विश्व बांस दिवस : घास का जंगली पौधा कैसे बन गया 21वीं सदी का 'ग्रीन स्टील'

बांस पर्यावरण के लिए महत्‍वपूर्ण और एक बहु उपयोगी पौधा है इसके बावजूद दुनिया में बांस के जंगल घटते जा रहे हैं। 

फोटो : विकी कॉमंस 

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Summary
  • भोजन, आवास से लेकर निर्माण तक की जरूरतें पूरा करता है बांस, 

  • पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र में निभाता है अहम भूमिका

  • भारत में 136 प्रजातियां, राष्ट्रीय बांस मिशन के जरिए खेती को मिला बढ़ावा

बांस का इस्‍तेमाल खान-पान से लेकर घर निर्माण, सजावट, हस्तशिल्प, औषधियां बनाने तक में होता है। पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में भी यह एक अहम भूमिका निभाता है। प्रकृति के इस लचीले, टिकाऊ और उपयोगी संसाधन की उपयोगिता के बारे में लोगों को जागरूकता बढ़ाने के लिए दुनिया भर में हर साल 18 सितंबर को 'विश्व बांस दिवस' मनाया जाता है। यह दिन इस साधारण से दिखने वाले पौधे का महत्‍व बताता है, जो वास्‍तव में एक घास है। पोएसी यानी घास कुल का यह पौधा अपनी तेजी से बढ़ने वाली जड़ों के जरिये मिट्टी को बांधकर रखने, वर्षा के जल को जमीन में रोकने, मिट्टी को कार्बनिक जैवभार (Organic biomass) जैवभार से पोषित करने की अहम पर्यावरणीय भूमिका भी निभाता है। बांस की इस व्‍यापक उपियोगिता के देखते हुए इसे आज जैव-आधारित चक्रीय अर्थव्यवस्था (Bio-based circular economy) के एक मजबूत आधार स्‍तंभ के रूप में देखा जाने लगा है। बांस का अध्‍ययन करने वाली अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था International Bamboo and Rattan Organisation यानी INBAR के अनुसार बांस के 10,000 से अधिक उत्पाद और उपयोग दर्ज किए जा चुके हैं और यह भोजन, चारा, ऊर्जा, निर्माण, कपड़ा, कागज और प्लास्टिक के विकल्प तक में इस्तेमाल हो सकता है।

विश्व बांस दिवस का इतिहास

विश्व बांस दिवस की शुरुआत 18 सितंबर 2009 को बैंकॉक में आयोजित 8वें World Bamboo Congress के दौरान हुई। करीब 100 देशों के प्रतिनिधियों ने 18 सितंबर को विश्व बांस दिवस के रूप में मनाने का समर्थन किया था। इस पहल का उद्देश्य बांस की पर्यावरणीय, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उपयोगिता के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाना और बांस की टिकाऊ खेती तथा उपयोग को प्रोत्साहित करना था। 18 सितंबर का दिन बांस के जंगलों के लिए मशहूर थाईलैंड के Royal Thai Forestry Day से भी जुड़ा हुआ है। तब से हर वर्ष यह दिन बांस को केवल परंपरागत सामग्री के रूप में नहीं, बल्कि टिकाऊ विकास के एक संभावित संसाधन के रूप में देखने का अवसर देता है।

'Bamboo Beyond Borders' का मतलब क्या है?

2026 में भारत में विश्व बांस दिवस की थीम Bamboo Beyond Borders यानी "बांस सीमाओं से परे" रखी गई है, जो बांस की संभावनाओं को स्थानीय उपयोग से आगे वैश्विक स्तर पर ले जाने की बात करती है। World Bamboo Organization की 2026 की वैश्विक अपील में अभियान-संदेश “Bamboo for a Regenerative Future: A Global Call to Grow, Build and Prosper with Nature” दिया गया है। 

भारत में विश्व बांस दिवस से जुड़े प्रमुख आयोजनों की बात करें तो गुजरात के गांधीनगर में 14 से 18 सितंबर 2026 तक National Institute of Design में इस विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में डिजाइनर, शोधकर्ता, वास्तुकार और उद्योग विशेषज्ञ बांस के भविष्य पर चर्चा करने के लिए जुट रहे हैं। इसमें शोध-पत्र, प्रदर्शनियां, कार्यशाला जैसी गतिविधियों का अयोजन किया जा रहा है। इसका मूल संदेश यह है कि बांस किसी एक देश, संस्कृति या उद्योग तक सीमित संसाधन नहीं है। इसलिए इसका इस्तेमाल स्थानीय परंपराओं के साथ ही आधुनिक भवन निर्माण (architecture), उत्‍पादों और इंजीनियरिंग में करते हुए एक पर्यावरण अनुकूल सर्कुलर इकनॉमी को बढ़ावा दिया जा सकता है। 

