सरकारी आंकड़े बताते हैं कि शहरी इलाक़ों में पुरानी पाइपलाइनें, उच्च जनसंख्या घनत्व और अपर्याप्त नेटवर्किंग दूषित पानी के सेवन की समस्या को बढ़ाती हैं।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि शहरी इलाक़ों में पुरानी पाइपलाइनें, उच्च जनसंख्या घनत्व और अपर्याप्त नेटवर्किंग दूषित पानी के सेवन की समस्या को बढ़ाती हैं।

हर बूंद में खतरा: शहरी जल आपूर्ति और स्वास्थ्य का संकट

शहरों में पीने के पानी में सिवेज़ का मिल जाना सिर्फ़ एक हादसा नहीं है। यह शहरों की पुरानी पाइपलाइनें, निगरानी की कमी और जवाबदेही की विफलता का प्रतीक है। हर बूंद में छिपी एक चेतावनी, जिसे अगर अनदेखा कर दिया जाए, तो वह भविष्य में आने वाली स्वास्थ्य त्रासदी बन सकती है।
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दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भगीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हुआ। सरकारी जांच में पता चला कि इलाके की पेयजल आपूर्ति लाइन में सीवेज का मिल जाना इस संकट का मुख्य कारण था। 

इस दूषित पानी के सेवन के बाद क्षेत्र में डायरिया, उल्टी, तेज़ बुखार और पेट के संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ने लगे। परिणामस्वरूप, कई लोग अस्पताल में भर्ती हुए और अब तक 15 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

यह घटना केवल इंदौर तक सीमित नहीं है। तीन जनवरी को गांधीनगर में भी ऐसी ही एक घटना हुई, जिसमें बच्चों समेत 104 लोगों के अस्पताल में भर्ती होने की खबर आयी। ये घटनाएं शहरी भारत में पीने के पानी की सुरक्षा में लंबे समय से चली आ रही ढांचागत कमजोरियों का संकेत देती हैं, जहां पुरानी पाइपलाइनें, लीकेज और निगेटिव प्रेशर जैसी तकनीकी समस्याएं लगातार स्वास्थ्य संकट का कारण बन रही हैं।

दूषित पानी की समस्या: एक राष्ट्रीय संकट

इंदौर की यह घटना केवल एक शहर या क़स्बे तक सीमित नहीं है। बीते एक दशक में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में दूषित पेयजल के कारण स्वास्थ्य संकट की खबरें बार-बार सामने आई हैं। चेन्नई, दिल्ली-एनसीआर, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रों की घटनाएं इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों ग्रामीण बस्तियों में लोग दूषित पानी पर निर्भर हैं। वहीं शहरी इलाक़ों में पुरानी पाइपलाइनें, उच्च जनसंख्या घनत्व और अपर्याप्त नेटवर्किंग समस्या को बढ़ाती हैं।

शोध बताते हैं कि दूषित पानी से होने वाली बीमारियों में डायरिया, हैजा, टाइफायड, हेपेटाइटिस और पेट के संक्रमण प्रमुख हैं। ये बीमारियां और लक्षण सीधे लोगों की मृत्यु और अस्पताल में भर्ती होने का प्रमुख कारण बनती हैं।

इंदौर के भगीरथपुरा की 2025-2026 की हालिया दूषित पानी घटना

साल 2025 के दिसंबर महीने एक आख़िरी सप्ताह में घटी इस घटना को एक आपातकाल के रूप में देखा और लिया जा रहा है। इसमें दूषित पानी पीने से लोगों को डायरिया, उल्टी और तेज बुखार की शिकायत होने लगी। इस कारण जहां लगभग 15 लोगों की मृत्यु हो गई वहीं क़रीब 1400 लोगों को गंभीर हालत के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

घटना की शुरुआती जांच में पाया गया कि शहर की मुख्य जल लाइन में सीवेज के पानी के रिसाव के मिल जाने से ऐसी स्थिति पैदा हुई।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने पीने का पानी बंद करने, वैकल्पिक जल आपूर्ति देने और स्वास्थ्य उपाय तेज करने का निर्णय लिया है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने नागरिकों को पानी फिल्टर करके या उबाल कर पीने जैसे निर्देश भी दिए हैं।

