वीणा और विजय पाटिल, एलिफेंटा द्वीप पर है इनका आशियाना
फोटो - शरत चंद्र प्रसाद
मुंबई का एलिफेंटा द्वीप : जहां बसते हैं तीन गॉंव; पानी और आजीविका दोनों संकट में
यहां चारों तरफ पानी तो है, लेकिन साल में कई बार ऐसा समय आता है जब इनके पास पीने का पानी नहीं होता।
मुंबई का एलिफेंटा द्वीप जहां हर रोज़ हज़ारों सैलानी आते हैं। गेटवे ऑफ इंडिया से फेरियां चलती हैं, जो सैलानियों को यहां तक पहुंचाती हैं। सूरज ढलते ही फेरी सेवाएं बंद हो जाती हैं और बचे कुचे सैलानियों को आखिली फेरी वापस ले आती है। और फिर इस द्वीप पर सन्नाटा छा जाता है। इसी सन्नाटे के बीच रहते हैं कोली समुदाय के लोग। एलिफेंटा द्वीप के कोली समुदाय के लिए यह द्वीप कोई विरासती पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि उनका घर है।
इन लोगों के लिए समुद्र रोमांच नहीं, बल्कि इनकी आजीविका का आधार है। यहां रहने वाले अधिकांश परिवारों की आमदनी मछली पर टिकी है, जो मौसम के साथ बदलती रहती है। जैसे जैसे मुंबई बंदरगाहों, जहाजरानी और तटीय ढांचे के जरिए फैल रहा है, एलिफेंटा द्वीप पर जीवन भी उसी रफ्तार से बदल रहा है।
गेटवे ऑफ इंडिया के सामने सुबह की नावें, समुद्र के पार एक शांत सफर
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एलिफेंटा द्वीप का वो हिस्सा जिसे पर्यटक नहीं देखते
एलिफेंटा द्वीप वो शांत द्वीप है जहां डेढ़ हजार साल पहले गुफाएं तराशी गई थीं। इन्हीं गुफाओं के लिए यह द्वीप प्रसिद्ध है। इन्हें यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला हुआ है। जब यह द्वीप सैलानियों से भर जाता है, तब बंदर दुकानदारों के बीच से गुजरते हैं और गाइड शिव और त्रिमूर्ति की कथाएं सुनाते हैं। हर दिन औसतन 2,000 से 3,000 पर्यटक आते हैं, जबकि वीकेंड व छुट्टियों में यह संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।
दिन भर की चहलपहल के बाद हर शाम आखिरी फेरी जाने के बाद यह द्वीप पूरी तरह शांत हो जाता है। तभी इस द्वीप का एक और रूप सामने आता है। द्वीप के एक छोर पर सन्नाटा होता है, तो दूसरे छोर पर कोली समुदाय के लोगों की दिन भर की थकान और रोजमर्रा की बातें।
2011 की जनगणना के अनुसार एलिफेंटा द्वीप पर करीब 1,200 लोग रहते हैं। लगभग सभी कोली समुदाय के हैं। यह मुंबई तट से जुड़े सबसे पुराने मछुआरा समुदायों में से एक है। उनके लिए यह द्वीप न कोई पर्यटन स्थल है न पुरातात्विक स्मारक। गुफाएं उनके लिए बस घर के आसपास के नजारे का हिस्सा हैं।
एलिफेंटा द्वीप की एक सड़क, जिसे पर्यटन पगडंडियों से परे के निवासी रोज इस्तेमाल करते हैं।
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एलिफेंटा द्वीप पर बसते हैं तीन गॉंव
द्वीप तीन गॉंव में बंटा है: शेंतबंदर, मोराबंदर और राजबंदर। ये बस्तियां छोटी हैं, घनी वनस्पति और संकरी पगडंडियों से घिरी हैं, जहां समुद्र कभी दूर नहीं होता। घर एक दूसरे से सटे हैं, गलियां शांत रहती हैं और हर दरवाजे से समुद्र की आहट आती है। सप्ताह के दिनों में द्वीप धीमी रफ्तार से चलता है जो शनिवार और रविवार की सुबह पर्यटक फेरियों के आने पर ही टूटती है। यहां का जीवन समुद्र, बारिश, पर्यटन और जो कुछ द्वीप खुद दे सकता है, उन नाजुक संतुलनों पर टिका है।
