खरक बांध परियोजना साइट
फोटो - सतीश भारतीय
मध्य प्रदेश की खारक बांध परियोजना - न ज़मीन बची, न पैसा मिला, दर-दर भटक रहे किसान
खारक बांध परियोजना का लक्ष्य कृषि के लिए जल आपूर्ति करना था। ताकि कृषि उत्पादन बढ़े और किसान और अधिक समृद्ध हो सकें। प्रशासन ने टेंडर निकाला, काम शुरू हुआ, जमीनों का अधिग्रहण हुआ और तमाम पेड़ों को काटा गया… लेकिन, बांध का काम पूरा नहीं हो सका। नतीजा यह हुआ कि जो किसान बीते कई वर्षों से प्रचुर मात्रा में पानी की आस लगाये थे, बांध से जिस पानी को लाने के सपने दिखाए गए थे, उसकी एक बूंद नहीं मिली। ऊपर से करीब 300 किसान परिवारों को आर्थिक तंगी ने अलग से जकड़ लिया। क्योंकि जमीन अधिग्रहीत किए जाने के दौरान 300 से अधिक परिवार विस्थापित हुए, जिनमें अब भी 128 परिवारों तक उचित मुआवजा राशि नहीं पहुंची। और बाकी जिन परिवारों को मुआवज़ा मिला भी तो धनराशि इनती कम थी कि घर चलाना मुश्किल हो गया।
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश जारी किया लेकिन इसके बावजूद इन किसानों को मुआवजा राशि नहीं मिली। आलम यह है कि, इन परिवारों की आर्थिक तंगी अब उनके बच्चों के जीवन को प्रभावित कर रही है।
मध्य प्रदेश की खरक बांध परियोजना के बारे में
मध्य प्रदेश के खरगोन ज़िले में खारक बांध परियोजना को क्षेत्र में पानी की बढ़ती कमी और कृषि पर निर्भरता को ध्यान में रखते हुए शुरू किया गया था। इस इलाके में वर्षा असमान और अनिश्चित रहने के कारण किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं हो पाता था। ऐसे में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, कृषि उत्पादन बढ़ाने और ग्रामीण जीवन को स्थिर बनाने के उद्देश्य से इस बांध की योजना बनाई गई।
परियोजना के लिएखाली करायी गई जमीन
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खरक बांध बनाने के प्रमुख उद्देश्य थे:
कृषि सिंचाई: क्षेत्र के किसानों को साल भर पानी उपलब्ध कराना, खासकर सूखा प्रभावित इलाकों में।
जल संरक्षण: वर्षा जल को संग्रहित करके उसका बेहतर उपयोग करना।
भूजल स्तर सुधार: आसपास के क्षेत्रों में भूजल रिचार्ज बढ़ाना।
पेयजल आपूर्ति: स्थानीय लोगों के लिए पर्याप्त मात्रा में पीने का पानी उपलब्ध कराना।
इस परियोजना की कार्य प्रक्रियाएं 2011-2012 से शुरू हुई। तब परियोजना की लागत 4913.59 रुपए बताई गयी। जिसमें से 2277.62 लाख रुपए से खारक नदी पर ग्राम चौखंड में जलाशय निर्माण की नीव रखी गई। जबकि, 2640 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई लक्ष्य रखा गया।
इस दौरान 300 से अधिक परिवार विस्थापित हुए। जिनमें अब भी 128 परिवारों तक उचित मुआवजा राशि नहीं पहुंची।
परियोजना के साथ शुरू हुआ था आंदोलन
एक तरफ जल की उपलब्धता के लिए यह परियोजना शुरू की जा रही थी, वहीं दूसरी ओर इस परियोजना के विरोध में लोग खड़े थे। आंदोलन कर रहे थे। विरोध और आंदोलन की वजह था लोगों को उचित मुआवजा और पुनर्वास ना मिलना। परियोजना में बहुत से प्रभावितों को मुआवजा मिल भी गया। मगर, इसके बावजूद भी 128 परिवार उचित मुआवजे और पुनर्वास से वंचित रह गए। इन 128 परिवारों में ज्यादातर लोग आदिवासी समुदाय से आते हैं।