पेड़ नहीं, घास है बांस

बांस का वैज्ञानिक वर्गीकरण इसे घास कुल यानी Poaceae में रखता है। Poaceae को पुराने वर्गीकरण में Gramineae भी कहा जाता है। इसी कुल में गेहूं, चावल, मक्का, जौ और गन्ने जैसी महत्वपूर्ण घासें भी आती हैं। बांस को Poaceae के भीतर Bambusoideae उपकुल में रखा जाता है। इसकी करीब 120 से अधिक वंशों और 1,600 से अधिक प्रजातियों का वैज्ञानिक उल्लेख मिलता है।

बांस की सबसे खास विशेषताओं में इसका तना यानी culm है। ज्‍यादातर प्रजातियों में तना खोखला होता है और इसमें गांठों यानी nodes के बीच लंबा internode होता है। इसकी भूमिगत जड़-तंत्र यानी rhizome के आधार पर बांस की कई प्रजातियों को मोटे तौर पर clumping और running प्रकारों में समझा जाता है। इसी कारण कुछ बांस एक जगह गुच्छे में फैलते हैं, जबकि कुछ भूमिगत rhizome के जरिए आसपास तेजी से फैल सकते हैं। यही जैविक विविधता इसे अलग-अलग जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों में उपयोगी बनाती है।

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दुनिया और भारत में बांस की कुछ प्रमुख प्रजातियां

दुनिया और भारत में बांस की अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं, जो आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं-

  • Moso bamboo (Phyllostachys edulis) चीन और पूर्वी एशिया में प्रमुख औद्योगिक बांस है। इसका इस्तेमाल निर्माण, engineered bamboo, फर्नीचर और खाद्य उत्पादों में होता है। 

  • Dendrocalamus giganteus यानी giant bamboo दुनिया के सबसे बड़े बांसों में शामिल है। इसके culms बहुत बड़े आकार तक पहुंच सकते हैं। 

  • Guadua angustifolia लैटिन अमेरिका में पाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण प्रजाति है।  इसे निर्माण कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल किया जाता है।

  • Bambusa vulgaris दुनिया के अनेक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में व्यापक रूप से उगाया जाता है।

भारतीय प्रजातियां

भारत में सरकारी आंकड़ों के अनुसार बांस की 136 प्रजातियां दर्ज हैं, जिनमें 125 स्वदेशी और 11 विदेशी प्रजातियां शामिल हैं। पूर्वोत्तर भारत बांस की विविधता और उपयोग की दृष्टि से खास क्षेत्र है, लेकिन मध्य, दक्षिण और पश्चिम भारत में भी इसकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं।भारत की प्रमुख प्रजातियां इस प्रकार हैं - 

  • Bambusa bambos (कांटेदार बांस)

  • Bambusa tulda (बंगाल बांस) 

  • Dendrocalamus strictus यानी solid/male bamboo, 

  • Dendrocalamus hamiltonii 

  • Dendrocalamus giganteus

  • Bambusa nutans 

  • Bambusa vulgaris 

कुछ अनूठी प्रजातियां

Dendrocalamus giganteus अपने विशाल आकार के लिए जाना जाता है। Bambusa arundinacea यानी पुराने नामकरण में भारतीय कांटेदार बांस अपनी ग्रीगेरियस flowering और बीजों के कारण भी महत्वपूर्ण है। कुछ बांस प्रजातियों में फूल आने का अंतराल कई दशकों तक हो सकता है। Melocanna baccifera जैसे बांस में फलन और बीज बनने की विशिष्ट प्रक्रिया देखी जाती है। वहीं काले बांस यानी Phyllostachys nigra की काली culm इसकी पहचान है और इसे सजावटी तथा डिजाइन उपयोगों में भी इस्तेमाल किया जाता है।

पर्यावरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है बांस?

