़ता जा रहा है। 

17 फरवरी को राजधानी में तापमान 27 डिग्री सेल्सियस तक बना रहा, जिससे संकेत मिलता है कि गर्मी अभी लंबे समय तक बनी रहेगी और इस साल गर्मी का एक नया रिकॉर्ड भी बन सकता है। गर्मी की इस तेज शुरुआत को देखते हुए लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज़ एक अल्पकालिक गर्म दौर है, या यह इस बात की चेतावनी है कि 2026, 2025 से भी ज़्यादा गर्म हो सकता है? 

मौसम विभाग के आंकड़े इसकी संभावना जताते हैं। आंकड़ों के मुताबिक पिछला साल यानी 2025 मौसम विभाग की ओर से 1901 में रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से आठवां सबसे गर्म वर्ष था। पिछले 15 वर्षों में सबसे गर्म 15 वर्षों में से 10 साल ऐसे रहे, जो जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में स्पष्ट वृद्धि का रुझान दर्शाते हैं। मौसम की शुरुआत में पड़ने वाली गर्मी अकसर लंबे, अधिक तीव्र ग्रीष्मकाल और अधिक लू चलने का संकेत देती है, जैसा कि हाल के वर्षों में देखा गया है। इसे देखते हुए पिछले साल की गर्मी का रिकॉर्ड इस साल टूटने के आसार बनते नज़र आ रहे हैं।

extreme heat

कई जगहों पर अधिकतम तापमान औसत से 10 डिग्री तक ऊपर पहुंच जाने से फरवरी में ही लोगों को आ रहे हैं पसीने। 

स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल

क्‍या है इस बदलाव की वजह

इस साल दिल्ली-एनसीआर में फरवरी के महीने में पारा असामान्य रूप से तेजी से बढ़ा है। फरवरी के तापमान में तेज बढ़ोतरी को वैज्ञानिक मौजूदा जलवायु संकट से जोड़कर देख रहे हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और ग्‍लोबल वॉर्मिंग ग्‍लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते असर के कारण ही तापमान में तेजी से बदलाव हो रहा है।  भारत सहित पूरी दुनिया में मैसम की चरम स्थिति यानी Extreme Weather Conditions के मामलों में बढ़ोतरी के कारण यह असंतुलन पैदा हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसा बदलाव मौसम की परंपरागत ऋतु-गतियों में असंतुलन का संकेत है। इसके लिए मुख्‍य तौर पर जिम्मेदार कारणों को इन बिंदुओं के रूप में समझा जा सकता है - 

ग्‍लोबल वॉर्मिंग के कारण तापमान में वृद्धि 

ग्‍लोबल वॉर्मिंग एक दीर्घकालीन और क्रमिक प्रक्रिया है, जिसके चलते पृथ्वी के औसत सतही तापमान में  साल दर साल लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। औद्योगिक क्रांति के बाद जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई और औद्योगिक उत्सर्जन ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को तेजी से बढ़ाया है। इस कारण पृथ्वी की सतह और महासागर अधिक ऊष्मा अवशोषित कर रहे हैं। इसी कारण सर्दियों की अवधि धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है और गर्मियों का विस्तार बढ़ रहा है। हाल के वैश्विक तापमान रिकॉर्ड बताते हैं कि 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जबकि 2025 भी शीर्ष गर्म वर्षों में शामिल है। यह स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक तापमान औद्योगिक युग पूर्व स्तर से लगभग 1.1 से 1.3 डिग्री सेल्सियस अधिक हो चुका है। ऐसे में फरवरी जैसे पारंपरिक रूप से गुनगुनी ठंड वाले महीने में भी असामान्य गर्मी दर्ज होना अब एक तेजी से उभरता पैटर्न बनता जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन का बढ़ता असर

जलवायु परिवर्तन केवल औसत तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मौसम की पूरी संरचना को प्रभावित कर रहा है। वातावरण में बढ़ती कार्बन डाईऑक्‍साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्‍साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसें सूर्य से आने वाली ऊष्मा को सोख कर पृथ्वी के चारों ओर वातावरण में फंसाए रखती हैं। इससे दिन और रात दोनों के तापमान में असंतुलन पैदा होता है। खासतौर पर रात के तापमान में बढ़ोतरी एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि सामान्यतः रात में धरती ठंडी हो जाती है। लेकिन, जब वातावरण में ऊष्मा फंसी रहती है, तो न्यूनतम तापमान भी ऊंचा बना रहता है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में फरवरी के औसत न्यूनतम तापमान में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इसके साथ ही लू (हीट वेव), असामान्य वर्षा और लंबे शुष्क दौर जैसी चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति भी बढ़ रही है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि जलवायु प्रणाली संतुलन से बाहर हो रही है।

पश्चिमी विक्षोभ और मौसमी पैटर्न का बदलता व्यवहार 

उत्तर भारत की सर्दी काफी हद तक पश्चिमी विक्षोभों पर निर्भर करती है, जो भूमध्य सागर क्षेत्र से नमी लेकर हिमालय और उत्तर भारत तक पहुंचते हैं। ये प्रणालियां बारिश या बर्फबारी कराकर तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करती हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इन विक्षोभों की तीव्रता, आवृत्ति और मार्ग में बदलाव देखा गया है। कई बार ये कमजोर पड़ जाते हैं या अपेक्षित समय पर सक्रिय नहीं होते। इस कारण ठंडी हवाओं का प्रभाव कम हो जाता है और दिन के तापमान में तेजी से वृद्धि होती है। यदि फरवरी में पर्याप्त पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं होते, तो सर्दी अचानक समाप्त होती दिखाई देती है और वसंत का संक्रमण काल छोटा पड़ जाता है।वैज्ञानिक मानते हैं कि आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से हो रहा तापमान परिवर्तन वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर रहा है, जिसका असर पश्चिमी विक्षोभों के व्यवहार पर भी पड़ सकता है।

