

CAG की रिपोर्ट में मानकों के हिसाब से संतोषजनक नहीं मिली रेलवे स्टेशनों पर पेयजल की व्यवस्था।
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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में देश के सबसे बड़े सरकारी महकमे रेलवे की पेयजल व्यवस्था में खामियां उजागर किए जाने के बाद विभाग इसे दुरुस्त करने के लिए हरकत में आया है। कैग रिपोर्ट के बाद रेलवे ने यात्रियों और अपने कर्मचारियों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए गोरखपुर सहित विभिन्न मंडलों में अभियान शुरू किया है।
कैग की Report of the Comptroller and Auditor General of India on Passenger amenities and sanitation at non-suburban railway stations in Indian Railways Union Government Ministry of Railways Report No. 31 of 2026 (Compliance Audit - Railways) रिपोर्ट में कई जगहों पर रेलवे द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे पानी की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं पाई गई थी। कैग रिपोर्ट के बाद रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीईओ सतीश कुमार ने माना था कि साफ और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना रेलवे की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसे सुनिश्चित करने के लिए पूरे सिस्टम के सही रखरखाव की जरूरत है। जलस्रोतों पर ही पानी की क्वालिटी की टेस्टिंग शुरू करते हुए विभिन्न स्तरों पर लगातार जांच और निगरानी भी अनिवार्य है। जलापूर्ति की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पूरा प्रोटोकाल लागू होने चाहिए।
12 अगस्त को रिपोर्ट जारी (टेबल) होने के बाद भारतीय रेलवे के विभिन्न मंडलों में मंडल स्तर पर पेयजल की गुणवत्ता को लेकर अभियान चलाया जा रहा है। जिसकी रिपोर्ट दिल्ली में रेलवे मंत्रालय तक भेजी जा रही है और बोर्ड स्तर पर इसकी समीक्षा की जा रही है। रेलवे बोर्ड ने इसका एक्शन प्लान भी तैयार किया है। एक्शन प्लान को लागू करने के लिए बोर्ड अध्यक्ष ने 27 अगस्त को पत्र लिखकर सभी महाप्रबंधकों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया था।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वोत्तर रेलवे ने गोरखपुर समेत लखनऊ, वाराणसी और इज्जतनगर मंडल में पेयजल की जांच का अभियान शुरू किया है। इसके तहत स्वास्थ्य निरीक्षक और सुपरवाइजर, रेलवे स्टेशनों, कार्यालयों और कालोनियों में मिल रहे पानी की गुणवत्ता की जांच कर रहे हैं। इस अभियान के तहत अब तक कुल 2,725 पेयजल गुणवत्ता परीक्षण किए जा चुके हैं। अभी तक 2,306 अवशिष्ट क्लोरीन परीक्षण (residual chlorine test), 374 जीवाणु संर्वधन परीक्षण (bacterial culture test) और 45 रासायनिक परीक्षण सहित कुल 2,725 पेयजल गुणवत्ता परीक्षण (drinking water quality test) किए जा चुके हैं। पूर्वोत्तर रेलवे के मुताबिक यह अभियान आगे भी नियमित जारी रहेगा।
कैग 2026 की रिपोर्ट में भारतीय रेलवे के 16 जोन में पूर्वोत्तर रेलवे (एनईआर) 11वें पायदान पर है। पेयजल की जांच में एनईआर का स्कोर 42.79 रहा। यह तय मानक के हिसाब से संतोषजनक नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार एनईआर के 15 स्टेशनों पर पानी में बैक्टीरिया और 14 स्टेशनों पर अवशिष्ट क्लोरीन की जांच नहीं हुई है। 17 स्टेशनों पर रासायनिक परीक्षण हुआ ही नहीं। 14 स्टेशनों पर निर्धारित अवधि के अनुसार रासायनिक परीक्षण नहीं किया गया। टैंक की सफाई से संबंधित अभिलेख भी 11 स्टेशनों पर नहीं हैं।
