यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास की 30 बस्तियों से लिए गए 63 पेयजल नमूनों में से 43 (करीब 70 प्रतिशत) में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए।
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भोपाल के पाइपलाइन पानी में मलजनित बैक्टीरिया के संकेत, क्या पीना सुरक्षित है?
मुख्य बातें
63 में से 43 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म मिले।
समस्या केवल जल स्रोत नहीं, वितरण नेटवर्क भी हो सकता है।
WHO स्रोत से नल तक निगरानी की सिफारिश करता है।
BIS के अनुसार पेयजल में E.coli स्वीकार्य नहीं है।
अब चुनौती 'हर घर जल' से आगे 'हर घर सुरक्षित जल' की है।
भोपाल गैस त्रासदी को चार दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास रहने वाले लोगों के लिए पीने के लिए सुरक्षित पानी का सवाल आज भी पहले जैसा ही जवाब के इंतज़ार में है।
इस क्षेत्र में भूजल का रासायनिक प्रदूषण वर्षों से चिंता का विषय रहा है। इसलिए प्रभावित बस्तियों में सुरक्षित जलापूर्ति सुनिश्चित करना आज भी एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है।
भोपाल गैस पीड़ितों के चार संगठनों द्वारा जारी एक हालिया जल गुणवत्ता सर्वेक्षण के अनुसार, यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास की 30 बस्तियों से लिए गए 63 पेयजल नमूनों में से 43 (करीब 70 प्रतिशत) में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए।
अधिकांश नमूने घरों के नलों और सार्वजनिक जलापूर्ति बिंदुओं से लिए गए थे, यानी वही पानी जिसकी आपूर्ति लोगों को सुरक्षित विकल्प के रूप में की जा रही है।
फीकल कोलीफॉर्म ऐसे सूक्ष्मजीवों का समूह है, जिसकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि पानी किसी स्तर पर मलजनित प्रदूषण के संपर्क में आया है। ऐसे संकेत मिलने पर केवल पानी की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि पूरी जलापूर्ति व्यवस्था की जांच भी आवश्यक मानी जाती है।
यदि सुरक्षित विकल्प के रूप में उपलब्ध कराए जा रहे पाइपलाइन के पानी में भी मलजनित प्रदूषण के संकेत मिलें, तो मुद्दा केवल जल स्रोत का नहीं रह जाता। तब शोधन प्रणाली, वितरण नेटवर्क, पाइपलाइन के रखरखाव और जल गुणवत्ता निगरानी - पूरी पेयजल व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
फीकल कोलीफॉर्म ऐसे सूक्ष्मजीवों का समूह है, जिसकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि पानी किसी स्तर पर मलजनित प्रदूषण के संपर्क में आया है।
यह अध्ययन केवल भोपाल की समस्या नहीं है। यह भारत की शहरी जलापूर्ति व्यवस्था के सामने खड़ी एक व्यापक चुनौती की ओर भी संकेत करता है। पिछले कुछ वर्षों में शहरों में पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति का तेजी से विस्तार हुआ है। लेकिन केवल नल कनेक्शन उपलब्ध करा देना सुरक्षित पेयजल की गारंटी नहीं है।
इसके लिए जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी, वितरण नेटवर्क का रखरखाव और सीवर व्यवस्था की सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है। इसलिए यह अध्ययन पूरे देश में शहरी जल सुरक्षा और जल वितरण व्यवस्था पर नई चर्चा की जरूरत को रेखांकित करता है।
भोपाल की जल समस्या का लंबा इतिहास
2-3 दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद चर्चा केवल गैस रिसाव के स्वास्थ्य प्रभावों तक सीमित नहीं रही। इसके साथ यूनियन कार्बाइड संयंत्र परिसर और आसपास के क्षेत्रों की मिट्टी तथा भूजल में रासायनिक प्रदूषण को लेकर भी सवाल उठने लगे। इन आशंकाओं की जांच के लिए वर्षों तक शोध, जांच और कानूनी कार्यवाहियां चलती रहीं।
