पानी में आराम करता बाघ
फोटो - सत्यमंगलम टाइगर रिजर्व
विश्व बाघ दिवस : भारत में कितने बाघ, कितने टाइगर रिजर्व और क्या है बाघों का नदी से रिश्ता?
जब भी बाघों के संरक्षण की बात होती है, चर्चा अक्सर जंगलों और वन्यजीवों तक सीमित रह जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाघों का अस्तित्व भारत की नदियों, जल स्रोतों और करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा से भी गहराई से जुड़ा है? जिन घने जंगलों में बाघ रहते हैं, वही जंगल वर्षा के पानी को संजोते हैं, भूजल का पुनर्भरण करते हैं और अनेक नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए बाघों को बचाना केवल एक वन्यजीव प्रजाति का संरक्षण नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, जल संसाधनों और जैव विविधता की रक्षा करना है।
विश्व बाघ दिवस के अवसर पर यह लेख भारत में बाघ संरक्षण की पूरी कहानी को बयां करता है। साथ ही बाघों की आबादी, टाइगर रिजर्व की संख्या, संरक्षण के सामने चुनौतियों और उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के साथ यह भी समझने का एक छोटा सा प्रयास है। इसी प्रयास के साथ हम यह भी जानेंगे कि आखिर क्यों "बाघ बचेंगे तो नदियां भी बचेंगी" केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत के पर्यावरण और जल भविष्य की एक वैज्ञानिक सच्चाई है।
विश्व बाघ दिवस क्या है और क्यों मनाया जाता है?
हर साल 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट में हुई थी। यह वो दौर था जब पूरी दुनिया में बाघों की संख्या तेजी से घट रही थी। इसे देखते हुए दुनिया के 13 देश आगे आये, जहां बाघों का आवास है, और TX2 लक्ष्य निर्धारित किया, जिसका उद्देश्य वर्ष 2022 तक बाघों की वैश्विक आबादी को दोगुना करना था।
विश्व बाघ दिवस का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नही है, बल्कि बाघों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना और साथ में बाघों के प्राकृतिक आवास, जैव विविधता और उन पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के महत्व को समझाना भी है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस पारिस्थितिकी तंत्र में बाघ रहते हैं, दरअसल वे पृथ्वी के लिए फेफड़ों का काम करते हैं। इसके अलावा इसका मुख्य उद्देश्य अवैध शिकार, वनों के क्षरण और मानव-वन्यजीव के बीच संघर्ष को रोकना भी है।
टाइगर कब
फोटो - पीआईबी
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है विश्व बाघ दिवस?
भारत के लिए विश्व बाघ दिवस का महत्व बाकी देशों की तुलना में बहुत अधिक है, क्योंकि दुनिया के लगभग 75% जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं। यही कारण है कि भारत सरकार का पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय बाघों के संरक्षण के प्रति योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहा है। इसी के तहत 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया था।
कब और कैसे शुरू हुआ प्रोजेक्ट टाइगर?
बाघ हमेशा से ही भारत की शान रहा है। रॉयल बंगाल टाइगर भारत का राष्ट्रीय पशु भी है। एक समय आया जब शिकार की बढ़ती घटनाओं के कारण बाघों की संख्या घटने लगी। हालांकि संख्या घटने का एक और कारण घटता पारिस्थतिक तंत्र भी था। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 1973 को प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की। उस समय देश में बाघों की संख्या तेजी से घट रही थी और उनके प्राकृतिक आवास भी सिकुड़ रहे थे। इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का उद्देश्य बाघों और उनके आवासों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण करना था।
प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 9 टाइगर रिजर्व और लगभग 18,278 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से हुई थी। इनमें कॉर्बेट (उत्तराखंड), कान्हा (मध्य प्रदेश), मानस (असम), मेलघाट (महाराष्ट्र), पलामू (झारखंड), रणथंभौर (राजस्थान), सिमलीपाल (ओडिशा), सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) और बांदीपुर (कर्नाटक) शामिल थे।
