बायो-फेंसिंग एक साथ कई स्तरों पर तालाब की रक्षा करती है। बायो-फेंसिंग के लिए स्थानीय जलवायु के अनुसार देशी घास, झाड़ियां और पेड़-पौधे चुने जाते हैं।
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बायो-फेंसिंग क्या है? तालाब संरक्षण में कंक्रीट की जगह क्यों ले रही है यह तकनीक
दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र के कंगनहेड़ी गांव के एक तालाब से जुड़े मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने हाल ही में एक अहम टिप्पणी की है। इस मामले में तालाब के चारों ओर सुरक्षा के लिए कंक्रीट की दीवार बनाने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा था। लेकिन NGT ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि जहां संभव हो, वहां बायो-फेंसिंग (जैविक बाड़) जैसे प्राकृतिक विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
पहली नज़र में यह बहस केवल सीमेंट बनाम हरियाली जैसी लग सकती है। लेकिन वास्तव में इसके पीछे यह बड़ा सवाल छिपा है कि क्या हम तालाबों को केवल एक संरचना की तरह देख रहे हैं, या एक जीवित जल-तंत्र की तरह?
असल में तालाब सिर्फ पानी रोकने की जगह नहीं होते। बारिश के पानी को संचित करने, धीरे-धीरे जमीन में उतारने और आसपास के भूजल स्तर को बनाए रखने में उनकी भूमिका अहम होती है। जब उनके चारों ओर पूरी तरह कंक्रीट की दीवारें बना दी जाती हैं, तो कई बार यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
इसी संदर्भ में बायो-फेंसिंग का विचार सामने आता है, जिसमें पौधों, झाड़ियों और स्थानीय हरित प्रजातियों के माध्यम से तालाब की सीमा तय की जाती है। यह तरीका न केवल अतिक्रमण को रोकने में मदद करता है, बल्कि तालाब के प्राकृतिक वातावरण को भी बनाए रखता है।
अब सवाल यह है कि क्या हर तालाब के लिए एक ही समाधान सही हो सकता है? या फिर हमें स्थान, जरूरत और पारिस्थितिकी के आधार पर अलग-अलग तरीके अपनाने चाहिए?
पौधों, झाड़ियों, घास या स्थानीय प्रजातियों की सहायता से प्राकृतिक सीमा तैयार करने को बायो-फेंसिंग कहते हैं।
तालाब सिर्फ पानी का गड्ढा नहीं, एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र
भारत के अधिकांश पारंपरिक तालाब वर्षा जल को इकट्ठा करने और धीरे-धीरे जमीन में उतारने के लिए बनाए गए थे। उनके चारों ओर खुली मिट्टी, घास, झाड़ियां और स्थानीय पेड़-पौधे होते थे। यही क्षेत्र वर्षा के पानी को तालाब तक पहुंचने और अतिरिक्त पानी को आसपास की जमीन में समाने का रास्ता देता था।
समय के साथ शहरीकरण बढ़ने पर कई शहरों में तालाबों के चारों ओर सुरक्षा और अतिक्रमण रोकने के लिए कंक्रीट की दीवारें और अन्य पक्की संरचनाएं बनाई जाने लगीं। लेकिन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की Urban Water Bodies रिपोर्ट के अनुसार, हर तालाब के लिए यह तरीका उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
बहुत अधिक कंक्रीटीकरण प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर सकता है और तालाब के आसपास होने वाली कई पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। कई मामलों में यह तालाब और उसके जलग्रहण क्षेत्र के बीच एक कठोर अवरोध बन जाता है, जिससे उसका प्राकृतिक संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
बायो-फेंसिंग क्या है?