पिछले चार दशकों में अनेक सरकारी एजेंसियों, न्यायालय द्वारा गठित समितियों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने इस विषय पर अध्ययन किए। इन अध्ययनों के निष्कर्ष पूरी तरह एक जैसे नहीं रहे। फिर भी अधिकांश अध्ययनों ने इस क्षेत्र में भूजल की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की हैं।
अनेक अध्ययनों में यह संकेत मिला कि संयंत्र परिसर में प्रदूषित अपशिष्ट मौजूद थे और आसपास के कुछ इलाकों में भूजल की गुणवत्ता प्रभावित हुई।
विभिन्न रिपोर्ट में क्लोराइड, नाइट्रेट, सीसा (Lead) तथा अन्य रासायनिक प्रदूषकों की मौजूदगी भी दर्ज की गई। इन निष्कर्षों ने प्रभावित समुदायों के लिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की ज़रूरत को लगातार रेखांकित किया।
इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में गठित समितियों ने सिफारिश दी है। इनके अनुसार जिन क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता संदिग्ध है, वहां लोगों को वैकल्पिक सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए।
बाद में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास भूजल प्रदूषण से प्रभावित 22 बस्तियों की पहचान की गई। इन क्षेत्रों में लोगों की दूषित भूजल पर निर्भरता कम करने के लिए पाइपलाइन आधारित पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था की गई।
ऐसे में यदि इसी पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति के पानी में फीकल कोलीफॉर्म मिलते हैं, तो प्रश्न केवल पाने के स्रोत का नहीं रह जाता।
यह संकेत देता है कि समस्या पानी की आपूर्ति के किसी भी चरण में हो सकती है। WHO के अनुसार सुरक्षित पेयजल का मतलब सिर्फ साफ जल स्रोत नहीं है। यह भी जरूरी है कि पानी को सही तरीके से साफ किया जाए, पाइपलाइनें सुरक्षित रहें और सीवर का पानी पेयजल में न मिले।
भोपाल का अनुभव बताता है कि पेयजल सुरक्षा को केवल स्रोत की गुणवत्ता तक सीमित नहीं देखा जा सकता। सुरक्षित पेयजल तभी सुनिश्चित होगा, जब स्रोत से लेकर उपभोक्ता के नल तक पूरी जलापूर्ति श्रृंखला सुरक्षित और विश्वसनीय बनी रहे।
इसलिए अब चर्चा सिर्फ़ दूषित भूजल तक सीमित नहीं रह सकती। ज़रूरत ऐसी जलापूर्ति व्यवस्था की है, जो 'जल सुरक्षा योजना' (Water Safety Plan) के सिद्धांतों पर चले।
इसमें पाने के स्रोत से लेकर उपभोक्ता के नल तक हर चरण की नियमित निगरानी हो, संभावित जोखिमों की पहचान की जाए और समस्या मिलने पर समय रहते कार्रवाई की जाए।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास भूजल प्रदूषण से प्रभावित 22 बस्तियों की पहचान की गई।
फीकल कोलीफॉर्म क्या है और यह चिंता का विषय क्यों है?
भोपाल के हालिया अध्ययन में पेयजल के नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म (Fecal Coliform) पाया गया। यह स्वयं कोई एक रोगजनक जीवाणु नहीं है। बल्कि यह इस बात का संकेत देता है कि पानी किसी स्तर पर मानव या अन्य गर्म रक्त वाले जानवरों के मलजनित प्रदूषण से प्रभावित हुआ है।
फीकल कोलीफॉर्म कई प्रकार के जीवाणुओं का समूह है। इनमें Escherichia coli (E.coli) सबसे महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। सभी E.coli हानिकारक नहीं होते। लेकिन पेयजल में इसकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि पानी मलजनित प्रदूषण के संपर्क में आया है।
ऐसी स्थिति में वायरस, अन्य जीवाणु और परजीवी जैसे रोगजनक सूक्ष्मजीव भी मौजूद हो सकते हैं। इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पेयजल की सूक्ष्मजीवी गुणवत्ता के आकलन के लिए E. coli को सबसे उपयुक्त संकेतक मानता है।