पिछले पांच दशकों में यह पहल लगातार मजबूत हुई है। आज भारत में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जो लगभग 83,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए हैं। यानी कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 2.5% हिस्सा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में आता है। इन संरक्षित क्षेत्रों ने न केवल बाघों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, बल्कि हाथी, तेंदुआ, गौर, बारहसिंगा, घड़ियाल और सैकड़ों अन्य वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण में भी योगदान दिया है।
टाइगर रिजर्व
फोटो - पीआईबी
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की भूमिका
वर्ष 2004 से 2005 के बीच सरिस्का टाइगर रिजर्व और पन्ना टाइगर रिजर्व में एक के बाद एक बाघों की मौतों की खबर से यह समझ आ गया कि बाघ को आइसोलेट करके संरक्षित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम 2006 में उठाया गया और सरकार ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में संशोधन कर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority - NTCA) का गठन किया। यह प्राधिकरण देश में बाघ संरक्षण की सर्वोच्च संस्था है।
क्या करता है एएनटीसीए -
एनटीसीए की मुख्य जिम्मेदारी टाइगर रिजर्व के प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश और मानक तय करता है।
बाघ संरक्षण परियोजनाओं के लिए राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है।
बाघों के आवास, वन्यजीव कॉरिडोर और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को बढ़ावा देने पर जोर देता है।
शिकार रोकने, सख्त निगरानी और मनुष्यों व बाघ के बीच संघर्ष को कम करने के प्रयास करता है।
देशव्यापी बाघ गणना और संरक्षण संबंधी शोध एवं मॉनिटरिंग का नेतृत्व करता है।
भारत में बाघों की गणना कैसे होती है?
भारत में बाघों की गणना दुनिया की सबसे बड़ी वन्यजीव निगरानी प्रकिया मानी जाती है। यह अभ्यास आमतौर पर हर चार वर्ष में किया जाता है और इसका क्रियान्वयान NTCA और भारतीय वन्यजीव संस्थान मिलकर करते हैं।
बाघों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए कई आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जैसे कैमरा ट्रैप के माध्यम से बाघों की तस्वीरें लेना और उनकी धारियों के आधार पर प्रत्येक बाघ की पहचान करना।
गणना में जंगलों में बाघों के पैरों के निशान, मल, खरोंच और अन्य संकेतों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। इस प्रकिया में जीआईएस और सैटेलाइट आधारित आवास मानचित्रण भी किया जाता है। इस प्रक्रिया में कई लाख कैमरा ट्रैप तस्वीरों और हजारों किलोमीटर के फील्ड सर्वे के डाटा के आधार पर सांख्यिकीय मॉडल तैयार किया जाता है और तब जाकर अंतिम अनुमानित संख्या तय होती है। इसी वैज्ञानिक और पारदर्शी पद्धति के कारण भारत की बाघ गणना को वैश्विक स्तर पर सबसे विश्वसनीय वन्यजीव आकलनों में गिना जाता है।
भारत में बाघों की आबादी कितनी?
बाघों के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर 1973 में शुरू किया गया था, लेकिन वर्ष 2000 तक बाघों की आबादी में कोई खास इज़ाफा नहीं हुआ। वर्ष 2006 में देश में जंगलों में रहने वाले बाघों की संख्या 1411 थी, जो 2010 में 1706 हुई और 2014 में 2226 हो गई। आगे के वर्षों में भी निरंतर प्रयास जारी रहे और 2018 में संख्या 2967 हो गई जो 2022 में बढ़ कर 3682 हो गई।
बाघों की आबादी बढ़ाने में मिली सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण क्या है?
यमुना बायोडायवर्टिी पार्क, दिल्ली के पयावरण वैज्ञानिक डॉ. फैयाज़ ए खुदसर ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि पहले बाघों को केवल एक जानवर के रूप में देखा जाता था। लेकिन वैज्ञानिकों ने बाघों के प्रजनन को बायोडायवसिर्टी से जोड़ा तब असली मतलब समझ आया। उसी के बाद से लैंडस्केप बढ़ाने पर जोर दिया गया।
हमें पता है कि तराई वाले इलाके बाघों के लिए बेहद अनुकूल होते हैं। इसीलिए सरकार ने तराई वाले इलाकों को संरक्षित करना शुरू कर दिया। चूंकि बाघ एक सथान से दूसरे स्थान तक पलायन करते हैं, इसीलिए जंगलों को जोड़ने के लिए कॉरिडोर बनाये गये। इससे बाघों का प्रजनन बढ़ा और आबादी भी तेजी से बढ़ी।
किन राज्यों में सबसे अधिक बाघ हैं?