ज्ञापन पर ज्ञापन सौंप रहे आदिवासी समुदाय के लोग, लेकिन सुनवाई नहीं
उचित धनराशि की आस लगाये बैठे ये लोग परियोजना कार्य शुरू होने से लेकर अब तक उचित मुआवजा और पुनर्वास पाने के लिए शासन-प्रशासन, नेताओं के नाम ज्ञापन सौंपते आ रहे हैं। साथ में धरना-प्रदर्शन भी करते आये हैं, लेकिन शासन-प्रशासन कहीं कोई सुनवाई नहीं। जब कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तब वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन शिकायत निवारण प्राधिकरणों (जीआरए) को गठित कर एक करोड़ रुपए मुआवजा देने का आदेश पुनर्वास नीति 2002 और 2008 के तहत दिया। इसके बावजूद भी आज तक लोगों को मुआवजा नहीं मिल सका है।
प्रदर्शन करते किसान
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क्या कहता है भू-अर्जन अधिकारी का सूचना पत्र
खारक बांध प्रभावितों के मुआवजा के संबंध में सूचना पत्र भेजे गए। इसी में बलीराम सोलंकी, निवासी ग्राम जुनाबिलवा को भी एक पत्र मिला जो सूचना पत्र कार्यालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) एवं भू-अर्जन अधिकारी खरगोन, मध्य प्रदेश द्वारा 19-01-2017 को जारी किया गया था।
पत्र में उल्लेख है कि, आदेशानुसार आपको खारक परियोजना अंतर्गत गठित समिति का सदस्य नियुक्त किया गया है। परियोजना अंतर्गत माननीय न्यायालय के आदेश में उल्लेखित प्रत्येक प्रभावित परिवार को राशि रुपये 50000/- भुगतान करने के निर्देश दिये गये हैं।
आखिर में, पत्र में लिखा गया है कि, आप (बलीराम) खारक बांध प्रभावित परिवारों की सूची एवं बैंक पासबुक तथा पहचान पत्र की प्रति तत्काल विशेष वाहक हस्ते इस कार्यालय को उपलब्ध करवाएं। ताकि, कार्यपालन यंत्री जल संसाधन विभाग खरगोन से परीक्षण पश्चात प्रभावित परिवारों को राशि भुगतान सुनिश्चित किया जा सके।
जागृत आदिवासी संगठन आया आगे
जब यहां के किसानों को हर तरफ से निराशा हाथ लगने लगी तब जागृत आदिवासी दलित संगठन ने इनका हाथ थामा। इस संगठन ने प्रभावित लोगों के मुआवजे के संबंध में समय-समय पर कई शासन-प्रशासन और नेताओं से मुलाकात कर इनकी बात रखी। इसी दौरान संगठन ने 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को के समक्ष किसानों की समस्या रखी।
पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन देते किसान
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29/03/2023 को दिए गए पत्र में लिखा कि खारक बांध परियोजना में विस्थापित 128 आदिवासी परिवार 2013-15 से अपने घरों व जमीनों से हिंसक रूप से विस्थापित किए गए हैं। इस मामले पर जिन लोगों ने आवाज़ उठाई उन्हें जेल भी जाना पड़ा। पत्र में खारक बांध परियोजना के विस्थापित परिवारों को न्यायालय के आदेश का पालन करते पुनर्वास राशि दिए जाने की अपील की गई और साथ ही मुख्यमंत्री को खरगोन पधारने के लिए आमंत्रित भी किया गया।
सांसद तक से की गई अपील