बांस का पर्यावरणीय महत्व केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि वह तेजी से बढ़ता है। इसके घने जड़ और rhizome तंत्र से मिट्टी को बांधने में मदद मिलती है। साथ ही इससे ढलानों और क्षरणग्रस्त जमीन पर कटाव को कम करने में उपयोगी है। इसकी पत्तियां और जैविक अवशेष मिट्टी में लौटकर पोषक तत्वों के चक्र में शामिल होते हैं। बांस ऊसर भूमि या खराब हो चुकी ज़मीन को फिर से ठीक करने यानी degraded land restoration में भी उपयोगी हो सकता है और कई परिस्थितियों में कम समय में पर्याप्त biomass तैयार करता है।

बांस का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कार्बन है। बढ़ते हुए बांस में प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से कार्बन जैवभार में जमा होता है। जब बांस को लंबे समय तक चलने वाले उत्पादों जैसे भवन, फर्नीचर या engineered panels में बदला जाता है। इससे लकड़ी के लिए पेड़ों की कटाई में कमी लाई जा सकती है। हालांकि, यह लाभ तभी टिकाऊ है जब बांस की खेती, कटाई, प्रसंस्करण और भूमि उपयोग सही तरीके से किया जाए। हर बांस का रोपण अपने आप कार्बन-सिंक नहीं बन जाता और प्राकृतिक वन को बांस के plantation से बदलना भी समान पर्यावरणीय परिणाम नहीं देता।

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बांस को उसकी मजबूती के कारण 21वीं सदी का 'ग्रीन स्टील' भी कहा जाता है।

फोटो : विकी कॉमंस

21वीं सदी का 'ग्रीन स्टील' क्यों कहा जाता है?

बांस का 'ग्रीन स्टील' नाम मुख्यतः इसकी strength-to-weight ratio, tensile properties, stiffness और तेजी से दोबारा तैयार होने की क्षमता के कारण प्रचलित हुआ है। इसका वजन स्टील की तुलना में बहुत कम होता है, लेकिन बांस के रेशों की दिशा में इसकी यांत्रिक मजबूती काफी अधिक हो सकती है। आधुनिक processing के जरिए bamboo strips को laminated या composite materials में बदला जा सकता है, जिससे engineered bamboo तैयार होता है।

लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है। बांस को हर परिस्थिति में स्टील का सीधा विकल्प मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। बांस प्राकृतिक और असमान गुणों वाला (anisotropic material) है। इसकी मजबूती प्रजाति, नमी, culm की उम्र, हिस्से और treatment के अनुसार बदलती है। सामान्य बांस को reinforced concrete में सीधे steel reinforcement की तरह इस्तेमाल करने में मजबूती और लचीलेपन  से जुड़ी सीमाओं को ध्‍यान में रखना जरूरी है। इसलिए 'ग्रीन स्टील' शब्द को बांस की उच्च strength-to-weight और कम embodied carbon जैसी विशेषताओं के संदर्भ में ीर समझना चाहिए, न कि हर निर्माण में स्टील के सीधे विकल्प के रूप में।

बांस का चावल पारंपरिक भोजन का हिस्सा

बांस का चावल यानी Bamboo rice वास्तव में धान का चावल नहीं है। यह बांस के फूल आने के बाद बनने वाले बीज हैं। कुछ प्रजातियों में लंबे अंतराल के बाद सामूहिक यानी gregarious flowering होती है और बड़ी मात्रा में बीज बनते हैं। इन बीजों को साफ करके और छिलका हटाकर खाद्य पदार्थ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों और अन्य एशियाई इलाकों में बांस के बीज पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे हैं। 2023 में Food Chemistry: X में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार बांस के बीजों में प्रोटीन, फाइबर और कई सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि bamboo rice को सामान्य धान के चावल का विकल्प या कोई औषधीय भोजन कहना ठीक नहीं होगा। इसकी उपलब्धता बहुत ही कम है क्योंकि बांस का flowering cycle दशकों लंबी और अनियमित होती है। एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि कुछ परिस्थितियों में बांस के बीज भारी धातुओं को जमा कर सकते हैं, इसलिए खाद्य उपयोग में स्रोत और सुरक्षा महत्वपूर्ण है।

बांस के फूल: दुर्लभ पारिस्थितिकीय घटना

बांस का flowering cycle वनस्पति विज्ञान की सबसे रोचक घटनाओं में से एक है। कई प्रजातियां बहुत लंबे vegetative phase के बाद फूलती हैं। कुछ प्रजातियों में एक ही genetic population के पौधे लगभग एक ही समय पर बड़े पैमाने पर फूल सकते हैं। कई monocarpic bamboo में flowering और seed production के बाद पूरा clump या culm system मर सकता है।

बांस के सामूहिक flowering का संबंध कुछ क्षेत्रों में चूहों की आबादी में अस्थायी वृद्धि से भी जोड़ा गया है। इसका कारण यह है कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध बांस के बीज rodents के लिए भोजन उपलब्ध कराते हैं। पूर्वोत्तर भारत के कुछ ऐतिहासिक famine episodes के संदर्भ में bamboo flowering और rodent outbreaks का उल्लेख मिलता है। इसलिए बांस का फूलना केवल botanical curiosity नहीं, बल्कि स्थानीय कृषि और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी घटना भी हो सकता है।

बांस का तेल और सिरका क्या है?

