युद्ध में छोड़ी जाने वाली मिसाइलों और रॉकेटों से भारी मात्रा में वायु प्रदूषण होता है। 

युद्ध में छोड़ी जाने वाली मिसाइलों और रॉकेटों से भारी मात्रा में वायु प्रदूषण होता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध पर्यावरण के लिए खड़ा कर स‍कता है गंभीर संकट

हज़ारों की संख्‍या में दागी जा रही मिसाइलों और फाइटर जेट्स की उड़ानों से वातावरण में फैल रहा धुआं और ग्रीन हाउस व प्रदूषक गैसें। जंग लंबी खिंची तो, मध्‍य-पूर्व सहित दुनिया के बड़े हिस्‍से में गहरा सकता है जल संकट, जलवायु परिवर्तन और ग्‍लोबल वॉर्मिंग का असर।
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सारी दुनिया में इस वक्‍त एक ही ख़बर छाई हुई है, वह है ईरान-इज़राइल-अमेरिका के बीच बीते सप्‍ताह शुरू हुई जंग। यह युद्ध बड़ी तेज़ी से दुनिया के एक बड़े हिस्‍से को अपने दायरे में लेता जा रहा है और फिलहाल इसके जल्‍द ख़त्‍म होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र का यह सैन्‍य संघर्ष राजनीतिक, सामाजिक और रक्षा से जुड़ी चिंताओं से कहीं आगे बढ़ चुका है। पश्चिम एशिया में पिछले कई दशकों का सबसे खतरनाक और व्यापक भू-राजनीतिक युद्ध अब वैश्विक ऊर्जा, समुद्री चिंताओं, जल संकट और पर्यावरणीय प्रभावों का मामला बन चुका है। इस बहुपक्षीय युद्ध में विजय-पराजय चाहे जिसकी हो और युद्ध का परिणाम चाहे जो भी हो, इतना तो निश्चित है कि यह जंग आने वाले समय में जलवायु से जुड़े जोखिमों को बढ़ाने जा रही है।

मिसाइलों और फाइटर जेट्स की उड़ानों से वातावरण हो रहा प्रभावित

रोज़ाना हज़ारों की संख्‍या में दागी जा रही मिसाइलों और लगातार उड़ान भर रहे फाइटर जेट केवल सैन्य ताकत का प्रदर्शन नहीं कर रहे, बल्कि वातावरण और जलवायु पर भी भारी दबाव डाल रहे हैं। इनसे न केवल वातावरण में धुआं फैल रहा है, बल्कि इनकी हीट से गर्मी और प्रदूषक व ग्रीन हाउस गैसों में भी इज़ाफा हो रहा है। आधुनिक लड़ाकू विमानों की ईंधन खपत बेहद अधिक होती है। उदाहरण के लिए, एफ-35 जैसे एक आधुनिक फाइटर जेट को एक घंटे की उड़ान में लगभग 5,600 लीटर जेट ईंधन की आवश्यकता होती है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक गैसें वातावरण में निकलती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे विमान प्रति घंटे लगभग 2 से 2.2 टन CO₂ समतुल्य उत्सर्जन कर सकते हैं।

इसके अलावा मिसाइलों और गोला-बारूद के विस्फोट से भी बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन कण और जहरीले एरोसोल वातावरण में फैलते हैं, जो वायु गुणवत्ता को खराब करते हैं और ओजोन व स्मॉग के निर्माण में योगदान देते हैं। साइंस डायरेक्‍ट में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, सैन्य गतिविधियों से निकलने वाले ये उत्सर्जन स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकते हैं। इसके साथ ही युद्ध के दौरान लगातार सैन्य गतिविधियों से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी काफी तेजी से बढ़ता है। मिसाल के तौर पर, एक रिसर्च स्‍टडी के अनुसार रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले 18 महीनों में करीब 77 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन दर्ज किया गया, जो दिखाता है कि बड़े पैमाने के युद्ध जलवायु परिवर्तन को भी तेज कर सकते हैं।