पौधों, झाड़ियों, घास या स्थानीय प्रजातियों की सहायता से प्राकृतिक सीमा तैयार करने को बायो-फेंसिंग कहते हैं। यह केवल एक प्राकृतिक बाड़ नहीं है। यह तालाब को अतिक्रमण से बचाने में मदद करती है। साथ ही, उसके आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी सुरक्षित रहता है।
बायो-फेंसिंग का उद्देश्य केवल अतिक्रमण रोकना नहीं है। यह उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी, जल-चक्र और जैव विविधता को भी सुरक्षित रखने में मदद करती है।
विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि जल निकायों के आसपास हरित बफर क्षेत्र जल गुणवत्ता सुधारने और भूजल रिचार्ज में मदद करते हैं।
बायो-फेंसिंग कैसे काम करती है?
बायो-फेंसिंग एक साथ कई स्तरों पर तालाब की रक्षा करती है। बायो-फेंसिंग के लिए स्थानीय जलवायु के अनुसार देशी घास, झाड़ियां और पेड़-पौधे चुने जाते हैं। इस घेरे से अतिक्रमण और अनधिकृत प्रवेश को रोकने में मदद मिलती है।
साथ ही, उनकी जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं, वर्षा जल के रिसाव को बढ़ावा देती हैं और कटाव कम करती हैं। यही हरित पट्टी पक्षियों, तितलियों, मेंढकों और अन्य छोटे जीवों के लिए भी सुरक्षित आवास का काम करती है। बायो-फेंसिंग में स्थानीय जलवायु के अनुसार देशी घास, झाड़ियां और पेड़-पौधे लगाए जाते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन और अनुभव
कई अध्ययन बताते हैं कि जल निकायों के आसपास हरित बफर क्षेत्र लंबे समय तक उनके संरक्षण में मदद करते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वेटलैंड के चारों ओर हरित क्षेत्र बनाने से जल प्रदूषण में 30-60 फ़ीसद तक की कमी संभव है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ भी ऐसे प्रकृति-आधारित उपायों का समर्थन करते हैं।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण से जुड़ी योजनाओं पर काम करने वाले लोगों और जल विशेषज्ञ मानते हैं कि बायो-फेंसिंग केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का उदाहरण है।
हमने लंबे समय तक जल निकायों को इंजीनियरिंग संरचना की तरह देखा है, जबकि वे जीवित पारिस्थितिकी तंत्र हैं। बायो-फेंसिंग हमें इस सोच से बाहर निकालकर प्रकृति-आधारित समाधान की ओर ले जाती है।
सुनीता नारायण पर्यावरणविद्, CSE
क्यों यह तरीका अधिक टिकाऊ है?
इसी कारण बायो-फेंसिंग को केवल सुरक्षा उपाय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरक्षण की रणनीति माना जाता है। स्थानीय पेड़-पौधे और घास मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। वे वर्षा जल को जमीन में समाने में भी मदद करते हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण (रिचार्ज) बेहतर होता है।
हरित बाड़ आसपास के तापमान को संतुलित रखने में भी मदद करती है। कंक्रीट की तुलना में इसका रखरखाव भी अपेक्षाकृत कम होता है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ बायो-फेंसिंग को तालाबों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए एक प्रभावी प्रकृति-आधारित समाधान मानते हैं।
मानव-निर्मित और प्राकृतिक जलाशय दोनों ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल रिचार्ज के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
भूजल रिचार्ज से इसका क्या संबंध है?