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा प्रेषित सूची में राज्यों को पांच अलग-अलग क्षेत्रों में बांटा गया है - मध्य भारत और पूर्वी घाट, पूर्वोत्तर पहाड़ियां और ब्रह्मपुत्र के मैदान, शिवालिक-गंगा के मैदान, पश्चिमी घाट और सुंदरबन। 2022 के आंकड़ों के अनुसार बाघों की सबसे अधिक संख्या 1439 मध्य भारत में है।
बाघों की राज्यवार आबादी इस प्रकार है
भारत में कितने टाइगर रिजर्व हैं?
भारत में कुल 58 टाइगर रिजर्व हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 84487.83 वर्ग किमी है। इस क्षेत्र में कोर एरिया 46701.29 वर्ग किमी है और 37786.54 वर्ग किमी बफर एरिया है। बफर एरिया वह एरिया होता है जो कोर एरिया के चारों ओर स्थित होता है। इसका उद्देश्य कोर क्षेत्र को बाहरी दबावों से सुरक्षित रखना और स्थानीय समुदायों तथा वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाना है।
भारत में टाइगर रिर्जव की सूची (स्रोत NTCA)
भारत के टाइगर रिजर्व केवल बाघों के संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये देश के सबसे महत्वपूर्ण वन पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और जलग्रहण क्षेत्रों की भी रक्षा करते हैं। वर्तमान में देश में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जो हिमालय, तराई, मध्य भारत, पश्चिमी घाट और सुंदरबन जैसे विविध प्राकृतिक स्थलों में फैले हुए हैं।
खास बात यह है कि प्रत्येक टाइगर रिजर्व अपने आप में महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत है फैक्ट शीट जिसमें आप प्रत्येक टाइगर रिजर्व से जुड़ी प्रमुख जानकारी प्राप्त कर सकते हैं :
प्रोजेक्ट टाइगर पर कितना खर्च हुआ?
पिछले 10 वर्षों (लगभग 2016-17 से 2025-26) की बात करें, तो प्रोजेक्ट टाइगर (अब Project Tiger & Elephant के रूप में संचालित) पर केंद्र सरकार का वार्षिक बजट आम तौर पर ₹250 करोड़ से ₹350 करोड़ के बीच रहा है। इन आवंटनों को जोड़ने पर पिछले एक दशक में इस मद पर करीब ₹2,800–3,000 करोड़ का केंद्रीय बजट आवंटित किया गया है। हाल के वर्षों में यह योजना इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ वाइल्डलाइफ हेबिटैट्स के अंतर्गत संचालित होती है।
बीते तीन वर्षों में कितने बाघों की मौत हुई?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार बीते तीन वर्षों में देश भर में कुल 112 बाघों की मौत हो चुकी है। 20 जुलाई 2026 को संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार इनमें 81 बाघ शिकारियों के शिकार हुए, जबकि 7 बाघों की मौत ट्रेन के नीचे आने से हुई। वहीं 24 बाघों की मौत बिजली का करंट लगने से हुई।
टाइगर रिजर्व के अंदर बसे गॉंव
आम तौर पर टाइगर रिजर्व की संरचना कुछ ऐसी होती है कि एक कोर एरिया होता है और उसके चारों ओर बफर एरिया। बफर एरिया के चारों ओर आम तौर पर गॉंव या खेत होते हैं। हालांकि कई टाइगर रिजर्व ऐसे हैं, जिनके अंदर आदिवासी लोगों का बसेरा है। इन आदिवासी लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इन लोगों को टाइगर रिजर्व के बाहर शिफ्ट करने की प्रक्रिया का प्रावधान है।