International Union of Scientists की एक रिपोर्ट, जिसके लेखक मानवेंद्र नाथ बेरा हैं, के मुताबिक युद्ध में हजारों मिसाइलों के दागे जाने से और लगातार उड़ान भरते लड़ाकू विमानों से उठता धुआं, गर्मी और ग्रीन हाउस गैसें केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वैश्विक जलवायु प्रणाली को भी प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि अब कई वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ युद्ध को भी जलवायु संकट का एक अनदेखा लेकिन महत्वपूर्ण कारण मानने लगे हैं। इसे देखते हुए वैज्ञानिकों के इस संगठन ने ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़रायल की सैन्‍य कार्रवाई की निंदा भी की है। युद्ध से होने वाले पर्यावरणीय असर को इस टेबल के ज़रिये आसानी से समझा जा सकता है-

युद्ध और पर्यावरण: हथियारों और विमानों से निकलने वाला कार्बन

हमले में तबाह रिफाइनरियों की आग से फैल रहा भयंकर वायु प्रदूषण

ईरान–इज़राइल के रणनीतिक हमलों सामरिक ठिकानों से आगे बढ़कर अब अर्थव्‍यवस्‍था और  ऊर्जा ढांचे को नष्‍ट-भ्रष्‍ट करने के लिए तेल-गैस रिफाइनरियों को प्रत्यक्ष तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। इसकी वजह से मध्‍य-पूर्व के इलाके में भारी वायु प्रदूषण हो रहा है। जलती हुई रिफाइनरियों से उठता घना काला धुआं काले बादलों की तरह वायुमंडल में फैलता जा रहा है। इससे इस पूरे इलाके में एक बड़ा पर्यावरणीय जोखिम उठ खड़ा हुआ है। 2 मार्च 2026 को मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको (Saudi Aramco) के रास तनुरा (Ras Tanura) तेल रिफाइनरी पर ड्रोन हमले की खबर सामने आई। इसके बाद इसे एहतियातन बंद करना पड़ा और रिफाइनरी से गहरे काले रंग के दमघोंटू धुएं के विशाल बादल उठते देखे गए। दुनिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली यह रिफाइनरी दिन में लगभग 5.5 लाख बैरल तेल प्रतिदिन संसाधित करती है। इसके बंद होने से जहां तेल संकट पैदा होने के आसार बढ़ गए हैं वहीं, इससे उठता धुआं पूरे खाड़ी क्षेत्र की वायु गुणवत्ता के लिए गंभीर गंभीर खतरा बन गया है।

इसी तरह यूएई के औयोगिक हब फुजैराह (Fujairah) ऑयल फील्‍ड और सैन्य ठिकाने पर भी हमले के बाद भयंकर आग की सूचना है।  ड्रोन हमलों और विस्फोटों के कारण लगी इस आग से भारी मात्रा में जहरीला धुआं उठता देखा गया। इससे आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है। इन रिफाइनरियों की आग से तेल और रसायनों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उत्सर्जन वायु में मिलकर स्थानीय तापमान, वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) को बिगाड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस कच्‍चे तेल की आग से उठते इस धुएं में काफी भारी मात्रा में PM2.5 और PM10 जैसे वायु प्रदूषक कणों का लोगों के स्वास्थ्य, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर और दीर्घकालिक असर हो सकता है। इससे खासतौर पर सांस सम्बन्धी रोग, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रिफाइनरियों के धुएं के कारण औद्योगिक गैस, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ सकती है, जो कि स्थानीय समुदायों और जैविक तंत्र के लिए दीर्घकालिक चुनौती पैदा करते हैं। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि युद्ध के प्रत्यक्ष सैन्य प्रभाव के साथ-साथ पर्यावरणीय और स्वास्थ्य-संबंधी परिणाम भी सामने आ रहे हैं, जिनका आकलन तत्काल कर पाना मुश्किल है।

<div class="paragraphs"><p>फाइटर जेट्स यानी युद्धक विमानों में भी भारी मात्रा में ईंधन की खपत होती है, जिससे काफी मात्रा में ग्रीन हाउस और प्रदूषक गैसें निकलती हैं। साथ ही इससे ध्‍वनि प्रदूषण और वायुमंडल का तापमान भी बढ़ता है।</p></div>