इंदौर की भगीरथपुरा और देश में ऐसी घटने वाली तमाम घटनाओं की जड़ में मौजूदा इंफ़्रास्ट्रक्चर का पुराना होना और उनकी देख-रेख और रखरखाव को नज़रअन्दाज़ करना है।

सचिन तिवाले, फेलो, वाटर एंड सोसाइटी, अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE), बैंगलोर

पूर्व के प्रमुख दूषित पानी या जलजनित दुर्घटनाएं (2016-2025)

महाराष्ट्र (पुणे), 2025:

  • जनवरी-जुलाई 2025 के बीच जलजनित बीमारियों का प्रकोप।

  • लगभग 6,500 लोग डायरिया, टाइफायड और हेपेटाइटिस से प्रभावित।

  • 140 गिलेन-बारे सिंड्रोम (GBS) के मामले और 4 मौतें दूषित पानी से जोड़ी गईं।

  • जांच में शहर के आठ पानी के स्रोतों, जिनमें सिंहगड़ रोड का बोरवेल शामिल था, में ई. कोलाई पाया गया, जो मल या पशु अपशिष्ट संदूषण का संकेत है।

उत्तर प्रदेश (गाजियाबाद), 2025:

  • कई सोसाइटी में लिए गए पानी के नमूनों में लगभग आधे पेयजल मानकों पर खरे नहीं उतरे।

  • दूषित पानी से पीलिया और गैस्ट्रोइंटेराइटिस के मामले बढ़े।

  • नगर निगम के अनुसार, शहर की 362 हाईराइज़ सोसाइटी में से कई सुरक्षित पेयजल से वंचित।

  • जनवरी-मई 2025 के बीच स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए जल परीक्षणों में कई नमूने असफल पाए गए।

  • अक्टूबर 2025 में दूषित पानी से 80 से ज़्यादा लोगों को पेट दर्द, उल्टी और दस्त की शिकायत

पंजाब (नाभा/जीरकपुर), 2025:

  • सितंबर 2025 में दूषित पानी के सेवन से लगभग 140 लोग डायरिया से ग्रसित।

  • जांच में पता चला कि पीने के पानी में सीवेज का मिल जाना समस्या का कारण था।

चेन्नई (रॉयापुरम), 2025:

  • कई महीनों तक दूषित पानी की सप्लाई जारी रही।

  • स्थानीय लोगों ने बताया कि अंडरग्राउंड पाइप क्षतिग्रस्त होने के कारण समस्या पैदा हुई।

  • शिकायतों के बावजूद मरम्मत नहीं हुई, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं।

चेन्नई (पल्लवरम), 2024:

  • 5 दिसंबर 2024 को संदिग्ध दूषित पानी से 3 मौतें।

  • दर्जनों लोगों को दस्त की शिकायत।

  • जांच में ई. कोलाई जैसे बैक्टीरिया पाए गए।

ओडिशा (केंद्रपाड़ा), 2024:

  • अगस्त 2024 में दूषित पानी पीने से 3 लोगों की मृत्यु।

  • जांच में ई. कोलाई पाया गया।

गुजरात (अहमदाबाद), 2018:

  • साबरमती नदी के पानी में ई. कोलाई की पुष्टि

  • पानी का उपयोग सिंचाई के लिए होने के कारण खाद्य-श्रृंखला में स्वास्थ्य जोखिम।

शिमला, 2015-2016:

  • दिसंबर 2015 में पीलिया/हेपेटाइटिस ई फैल गया।

  • लगभग 1,600 लोग बीमार, 10 मौतें।

  • जांच में आशवानी खड्ड नदी/स्ट्रीम में अनुपचारित सीवेज का मिलना मुख्य कारण।

सिवेज़ और पेयजल ढांचे की संरचनात्मक विफलताएं

सरकारी व मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के निर्देशों के अनुसार ठीक तरीके से बांधी और रख रखाव नहीं की गई पाइपलाइनें दूषित जल घटनाओं के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब जल आपूर्ति में दबाव कम होता है, जिसे तकनीकी भाषा में निगेटिव प्रेशर कहा जाता है, तो आसपास की गंदगी, सीवेज और दूषित पानी दरारों के ज़रिए सीधे पेयजल पाइप में खिंच आता है। यही कारण है कि कई बार सप्लाई शुरू होते ही अचानक पानी बदबूदार, मटमैला या झागदार हो जाता है।