हीट आइलैंड प्रभाव और स्थानीय पर्यावरणीय बदलाव 

वैश्विक कारणों के अलावा स्थानीय स्तर पर भी तापमान वृद्धि में कई कारक योगदान देते हैं। दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगरों में कंक्रीट की इमारतें, चौड़ी सड़कें, कम होती हरियाली और वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन वातावरण को अधिक गर्म बनाते हैं। इस प्रक्रिया को शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव या Heat Island Effect कहा जाता है। दिन में ये सतहें सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर लेती हैं और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती हैं, जिससे न्यूनतम तापमान भी सामान्य से अधिक रहता है। इसके अलावा एयर कंडीशनर, औद्योगिक इकाइयां और ऊर्जा खपत भी स्थानीय तापमान को बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। शोध बताते हैं कि बड़े शहरों में तापमान वृद्धि की दर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक होती है। यही वजह है कि फरवरी जैसी संक्रमणकालीन ऋतु में भी शहरी क्षेत्रों में गर्मी का अहसास अपेक्षाकृत जल्दी होने लगता है।

<div class="paragraphs"><p>शहरी इलाकों में 'कंक्रीट के जंगल' के कारण पैदा होने वाला हीट आइलैंड इफेक्‍ट शहरी इलाकों गर्मी बढ़ा देता है। </p></div>

शहरी इलाकों में 'कंक्रीट के जंगल' के कारण पैदा होने वाला हीट आइलैंड इफेक्‍ट शहरी इलाकों गर्मी बढ़ा देता है।

स्रोत : आईडब्‍लूपी

क्‍या होगा इस गर्मी का असर

फरवरी में ही गर्मी की शुरुआत हो जाने के कई तरह के प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। इससे 2026 में अधिक गर्मी पड़ने से और भी कठिन चुनौतियां सामने आ सकती हैं। सबसे पहले तो इससे स्वास्थ्य पर गर्मी का अधिक प्रभाव देखने को मिल सकता है, जिसमें लू लगने और मौसमी बुखार, डायररिया, डिहाइड्रेशन, ब्‍लड प्रेशर जैसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं बढ़ने जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। इसके अलावा फरवरी में गर्मी शुरू होने से ठंड के दिन घट जाने के कारण गेहूं जैसी रबी फसलों की पैदावार में कमी हो सकती है। कृषि पर इसके प्रभाव के बारे में विस्‍तृत जानकारी के लिए आप हमारी हालिया स्‍टोरी फरवरी में अधिक तापमान घटा सकता है रबी फसलों की पैदावार पढ़ सकते हैं। 

साथ ही मौसम के इस बदलते पैटर्न के कारण गर्मी में बिजली की मांग में बढ़ोतरी हो सकती है, जो हमारे देश के ऊर्जा संकट को और भी बढ़ा सकती है। इसके अलावा गर्मी के जल्‍दी दस्‍तक देने से भीषण लू का प्रकोप अप्रैल से ही देखने को मिल सकता है, जो कि पहले मई-जून के महीनों में होता था। धूल भरी आंधियों के चलने से शहरों के वायु प्रदूषण में भी बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही गर्मी बढ़ने से शहरों में जल संकट की समस्या भी बढ़ सकती है। 

पश्चिमी विक्षोभ दे सकता है राहत

मैदानी इलाकों में तापमान में वृद्धि के बावजूद, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) के सक्रिय होने पर तेजी से बढ़ती गर्मी से राहत मिलने के आसार हैं। इनके संयुक्त प्रभाव से 13 फरवरी और फिर 16-17 फरवरी, 2026 के बीच पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के कुछ हिस्सों में बारिश और हिमपात हो सकता है। उत्तरी मैदानी इलाकों के लिए तापमान में लगातार हो रही वृद्धि को आने वाली भीषण गर्मी का प्रारंभिक संकेत माना जा रहा है। 

सुबह और शाम के समय हल्की ठंडक के अलावा, दिन के समय गर्मी का एहसास होने लगा है। ऐसे में पश्चिमी विक्षोभ के चलते बारिश और हिमपात होने पर फरवरी में तेजी से बढ़ती गर्मी से राहत मिल सकती है। इसके विपरीत, यदि पश्चिमी विक्षोभ निष्‍प्रभावी रहा, तो तापमान इसी गति से बढ़ता रहा तो उत्तर भारत में हाल के वर्षों में वसंत ऋतु का ‘गुम' हो जाना व मौसम का एक नया पैटर्न बन सकता है। इससे जलवायु परिवर्तनशीलता और तेजी से अप्रत्याशित मौसमी चक्रों के बारे में नई चिंताएं पैदा हो सकती हैं।

Also Read
उत्तर भारत को क्यों महसूस हो रही है तापमान से 10 डिग्री ज़्यादा गर्मी
<div class="paragraphs"><p>तेजी से चढ़ते पारे ने भारत में फरवरी में ही दिल्‍ली-एनसीआर के लोग महसूस कर रहे गर्मी।&nbsp; </p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

संबंधित कहानियां

No stories found.
India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org