मलजनित प्रदूषण से प्रभावित पानी के सेवन से डायरिया, हैजा, पेचिश, टाइफाइड और हेपेटाइटिस-ए जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। WHO के अनुसार सूक्ष्मजीवों से दूषित पेयजल आज भी दुनिया में जलजनित रोगों का एक प्रमुख कारण है।
भारत में भी दूषित पेयजल सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) के अनुसार हर साल विभिन्न राज्यों में लोग डायरिया, गैस्ट्रोएन्टेराइटिस, हैजा और टाइफाइड जैसे रोग की चपेट में आते हैं।
इनमें बड़ी संख्या दूषित पेयजल और खराब स्वच्छता से जुड़ी होती है। इसी कारण स्वास्थ्य मंत्रालय पानी के गुणवत्ता की नियमित निगरानी को रोगों की रोकथाम का प्रमुख उपाय मानता है।
इसी आधार पर भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के पेयजल मानक IS 10500:2012 (संशोधित) के अनुसार 100 मिलीलीटर पेयजल के नमूने में E. coli या थर्मोटॉलरेंट (फीकल) कोलीफॉर्म नहीं मिलने चाहिए। यदि ये पाए जाते हैं, तो पानी सुरक्षित नहीं माना जाता। WHO भी उपचारित पेयजल या वितरण व्यवस्था में E. coli मिलने पर तुरंत जांच और आवश्यक सुधार के कदम उठाने की सिफारिश करता है।
यह समझना भी ज़रूरी है कि फीकल कोलीफॉर्म मिलने का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि पानी का स्रोत ही दूषित है। कई बार पानी उपचार के बाद सुरक्षित होता है, लेकिन वितरण व्यवस्था के दौरान दूषित हो जाता है।
ऐसा पाइपलाइन में रिसाव, कम जल दबाव, सीवर से क्रॉस-कनेक्शन या क्षतिग्रस्त पाइपों जैसी वजहों से हो सकता है। इन्हीं कारणों से जल गुणवत्ता विशेषज्ञ अब केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि स्रोत से नल तक की पूरी जलापूर्ति प्रणाली की सुरक्षा पर जोर देते हैं।
इसी संदर्भ में भोपाल का अध्ययन उल्लेखनीय है। जिन क्षेत्रों में लोगों को दूषित भूजल से बचाने के लिए पाइपलाइन से पेयजल उपलब्ध कराया गया था, वहीं अब उसी पानी में फीकल कोलीफॉर्म मिले हैं। यह संकेत देता है कि चुनौती केवल जल स्रोत की नहीं, बल्कि पूरी जलापूर्ति व्यवस्था की भी है।
पाइपलाइन का पानी दूषित कैसे हो जाता है?
अक्सर माना जाता है कि पानी साफ करने के बाद वह घरों तक भी सुरक्षित पहुंचता है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। घरों तक पहुँचने के दौरान भी पानी दूषित हो सकता है।
जल गुणवत्ता विशेषज्ञों के अनुसार सुरक्षित पेयजल केवल साफ पानी के स्रोत पर निर्भर नहीं करता। यह भी जरूरी है कि पानी को सही तरीके से साफ किया जाए, उसे सुरक्षित तरीके से संग्रहित किया जाए और पाइपलाइन के जरिए घरों तक पहुंचने के दौरान उसकी गुणवत्ता बनी रहे।
पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइपलाइन
भारत के कई शहरों में पानी की पाइपलाइनें कई दशक पुरानी हैं। समय के साथ इनमें जंग लग सकती है, दरारें पड़ सकती हैं या जोड़ कमजोर हो सकते हैं। यदि ऐसी पाइपलाइनें नालों या सीवर लाइनों के पास हों, तो दूषित पानी के भीतर जाने का खतरा बढ़ जाता है।
यह खतरा तब और बढ़ जाता है, जब पाइपलाइन में रिसाव हो या पानी का दबाव कम हो जाए। ऐसी स्थिति में आसपास की मिट्टी, नालों या सीवर का दूषित पानी पाइप के भीतर खिंच सकता है। इसलिए विशेषज्ञ जलापूर्ति के दौरान पर्याप्त दबाव बनाए रखने पर जोर देते हैं।
एक दूसरी समस्या यह है कि कई शहरों में पेयजल और सीवर की पाइपलाइनें एक-दूसरे के बहुत पास बिछी होती हैं। यदि पाइप टूट जाए, गलत कनेक्शन बन जाए या मरम्मत ठीक से न हो, तो सीवर का पानी पेयजल में मिल सकता है। WHO और अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) इसे सूक्ष्मजीवी प्रदूषण के प्रमुख कारणों में मानते हैं।
कम दबाव (Negative Pressure) क्यों खतरनाक है?