वह समुद्र जिसने पीढ़ियां पाली
विजय पाटिल ने अपनी लगभग पूरी जिंदगी एलिफेंटा द्वीप पर बिताई है। वे हर सुबह पांच बजे उठते हैं, चाय बनाते हैं और मछली पकड़ने निकलने से पहले किनारे पर बैठते हैं। यह दिनचर्या दशकों से लगभग ऐसी ही रही है और वे कहते हैं कि इसे छोड़कर कहीं और जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते।
उनकी पत्नी वीणा 1980 में शादी के बाद यहां आईं। रायगड़ जिले के अलीबाग की रहने वाली वीणा को पहले यह जानकर अजीब लगा था कि उनके होने वाले पति एक छोटे से बंदरगाह के द्वीप पर रहते हैं। बसने में उन्हें तीन महीने लगे। उसके बाद वे कहती हैं, द्वीप घर बन गया। "मुझे अपने फैसले पर कभी पछतावा नहीं हुआ," वे कहती हैं।
विजय और वीणा, एक जोड़ा जो आधी सदी से साथ मछली पकड़ते और नाव चलाते आए हैं।
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चार दशकों से भी ज्यादा समय से यह जोड़ा मछली पकड़ने पर निर्भर रहा है। वीणा ने बचपन में माता पिता को देखकर यह काम सीखा। मछली साफ करना, पकड़ छांटना, ज्वार भाटे को समझना, मछली काटना, मौसम के संकेत पढ़ना और पानी को परखना, ये सब हुनर रटकर नहीं बल्कि बार बार करते रहने से आए।
विजय के समुद्र पर जाने से पहले दोनों मिलकर डीजल नाव तैयार करते हैं। जाल जांचे जाते हैं, रस्सियां लगाई जाती हैं, ईंधन भरा जाता है, सामान व्यवस्थित किया जाता है और निकलने से पहले नाव को स्थिर किया जाता है। वीणा खुद मछली पकड़ने नहीं जातीं, फिर भी मछली से जुड़ी अधिकतर मेहनत उनके हिस्से आती है। विजय के समुद्र पर रहने के दौरान वे घर भी अकेले संभालती हैं। अच्छे दिन 10 से 30 किलोग्राम तक पकड़ हो सकती है। बुरे दिन बेचने लायक कुछ नहीं मिलता। उनकी कमाई कभी तय नहीं होती, मौसम, मछलियों की आवाजाही, ज्वार और किस्मत के साथ बदलती रहती है।
विजय जोड़े द्वारा बनाई गई एक छोटी नाव दिखा रहे हैं, समुद्र में बिताई जिंदगी की एक छोटी सी झलक।
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उम्र के साथ विजय के लिए यह काम और कठिन हो गया है। जाल खींचना और नाव संभालना अब उतनी ताकत मांगते हैं जो धीरे धीरे कम होती जा रही है। कुछ साल पहले मछली पकड़ने के एक सफर में नाव पर गिरने से उनकी टांग बुरी तरह टूट गई। ठीक होने में लंबा वक्त लगा और उन महीनों में वीणा ने अधिकांश जिम्मेदारी खुद उठाई। तब से उनकी भूमिका और बड़ी हो गई है। वे घाट पर नाव थामती हैं, रस्सियां बांधती हैं और वे काम करती हैं जो कभी विजय खुद करते थे।
विजय अपनी डीजल नाव पर सवार हैं, करीब पांच घंटे के काम के लिए समुद्र की ओर निकले हैं।
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इस हादसे ने उन्हें कमाई का दूसरा जरिया ढूंढने पर मजबूर किया। दोनों ने घर पर लकड़ी की छोटी नावें और खिलौना मछलियां बनाना शुरू किया। महीने में केवल कुछ ही बार ऑर्डर आते हैं, लेकिन यह काम उन मौसमों में सहारा देता है जब समुद्र कुछ नहीं देता। इस जोड़े के बच्चे नहीं हैं। घर साधारण है और दिनचर्या सीधी सादी। "विजय कभी कभी खाना भी बनाते हैं," वीणा रसोई दिखाते हुए धीरे से कहती हैं।
हर साल जिंदगी को कठिन बना देता है मानसून