जब राज्य स्तर पर बात नहीं बनी तब प्रभावितों के पुनर्वास एवं जीआरए की नियुक्ति को एक पत्र खरगोन-बड़वानी लोक सभा क्षेत्र के सांसद गजेंद्र सिंह पटेल को लिखा गया। यह पत्र भी जागृत आदिवासी दलित संगठन ने लिखा।
दिनांक 26/8/2025 को सौंपे गए इस पत्र में भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2017 में दिए गए आदेश का हवाला दिया गया और बताया गया कि 8 साल बीत जाने के बाद भी किसानों का पुनर्वास नहीं हुआ है। पत्र में आगे लिखा है गया कि खरक परियोजना से प्रभावित 129 परिवारों को पुनर्वास राशि दिलाने में उनकी सकारात्मक भूमिका रही है। लेकिन, 128 परिवार ऐसे हैं, जिनका जीआरए द्वारा आदेश लंबित है। खारक बांध परियोजना के कारण इन लोगों के घरों को अवैध रूप से उजाड़ा गया। खेत व घर नष्ट किए गए। कई परिवार पलायन करने के लिए मजबूर हो गए। पत्र के अंत में मुआवजे की धनराशि को जल्द से जल्द दिलाने का आग्रह किया गया।
8 वर्षों में केवल 20 मामलों का निपटान
इस मामले के निपटान के लिए वर्ष 2020 से 2024 के बीच में जीआरए के पद पर दो जज नियुक्त किए गए। साल 2020 से 2022 तक अब्दुल जफ्फार खान और जनवरी 2022 से 30 सितंबर 2024 तक तारकेश्वर सिंह। लेकिन इस अवधि में केवल 20 मामलों में निर्णय हुआ। फिर भी, उन प्रभावितों को पुनर्वास राशि नहीं मिली। 20 मामलों के निपटान की बात मुख्यमंत्री, जलसंसाधन मंत्री और जल संसाधन विभाग भोपाल को सौंपें पत्र (दिनांक 25/09/2025 के) में भी लिखी गई।
किसानों की पीड़ा
खारक बांध परियोजना में प्रभावित 128 लोगों को मुआवजा और पुनर्वास ना मिल पाने की स्थति में उनके दिलोंदिमाग में क्या है? वे किस तरह प्रभावित हैं? अपनी परेशानी को कैसे देख रहे हैं? यह जानने-समझने के लिए हमने कुछ प्रभावितों से संवाद किया।
जूना बिलवा गांव के जगदीश बारेला (48) जो एक किसान थे अब वे मजदूरी कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि, “मेरी 14 एकड़ जमीन खारक बांध परियोजना में अधिग्रहित की गयी। इस पूरी जमीन का मुझे कोई मुआवजा नहीं मिला। मुआवजा पाने के लिए हम करीब 12 वर्ष से संघर्ष कर रहे हैं। जिसमें शासन-प्रशासन को कई ज्ञापन सौंपने से लेकर धरना देने तक का संघर्ष किया है। फिर भी, अब तक मुआवजा नहीं मिला।”
जगदीश आगे दर्द भरे लहजे में कहते हैं, “पहले हम खेती-बाड़ी के जरिए खुशहाली की जिंदगी जीते थे। खेती में अच्छी आय थी। सब ठीक-ठाक चलता था। जब से हमारी जमीन परियोजना में गयी है, तब से हम किसान से मजदूर बन गए हैं। लेकिन, आज बेरोजगारी के इस दौर में मजदूरी के जरिए मुझे अपने परिवार के 7 सदस्यों का पेट पालना मुश्किल हो रहा है। यदि सरकार हमें अच्छा मुआवजा देती तब आज खुद को संभार पाते।”
आये दिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते किसान
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दिन पर दिन आर्थिक स्थिति हो रही है खराब