भारत में जल वितरण नेटवर्क का अधिकांश हिस्सा पुराना और लीकेज-ग्रस्त है। साथ ही पाइप नेटवर्क को नियंत्रित करने वाले सिस्टम (जैसे प्रेशर मॉनिटरिंग, अलार्म, बैकफ़्लो कंट्रोल) व्यापक रूप से स्थापित नहीं हैं।

देश के अधिकांश बड़े शहरों में पेयजल और सिवेज़ पाइपलाइनें समानांतर या बहुत पास-पास बिछी हुई हैं। कई जगहों में ये पाइपलाइनें 30-40 साल पुरानी हैं, जिनकी डिज़ाइन लाइफ कब की समाप्त हो चुकी है। 

लीकेज, दरारें और जॉइंट फेल्योर अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति बन चुके हैं। पुरानी, जर्जर और अव्यवस्थित पेयजल व सिवेज़ सिस्टम जिनके रखरखाव को सालों से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।

रखरखाव का संकट का मुख्य कारण

निरीक्षण और मरम्मत की प्राथमिकता की कमी: नगर निगम और जल आपूर्ति एजेंसियां नियमित निरीक्षण और मरम्मत के दावे तो करती हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे मेल नहीं खाती।
शहरी जल आपूर्ति नेटवर्क और सीवर लाइनों का रख-रखाव आज भी बड़े पैमाने पर ब्रेकडाउन के बाद होता है। यानी जब समस्या स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है तब उसके समाधान के कदम उठाए जाते हैं।
सच्चाई यह है कि नियमित निवारक रख-रखाव, पाइपलाइन मैपिंग, लीक डिटेक्शन और रियल-टाइम जल गुणवत्ता निगरानी जैसी प्रणालियां शहरों में व्यापक रूप से स्थापित नहीं हैं।
आम तौर पर स्थानीय निकायों पर निर्भरता, बजट प्रतिबंध और तकनीकी क्षमता की कमी के कारण संचालन एवं प्रबंधन (O&M) कमजोर रहता है।

एसटीपी में सिवेज़ के गुणवत्ता मानकों का अनुपालन दर भी बहुत कम है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में केवल लगभग 30 फ़ीसद ही सीवेज सही तरीके से ट्रीट होता है।

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) क्षमता और संचालन की कमी: नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार भारत में शहरी केंद्रों में प्रतिदिन लगभग 72,368 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। लेकिन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों (एसटीपी) की स्थापित कुल क्षमता केवल लगभग 31,841 एमएलडी (लगभग 44 फ़ीसद) है। यानी कुल सीवेज के बहुत बड़े हिस्से का ट्रीटमेंट होता ही नहीं है।
एसटीपी मौजूद होने के बावजूद भी पूरा सीवेज ठीक से ट्रीट नहीं होता और लगभग 20,235 एमएलडी ही वास्तविक रूप से संचालित है। नतीजतन स्थापित क्षमता के बावजूद काफी सीवेज अनुपचारित रहता है।
इन एसटीपी में सिवेज़ के गुणवत्ता मानकों का अनुपालन दर भी बहुत कम है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में केवल लगभग 30 फ़ीसद ही सीवेज सही तरीके से ट्रीट होता है।

नतीजतन एक बड़ा हिस्सा सकल मानकों (जैसे बीओडी) को पूरा नहीं करता और जिसका सीधा असर नदी, झील और भूजल स्रोतों पर होता है।

संचालन और रख-रखाव की चुनौतियां

एसटीपी का स्थायी संचालन कई कारणों से प्रभावित होता है। इन कारणों में प्रमुख हैं:

अपर्याप्त बिजली आपूर्ति: अपने सुचारू संचालन के लिए एसटीपी को निरंतर बिजली की ज़रूरत होती है। अनियमित बिजली आपूर्ति के कारण अक्सर ये प्लांट प्रभावी रूप से संचालित नहीं हो पाते हैं।

तकनीकी विशेषज्ञता और स्टाफ़ की कमी: एसटीपी ऑपरेशन के लिए कुशल कर्मियों की आवश्यकता होती है। बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के प्लांट संचालन ठीक नहीं हो पाता।

कम रख-रखाव बजट: अधिकांश नगरपालिकाओं के पास नियमित प्रिवेंटिव मेंटेनेंस और उच्च-कोटि के मॉनिटरिंग के लिए संसाधनों की कमी है। नतीजतन प्लांट को शॉर्ट-टर्म यानी अस्थायी समस्या निवारण पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