मानसून आते ही द्वीप को संभालने वाला समुद्र शांत हो जाता है। जून, जुलाई और अगस्त एलिफेंटा द्वीप के मछुआरा परिवारों के लिए सबसे कठिन महीने होते हैं। खराब मौसम मछली पकड़ना असुरक्षित बना देता है और मत्स्य प्रजनन चक्र की रक्षा के लिए लगाया गया मौसमी प्रतिबंध तटीय गतिविधियां रोक देता है। यह रोक जरूरी मानी जाती है लेकिन इसका मतलब है लगभग तीन महीने बिना मछली की आमदनी के।
वीणा बंदरगाह पर अपने पति का इंतजार कर रही थीं, लौटती नावों को देखते हुए।
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इस दौरान परिवार साल की शुरुआत में बचाई रकम पर गुजारा करते हैं। बहुतों के लिए इस वक्त मामूली मरम्मत भी मुश्किल हो जाती है। नाव को नुकसान पहुंच सकता है और मरम्मत अक्सर इसलिए टलती रहती है क्योंकि पैसे नहीं होते। "कई बार मेरी नाव टूट गई। एक वक्त ऐसा भी आया जब उसकी मरम्मत के लिए भी पैसे नहीं थे," वीणा कहती हैं।
द्वीप पर बुनियादी सुविधाएं सीमित हैं। न स्कूल है, न अस्पताल। पढ़ाई और इलाज के लिए मुंबई जाना पड़ता है। 2014 के बाद बिजली आई। उससे पहले रोजमर्रा की जिंदगी बिना भरोसेमंद बिजली के चलती थी। बहुत से युवा काम या पढ़ाई के लिए मुख्यभूमि चले जाते हैं जबकि कुछ मछली पकड़ने या पर्यटन से जुड़ी पारिवारिक रोजी संभालने के लिए रुकते हैं।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेल रहा एलिफेंटा द्वीप।
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पानी से घिरा द्वीप, पर पीने का पानी नहीं
एलिफेंटा द्वीप पर पानी की कमी एक ऐसी हकीकत है जिसे अधिकतर सैलानी देख नहीं पाते। कुएं और ट्यूबवेल हैं, लेकिन भूजल खारा है और पीने के लायक नहीं। इसका इस्तेमाल नहाने, बर्तन धोने और घर की सफाई में होता है। पीने का पानी मुख्यतः मानसून में जमा की गई बारिश के पानी पर निर्भर रहता है। जब यह भंडार कम होने लगता है तो परिवारों को मुंबई से लाया पानी खरीदना पड़ता है।
एक महिला पानी भर रही है जो केवल सफाई और नहाने के काम आता है, यह द्वीप पर बुनियादी संसाधनों की सीमित पहुंच को दर्शाता है।
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इस आपूर्ति को संभालना रोजाना की जिम्मेदारी बन जाती है, खासकर महिलाओं के लिए जो सूखे महीनों में भंडारण ध्यान से देखती हैं, तय करती हैं कब अतिरिक्त पानी खरीदना है और घर में उसका हिसाब रखती हैं।
लेकिन द्वीप की मीठे पानी की जद्दोजहद वर्तमान निवासियों से बहुत पहले की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की हालिया खुदाई में द्वीप की जमीन के नीचे एक विशाल सीढ़ीदार जलाशय मिला है जिसके लगभग 1,500 साल पुराने होने का अनुमान है। पुरातत्वविद अभिजीत अंबेकर की देखरेख में हुई इस खुदाई से पता चलता है कि पुराने निवासी भी बारिश का पानी जमा करने और संरक्षित करने की व्यवस्था बनाते थे। मुख्यभूमि से लाए पत्थर के टुकड़ों से बने इस जलाशय से जाहिर होता है कि सदियों पहले भी मीठे पानी का भंडारण यहां जीवन का केंद्र था।
अपने छोटे स्टॉल पर गीता पाटिल एलिफेंटा गुफाओं पर आने वाले सैलानियों को चाय, बिस्किट और चिप्स परोसती हैं।
