राजस्थान की बिबली बाई ने जीती फ्लोराइड से जंग: सामूहिक ताकत से दूर हुआ टूंका गॉंव का पेयजल संकट
राजस्थान के अधिकांश जिलों में पानी में फ्लोराइड की अधिकता होने के मामले आना आम बात है। राज्य के 50 में से 34 जिलों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा मानक से अधिक है, जिसकी वजह से यहां पर डेंटल फ्लोरोसिस, स्केलेटल फ्लोरोसिस और न्यूरो संबंधित बीमारियां होना आम है। वर्षों से पादी में फ्लोराइड का दंश झेल रहे इस राज्य में हाल ही में एक ऐसा मुहिम चला, जो मिसाल बना। इस मुहिम लो लीड करने वाली कोई हाई ग्रेड कॉलेज से पढ़कर आने वाला स्कॉलर नहीं बल्कि गॉंव की एक साधारण महिला है - नाम बिबली बाई। बिबली बाई के निरंतर प्रयास के चलते सिरोही जिले के एक गॉंव को फ्लोराइड मुक्त पानी मिला।
पीने के पानी के लिए किए गए इस सामूहिक प्रयास और उसकी सफलता से पहले एक नज़र राजस्थान में पानी से जुड़ी इस समस्या पर नज़र डालते हैं। राजस्थान एक ऐसा राज्य है, 50 में से 34 यानि कि करीब 68 प्रतिशत जिलों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम / लीटर से अधिक है।
इन जिलों के नाम हैं - अजमेर, अलवर, बंसवाड़ा, बाड़मेर, भरतपुर, बरन, भीलवाड़ा, बीकानेर, बूंदी, चित्तौड़गढ़, चुरु, दौसा, धौलपुर, डुंगरपुर, गंगानगर, हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, झालोर, झालावर, झुनझुनु, जोधपुर, करौली, कोटा, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, राजसमंद, सिरोही, सीकर, सवाई, माधौपुर, टोंक और उदयपुर।
टूंका गॉंव, सिरोही, राजस्थान
फोटो - दीता राम
राजस्थान के लिए आपदा बना फ्लोराइड
राजस्थान के सूखे और जल संकट से जूझते इलाकों में पानी की समस्या नई नहीं है। तमा गांवों ऐसे हैं जहां यह संकट एक खामोश स्वास्थ्य आपदा में बदल चुका है, जिसमें फ्लोराइड युक्त पानी के कारण लोगों में डेंटल फ्लोरोसिस (जिसमें दॉंत कमजोर हो जाते हैं, पीले पड़ जाते हैं और बीच से टूटते हैं), स्केलेटल फ्लोरोसिस (हड्डियां टेढ़ी होने लगती हैं, जोड़ों में दर्द, रीढ़ की हड्डी कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती है) और न्यूरो संबंधित बीमारियां (जिसमें बच्चों में IQ कम होता है, वो किसी काम में एकाग्र नहीं हो पाते हैं। इसके अलावा लोगों के व्यवहार में भी परिवर्तन) होती हैं। इनके अलावा मांसपेशियों में दर्द, थकान, कमजोरी, किडनी पर असर, थायरॉइड, एनीमिया और पेट संबंधी बीमारियां भी हो सकती हैं।
दरअसल फ्लोराइड की अधिक मात्रा शरीर में धीरे-धीरे जाने वाला ज़हर है, जिसका असर तुरंत नहीं दिखाई देता है। लंबे समय में जब तक जब तक इसका असर दिखता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
महिलाओं का समर्थन जुटातीं बिबली बाई
फोटो - सीएमएफ टीम
कैसे फ्लोराइड मुक्त पानी गॉंव तक लायीं बिबली बाई?