अपने सुचारू संचालन के लिए एसटीपी को निरंतर बिजली की ज़रूरत होती है। अनियमित बिजली आपूर्ति के कारण अक्सर ये प्लांट प्रभावी रूप से संचालित नहीं हो पाते हैं।

वास्तविक क्षमता और उपयोग का अंतर: कुछ राज्यों में तो एसटीपी स्थापित क्षमता होने के बावजूद प्लांट का पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए पंजाब में 168 एसटीपी की कुल क्षमता शहरों के उत्पन्न सीवेज के बराबर या इससे ज़्यादा होने के बावजूद भी इसका वास्तविक उपयोग केवल लगभग 87 फ़ीसद है।

योजनाओं का अधूरा क्रियान्वयन: मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में एक समय पर मेगा योजना के तहत 56 डिसेंट्रलाइज़्ड एसटीपी लगाए जाने थे। लेकिन सालों बाद भी उनमें से कई का निर्माण पूरा नहीं हुआ। इसका असर यह हुआ कि अपशिष्ट जल बिना उपचार के बहता रहता है।

संचालन-रखरखाव को लेकर वित्तीय बंधन: एसटीपी और जल नेटवर्कों के रख-रखाव में वित्तीय संसाधनों की कमी भी एक प्रमुख कारक है। अक्सर परिचालन लागत, रसायन व ऊर्जा खर्च एवं उपकरणों की मरम्मत के लिए आवश्यक बजट उपलब्ध नहीं होता है। जिससे संयंत्र या नेटवर्क समय के साथ और अधिक जर्जर हो जाते हैं। 

सीवेज उपचार की इन कमियों के कारण अनूपचारित या अस्थायी रूप से उपचारित किया गया सिवेज़ का पानी सतही और भूजल स्रोतों में मिल जाता है। जिससे शहरी जल स्रोतों का प्रदूषण बढ़ता है और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होती है।
विश्व स्तर के जल प्रदूषण अध्ययनों से भी यही बात सामने आई है हैं कि शहरों के अधिकांश “ट्रीटमेंट प्लांट” या तो संचालन में नहीं हैं या पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं हैं।

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कानूनी और नियामक ढांचे की विफलता

भारत में जल प्रदूषण और दूषित पेयजल के मामलों से निपटने के लिए जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, जल केंद्रीय जान स्वास्थ्य और पर्यावरण इंजीनियरिंग संगठन मैनुअल्स (CPHEEO), भारत पेयजल गुणवत्ता मानक जैसे कई कानून और तकनीकी दिशानिर्देश हैं। लेकिन ये अक्सर ज़मीन पर काम नहीं कर पाते। इसके कुछ मुख्य कारणों में शामिल हैं:

प्रभावी क्रियान्वयन की मुश्किलें: संसाधन, तकनीकी क्षमता और प्रशिक्षित स्टाफ़ की कमी के कारण बोर्ड नियमित निरीक्षण और मॉनिटरिंग नहीं कर पाते। 

अनुपालन दर में कमी: दंड की सख़्ती, निरीक्षण की नियमितता और मामलों में देरी जैसी व्यवस्थाओं के कारण नियमों का उल्लंघन जारी रहता है।

संस्थागत बाधाएं: केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय मुश्किल है, और कभी-कभी राजनैतिक हस्तक्षेप भी होता है, जिससे लागू करने की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

भूमिगत नेटवर्क की संरचना की कमी: कई शहरों में पेयजल पाइपलाइन और सिवेज़ पाइपलाइन के बीच पर्याप्त दूरी रखना (जो CPHEEO मानकों में है) वास्तविक ढांचे में संभव नहीं हो पाता है। नतीजतन दूषित जल का मिलना आसान हो जाता है। 

संचालन और प्रबंधन (O&M) की चुनौती: मैन्युअल में भले ही O&M का विस्तार से वर्णन किया जाता है लेकिन स्थानीय निकायों के पास संचालन और रख-रखाव के लिये नियमित बजट, प्रशिक्षण और निगरानी व्यवस्था नहीं रहती। नतीजतन नियम केवल कागज़ तक ही सीमित रह जाते हैं।