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शोधकर्ताओं ने नोट किया कि द्वीप पर भारी मानसून बारिश होने के बावजूद पथरीली जमीन पानी को अंदर नहीं जाने देती। अधिकतर पानी जल्दी ही समुद्र में बह जाता है। इसलिए आज के निवासियों की यह मुश्किल एक लंबे पर्यावरणीय इतिहास का हिस्सा है।
खुदाई में भूमध्यसागरीय मटके, पश्चिम एशियाई बर्तन, लंगर, मनके और छठी सदी के व्यापार नेटवर्क से जुड़े सिक्के भी मिले जो बताते हैं कि एलिफेंटा द्वीप कभी वृहत समुद्री दुनिया से जुड़ा था। उन व्यापारिक इतिहासों के नीचे एक शांत निरंतरता है: सदियों के अंतराल से अलग हुई पीढ़ियां, सभी ने समुद्र से घिरे द्वीप पर मीठा पानी बचाए रखने की एक जैसी चुनौती का सामना किया।
महिलाएं जो द्वीप को चलाती हैं
जब पुरुष समुद्र पर निकल जाते हैं तो द्वीप की रोजाना की जिंदगी काफी हद तक महिलाओं के हाथों में होती है। दिन में एलिफेंटा द्वीप की गलियों से गुजरें तो साफ दिखता है कि यहां की छोटी दुकानें महिलाएं चला रही हैं। चाय की थड़ी, फूल की दुकान, जूस काउंटर, गहनों की दुकान, रेस्तरां और छोटे कैफे, सब उनके हाथों में हैं जबकि पुरुष मछली पकड़ने या किनारे पर काम करते हैं। घर संभालने के साथ साथ महिलाएं ही द्वीप की रोजाना की अर्थव्यवस्था को चुपचाप थामे रखती हैं।
द्वीप की एक खिलौने की दुकान में चमकीले प्लास्टिक और हाथ से बने सामान सजे हैं, यह छोटी सी याद दिलाते हैं कि पर्यटन स्थानीय व्यापार को कैसे आकार देता है।
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उनका दिन अक्सर सूरज निकलने से पहले शुरू होता है। परिवार के लिए खाना बनाने के बाद मछली साफ करना, पकड़ छांटना, सामान ढोना, पानी जमा करना और दुकान खोलना होता है। कुछ महिलाएं मुंबई में ससून डॉक पर मछली बेचने जाती हैं और फिर लौटकर काम में लग जाती हैं।
गीता पाटिल जिनका नाम बदला गया है, पर्यटन मार्गों के पास एक छोटी दुकान और फूल स्टॉल चलाती हैं। मछली पकड़ना कभी उनकी सीधी आमदनी का जरिया नहीं रहा लेकिन पर्यटन ने कई परिवारों के लिए कमाई के नए रास्ते खोले। "लोग अब दोगुना कमा रहे हैं," वे कहती हैं। यह टिप्पणी न उत्सव है न शिकायत, बस एक व्यावहारिक टिप्पणी है कि रोजी कैसे बदली है।
रास्ते के किनारे फूलों की दुकानें लगी हैं जिनकी बिक्री धार्मिक उपयोग और पर्यटकों की मांग दोनों से जुड़ी है।
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पानी की कमी का बोझ भी महिलाएं ही उठाती हैं। खारे कुएं का पानी पीने के पानी से अलग रखना पड़ता है, बारिश के पानी का भंडारण ध्यान से देखना पड़ता है और मुंबई से पानी कब मंगाना है यह फैसला आमतौर पर उन्हीं का होता है।
ईंधन इकट्ठा करना भी एक मेहनत भरा काम है। कई घर और खाने की थड़ियां अभी भी लकड़ी पर निर्भर हैं क्योंकि रसोई गैस या तो महंगी है या नियमित रूप से मिलना मुश्किल है। महिलाएं अक्सर जंगली इलाकों से लकड़ी बीनने में घंटे लगाती हैं और फिर उसे घर तक लाती हैं। सप्ताहांत में वहां से गुजरने वाले अधिकतर सैलानी यह मेहनत नहीं देखते, हालांकि द्वीप काफी हद तक इसी के दम पर चलता है।
एक महिला सिर पर लकड़ियां उठाकर ले जा रही है, यह रोज का काम है जो द्वीप की बढ़ती पर्यटन अर्थव्यवस्था के साथ साथ जारी है।
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मछली के जाल से पर्यटन की दुकान तक