सामान्य परिस्थितियों में पाइपलाइन के भीतर पानी पर्याप्त दबाव के साथ बहता है। इससे बाहरी गंदा पानी पाइप के अंदर नहीं जा पाता। लेकिन जब किसी कारण से यह दबाव कम हो जाता है, तो स्थिति बदल जाती है। ऐसी अवस्था में आसपास की मिट्टी, नालों या सीवर का पानी पाइप के भीतर खिंच सकता है। इसे बैक-सक्शन (Back-suction) कहा जाता है।
ऐसी स्थिति पानी का सप्लाई रुकने, पाइपलाइन टूटने, मरम्मत के दौरान या पंप बंद होने पर बन सकती है। WHO के अनुसार बैक-सक्शन वितरण प्रणाली में सूक्ष्मजीवी प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
भारत के कई शहरों में पानी दिनभर नहीं, बल्कि सीमित घंटों के लिए आता है। पानी बार-बार बंद और चालू होने से पाइपलाइन का दबाव बदलता रहता है। यदि कहीं रिसाव हो, तो ऐसे समय गंदा पानी पाइप में प्रवेश कर सकता है। इसलिए रुक-रुक कर होने वाली जलापूर्ति (Intermittent Water Supply) भी प्रदूषण का जोखिम बढ़ा सकती है।
अवैध कनेक्शन और खराब मरम्मत
अवैध जल कनेक्शन, खराब मरम्मत और पाइपलाइन की सफाई में लापरवाही भी पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए WHO और BIS दोनों पाइपलाइन के नियमित रखरखाव पर जोर देते हैं।
भोपाल का अध्ययन भी यही बात सामने लाता है। जिन इलाकों में लोगों को दूषित भूजल से बचाने के लिए पाइपलाइन से पेयजल उपलब्ध कराया गया था, वहीं अब उसी पानी में फीकल कोलीफॉर्म मिले हैं।
इससे साफ है कि केवल सुरक्षित जल स्रोत होना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि घरों के नल तक पहुंचने तक पानी सुरक्षित बना रहे।
जल सुरक्षा पर विशेषज्ञों की राय
WHO के अनुसार सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने के लिए केवल उपभोक्ता के नल से लिए गए पानी के नमूनों की जांच पर्याप्त नहीं है। यदि जलापूर्ति प्रणाली के किसी भी चरण में जोखिम मौजूद हो, तो केवल अंतिम बिंदु पर परीक्षण करने से पूरी व्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
पेयजल की सुरक्षा और स्वीकार्यता को लगातार सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी तरीका 'वाटर सेफ्टी प्लान' है।
WHO की 'Water Safety in Distribution Systems' मार्गदर्शिका के अनुसार अनेक जलजनित रोगों का संबंध जल स्रोत से अधिक वितरण नेटवर्क की कमियों से होता है। इनमें पुराने पाइप, रिसाव, अपर्याप्त रखरखाव और दबाव में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं। इसलिए जल गुणवत्ता की निगरानी केवल जल स्रोत पर नहीं, बल्कि पूरी वितरण प्रणाली में की जानी चाहिए।
भारत सरकार भी अब जल गुणवत्ता को केवल जल स्रोत तक सीमित नहीं मानती। जल जीवन मिशन के दिशा-निर्देशों में Water Quality Monitoring and Surveillance (WQM&S) को कार्यक्रम का एक प्रमुख घटक बनाया गया है। इसके तहत जल स्रोतों और वितरण प्रणाली दोनों की नियमित निगरानी पर बल दिया गया है। साथ ही स्थानीय स्तर पर परीक्षण और संदूषण मिलने पर त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था भी आवश्यक मानी गई है।
भोपाल का हालिया अध्ययन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यदि सुरक्षित जल स्रोत से आपूर्ति किए जा रहे पानी में भी फीकल कोलीफॉर्म मिलते हैं, तो इसका अर्थ है कि जांच केवल जल स्रोत तक सीमित नहीं रह सकती। पूरी जलापूर्ति प्रणाली की नियमित निगरानी और जोखिम प्रबंधन आवश्यक है।
पिछले वर्ष इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल पाइपलाइन में सीवर का पानी मिलने के बाद डायरिया और तीव्र गैस्ट्रोएन्टेराइटिस का बड़ा प्रकोप फैला। एक हजार से अधिक लोग बीमार पड़े और कई लोगों की मृत्यु हुई। जांच में जल वितरण व्यवस्था की गंभीर कमियां सामने आईं।