इनमें प्रमुख रूप से सिमलीपल टाइगर रिजर्व ओडिशा, रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश, नागरहोले और काली टाइगर रिजर्व कर्नाटक, तदोबा अंधारी टाइगर रिजर्व महाराष्ट्र, और अचानाकमर एवं उदंती सीतानदी छत्तीसगढ़ शामिल हैं।
दरअसल टाइगर रिजर्व के कोर/क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट से गांवों का पुनर्वास संबंधित राज्य सरकारें, प्रोजेक्ट टाइगर के तहत केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता से करती हैं। लोकसभा में प्रेषित आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार ने बीते पांच वर्षों में 1,350.54 करोड़ रुपये आवंटित किए। 2020-21 में 157.93, 2021-22 में 170.58, 2022-23 में 224.20, 2023-24 में 346.10 और 2024-25 में 451.73 करोड़ रुपए आवंटित किए।
पन्ना टाइगर रिजर्व
टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन के बाहर के गॉंव
टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन के बाहर बसे गॉंवों में रहने वाले ग्रामीणों की अलग ही चुनौतियां हैं। दरअसल रिजर्व फॉरेस्ट के अंदर कैम्प में पर्यटकों की संख्या में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। इसके चलते सरकार भी इन कैम्पों को स्थापित करने की योजना को बढ़ावा दे रही है। इससे ज़ोन के बाहर रहने वाले ग्रामीणों को छोटा-मोटा रोज़गार जैसे जंगलों के भीतर सामान पहुचाना, सफारी वाहन चलाना, पर्यटकों के लिए खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना, आदि मिल जाते हैं। इस पर डॉ. फैयाज़ ने कहा कि अगर कम्युनिटी पार्टिसिपेशन यानी जन भागीदारी के जरिए इन्हीं खेतों को टाइगर कॉरिडोर में शामिल कर लिया जाए तो इन ग्रामीणें की आमदनी कई गुना बढ़ सकती है।
उन्होंने कहा कि वैसे भी टाइगर को आसानी से बफर ज़ोन में देखा जा सकता है। अगर इन्हीं ज़ोन के बीच में पड़ने वाले खेतों को टाइगर स्पॉट एरिया घोषित कर दिया जाये और वहां आने वाले पर्यटकों से होने वाली कमाई का हिस्सा ग्रामीणों को दिया जाए तो उनके जीवन में काफी हद तक आर्थिक उन्नति हो सकती है।
क्या बाघ को बचाने के लिए टाइगर रिजर्व काफी हैं?
इस सवाल पर ग्लोबल ग्रीन ग्रोथ इनिशिएटिव्स से जुड़े बेंगलुरु के पर्यावरणविद एवं ईकोलॉजिस्ट डॉ. चंद्रशेखर बिरादर ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में कहा, "बाघों की आबादी के मामले में भारत के प्रयास एक बहुत बड़ी सफलता है। हालांकि यह भी सच है कि बाघों को बचाने के लिए अब केवल टाइगर रिवर्ज का स्थापित करना या घोषित करना काफी नहीं है। हमें फोकस को टाइगर रिजर्व से अलग भी शिफ्ट नहीं करना है, बल्कि उसे और विस्तार देने की जरूरत है। अब हमें रिजर्व केंद्रित कंज़रवेशन से आगे बढ़ कर इंटीग्रेटेड टाइगर लैंडस्केप कंज़रवेशन के बारे में सोचने की आवश्यकता है।"
उन्होंने आगे कहा कि भारत में एक तिहाई बाघ चिन्हित टाइगर रिजर्व के बाहर पाये जाते हैं। बाघों को आप एक जगह सीमित नहीं रख सकते। इनको कोर हैबिटेट के बड़े नेटवर्क की जरूरत है, जिसमें संरक्षित इलाको के अलावा बफर फॉरेस्ट हों, वन्यजीव गलियारे हों, नदी ईकोसिस्टम हो और ऐसा लैंडस्केप हो जिसका प्रबंधन जनभागीदारी के साथ किया जाए। यह सभी बाघों के प्रवास, विस्थापन, प्रजनन, आनुवंशिक आदान-प्रदान के लिए जरूरी हैं और पर्यावरणीय परिवर्तनों के अनुरूप भी।
जंगल में नदी किनारे हिरण
बाघ और पानी का क्या संबंध है?