पर्यटन ने एलिफेंटा द्वीप पर मछली पकड़ने की जगह नहीं ली है। कई परिवारों के लिए यह उसके साथ जीने का रास्ता बन गया है। द्वीप पर रहने वाले राजेश पाटिल एक समय मुख्यतः मछली पकड़ने पर निर्भर थे। आज वे और उनकी पत्नी पर्यटन क्षेत्र के पास एक छोटा जूस और सोडा का स्टॉल चलाते हैं। "मछली पकड़ना बहुत मेहनत का काम है और इतना फायदेमंद नहीं," वे कहते हैं।
मुंबई में मछली बेचने के लिए समय, यातायात और तालमेल चाहिए। दुकान से ज्यादा स्थिर आमदनी होती है, खासकर उन सप्ताहांत और छुट्टियों में जब मुख्यभूमि से फेरियां सैलानी लाती हैं। राजेश कभी कभी अभी भी मछली पकड़ने जाते हैं लेकिन समुद्र अब वैसा भरोसा नहीं देता जो पहले था। उनके बच्चे अब मुंबई में रहते हैं और बेटा मास्टर डिग्री कर रहा है। कई द्वीपीय परिवारों की तरह अगली पीढ़ी धीरे धीरे मुख्यभूमि पर अलग भविष्य की ओर बढ़ रही है।
राजेश अपनी छोटी दुकान पर रुककर गुजरते सैलानियों को नींबू सोडा परोस रहे हैं, द्वीप की दिनचर्या और पर्यटकों की उत्सुकता के बीच एक संक्षिप्त मुलाकात।
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साथ ही पर्यटन अपने दबाव भी लाता है। व्यस्त सप्ताहांत के बाद प्लास्टिक की बोतलें, रैपर और कचरा अक्सर रास्तों और सार्वजनिक जगहों पर बिखरा रहता है। नगरपालिका की कोशिशें सीमित होने की वजह से निवासी अक्सर खुद ही सफाई करते हैं। पर्यटन का पर्यावरणीय बोझ उन्हीं पर पड़ता है जो वहां साल भर रहते हैं। "मुझे बदलाव दिखता है," राजेश कहते हैं। "बहुत से बंदरगाह बन गए हैं। यह हमारे लिए अच्छा नहीं होगा।"
राजेश अपनी डीजल नाव के पास खड़े हैं जिसे वे कभी कभी चलाते हैं, मछली पकड़ने, यातायात और बंदरगाह की धीमी रफ्तार के बीच संतुलन साधते हुए।
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बदल रहा है समुद्र का व्यवहार
कोली समुदाय अपनी मर्जी से मछली पकड़ना नहीं छोड़ रहा। उनके आसपास का पानी बदल रहा है। आईआईटी बॉम्बे से पीएचडी करने वाले डॉ. कैलाश तांडेल बताते हैं कि पारंपरिक मछली पकड़ने की व्यवस्था कभी संयम और पारिस्थितिक संतुलन पर टिकी थी। छोटे जाल इस्तेमाल होते थे, छोटी मछलियां अक्सर वापस पानी में छोड़ दी जाती थीं और तरीके समुद्री जीवन को कम नुकसान पहुंचाते थे।
औद्योगिक तरीकों ने वह संतुलन बिगाड़ दिया है। अरब सागर में पेट्रोलियम खनन, पानी के अंदर विस्फोट, अवैध यंत्रचालित नावें, बढ़ते बंदरगाह और जहाजरानी की बढ़ती गतिविधि ने मुंबई बंदरगाह के आसपास के तटीय पारितंत्र को प्रभावित किया है।
रात में मुंबई बंदरगाह दूर से चमकता है, द्वीप की धीमी रफ्तार से एक अलग ही नजारा।
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मछलियों के रहने की जगहें उजड़ रही हैं, पकड़ घट रही है और कुछ पारंपरिक मछली पकड़ने के इलाके अब पहुंच से बाहर हो गए हैं। मछली व्यापार और नाव निर्माण की पुरानी व्यवस्थाएं जो कभी कोली जीविका को सहारा देती थीं, वे भी कमजोर पड़ गई हैं। "लोग आसान रास्ते चुन रहे हैं," डॉ. तांडेल कहते हैं। मछली पकड़ने की नाव से पर्यटन की दुकान तक का सफर सिर्फ पसंद या सुविधा का मामला नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि अकेले समुद्र से गुजारा करना कितना मुश्किल हो गया है।