तालाब केवल पानी जमा नहीं करते, बल्कि भूजल को भी रिचार्ज करते हैं। अब कई वैज्ञानिक अध्ययन भी इसकी पुष्टि करते हैं। तालाब, झील और आर्द्रभूमियां वर्षा जल को धीरे-धीरे जमीन में समाने का मौका देती हैं। इससे आसपास के जलभृत (aquifers) रिचार्ज होते हैं।
CGWB की रिपोर्ट Dynamic Ground Water Resources of India में स्पष्ट किया गया है कि मानव-निर्मित और प्राकृतिक जलाशय दोनों ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल रिचार्ज के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
वर्षा का पानी प्राकृतिक किनारों से होकर तालाब तक पहुंचता है। उसका एक हिस्सा धीरे-धीरे जमीन में समा जाता है। इसी प्रक्रिया से आसपास के भूजल का रिचार्ज होता है।
वहीं, यदि तालाब के चारों ओर की जमीन का अत्यधिक कंक्रीटीकरण कर दिया जाए, तो इससे वर्षा जल का प्राकृतिक रिसाव बाधित हो सकता है। इसके कारण भूजल रिचार्ज कम होता है और सतही जल बहाव (रनऑफ) बढ़ जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय भूजल सम्मेलन (IGWC 2025) में प्रकाशित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH), रुड़की से जुड़े एक अध्ययन में भी यही बात सामने आई है। अध्ययन के अनुसार, सड़कों, इमारतों और अन्य अभेद्य सतहों वाले क्षेत्रों में वर्षा जल का जमीन में समाना बहुत कम हो जाता है।
इससे सतही जल बहाव बढ़ता है। वहीं, वनस्पति वाले क्षेत्र वर्षा जल के रिसाव को बढ़ावा देते हैं और बहाव को कम करते हैं।
हालांकि इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि हर परिस्थिति में कंक्रीट की संरचनाएं ग़लत ही हैं। कुछ शहरी क्षेत्रों में सुरक्षा के लिए कंक्रीट जैसी संरचनाओं की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे उपाय सोच-समझकर और सीमित स्तर पर अपनाने चाहिए।
उदाहरण के लिए, कुछ स्थानों पर पारगम्य कंक्रीट (Permeable Concrete) या हाइब्रिड एज डिज़ाइन जैसी तकनीकें सुरक्षा और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकती हैं। इसलिए हर तालाब के लिए एक जैसा समाधान उपयुक्त नहीं होता।
तेजी से फैलते शहरों में अधिकांश जमीन कंक्रीट से ढक चुकी है। ऐसे में बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय सीधे नालों में बह जाता है।
क्या हर तालाब के लिए एक ही समाधान सही है?
इसका उत्तर आसान नहीं है। तालाबों की स्थिति, उनके आसपास का भू-उपयोग, अतिक्रमण का दबाव और सुरक्षा की जरूरत हर जगह अलग होती है। इसलिए किसी एक उपाय को हर जगह लागू नहीं किया जा सकता।
जहां जगह और प्राकृतिक परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां बायो-फेंसिंग बेहतर विकल्प हो सकती है। वहीं घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में कई बार प्रकृति-आधारित उपायों के साथ सीमित इंजीनियरिंग संरचनाओं की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
जैसे कि, जहां जरूरत हो वहां तालाब के कुछ हिस्सों में पत्थर की मजबूत परत या सीमित कंक्रीट संरचना बनाई जा सकती है ताकि किनारे सुरक्षित रहें। वहीं बाकी हिस्सों में स्थानीय पेड़-पौधे, घास और झाड़ियों की हरित पट्टी विकसित की जा सकती है। इससे अतिक्रमण रोकने में मदद मिलती है और तालाब का प्राकृतिक वातावरण भी बना रहता है।
बायो-फेंसिंग का उद्देश्य केवल अतिक्रमण रोकना नहीं है। यह उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी, जल-चक्र और जैव विविधता को भी सुरक्षित रखने में मदद करती है।
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शहरी तालाब क्यों अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं?