बांस की पत्तियों की प्रोसेसिंग करके bamboo leaves से औषधीय गुणों वाला essential oil निकाला जाता है। यह चावल की भूंसी से तेल (Rice bran oil) निकालने जैसा ही है। इसलिए 'बांस का तेल' कोई मानकीकृत उत्पाद नहीं है। इसके लिए विभिन्न प्रजातियों की पत्तियों को steam distillation से process करके volatile compounds वाला तेल प्राप्त किया जा सकता है। अलग-अलग प्रजातियों के तेल की रासायनिक संरचना और मात्रा अलग होती है। कुछ प्रयोगशाला अध्ययनों में bamboo leaf essential oils में antioxidant और antimicrobial activity देखी गई है। इसलिए बाजार में मिलने वाले 'bamboo oil' को किसी एक निश्चित औषधीय उत्पाद के रूप में नहीं समझना चाहिए। 

बांस के तेल की तरह ही बांस से बनने वाला bamboo vinegar भी एक चर्चितउत्पाद है, जो bamboo charcoal बनाने की प्रक्रिया में प्राप्त condensate से जुड़ा होता है। दोनों को एक-दूसरे का पर्याय मानना सही नहीं है।

बांस के खाद्य उत्‍पाद

बांस के कोमल अंकुर (bamboo shoots) कई एशियाई देशों और भारत के पूर्वोत्तर तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में पारंपरिक खाद्य के रूप में इस्तेमाल होते हैं। इन्हें उबालकर, भिगोकर या किण्वित करके कड़वाहट कम की जाती है और फिर अलग-अलग व्यंजन बनाए जाते हैं।

  • बांस का अचार: कोमल बांस के अंकुरों को छोटे टुकड़ों में काटकर नमक, मसालों और तेल के साथ अचार बनाया जाता है। पूर्वोत्तर भारत में यह पारंपरिक खाद्य पदार्थ है।

  • बांस का सूप: उबले या किण्वित bamboo shoots को सब्जियों, मसालों और अन्य सामग्री के साथ पकाकर हल्का सूप बनाया जाता है। कई पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशियाई व्यंजनों में इसका इस्तेमाल मिलता है।

  • बांस की सब्जी: ताजा या किण्वित shoots को उबालकर या मसालों के साथ पकाकर सब्जी बनाई जाती है। इन्हें दाल, मांस या दूसरी सब्जियों के साथ भी पकाया जाता है।

  • बम्बू चिप्स: पतले कटे हुए bamboo shoots को उबालकर/प्रसंस्कृत करके सुखाया या तला जाता है और उनसे कुरकुरे chips बनाए जाते हैं। यह बांस को value-added food product में बदलने का एक आधुनिक उदाहरण है।

  • अन्य खाद्य उपयोग: bamboo shoots को सलाद, stir-fry, noodles, curry और fermented foods में भी इस्तेमाल किया जाता है। कुछ जगहों पर बांस के बीज, जिन्हें bamboo rice कहा जाता है, भी खाद्य के रूप में इस्तेमाल होते हैं।

खाद्य पदार्थ के रूप में बांस का उपयोग करते वक्‍त ध्यान देने वाली बात यह है कि कच्चे bamboo shoots में प्राकृतिक cyanogenic glycosides हो सकते हैं, जो शरीर में cyanide बना सकते हैं। इसलिए खाद्य बांस की उपयुक्त प्रजाति चुनना और उसे सही तरीके से उबालना/प्रसंस्कृत करना जरूरी है।

<div class="paragraphs"><p>बांस की पत्तियां झड़ कर मिट्टी को कार्बन और अन्‍य पोषक तत्‍व प्रदान करके मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं।&nbsp;</p></div>

बांस की पत्तियां झड़ कर मिट्टी को कार्बन और अन्‍य पोषक तत्‍व प्रदान करके मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं। 

फोटो : विकी कॉमंस

बांस के कुछ आधुनिक इस्‍तेमाल

आज बांस का उपयोग पारंपरिक टोकरी, चटाई और घर बनाने से आगे निकल चुका है। इसे bamboo fibre में बदलकर textile और composite materials बनाए जा रहे हैं। engineered bamboo से flooring, panels, furniture और structural components बनाए जा रहे हैं। bamboo pulp का उपयोग paper और packaging में हो सकता है। कुछ कंपनियां bamboo-based biocomposites और plastic alternatives पर भी काम कर रही हैं।