इसी तरह एक अन्य मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज, झांसी और आगरा मंडल के स्टेशनों पर यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए विशेष निगरानी और सफाई अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत 12 से 18 सितंबर के बीच तीनों मंडलों में पेयजल की गुणवत्ता की कुल 2,036 जांचें की गई। इससे पहले 20 अगस्त से शुरू किए गए अभियान के तहत भी 18 सितंबर तक 7,959 पानी की टंकियों की सफाई और कीटाणुशोधन किया जा चुका है।
उत्तर मध्य रेलवे के तीनों मंडलों में कुल 8,766 ओवरहेड, भूमिगत और पीवीसी पानी की टंकियों की सफाई करने का लक्ष्य रखा गया है। अबतक इसमें से 90.79 फीसदी टंकियों की सफाई पूरी हो चुकी है। इसके साथ ही पेयजल बूथ, प्लेटफार्म, वाटर कूलर और आरओ सिस्टम की जांच भी की जा रही है। स्वास्थ्य निरीक्षकों पानी में अवशिष्ट क्लोरीन की जांच के साथ बैक्टीरियोलॉजिकल और रासायनिक जांच कर रहे हैं। इन जांचों में पानी में किसी तरह की कमी या खामी मिलने पर सुधार के लिए संबंधित इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रिकल विभाग को निर्देश दिया जा रहा है।
पेयजल व्यवस्था में खामियां उजागर किए जाने के बाद रेलवे ने इसे दुरुस्त करने के लिए कई जगह पानी की जांच की है।
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रेल मंत्रालय ने 24 अगस्त 2026 को एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी कर बताया कि रेल मंत्री ने 16 अगस्त 2026 को समीक्षा के दौरान लगभग 20,000 स्थानों पर टैंक-टू-टैप फिल्ट्रेशन और निगरानी व्यवस्था स्थापित करने तथा पानी की टंकियों को बदलने के निर्देश भी दिए थे। इसमें बताया गया है कि भारतीय रेलवे ने पेयजल टंकियों और फिल्टरों की सफाई तथा कीटाणुशोधन के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। इसके साथ ही पेयजल गुणवत्ता प्रबंधन को मजबूत करने की कार्ययोजना में निम्न कदम शामिल किए गए हैं:
पेयजल व्यवस्था के पूरे ढांचे का नियमित निरीक्षण और रखरखाव।
पानी के स्रोत और उपभोग के बिंदु, दोनों जगह गुणवत्ता की जांच।
केवल अंतिम नल पर पानी की जांच करने के बजाय पूरी आपूर्ति शृंखला की निगरानी।
स्टेशनवार कमियों और उन्हें दूर करने के लिए की गई कार्रवाई की निगरानी।
रेल मंत्रालय ने 5 अगस्त 2026 को लोकसभा में दिए गए जवाब के आधार पर बताया कि देश में 19 रेल नीर संयंत्र चालू हैं। प्रत्येक संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन एक लाख बोतल है। संयंत्रों की सूची में अमेठी, हापुड़, जगिरोड, दानापुर, नागपुर और अन्य स्थान शामिल हैं। रेल नीर भारतीय रेलवे की पैकेज्ड पेयजल व्यवस्था है, जिसका संचालन भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (IRCTC) करता है। इसका उद्देश्य यात्रियों को रेलवे परिसरों और ट्रेनों में पीने के लिए पैकेज्ड पानी उपलब्ध कराना है। रेल नीर के उत्पादन के लिए अलग-अलग स्थानों पर संयंत्र स्थापित किए गए हैं, ताकि रेलवे की मांग के अनुरूप पानी की आपूर्ति की जा सके।
देश में 19 रेल नीर संयंत्र चालू हैं। प्रत्येक संयंत्र की प्रतिदिन एक लाख बोतल उत्पादन क्षमता है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल पर इस क्षमता का एक संयंत्र स्थापित करने की अनुमानित लागत करीब 10 करोड़ रुपये है, जिसमें भूमि की लागत शामिल नहीं है। संयंत्र कहां स्थापित किए जाएं, इसका निर्णय रेलवे में रेल नीर की मांग और जरूरत के आधार पर किया जाता है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि त्रिपुरा में रेल नीर की मांग फिलहाल असम के जगीरोड संयंत्र से पूरी की जा रही है। इससे पता चलता है कि संयंत्रों का स्थान केवल राज्य की सीमाओं के हिसाब से नहीं, बल्कि आसपास के रेल नेटवर्क की आपूर्ति जरूरतों को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।