जूना बिलवा गांव के निवासी बिकला सोलंकी (45) बताते हैं, “खारक बांध परियोजना में प्रशासन से कई मांगे थीं। इन मांगों में खास मांग थी कि, हमारी जितनी जमीन परियोजना में जायेगी उतनी जमीन हमें दी जाए। इसकी वजह थी कि, हमारे पास आजीविका का साधन केवल जमीन थी। लेकिन, बांध में मेरी 9 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहीत की गयी। जिसके लिए 1 लाख रूपए एकड़ के हिसाब से मुआवजा केवल 9 लाख रुपए मिला।”
आगे वह बताते हैं कि जब किसानों ने कम मुआवजे का विरोध किया, तब पुलिस प्रशासन ने लाठी-डंडे चलाये। सोलंकी बताते हैं कि जिन किसानों ने विरोध किया उनको उनके परिवार के साथ जेल में भी डाल दिया गया था। फिर, कई दिन बाद जेल से निकाला गया। सोलंकी के अनुसार परियोजना में एक भी परिवार का पुनर्वास नहीं हुआ है। परिवारों की आर्थिक स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है।
पेड़ों और पशुओं के लिए कोई मुआवजा नहीं
परियोजना प्रभावित शिवराम कनाहसे, ग्राम गांव चोखन के निवासी हैं। कनाहसे ने कहा, “मेरे परिवार में 4 लोग हैं। हम लोग हमारी 4 एकड़ भूमि पर कृषि करते थे। इसी से हमारी रोजी-रोटी चलती थी। मगर, परियोजना में 4 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर ली गयी। 4 एकड़ भूमि का हमें केवल केवल 1 लाख 30 हजार रुपए मुआवजा दिया गया। जमीन थी, तब उस पर फलदार पेड़ थे, जिनसे घर चल जाता था। सरकार ने पेड़ों और पशुओं के लिए कोई मुआवजा नहीं दिया।
उन्हों ने आगे कहा, “आज हमारी हालत यह है कि म रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों में मजदूरी करने जाते। हमें उम्मीद थी कि, अच्छा मुआवजा और पुनर्वास सुविधाएं हमें बिखरने नहीं देगीं। मगर, सरकार न हमें पुनर्वास दे पायी और न जमीन का अच्छा मुआवजा। तब हमारी जिंदगी सुधरने के बजाए विखरने लगी है।”
मजदूरी ही एक चारा, किसानों को नहीं मिल रहा अन्य कोई रोजगार
चोखन गाँव के कोटवाल डोमरे (35) ने कहा, “मेरी 8 एकड़ जमीन परियोजना अंतर्गत अधिग्रहण की गयी। इस जमीन का हमें केवल 2 लाख 50 हजार रुपए दिया गया। इतने कम मुआवजे में हम अपनी जिंदगी कैसे चला सकते हैं। जमीन अधिग्रहण के बाद ना हमें कोई रोजगार दिया गया। ना कोई ऐसी कोई स्किल सिखाई गई जिससे कोई नया रोजगार मिल पाए। हमारा परंपरागत रोजगार केवल कृषि था। कृषि के अलावा हमारे पास कोई अन्य कौशल नहीं है, जिससे हम जीविका चला सकें।
रामलाल सोलंकी (52) भी चोखन गांव के हैं। उनकी भी निर्भरता मजदूरी पर है। उन्होंने कहा, “हमारी 8 एकड़ जमीन परियोजना में हाथ से चली गई। जिसका हमें 7 लाख रुपए ही मुआवजा दिया गया। बाकी का मुआवजा अभी तब नहीं मिला है। इस स्थिति ने हमें मजदूरी की ओर धकेल दिया है। अभी हम 250-300 रुपए दिन मजदूरी कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं।”
इसके आगे वे यह भी कहते हैं कि, ‘मुआवजे से वंचित रह गए, 128 परिवार की हालात बेहद खराब है। इन परिवारों के कई लोगों काम के लिए दिल्ली, मुंबई, इंदौर, भोपाल जैसे शहरों में पलायन करने पर मजबूर हो गए हैं। छोटे-छोटे बच्चों का पेट पालना उनको पढ़ाना सभी के लिए काफी कठिन होता जा रहा है।