फाइटर जेट्स यानी युद्धक विमानों में भी भारी मात्रा में ईंधन की खपत होती है, जिससे काफी मात्रा में ग्रीन हाउस और प्रदूषक गैसें निकलती हैं। साथ ही इससे ध्‍वनि प्रदूषण और वायुमंडल का तापमान भी बढ़ता है।

स्रोत : विकी कॉमंस

युद्धपोतों, टैंकरों और नौसैनिक ढांचों पर हमले से समुद्र में फैल रहा प्रदूषण 

इस पहुपक्षीय संघर्ष के साथ ही फारसी खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में समुद्री क्षेत्र एक सक्रिय युद्ध क्षेत्र बन चुका है, जहाँ युद्धपोतों, तेल टैंकरों और नौसैनिक आधारों पर हमले ने समुद्री ट्रैफिक को बाधित करने के साथ-साथ समुद्र में प्रदूषण और पारिस्थितिकीय जोखिमों को नए स्तर पर धकेल दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हाल के दिनों में, युद्ध की तीव्रता के बीच कम से कम तीन तेल टैंकरों को नुकसान पहुंचा है और कई अन्य जहाज़ों पर हमलों की खबरें हैं, जिनमें से एक पर भारतीय चालक दल का एक सदस्य भी मारा गया। यह हमला होर्मुज़ की खाड़ी में ड्रोन बोट की टक्कर के कारण हुआ था, जिसमें जहाज़ के इंजन कक्ष में आग लग गयी थी। ऐसे हमलों के कारण समुद्र में तेल और अन्य हानिकारक रसायनों के फैलने का खतरा बढ़ता है, जिससे जल, समुद्री जीवन और तटीय पारिस्थितिकी पे प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इसके साथ ही स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में समुद्री ट्रैफिक लगभग ठहर सा गया है, जहाँ सैकड़ों तेल और LNG टैंकर, कंटेनर जहाज़ और मालवाहक व्यापारिक जहाज़ सहित कुल 150 से अधिक vessels तक लंगर डालकर खड़े हैं, क्योंकि युद्ध की आशंका, रूटिंग और नेविगेशन सिस्टम पर हमले के कारण उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया है। इस भारी जाम की वजह से न केवल तेल और गैस की आपूर्ति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बढ़ा है, बल्कि जहाज़ों में मौजूद सूखे और हानिकारक ईंधन तथा अन्य रसायनों का समुद्र में रिसाव होने का जोखिम भी बड़ा है।

यह हमले और इन के चलते सागर में हो रहा तेल रिसाव व रासायनिक प्रदूषण समुद्री जीवन के लिए विशेष रूप से खतरनाक है। तेल टैंकरों में भारी मात्रा मौजूद कच्‍चा तेल समुद्र में फैल सकता है, जहाज़ों पर लगी आग से रसायन और आग का भारी धुआं भी समुद्र की सतह और पानी के गहरे हिस्सों में मिल सकता है। इस प्रदूषण और युद्ध की गतिविधियों के कारण समुद्री मछलियों तथा प्रवाल भित्तियों का आवास बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यदि ऐसे जहाज़ों पर नियंत्रण और सुरक्षा उपाय तुरंत लागू नहीं हुए, तो खाड़ी की पारिस्थितिकी तंत्र में दीर्घकालिक प्रदूषण और जैव विविधता का नुकसान हो सकता है, जो पहले से ही बढ़ते तापमान और समुद्री जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच एक गंभीर पर्यावरणीय आपदा बन सकता है।

इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि युद्ध का एक खतरनाक दूसरा पहलू ‘समुद्री पारिस्थितिकी और जल प्रदूषण’ अब एक महत्वपूर्ण वैश्विक चिंता बन चुका है, जिससे समुद्र के पानी के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, जीविका और समुद्री जीवन का संरक्षण भी सीधे खतरे में है। इसे इस टेबल के ज़रिये आसानी से समझा जा सकता है-