बाघों की मौजूदगी जैव विविधता का प्रमाण है, यह बात हम सभी जानते हैं, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि बाघों का सीधा संबंध पानी से भी है। इस पर पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. फैयाज़ ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में कहा, “ऐसी कई समस्याएं हैं जो भारत में नदियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। पिछले दो दशकों में नदियों के साथ हमारे अनुभव और अध्ययन के आधार पर तीन प्रमुख कारण ऐसे हैं, जो उनकी पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) और लचीलापन (Resilience) को सबसे अधिक प्रभावित कर रहे हैं। पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह का अभाव, जलग्रहण क्षेत्र, वाटरशेड और नदी बेसिन का क्षरण, तथा नदियों में बिना उपचारित या अपर्याप्त रूप से उपचारित अपशिष्ट जल का प्रवाह।”
उन्होंने कहा, “इन सभी समस्याओं का स्थायी समाधान पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित (Restore) करने और उनकी प्राकृतिक पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को फिर से सक्रिय करके ही संभव है।”
डॉ. फैयाज़ ने आगे कहा, “बाघ एक विशिष्ट प्रजाति है, जो पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बाघों की उपस्थिति बड़े और अच्छे घास के मैदानों तथा पर्याप्त संख्या में ऐसी प्रजातियों के संरक्षण को सुनिश्चित करती है, जिनका शिकार बाघ करते हैं। इससे जंगल समृद्ध होते हैं, मिट्टी और जल संरक्षण बेहतर होता है तथा अनगिनत छोटी-छोटी जलधाराएं निरंतर प्रवाहित होती हैं। यही छोटी धाराएं मिलकर नदियों का निर्माण करती हैं और अनेक नदियां मिलकर विशाल नदी प्रणालियों का आधार बनती हैं। इस दृष्टि से बाघों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव की रक्षा नहीं, बल्कि नदियों, जल संसाधनों और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।"
डॉ. फैयाज़ और डॉ. बिरादर की बात से यह स्पष्ट है कि अगर बाघ बचेगा तभी नदियां बचेंगी। इस बात के प्रमाण भौगोलिक रूप से दिखाई भी देते हैं। दुनिया भर में जितने भी टाइगर रिजर्व हैं, वो सभी किसी न किसी नदी का हिस्सा हैं। और इन नदियों में मिलने वाली अनेक धाराएं टाइगर रिजर्व से ही आती हैं।
एक नज़र भारत की उन नदियों पर जो टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं
प्रस्तुत है उन नदियों की सूची जो टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं -
टाइगर लैंडस्केप कैसे बचाते हैं जल संसाधन?
टाइगर लैंडस्केप केवल बाघों का आवास नहीं हैं, बल्कि वे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और जल सुरक्षा की आधारशिला हैं। घने जंगल और स्वस्थ वन क्षेत्र जलग्रहण क्षेत्रों की रक्षा करते हैं, जिससे वर्षा का पानी धीरे-धीरे नदियों और भूजल स्रोतों तक पहुंचता है। यही जंगल भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देते हैं, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक झरनों को जीवित रखते हैं और मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करते हैं। जब मॉनसून में भारी बारिश होता है तब यही वन पानी के तेज बहाव को नियंत्रित कर बाढ़ के जोखिम को कम करते हैं।
टाइगर लैंडस्केप के समक्ष सबसे बड़ा खतरा क्या है?
इस सवाल पर ईकोलॉजिस्ट डॉ. चंद्रशेखर बिरादर ने कहा, "सबसे बड़ा खतरा हैबिटैट का बंटवारा और हाईवे, रेलवे, बिजली की लाइनें, नहरें, माइनिंग, शहरों का फैलाव और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से कनेक्टिविटी का धीरे-धीरे खत्म होना है। यहां तक कि जहां अच्छी तरह से सुरक्षित रिज़र्व में टाइगर की संख्या बढ़ रही है, वहां भी कॉरिडोर के खराब होने से आबादी अलग-थलग पड़ सकती है, जीन फ्लो में रुकावट आ सकती है और इंसानों-टाइगर के बीच मुठभेड़ बढ़ सकती है क्योंकि फैलने वाले जानवर खेतों और बस्तियों में घुस रहे हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "दूसरे गंभीर खतरों में हैबिटैट पर कब्ज़ा, जंगल का खराब होना, शिकार की कमी, गैर-कानूनी शिकार और वाइल्डलाइफ ट्रेड, जंगल में आग, हमलावर प्रजातियां, बिना कंट्रोल के चराई और जंगल के रिसोर्स का बहुत ज़्यादा दोहन शामिल हैं। क्लाइमेट चेंज एक और बढ़ता हुआ खतरा है, खासकर सुंदरबन में समुद्र का लेवल बढ़ना, खारापन और कटाव, साथ ही दूसरे इलाकों में सूखे, गर्मी और आग के बढ़ते खतरे हैं।"
डॉ. बिरादर का कहना है कि नई चुनौती यह है कि भारत में टाइगर की कुल आबादी बढ़ सकती है जबकि कुछ छोटी आबादी, हैबिटैट और कॉरिडोर गायब होते रहेंगे। इसलिए, कंज़र्वेशन की सफलता को न केवल टाइगर की संख्या से मापा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें सहारा देने वाले इलाकों की सीमा, कनेक्टिविटी, इकोलॉजिकल हेल्थ और लचीलेपन से भी मापा जाना चाहिए। भारत को अब कुल मिलाकर जरूरत है, लैंडस्केप-लेवल प्लानिंग, वैज्ञानिक तरीके से डिज़ाइन किए गए वन्यजीव क्रॉसिंग, आवास और टाइगर जिन जानवरों को आहार बनाता है उनकी संख्या में वृद्धि, टेक्नोलॉजी से लैस निगरानी, ग्रामीणों या आदिवासियों के साथ कोई दुर्घटना होने पर समय पर मुआवजा और समान आजीविका लाभ के साथ वास्तविक सामुदायिक प्रबंधन।
भारत के बाघ संरक्षण मॉडल में आगे क्या?