कई बार कार्यालयों के बाहर धरना दे चुके हैं किसान
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छिन गई परिवार की आजीविका
सिरवई गांव की जसमा बाई बारेला (35) भी 128 लोगों में से एक हैं। अपना दुख जाहिर करते हुए वे कहती हैं, “हमारे परिवार में 12 सदस्यों की 4.5 एकड़ जमीन थी। यह जमीन हमें जीविका देती थी। मगर, पूरी जमीन परियोजना में डूब गयी। जिसका मुआवजा केवल 7 लाख रुपए मिला।”
आगे कहती हैं, “कम मुआवजे के कारण हम कोई दूसरी जमीन नहीं खरीद पाये। आज हम भूमिहीन हो गये। अब हमारे कमाने-खाने का साधन कुछ नहीं है। हमारी मांग है कि, सरकार हमारे साथ न्याय करे।
इस पूरे मामले में प्रभावितों की आवाज उठाने वाली और जागृत आदिवासी दलित संगठन से जुड़ी माधुरी कृष्णा स्वामी से भी हमने उनका नजरिया जानने की कोशिश की। तब वे बातचीत में कहती हैं कि, ‘परियोजना में डूब 2015 में हुआ था। वर्ष 2012-13 में प्रभावित लोगों को कुछ मुआवजा दिया गया था। जो करीब 65 हजार रुपए प्रति एकड़ था। यह मुआवजा बहुत कम था। कम प्रभावितों को मिला। वहीं, पुनर्वास नहीं मिला था। प्रभावितों ने मुआवजे और पुनर्वास के लिए आन्दोलन भी किए। यहाँ तक कि, करीब 150 लोगों को जेल भी जाना पड़ा। वहीं, लोगों के साथ मार-पीट भी की गयी।
माधुरी ने कहा, “चिंताजनक है कि, बहुत साल बीत जाने के बाद भी अब तक 128 लोगों को मुआवजा नहीं मिल सका है। हम शासन-प्रशासन से लगातार मांग कर रहे हैं कि, लोगों को मुआवजा और पुनर्वास दे दीजिए। संभव हो तब जीआरए बैठा कर दे दीजिए। नहीं तो सीधे ही मुआवजा भेज दीजिए। लेकिन, इस मामले में ऐसा लग रहा है कि, मुआवजे की प्रक्रिया सुलझने के बजाए उलझती जा रही है।”
क्या कहते हैं अधिकारी?
खारक बांध परियोजना में मुआवजा के संबंध में हमने जल विभाग की एग्जीक्यूटिव इंजीनियर नीलम से भी बातचीत की। उन्होंने कहा, “पहले जो खारक बांध परियोजना प्रभावित रह गये थे उन्हें मुआवजा दिया गया था। लेकिन, शासन स्तर पर में जीआरए गठित नहीं हो पाया है। जिससे अन्य परियोजना प्रभावित लोगों को मुआवजा नहीं मिल पाया है। मुआवजा ना मिलने वाले लोगों के लिए जब जीआरए गठित हो जायेगा तब इस मामले में सुनवाई होगी। इसके बाद यह सुनिश्चित हो पायेगा कि, प्रभावितों को कितनी-कितनी राशि प्रदान की जानी है। इस मामले को हमने शासन स्तर पर भेज दिया है। इस मामले में बजट की परेशानी नहीं है। मगर, कह नहीं सकते मामले का कब तक समाधान होगा।”
बांध निर्माण से पहले किसान बारिश पर निर्भरता के कारण सोयाबीन, मक्का जैसी फसलें उगाते थे। फिर, इस बांध के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। तब किसान इस बात को लेकर खुश हुए कि बांध से पर्याप्त पानी मिलने पर गर्मी के मौसम में भी मक्का, उड़द, या अन्य फसलों और सब्जियों की खेती सहजता से कर पाएंगे। और आमदनी बढ़ेगी। लेकिन शासन-प्रशासन की हीलाहवाली के चलते इन किसानों को न पानी मिला, न जमीन, न उचित मुआवजा और न ही पुनर्वास। कुल मिलाकर इनका जीवन अंधेरे में है।
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