युद्ध के कारण समुद्री प्रदूषण: तेल टैंकर और जहाज़ों की दुर्घटनाएं

मध्य-पूर्व की भू-राजनीति और गहराता जलवायु संकट 

मध्य पूर्व पहले से ही दुनिया की सबसे जल–तनावग्रस्त (water-stressed) क्षेत्र में शामिल है, जहां वर्षा अत्यधिक अनियमित है, जलवायु परिवर्तन सूखे को गंभीर बना रहा है। मौजूदा संघर्ष मौजूदा संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहा है। इसने तापमान में वृद्धि, वर्षा में अनियमितता और जलवायु परिवर्तन, जैसी स्थितियों को और गंभीर बनाने के हालात पैदा कर दिए हैं। साथ ही इराक, सीरिया और ईरान में धीरे-धीरे सूखे की गंभीरता बढ़ा दी है, जिससे फसलों, सामाजिक तनावों और पानी की मांग में तीव्र वृद्धि हुई है। इस युद्ध की भूराजनीति और जलवायु का यह मिलाजुला असर इस क्षेत्र में कृषि संकट, चरम तापमान और पानी की कमी को और भी गंभीर बना रहा है। युद्ध का विस्तार होने से इन जोखिमों के बढ़ने की प्रबल संभावना है।

सैन्य संघर्ष का एक बड़ा परिणाम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट होना है। स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज, फारसी खाड़ी से गुजरने वाला एक वाणिज्यिक मार्ग, वैश्विक तेल और LNG शिपमेंट का लगभग 20-30% हिस्सा संभालता है — और यहीं पर ईरान के सैन्य खतरे, टैंकरों और जहाज़ों पर हमलों के कारण तेल आपूर्ति पर व्यवधान आ गया है।

इसके निम्‍नलिखित आर्थिक प्रभाव प्रत्‍यक्ष रूप से देखने को मिल रहे हैं :

  • वैश्विक तेल और गैस कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।

  • कई तेल कंपनियों और जहाज़ मालिकों ने खतरे की वजह से क्षेत्र में कवर (war risk insurance) हटाया या महंगा कर दिया है

  • एशिया और यूरोप जैसे देशों को आपूर्ति संकट और महंगाई का खतरा उठ रहा है।

यह स्थिति मध्‍य-पूर्व में जल संकट की गहराने की आशंका को और प्रबल बनाती है, क्योंकि तेल और ऊर्जा की महंगाई सीधे सिंचाई और पानी की आपूर्ति प्रणालियों को प्रभावित करती है, जिससे पानी पंपिंग, और जल नियोजन प्रणालियां और भी महंगी और कमजोर हो जाती हैं।

हवा से लेकर मिट्टी, पानी तक होते हैं प्रभावित

युद्ध में जब सैन्‍य व औद्योगिक ठिकानों पर हमले में बम, मिसाइल या ड्रोन का इस्तेमाल होता है, तो यह सिर्फ इन ठिकानों को नहीं नष्ट करता, बल्कि वातावरण में भारी मात्रा में प्रदूषक भी छोड़ता है। मिसाइल ब्लास्ट, बम विस्फोट, हवा, धरती की सतह यानी मिट्टी और जल स्रोतों में हानिकारक पदार्थ छोड़ते हैं। इसका असर इस रूप में देखने को मिलता है:

  • हवा में भारी मात्रा में धूल और कार्बन मोनोऑक्‍साइड (CO), नाइट्रस ऑक्‍साइड (NOx), सल्‍फर डाईऑसइड (SO₂) जैसी ज़हरीली गैसें और Volatile Organic Compound (VOCs) स्थानीय तापमान पैटर्न और मानवीय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं

  • जल स्त्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि सैन्य गतिविधियज्ञा ताज़े पानी के पाइपलाइन, जल निकासी और नालियों को प्रभावित करती हैं।