इन्हीं वजहों से मौजूद क़ानूनी और नियामक ढांचा ज़मीन पर पूरी तरह असर नहीं दिखा पाता। नियम काग़ज़ों में तो होते हैं, लेकिन उनके अनुसार निगरानी, रख-रखाव और रोज़मर्रा का संचालन अक्सर ढीला या अनुपस्थित रहता है।

नतीजतन शहरी इलाक़ों में जल आपूर्ति और सीवेज से जुड़ी समस्याएं बार-बार सामने आती रहती हैं और हर बार उनका असर सीधे लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।

घटना से आगे: प्रणालीगत सीख

भगीरथपुरा का मामला केवल एक स्थानीय चूक नहीं है। यह भारत के शहरी जल आपूर्ति ढांचे की गहरी प्रणालीगत कमजोरियों का लक्षण है। इंदौर में पीने के पानी में सीवेज मिलने की पुरानी चेतावनी 2016-17 के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के रिपोर्ट में पहले ही दर्ज थी, जिसमें 60 में से 59 स्थानों पर कुलकोलिफॉर्म के उच्च स्तर का पता चला था और सीवेज के मिल जाने का जोखिम बताया गया था।
उस रिपोर्ट में सुधार के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उन्हें स्थायी रूप से लागू नहीं किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि विफलता एक बार की तकनीकी कमी नहीं बल्कि लगातार दोहराई जा रही संरचनात्मक कमजोरी है।

इंदौर में पीने के पानी में सीवेज मिलने की पुरानी चेतावनी 2016-17 के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के रिपोर्ट में पहले ही दर्ज थी, जिसमें 60 में से 59 स्थानों पर कुलकोलिफॉर्म के उच्च स्तर का पता चला था और सीवेज के मिल जाने का जोखिम बताया गया था।

भविष्य के कदम: जल सुरक्षा सुधार

शहरी जल नेटवर्क में डेटा-आधारित, नियमित निगरानी की कमी समस्या को बढ़ाती है। पाइपलाइन लीकेज और पास-पास बिछी सीवेज पाइपलाइनें बैक्टीरियल संदूषण का जोखिम बढ़ता है। वास्तविक-समय निगरानी प्रणालियों का विस्तार जरूरी है, जो तुरंत संदूषण संकेत दे सकें। इसके लिए कुछ आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं:

सीवेज और पेयजल का पृथक्करण:

  • कई जगहें पेयजल और सीवेज पाइपलाइनें पास-पास या समान खांचे में हैं।

  • निगेटिव प्रेशर के कारण सीवेज आसानी से पीने के पानी में प्रवेश कर सकता है।

  • बेहतर ढांचा, अलग लेआउट और बैकफ्लो रोकने वाले उपाय अनिवार्य हैं।

रियल-टाइम जल गुणवत्ता परीक्षण:

  • लैब-टू-गांव और मोबाइल टेस्टिंग यूनिट्स से पानी की तुरंत और तेज जांच संभव।

  • उदाहरण: विशाखापत्तनम में मोबाइल लैब ऑन व्हील्स।

सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनी तंत्र:

  • दस्त, बुखार या उल्टी में तेजी दिखते ही स्वचालित अलर्ट और त्वरित जांच की व्यवस्था।

  • आपूर्ति रोकना और आपात स्वास्थ्य कदम तुरंत लागू होना चाहिए।

जवाबदेही और पारदर्शिता:

  • स्थानीय निकाय और जल एजेंसियों को ओपन डेटा पोर्टल और नियमित रिपोर्ट जारी करनी चाहिए।

  • इससे प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी और नागरिक जागरूक व सहभागी बनेंगे।

भगीरथपुरा की त्रासदी सिर्फ़ एक क्षेत्रीय दुर्घटना नहीं है। बल्कि यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनी की मेज़बानी करती है। जब तक जल आपूर्ति, सीवेज मैनेजमेंट और निगरानी प्रणालियां सतत, पारदर्शी और जवाबदेह नहीं होंगी, ऐसी घटनाएं अनगिनत बार दोहराई जाएंगी।
संयुक्त रूप से जारी राष्ट्रीय सर्वेक्षणों ने भी दिखाया है कि तत्काल स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी केवल इंफ्रास्ट्रक्चर देने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि नियमित गुणवत्ता निगरानी और प्रभावी जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

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