तेजी से फैलते शहरों में अधिकांश जमीन कंक्रीट से ढक चुकी है। ऐसे में बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय सीधे नालों में बह जाता है। जिससे एक ओर जलभराव बढ़ता है तो दूसरी ओर भूजल रिचार्ज कम होता है।
हाल के वर्षों में दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में भारी बारिश के दौरान बार-बार जलभराव हुआ है। कई मामलों में ड्रेनेज सिस्टम अतिरिक्त पानी संभाल नहीं पाता, जिससे सड़कें और रिहायशी इलाके तक पानी में डूब जाते हैं।
यहीं शहरी तालाबों की भूमिका अहम होती है। जब इन्हें सक्रिय और प्राकृतिक अवस्था में रखा जाता है, तो ये वर्षा जल के लिए एक बफर ज़ोन की तरह काम करते हैं। इससे अचानक आने वाले पानी का दबाव कम होता है।
अगर तालाबों का जलग्रहण क्षेत्र सुरक्षित रहे, तो उनके कई फायदे होते हैं। वे वर्षा जल रोकते हैं और जलभराव कम करते हैं। इसके अलावा भूजल रिचार्ज दर बढ़ाते हैं और आसपास का तापमान भी संतुलित रखने में मदद करते हैं।
इसका एक स्पष्ट उदाहरण चेन्नई के पल्लिकरनई मार्शलैंड सिस्टम से समझा जा सकता है। यह क्षेत्र कभी शहर के प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का हिस्सा था, लेकिन अतिक्रमण और निर्माण के कारण इसका बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ।
हाल के संरक्षण प्रयासों के बाद जहां-जहां इस आर्द्रभूमि को पुनर्जीवित किया गया है, वहां भारी बारिश के दौरान आसपास के इलाकों में जलभराव की तीव्रता अपेक्षाकृत कम देखी गई है।
यह उदाहरण दिखाता है कि प्राकृतिक जल निकाय केवल पानी जमा करने की जगह नहीं हैं। उनका संरक्षण शहरों को जलभराव, भूजल संकट और बढ़ती गर्मी जैसी समस्याओं से निपटने में भी मदद कर सकता है।
जैव विविधता के लिए भी जरूरी है प्राकृतिक किनारा
तालाब के किनारे उगने वाली घास, सरकंडे, झाड़ियां और स्थानीय पौधे अनेक पक्षियों, उभयचरों, कीटों और छोटे जीवों के लिए आवास उपलब्ध कराते हैं। वनस्पतियां तलछट और प्रदूषकों को रोकने में मदद करती हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है।
यदि तालाब का पूरा किनारा कंक्रीट से ढक दिया जाए, तो कई जीवों का प्राकृतिक आवास खत्म हो सकता है। इससे जैव विविधता प्रभावित होती है। वर्षा जल का जमीन में समाना भी कम हो जाता है।
इसीलिए पारिस्थितिकी विशेषज्ञ अक्सर सलाह देते हैं कि जहां संभव हो, वहां तालाबों के चारों ओर स्थानीय वनस्पतियों का संरक्षण किया जाए और हरित बफर क्षेत्र विकसित किए जाएं।
तालाब संरक्षण का मतलब केवल उसके चारों ओर बाड़ लगाना नहीं है। उसके जलग्रहण क्षेत्र और प्राकृतिक जल प्रवाह को भी सुरक्षित रखना जरूरी है। भूजल रिचार्ज और जैव विविधता का भी ध्यान रखना चाहिए तभी तालाब लंबे समय तक स्वस्थ बने रह सकते हैं।
केवल सौंदर्यीकरण नहीं, पारिस्थितिक संरक्षण
देश के कई शहरों में तालाबों के संरक्षण का अर्थ अक्सर पक्के घाट, टाइलें, रेलिंग और कंक्रीट के किनारे बना देना माना जाता है। इससे तालाब देखने में आकर्षक तो लग सकता है, लेकिन कई बार उसकी प्राकृतिक कार्यप्रणाली प्रभावित हो जाती है।
किनारों की मिट्टी, स्थानीय वनस्पति और वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव आने से तालाब की जलधारण क्षमता, भूजल रिचार्ज और जैव विविधता पर भी असर पड़ सकता है।
कंगनहेड़ी का मामला केवल एक तालाब का मामला नहीं है। यह उस सोच की ओर संकेत करता है जिसमें जल निकायों को केवल निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि जीवित पारिस्थितिकी तंत्र माना जाता है।
हर जगह बायो-फेंसिंग ही समाधान नहीं होगी, लेकिन यह ज़रूर याद दिलाती है कि तालाबों का भविष्य केवल कंक्रीट से सुरक्षित नहीं होगा। संरक्षण तभी सफल होगा, जब स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रकृति और इंजीनियरिंग के बीच संतुलन बनाया जाए।
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