यह केवल भोपाल की समस्या नहीं है
भोपाल का अध्ययन केवल एक शहर की कहानी नहीं है। पिछले वर्ष इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल पाइपलाइन में सीवर का पानी मिलने के बाद डायरिया और तीव्र गैस्ट्रोएन्टेराइटिस का बड़ा प्रकोप फैला। एक हजार से अधिक लोग बीमार पड़े और कई लोगों की मृत्यु हुई। जांच में जल वितरण व्यवस्था की गंभीर कमियां सामने आईं।
इसके बाद पाइपलाइन की मरम्मत, क्लोरीनेशन और पानी की गुणवत्ता की जांच जैसे कदम उठाए गए। मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक भी पहुंचा, जहां संयुक्त समिति ने वितरण व्यवस्था की समीक्षा की।
इंदौर की घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य स्तर पर जल गुणवत्ता निगरानी को मजबूत करने के लिए अभियान चलाया। इसी क्रम में भोपाल नगर निगम ने भी नागरिकों के लिए जल गुणवत्ता परीक्षण और शिकायत निवारण की पहल शुरू की।
इंदौर का अनुभव बताता है कि जलजनित बीमारी का कारण हमेशा दूषित जल स्रोत नहीं होता। कई मामलों में समस्या जल वितरण नेटवर्क, पाइपलाइन में रिसाव या सीवर के पानी के प्रवेश से भी उत्पन्न होती है।
भारत के अधिकांश शहरों में पेयजल पुराने वितरण नेटवर्क के माध्यम से घरों तक पहुंचता है। बढ़ती आबादी, शहरी विस्तार और सीमित रखरखाव के कारण इन प्रणालियों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
भारत में शहरी जलापूर्ति का विस्तार तेजी से हो रहा है, लेकिन वितरण अवसंरचना का नवीनीकरण उसी गति से नहीं हुआ है। इसलिए भविष्य की जल सुरक्षा केवल नए नल कनेक्शन देने से नहीं, बल्कि मौजूदा पाइपलाइन नेटवर्क की विश्वसनीयता बढ़ाने पर भी निर्भर करेगी।
दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और मुंबई सहित कई शहरों से समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां पाइपलाइन में सीवर का पानी मिलने या वितरण प्रणाली की खराबी के कारण जलजनित बीमारियां फैलीं। इससे स्पष्ट है कि यह चुनौती किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। कई मामलों में इसकी वजह दूषित जल स्रोत नहीं, बल्कि पाइपलाइन में लीकेज, सीवर से क्रॉस-कनेक्शन या वितरण नेटवर्क की खराब स्थिति रही है।
इसी चुनौती को देखते हुए जल जीवन मिशन में जल गुणवत्ता निगरानी और निगरानी व्यवस्था (Water Quality Monitoring and Surveillance) को भी प्रमुख महत्व दिया गया है।
शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना केवल पानी पहुंचाने का कार्य नहीं है। स्थानीय निकायों को पाइपलाइन का रखरखाव, रिसाव की समय पर मरम्मत, जलाशयों की सफाई और नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण भी सुनिश्चित करना होता है।
भारत सरकार के Service Level Benchmarks for Urban Water Supply भी स्पष्ट करते हैं कि किसी जलापूर्ति प्रणाली का मूल्यांकन केवल आपूर्ति की मात्रा से नहीं, बल्कि जल गुणवत्ता, नियमितता और उपभोक्ता तक सुरक्षित पानी पहुंचने के आधार पर किया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में भोपाल का अध्ययन पूरे देश के लिए एक अहम संकेत है। यह बताता है कि सुरक्षित पेयजल का प्रश्न केवल जल स्रोत तक सीमित नहीं है। जब तक पाइपलाइन, वितरण नेटवर्क, सीवर व्यवस्था और जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी को समान प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक सुरक्षित स्रोत का पानी भी उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते दूषित हो सकता है।
नल कनेक्शन से आगे: जल गुणवत्ता की चुनौती