पिछले पांच दशकों में भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। प्रोजेक्ट टाइगर, वैज्ञानिक निगरानी, टाइगर रिजर्वों के विस्तार और स्थानीय स्तर पर संरक्षण प्रयासों के साथ भारत इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। दरअसल यह उपलब्धि मजबूत नीतियों, दीर्घकालिक सोच और संस्थागत प्रयासों का परिणाम है। लेकिन आगे भी बाघ संरक्षित रहें इसके लिए विस्तृत लैंडस्केप को संरक्षित रखने की जरूरत है। वन्यजीव कॉरिडोर में बढ़ते अतिक्रमण को रोकने की जरूरत है। अभी भी जो चुनौतियां बनी हुई हैं उनमें मुख्य रूप से वन्यजीव गलियारों पर अतिक्रमण है। सड़कों व हाइवे के निर्माण के लिए वन्य जीव कॉरिडोर को संकुचित करना इनके आवास के विखंडन करने जैसा है।
कैसे बचाया जाए टाइगर रिजर्व लैंडस्केप को?
इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता का सूत्र लैंडस्केप में विस्तार है। अब इसे बचाना उससे भी बड़ी चुनौती है। इस पर डॉ. चंद्रशेखर बिरादर ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में कहा कि भारत दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक जंगली बाघों का घर है। इसके अलावा यहां तेंदुआ, एशियाई शेर और हिम तेंदुआ जैसी बड़ी बिल्ली प्रजातियां भी पाई जाती हैं। इन पशुओं के लिए अनुकूल आवास के नष्ट होने, वनों की कटाई और मानव व वन्यजीवों के बीच संघर्ष जैसी चुनौतियां देश की वन्यजीव संपदा के लिए लगातार खतरा बन रही हैं।
डॉ. बिरादर ने आगे कहा, "ऐसे में जैव विविधता क्रेडिट एक बड़े समाधान के रूप में उभर सकता है। इनके माध्यम से स्थानीय समुदायों, वनवासियों, आदिवासी समाज और संरक्षण एजेंसियों को वन्यजीव गलियारों, घास के मैदानों, एग्रो-फॉरेस्ट्रिी, फूड फॉरेस्ट और बफर क्षेत्रों जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, प्रोजेक्ट टाइगर के तहत आने वाले टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्रों को जैव विविधता क्रेडिट योजनाओं से जोड़ा जा सकता है। इससे स्थानीय समुदायों को चराई या लकड़ी कटाई जैसी संसाधन-आधारित गतिविधियों के बजाय संरक्षण-आधारित आजीविका से आय अर्जित करने का अवसर मिलेगा। ये क्रेडिट प्राकृतिक संपदा को सहेजने, एग्रो-फॉरेस्ट्री और इको-टूरिज्म जैसी पहलों को भी बढ़ावा दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहां बाघ, तेंदुओं आदि की प्रजातियों के आवासों का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है, वहां ये स्कीम कारगर साबित हो सकती है।"
तो कुल मिलाकर आने वाले वर्षों में संरक्षण का फोकस केवल बाघों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पूरे टाइगर लैंडस्केप, नदी तंत्र और जंगलों के ईकोसिस्टम को सुरक्षित रखने पर होना चाहिए। और इन सबके बीच एक बात जो हमें नहीं भूलनी है वो यह कि बाघ नहीं बचेंगे तो नदियां भी नहीं बचेंगी।
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