बांस से साइकिल, खेल का सामान, वाद्य यंत्र, बर्तन, लैंप शेड और फर्नीचर भी बनाए जाते हैं। कारखानों में रासायनिक प्रक्रियाओं जरिये treated bamboo का इस्तेमाल roofs, bridges, pavilions और housing structures में किया जा रहा है। इसके अलावा bamboo charcoal, activated carbon और biomass fuel जैसे उपयोग भी विकसित हुए हैं। इसीलिए बांस को आज पारंपरिक सामग्री से अधिक एक बहु-उपयोगी bio-based material platform के रूप में देखा जा रहा है।

भारत में बांस की खेती को बढ़ावा दे रही है सरकार 

भारत में बांस क्षेत्र के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय कार्यक्रम National Bamboo Mission (NBM) है। इसकी शुरुआत 2006-07 में हुई थी और बाद में इसे Mission for Integrated Development of Horticulture में शामिल किया गया। 2018-19 में इसे पुनर्गठित करके दोबारा शुरू किया गया, जिसका लक्ष्य केवल पौधे लगाना नहीं बल्कि nursery, quality planting material, plantation, treatment, primary processing, value addition, marketing, skill development और उद्योग तक पूरी value chain विकसित करना है।

NBM के तहत किसानों और अन्य हितधारकों को बांस की खेती, nursery, treatment और value-added products से जुड़ी गतिविधियों के लिए सहायता दी जाती है। केंद्र-राज्य funding pattern सामान्य राज्यों के लिए 60:40 और पूर्वोत्तर तथा कुछ पहाड़ी राज्यों के लिए 90:10 है। 2025 में कृषि मंत्रालय के अनुसार Mission 24 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में लागू था। इसके तहत FPO, MSME, skill development, market linkage और bamboo-based enterprises को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

एक बड़ा नीतिगत बदलाव भारतीय वन अधिनियम, 1927 यानी Indian Forest Act, 1927 में 2017 का संशोधन था। इसके जरिए बांस को 'tree' की परिभाषा से हटा दिया गया। इसका उद्देश्य forest areas के बाहर उगाए गए बांस की कटाई और परिवहन को अधिक आसान बनाना था, जिससे किसानों के लिए इसे कृषि फसल की तरह उगाना और बाजार तक पहुंचाना सरल हो सके।

इसके अलावा ICAR संस्थान bamboo-based agroforestry, nursery management, suitable species, sustainable harvesting और value addition पर प्रशिक्षण और अनुसंधान कर रहे हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में North Eastern Council और North East Cane and Bamboo Development Council जैसे संस्थान processing, artisans, common facility centres और market development से जुड़े काम कर रहे हैं। यानी सरकारी नीति अब केवल बांस लगाने से आगे बढ़कर खेती से बाजार तक पूरी value chain बनाने की दिशा में है।

बांस के 10 रोचक जानकारियां

1. बांस पेड़ नहीं, घास है। यह Poaceae यानी Gramineae कुल और Bambusoideae उपकुल का सदस्य है।

2. बांस की दुनिया में 1,600 से अधिक प्रजातियां दर्ज हैं। इनका फैलाव उष्णकटिबंधीय से लेकर समशीतोष्ण क्षेत्रों तक है।

3. भारत में 136 बांस प्रजातियां दर्ज हैं। इनमें 125 indigenous और 11 exotic species शामिल हैं।

4. कुछ बांस बहुत तेजी से बढ़ते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में कुछ species के shoots प्रतिदिन कई सेंटीमीटर तक बढ़ सकते हैं।

5. बांस का 'चावल' वास्तव में उसका बीज है। यह धान यानी Oryza sativa का चावल नहीं है।

6. बांस का flowering cycle बेहद अनोखा है। कई species दशकों तक vegetative अवस्था में रहने के बाद फूलती हैं।

7. बांस का उपयोग हजारों उत्पादों में होता है। भोजन, कागज, कपड़ा, furniture, construction, energy और composites इसके प्रमुख क्षेत्र हैं।

8. बांस की जड़ और rhizome मिट्टी को बांधने में मदद करते हैं। इसी वजह से इसका इस्तेमाल erosion control और land restoration में किया जाता है।

9. बांस हल्का लेकिन मजबूत material है। इसी strength-to-weight ratio के कारण इसे लोकप्रिय रूप से 'ग्रीन स्टील' कहा जाता है।

10. बांस की स्थिरता उसकी खेती के तरीके पर निर्भर करती है। टिकाऊ harvesting, उचित treatment और सही species selection जरूरी है; केवल बांस लगाना अपने आप में sustainable development की गारंटी नहीं है।

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