19 रेल नीर संयंत्रों की सूची
यह जानकारी पैकेज्ड पेयजल की उत्पादन व्यवस्था बताती है। इसलिए इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर स्टेशन पर नल का पानी पर्याप्त या सुरक्षित है, क्योंकि रेल नीर और स्टेशन की नल-आधारित पेयजल व्यवस्था अलग-अलग आपूर्ति माध्यम हैं।
रेलवे स्टेशनों पर नल-आधारित पेयजल व्यवस्था यात्रियों को सीधे नलों, वाटर बूथों और पेयजल स्टैंडों के माध्यम से पानी उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस व्यवस्था में रेलवे को केवल पानी की आपूर्ति ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, नियमित जांच और वितरण के बुनियादी ढांचे का रखरखाव भी सुनिश्चित करना होता है। पानी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए स्रोत से लेकर यात्रियों के इस्तेमाल वाले नल तक निगरानी जरूरी है। टंकियों की सफाई, फिल्टरों का रखरखाव, पाइपलाइन की स्थिति और पानी के नमूनों की जांच इसके अहम हिस्से हैं।
रेलवे बोर्ड के अनुसार पेयजल की आपूर्ति की जिम्मेदारी इंजीनियरिंग विभाग की है, जबकि उसकी गुणवत्ता की निगरानी मेडिकल विभाग करता है। रेलवे के नियमों में पानी के नमूने लेकर उनकी जीवाणु और रासायनिक जांच करने, अवशिष्ट क्लोरीन की निगरानी तथा टंकियों और पाइपलाइनों के रखरखाव का प्रावधान है। रेलवे की 2026 की पहल में टंकियों और फिल्टरों की सफाई, स्रोत और नल दोनों जगह पानी की जांच तथा कमियां मिलने पर समयबद्ध सुधार पर जोर दिया गया है।
हालांकि, नल-आधारित व्यवस्था की प्रभावशीलता का आकलन केवल नलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। पानी की उपलब्धता, उसकी गुणवत्ता और उपकरणों के चालू रहने की स्थिति भी महत्वपूर्ण हैं। 2019 में रेलवे ने बताया था कि पानी को जरूरत के अनुसार उपचारित कर नियमित जांच की जाती है।
रेलवे ने यात्रियों को कम कीमत पर शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वाटर वेंडिंग मशीन (WVM) की नीति 2015 में लागू की थी। इसके तहत मशीनों से मिलने वाले पानी को भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के पेयजल मानक IS 10500:2012 के अनुरूप बनाए रखने और महीने में कम से कम एक बार उसकी जांच करने का प्रावधान किया गया था। मशीनों पर पानी की कीमत और मात्रा प्रदर्शित करना भी जरूरी रखा गया था। रेलवे की 2015 की नीति में मशीनों से पानी उपलब्ध कराने के लिए कम दरें भी निर्धारित की गई थीं। उदाहरण के लिए, 300 मिलीलीटर पानी का रिफिल एक रुपये, आधा लीटर का रिफिल तीन रुपये और एक लीटर का रिफिल पांच रुपये तय किया गया था। मशीनों में RO या उससे बेहतर तकनीक के इस्तेमाल, पानी की कीमत और मात्रा प्रदर्शित करने तथा स्वास्थ्य निरीक्षक या मेडिकल कर्मियों से कम से कम महीने में एक बार जांच कराने का प्रावधान था।
रेलवे की 2016 की विज्ञप्ति के अनुसार उस समय करीब 250 स्टेशनों पर मशीनें लगी थीं और 832 मशीनें चालू की जा चुकी थीं। हालांकि, मशीनों की स्थापना का आंकड़ा अपने आप में यह नहीं बताता कि वे कितनी नियमितता से चल रही थीं या यात्रियों को कितना पानी उपलब्ध करा रही थीं।
रेलवे के Indian Railways Year Book 2023-24 के अनुसार, 2023-24 में देशभर के स्टेशनों पर 875 वाटर वेंडिंग मशीनें चालू थीं। हाल ही में लोकसभा में दिए गए एक अन्य आधिकारिक जवाब में 1,226 चालू मशीनों का उल्लेख है। यह आंकड़े अलग-अलग समय के हैं और इनके आधार पर मशीनों की संख्या में बदलाव का संकेत मिलता है, लेकिन इन्हें 2026 की वर्तमान संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