जल जीवन मिशन (JJM) ने देशभर में पाइपलाइन आधारित पेयजल आपूर्ति का दायरा तेजी से बढ़ाया है। इससे सुरक्षित पेयजल तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। लेकिन अब चुनौती केवल जलापूर्ति का विस्तार नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ता के नल तक पहुंचने वाला पानी हर समय सुरक्षित बना रहे।
मिशन शुरू होने के समय देश के केवल लगभग 3.23 करोड़ (करीब 17 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों के पास नल से जलापूर्ति की सुविधा थी। जुलाई 2026 तक यह संख्या बढ़कर 15 करोड़ से अधिक (लगभग 80 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार) तक पहुंच चुकी है। यह भारत के ग्रामीण जल क्षेत्र की बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
जल गुणवत्ता विशेषज्ञों का मानना है कि अब पेयजल क्षेत्र की प्राथमिकता 'हर घर जल' से आगे बढ़कर 'हर घर सुरक्षित जल' सुनिश्चित करने की होनी चाहिए। यदि नल तक पहुंचने वाला पानी गुणवत्ता की दृष्टि से सुरक्षित नहीं है, तो केवल जलापूर्ति के विस्तार से सार्वजनिक स्वास्थ्य का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।
पाइपलाइन आधारित पेयजल योजनाओं में आपूर्ति किए जाने वाले पानी की गुणवत्ता के लिए BIS 10500 मानकों को ही मानक (benchmark) के रूप में अपनाया गया है।
इसी उद्देश्य से जल जीवन मिशन में Water Quality Monitoring and Surveillance (WQM&S) को एक प्रमुख घटक बनाया गया है। इसमें सरकारी प्रयोगशालाओं के साथ स्थानीय समुदायों, पंचायतों, प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं की भागीदारी पर विशेष बल दिया गया है।
राज्यों को नियमित जल परीक्षण, संदूषण मिलने पर त्वरित कार्रवाई और परीक्षण परिणाम सार्वजनिक करने की व्यवस्था विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं।
मिशन के तहत जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएं आम नागरिकों के लिए भी खोली गई हैं, ताकि लोग नाममात्र के शुल्क पर अपने पेयजल की जांच करा सकें। साथ ही हर गांव में फील्ड टेस्ट किट (FTK) के माध्यम से स्थानीय लोगों, विशेषकर महिलाओं को पानी की बुनियादी गुणवत्ता जांच का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई है।
फिर भी विशेषज्ञों का कहना है कि जल गुणवत्ता की निगरानी केवल जल स्रोत तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि उपचारित पानी वितरण नेटवर्क में रिसाव, सीवर क्रॉस-कनेक्शन या भंडारण की खराब व्यवस्था के कारण दूषित हो जाने की स्थिति में स्रोत पर की गई जांच पर्याप्त नहीं होगी।
भारत में पेयजल की गुणवत्ता के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने IS 10500:2012 (Drinking Water Specification) निर्धारित किया है। इसमें भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीवी (Microbiological) मानकों की विस्तृत सूची दी गई है।
सूक्ष्मजीवी गुणवत्ता के संदर्भ में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 100 मिलीलीटर पेयजल के नमूने में E. coli या थर्मोटॉलरेंट (फीकल) कोलीफॉर्म की मौजूदगी स्वीकार्य नहीं है। इसका अर्थ है कि वितरण नेटवर्क में फीकल कोलीफॉर्म की मौजूदगी केवल तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
भोपाल का हालिया अध्ययन इसी संदर्भ में अहम है। जिन इलाकों में दूषित भूजल के विकल्प के रूप में पाइपलाइन से पानी उपलब्ध कराया गया था, यदि उसी जलापूर्ति में फीकल कोलीफॉर्म मिल रहे हैं, तो स्पष्ट है कि केवल नल कनेक्शन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है।
जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी, वितरण नेटवर्क का रखरखाव, सीवर व्यवस्था की सुरक्षा और पारदर्शी परीक्षण व्यवस्था को जलापूर्ति कार्यक्रमों का समान रूप से मुख्य हिस्सा बनाना होगा।