यह कहानी सिरोही जिले के टूंका गॉंव की है। इस गॉंव को टोंका गॉंव भी कहा जाता है और यहां की आबादी लगभग 2000 है और वर्षों से लोग फ्लोराइड की अधिकता के कारण तमाम बीमारियों से जूझ रहे थे। पानी का एक ही स्रोत होने की वजह से गॉंव की वर्षों से महिलाएं अपना पूरा दिन पानी भरने में बिता देती थीं। लोगों की यह परेशानी इसी गॉंव की बिबली बाई से देखी नहीं गई और उन्होने तय किा कि वो अपने गॉंव तक शुद्ध पेय जल लाने में कतई देरी नहीं करेंगी। बिबली बाई के अपने परिवार में भी फ्लोराइड के दुष्प्रभाव साफ दिखने लगे थे। इसीलिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया।
बिबली बाई, ने न केवल समस्या को पहचाना बल्कि पूरे गांव को साथ लेकर समाधान की राह भी बनाई। सच पूछिए तो यह कहानी सामुदायिक भागीदारी, नेतृत्व और बदलाव की है।
बिबली बाई
फोटो - दीता राम
कैसे हुई बिबली बाई के अभियान की शुरुआत
बिबली बाई के मुहिम की शुरुआत जल उपभोक्ता समूह के साथ हुई। दरअसल इस समूह का गठन गॉंव में पाइप वॉटर सप्लाई की योजना के अंतर्गत किया गया था। ताकि सामूहिक भागीदारी से यह कार्य सुनिश्चित हो सके।
लेकिन जब स्कीम के तहत बोरवेल खोदने शुरू किए गए, तो एक के बाद एक बोरवेल फेल होने लगे, जिसके कारण योजना को रद्द कर दिया गया। स्कीम तो रद्द हो गई, लेकिन एक बात पता चल गई कि गॉंव के सभी जल स्रोतों में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक है। लेकिन उनमें एक स्रोत ऐसा था जहां फ्लोराइड की मात्रा कम थी।
जैसे ही इस स्रोत के बारे में पता चला, लोगों ने वहीं से पानी लेना शुरू कर दिया। पूरे-पूरे दिन पान भरने का कार्य चलता था और एक बारे में 20 से 30 महिलाएं कतारों में दिखती थीं। गॉंव की महिलाएं पूरे-पूरे दिन इस ट्यूबवेल के चक्कर काटतीं और तब जाकर उनके घरों में पानी पहुंचता।
टूंका गॉंव से बाहर स्थित जल स्रोत से पानी लाती महिलाएं
फोटो - सीएमएफ टीम
गॉंव वालों ने खुद किया पानी का परीक्षण
बिबली बाई से महिलाओं की रोज़-रोज़ की दिक्कतें देखी नहीं गई। बिबली बाइ ने एक छोटी सी टीम बनायी और स्थानीय संगठन की मदद से गॉंव के सभी जल स्रोतों पर जाकर पानी का परीक्षण किया। उन्होंने भी वही पाया जो सरकारी टीम ने पाया था। फ्लोराइड की मात्रा हर जगह बढ़ी हुई थी। पहले जिन स्रोतों में फ्लोराइड की मात्रा होने का महज शक जताया गया था, वह अब सबूत के रूप में इनके हाथों में था।
मात्र दूसरी कक्षा तक पढ़ीं बिबली बाई पढ़ाई के नाम पर भले ही केवल अपना नाम लिखना भर जानती हों, लेकिन सरकारी दफ्तरों में जाकर कैसे बात करनी है, उनमें वो कॉन्फिडेंस कूट-कूट कर भरा हुआ था। उन्होंने युवाओं की मदद से अपने गॉंव में शुद्ध पेय जल लाने की एप्लीकेशन लिखवायी और दफ्तरों में लगानी शुरू कीं। लेकिन समस्या इस बात की थी कि बिबली बाई का साथ देने वाली दो-चार महिलाएं ही थीं।
छोटी-छोटी सभाओं, नुक्कड़ नाटकों में बिबली बाई के प्रयास
फोटो - सीएमएफ टीम
नुक्कड़ नाटक व जन सभाओं से जुटाया लोगों का समर्थन
अपनी बात को पूरे गॉंव तक पहुंचाने के लिए बिबली बाई ने नुक्कड़ नाटक, छोटी-छोटी जन सभाओं और बैठकों के जरिए लोगों को जागरूक करना शुरू किया। जिस जल स्रोत से पूरे गॉंव को शुद्ध पेय जल मिल रहा था, उसकी पूजा करनी शुरू की और उस कार्यक्रम को एक त्योहार की तरह मनाने लगीं। बिबली बाई ने सबसे ज्यादा जोर एक ही बात पर दिया - “हमने फ्लोराइड युक्त पानी पीया, लेकिन हम अपने बच्चों को दूषित जल पीने नहीं देंगे।”
बिबली बाई के सामूहिक प्रयास धीरे-धीरे रंग लाने लगे और फिर एक दिन गॉंव के लोगों ने फ्लोराइड की समस्या के खिलाफ एक बड़ी मीटिंग बुलाई। इस बैठक में तय किया गया वो सरकार से इस जगह पर फिल्टरेशन यूनिट लगवाने की मांग करेंगे। मांग अच्छी थी, लेकिन घूम फिर कर बात वही होती - एक फिल्टर यूनिट लगती और सारी महिलाओं को फिर एक ही जगह पानी के लिए आना पड़ता।