पानी की कम उपलब्धता वाले क्षेत्र जैसे इरान पहले से ही जल संकट का सामना करना पड़ता है क्‍योंकि युद्ध पम्प, पाइपलाइन, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट जैसे मूलभूत ढांचे (इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर) और संसाधनों को नष्‍ट करता है। इससे पानी की उपलब्धता में कमी, पेयजल की गुणवत्ता में गिरावट और जल प्रदूषण, जल-‍जनित रोगों जैसी समस्‍याएं भी उत्‍पन्‍न होती हैं। कई बार जल संकट इतना विकराल हो जाता है कि“वाटर-बैंकक्रप्सी” की स्थिति उत्‍पन्‍न हो जाती है।

<div class="paragraphs"><p>युद्ध में भारी मात्रा में गोला-बारूद का इस्‍तेमाल और बमों का विस्‍फोट वातावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित करता है।&nbsp;</p></div>

युद्ध में भारी मात्रा में गोला-बारूद का इस्‍तेमाल और बमों का विस्‍फोट वातावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित करता है। 

1991 के खाड़ी युद्ध की भी चुकानी पड़ी थी भारी पर्यावरणीय कीमत

1991 के खाड़ी युद्ध (गल्फ वॉर) के दौरान जब इराकी सेना ने कुवैत के तेल कुओं को आग लगा दी थी, तब इसका गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव पूरे मध्‍य-पूर्व में लंबे समय तक देखने को मिला था। उस दौरान लगभग 600 तेल कुओं को आग के हवाले किया गया था, जिससे बहुत भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन के कण वायुमंडल में छा गए थे। इस भयंकर वायु प्रदूषण ने कई महीनों तक खाड़ी देशों में तापमान, वायु गुणवत्ता, तथा पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित किया था।

इसके अलावा युद्ध में हमलों का शिकार हुए युद्ध पोतों और तेल टैंक्‍रों से व्यापक स्‍तर पर तेल-लीक की घटना ने समुद्री जल और मरीन लाइफ को बुरह तरह से प्रभावित किया था। कई लाख टन तेल, जहरीले रसायन और प्रदूषण वाला कचरा मलबे और समुद्री तटरेखाओं तक फैल गया था, जिससे समुद्री जल के साथ ही तटीय मिट्टी तक पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा था। इसने पारिस्थिति तंत्र का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया था। कुल मिलाकर खाड़ी युद्ध यह सबक दिया था कि युद्ध पर्यावरण के लिए दीर्घ कालिक संकट खड़ा कर सकता है। तेल रिसाव और आग की वजह से उत्‍पन्‍न वायु और जल प्रदूषण की चपेट में आकर पारिस्थितिकी तंत्र कई दशकों तक प्रभावित रह सकता है। हालात सुधारने के लिए पर्यावरणीय पुनर्निर्माण, साफ-सफाई और पारिस्थितिकी की बहाली में अरबों डॉलर का भारी खर्च उठाना पड़ता है। आज की ईरान–इज़राइल-अमेरिका की जंग  भी यह स्पष्ट संकेत रही है कि अगर तेल टैंकरों, ऊर्जा ढांचों या समुद्री मार्गों से जुड़ी बुनियादी संरचनाएं क्षतिग्रस्त होती हैं, तो उसके प्रभाव का दायरा केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धरती, वातावरण, जल स्रोतों और अंतत: मानव के स्वास्थ्य तक को बुरी तरह प्रभावित करेगा

निष्कर्ष: युद्ध नियमों में पानी, पर्यावरणीय नुकसानों को भी किया जाए शामिल

ईरान–इज़राइल का युद्ध अब सैन्य संघर्ष से आगे निकलकर जल, पर्यावरण और जलवायु संकट का एक संयुक्त मसला बन चुका है। यह न केवल राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियाँ लेकर आया है, बल्कि भू–अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, पानी की उपलब्धता, समुद्री और भूमि प्रदूषण, और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक प्रयासों को भी प्रभावित कर रहा है। अतः यह जरूरी हो गया है कि वैश्विक समुदाय सैन्य दृष्टिकोण के साथ पर्यावरणीय और जल सुरक्षा को भी युद्ध की रणनीति में शामिल करे, क्योंकि यह केवल एक मानवीय और राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि गंभीर पर्यावरणीय चुनौती भी है, जो हम सभी के जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।

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