भारत के पेयजल कार्यक्रम अब ऐसे चरण में पहुंच चुके हैं, जहां सफलता का माप केवल नए नल कनेक्शन नहीं, बल्कि सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण जलापूर्ति होगी।
केवल स्रोत नहीं, पूरी जल आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी जरूरी
भोपाल का अध्ययन एक अहम सीख देता है। सुरक्षित पेयजल केवल जल स्रोत की गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करता। पानी नदी, झील, बाँध या भूजल स्रोत से निकलने के बाद शोधन संयंत्र, पंपिंग स्टेशन, भंडारण टैंक, पाइपलाइन नेटवर्क और अंततः उपभोक्ता के नल तक पहुंचता है।
यदि इस श्रृंखला के किसी भी चरण में तकनीकी खामी या लापरवाही हो, तो पानी दूषित हो सकता है। इसलिए आज जल सुरक्षा को पूरी जलापूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
नियमित सैंपलिंग केवल स्रोत पर नहीं, पूरी पाइपलाइन में
जल गुणवत्ता शोधकर्ताओं के अनुसार नमूने केवल जल स्रोत या शोधन संयंत्र से नहीं, बल्कि ओवरहेड टैंक, मुख्य पाइपलाइन, वितरण पाइपलाइन और उपभोक्ता के नलों सहित वितरण नेटवर्क से नियमित रूप से लिए जाने चाहिए। तभी वितरण नेटवर्क में होने वाले प्रदूषण का समय रहते पता चल सकता है।
आगे की राह: सुरक्षित जलापूर्ति के पांच प्रमुख कदम
शोधकर्ताओं का मानना है कि जल गुणवत्ता परीक्षण के परिणाम सार्वजनिक होने चाहिए। इससे नागरिकों का भरोसा बढ़ता है और स्थानीय निकायों की जवाबदेही भी मजबूत होती है। तकनीक भी इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।
रियल-टाइम मॉनिटरिंग: ऑनलाइन सेंसर और SCADA जैसी डिजिटल प्रणालियां क्लोरीन, pH, टर्बिडिटी, दबाव और जल प्रवाह की वास्तविक समय में निगरानी कर सकती हैं। इससे जल गुणवत्ता में किसी भी असामान्य बदलाव का पता जल्दी चलता है और समय पर सुधारात्मक कार्रवाई संभव होती है।
पाइपलाइन ऑडिट: जिस प्रकार पुलों, भवनों और सड़कों का समय-समय पर तकनीकी निरीक्षण किया जाता है, उसी प्रकार जलापूर्ति पाइपलाइन का भी नियमित इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑडिट (Pipeline Audit) आवश्यक है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि कहां लीकेज है, कहां पाइप कमजोर हो चुके हैं, किन हिस्सों में बार-बार मरम्मत की आवश्यकता पड़ रही है और किन क्षेत्रों में पाइप बदलने की जरूरत है।
GIS मैपिंग: विशेषज्ञों का मानना है कि जलापूर्ति और सीवर नेटवर्क की GIS (Geographic Information System) आधारित मैपिंग से दुर्घटनाओं और क्रॉस-कनेक्शन के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि जल और सीवर पाइपलाइन का सटीक डिजिटल मानचित्र उपलब्ध हो, तो मरम्मत, विस्तार और नई पाइपलाइन बिछाने के दौरान गलत कनेक्शन बनने की संभावना कम हो जाती है।
भारत सरकार की AMRUT 2.0 योजना भी शहरी जल एवं सीवर अवसंरचना के डिजिटलीकरण और GIS आधारित परिसंपत्ति प्रबंधन (Asset Management) पर विशेष जोर देती है।
भोपाल का अध्ययन याद दिलाता है कि जल सुरक्षा का अगला चरण केवल जल स्रोत की सुरक्षा नहीं, बल्कि पूरी जल वितरण व्यवस्था की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। जल जीवन मिशन ने देश में पेयजल उपलब्धता का नया अध्याय शुरू किया है।
अब चुनौती यह है कि हर घर तक पहुंचने वाला पानी हर समय सुरक्षित भी रहे। इसके लिए जल स्रोत, शोधन प्रणाली, पाइपलाइन, सीवर प्रबंधन, नियमित परीक्षण और पारदर्शी निगरानी - इन सभी को एकीकृत दृष्टिकोण के साथ अपनाना होगा। तभी 'हर घर जल' का लक्ष्य वास्तव में 'हर घर सुरक्षित जल' में बदल सकेगा।
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