बिबली बाई आगे आयीं और बोलीं, “इसका हल केवल एक ही है कि हम सरकार के पास जायें और अपनी समस्या रखें।” गॉंव वालों की रज़ामंदी पर बिबली बाई के नेतृत्व में छोटी-छोटी टीमें बनायी गईं। इन टीमों में 60 से 60 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की थी। इन महिलाओं ने पंचायत समिति, और फिर पब्लिक सब डिवीजन (पीएसडी) में गई और अपनी एप्लीकेशन दाखिल की।
बत्तीसा नाला बांध, सिरोही राजस्थान
फोटो - विकीकॉमन्स
जब सामूहिक प्रयास रंग लाये
सरकार ने बिबली बाई की याचिका को संज्ञान में लिया और पीएसडी ने जल जीवन मिशन के अंतर्गत गॉंव में पानी पहुंचाने का निर्णय लिया। लेकिन जब सरकारी टीम आयी तो उनको भी शुद्ध पानी का सोर्स नहीं मिला।
इससे पहले कि गॉंव की यह समस्या फाइलों में दब जाये, बिबली बाई ने अपने प्रयास जारी रखे और निरंतर अधिकारियों के समक्ष गॉंव की समस्या लेकर उनके दफ्तरों के चक्कर काटती रहीं। अंतत: यह तय किया गया कि करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर आबू रोड पर स्थित बत्तीसा नाला बांध है, वहां से इस गॉंव को पानी पहुंचाया जाएगा।
प्लान को स्वकृति मिलते ही विभाग सक्रिय हो गया और गॉंव में एक टंकी का निर्माण कराया गया और बांध से लेकर गॉंव तक पीने के पानी के लिए पाइप लाइन बिछाने का काम शुरू हो गया। जुलाई माह के अंत तक घरों तक पानी पहुंचने लगेगा।
टंकी लग चुकी है जल्द घर-घर पहुंचेगा नल से पानी
टंकी लग चुकी है जल्द घर-घर पहुंचेगा नल से पानी
बिबली बाई के इस पूरे सफर को बहुत करीब से देखा सेंटर फॉर माइक्रोफाइनेंस (सीएमएफ) की अबू रोड टीम के सदस्य नरेंद्र पांडे और आदित्य झा ने। सीएमएफ टीम ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में कहा कि बिबली बाई के प्रयास ही थे जो यह गॉंव फ्लोराइड मुक्त पानी लाने में सफल हो पाया। गॉंव में पानी की टंकी लग गई है। और हर घर नल योजना के तहत घरों में पाइप लगाने का कार्य भी शुरू हो गया है। जल्द ही गॉंव के सभी घरों तक पाइप से पानी पहुंचने लगेगा। सीएमएफ की अबू रोड टीम इसका सारा श्रेय बिबली बाई को देते हैं।
टूंका गॉंव में टंकी लग चुकी है
फोटो - दीता राम
जल जीवन मिशन में गॉंव का नाम जुड़ने पर खुशी की लहर
गॉंव के निवासी दीता राम ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में कहा, “हमने बचपन से फ्लोराइड का पानी पीया, और अपने परिवारों को और गॉंव वालों को भी वही पीते देखा, यह जानते हुए भी कि यह नुकसान दायक है। मुझे खुशी इस बात की है कि कम से कम हमारे बच्चे फ्लोराइड मुक्त पानी पी सकेंगे। और इसका सारा श्रेय हमारी बिबली बाई को जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकारी अधिकारियों ने टूंका गॉंव का निरीक्षण कई बार किया, लेकिन गॉंव तक पानी पहुंचाने के प्रयास नहीं किए। बिबली बाई और उनकी टीम के प्रयास से हमारे गॉंव को जल जीवन मिशन स्कीम से जोड़ा गया। इस बात को लेकर हम सभी में बहुत खुशी है।”
टूंका के निवासी दीता राम
टूँका गॉंव को मिलेगा फिल्टर किया हुआ पानी
बांध से आने वाला पानी सीधे नलों में नहीं भेजा जाएगा, इसके लिए बीच में पानी को फिल्टर किया जाएगा। इस काम के लिए सरकार गॉंव के बाहरी क्षेत्र में एक फिल्ट्रेशन प्लांट लगा रही है, ताकि टूँका के निवासियों को शुद्ध पेय जल मिल सके।
कुल मिलाकर फ्लोराइड की अधिकता के कारण जिनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ वो कब तक ठीक होंगे या ठीक होंगे भी या नहीं, कहा नहीं जा सकता, लेकिन बिबली बाई के इन प्रयासों से एक बात तय है कि आने वाले समय में यहां नए मामले शायद नहीं आयेंगे। और इसमें कोई शक नहीं है कि इस मुहिम का नेतृत्व करने वाली बिबली बाई को लोग वर्षों तक याद रखेंगे।
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