पानी की बर्बादी रोकने के लिए रेलवे साफ सफाई के कामों में वेस्टवाॅटर के उपयोग को अपना रहा है।
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भारतीय रेलवे के लिए स्टेशनों पर यात्रियों के लिए स्वच्छ पेयजल की सुविधा मुहैया कराना लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। कैग की हालिया रिपोर्ट में इसमें गंभीर कमियां उजागर होने से पहले भी रेलवे स्टेशनों पर नल-आधारित पेयजल व्यवस्था की कमियां अलग-अलग वर्षों की कैग जांचों में सामने आती रही हैं। कैग की 2013 की रिपोर्ट में 17 रेलवे जोन के 212 स्टेशनों पर पानी की गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था की समीक्षा की गई थी। 2,468 यात्रियों के सर्वेक्षण में 42 प्रतिशत ने नल के पानी को असुरक्षित माना, जबकि 46 प्रतिशत ने बोतलबंद पानी को अधिक सुरक्षित बताया। रिपोर्ट में दो जोन के जांचे गए स्टेशनों पर निर्धारित मानकों से कम नल, छह जोन में जांचे गए स्टेशनों पर RO संयंत्रों का अभाव और कानपुर स्टेशन पर लगा एकमात्र RO संयंत्र खराब मिलने जैसी कमियां दर्ज की गईं।
इसके बाद कैग की 2016 की जांच रिपोर्ट में 436 स्टेशनों में से 86 पर निर्धारित मानकों के अनुसार पेयजल के लिए नल उपलब्ध नहीं मिले। इस रिपोर्ट में 74 स्टेशनों और 80 ट्रेनों के निरीक्षण किया गया। इसके अगले वर्ष 2017 की कैग रिपोर्ट में 11 रेलवे जोन के 21 स्टेशनों पर शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं होने और 22 ट्रेनों में चाय-कॉफी जैसे पेय तैयार करने के लिए बिना शुद्ध किया हुआ नल का पानी इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।
अलग-अलग वर्षों के इन आंकड़ों से पता चलता है कि रेलवे स्टेशनों पर शुद्ध पेयजल की पेयजल व्यवस्था के तहत पीने के साफ पानी की उपलब्धता, शुद्धिकरण और रखरखाव में को लेकर समस्याएं और चुनौतियां कई वर्षों से लगातार बनी हुई हैं।
रेलवे की पेयजल व्यवस्था में पानी की गुणवत्ता के साथ उसके इस्तेमाल और बर्बादी का सवाल भी जुड़ा है। रेलवे की पर्यावरणीय स्थिरता संबंधी रिपोर्ट (environmental sustainability report) में वाटर वेंडिंग मशीनों से निकलने वाले RO के रिजेक्ट पानी को प्लेटफॉर्म धोने, एप्रन की सफाई और शौचालयों में इस्तेमाल करने का प्रावधान दर्ज है। इससे शुद्धिकरण के दौरान निकलने वाले पानी का दोबारा उपयोग किया जा सकता है। लेकिन, इस पानी के दोबारा इस्तेमाल की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि रिजेक्ट पानी को कितनी मात्रा में एकत्र किया जाता है, उसके भंडारण की व्यवस्था कैसी है और उसका उपयोग किन कार्यों में किया जाता है। रेलवे की पर्यावरण प्रबंधन संबंधी कैग रिपोर्ट ने भी जल संरक्षण, अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और पानी के कुशल इस्तेमाल को महत्वपूर्ण बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे में पानी की मांग केवल यात्रियों के पीने तक सीमित नहीं है, बल्कि कोचों की धुलाई, शौचालयों और स्टेशनों की सफाई में भी बड़ी मात्रा में पानी खर्च होता है। ऐसे में RO के रिजेक्ट पानी का गैर-पेय कार्यों में इस्तेमाल ताजे पानी की मांग घटाने का एक उपाय हो सकता है। हालांकि, दस्तावेज में इसके इस्तेमाल से बचाए गए पानी की कोई निश्चित मात्रा नहीं दी गई है।
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