विजय और वीणा जैसे परिवार मछली पकड़ना जारी रखते हैं क्योंकि यही वह जिंदगी है जो उन्हें आती है, चाहे समुद्र कम भरोसेमंद होता जाए। कुछ घर पूरी तरह छोड़ चुके हैं। बाकी इसलिए टिके हैं क्योंकि उन्हें कोई साफ विकल्प नहीं दिखता।
एक टूटी नाव बंदरगाह के पास एक छोटे घाट पर पड़ी है, जो घिसाव, मौसम और रोजी की अनिश्चितताओं की ओर इशारा करती है।
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पर्यटन, कचरा और नाजुक द्वीपीय पारिस्थितिकी
एलिफेंटा द्वीप का पारिस्थितिक जीवन पर्यटन के साथ एक असहज संतुलन में जी रहा है। द्वीप पर अभी भी घनी वनस्पति, मैंग्रोव, पक्षी, बंदर, चरते मवेशी और जंगली इलाके हैं जो जैव विविधता को संजोए हैं। निवासी यह भी बताते हैं कि यहां कभी हाथी रखे जाते थे जो सामान ढोते थे और शायद इसी से द्वीप को यह नाम मिला।
लेकिन पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहा है। पर्यटन बढ़ता प्लास्टिक कचरा छोड़ता है। पाबंदियों के बावजूद बंदरों को खाना खिलाने से उनका व्यवहार बदल रहा है। तटीय निर्माण और आसपास के बंदरगाह द्वीप से जुड़े समुद्री पारितंत्र को लगातार बदल रहे हैं।
किनारों पर मैंग्रोव के पेड़ फैले हैं जबकि पृष्ठभूमि में निर्माण के संकेत तटीय परिदृश्य को चुपचाप बदल रहे हैं।
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निवासियों के लिए पारिस्थितिक गिरावट कोई अमूर्त चिंता नहीं है। यह मछली की पकड़ में, पानी की गुणवत्ता में, किनारे के बदलाव में और आसपास के समुद्र की हालत में सीधे दिखती है। गुफाएं भले ही वैश्विक पहचान दिलाएं, लेकिन द्वीप कहीं ज्यादा नाजुक व्यवस्थाओं के दम पर जीता है: मौसमी बारिश, काम करती तटीय पारिस्थितिकी और उन लोगों की मेहनत जो हर बदलाव के साथ खुद को ढालते रहते हैं।
“हम समुद्र से दूर नहीं रह सकते”
डेढ़ हजार साल पहले एलिफेंटा द्वीप के लोगों ने एक और मौसम निकालने के लिए बारिश का पानी थामने को जलाशय बनाए थे। तर्क आज भी वही है। परिवार अभी भी मानसून का इंतजार करते हैं कि टंकियां भर जाएं। मछुआरे अभी भी ज्वार भाटे और प्रजनन चक्र पर निर्भर हैं। महिलाएं अभी भी अनिश्चित महीनों में घर को संभाले रखती हैं।
एक समुद्री गल पर्यटकों के पास मंडरा रहा है, पाबंदियों के बावजूद अक्सर खाना खिलाया जाता है और यह अनजाने में द्वीप के अनुभव का हिस्सा बन गया है।
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लेकिन द्वीप के आसपास के दबाव और बढ़ गए हैं। मछली भंडार सिकुड़ रहे हैं, तटीय विकास फैल रहा है, पर्यटन बढ़ता जा रहा है और पेयजल अनिश्चित बना हुआ है। कोली समुदाय के लिए ये कोई दूर की पर्यावरणीय बहसें नहीं हैं। ये हर रोज पूछे जाने वाले व्यावहारिक सवाल हैं: क्या भंडारण में अभी काफी पेयजल बचा है, क्या टूटी नाव की मरम्मत हो सकेगी, क्या अगला मछली सीजन इंतजार की कीमत वसूल करेगा और क्या युवा पीढ़ी यहीं रहेगी। "हम कोली हैं," वीणा कहती हैं। "हम समुद्र से दूर नहीं रह सकते।"
अधिकतर सैलानी एलिफेंटा से पत्थर की मूर्तियों और गुफा मंदिरों की तस्वीरें लेकर लौटते हैं। कोली समुदाय पीछे एक अलग विरासत के साथ रहता है: गर्मियां आने से पहले बारिश का पानी जमा करना, तूफानों के बाद नावें ठीक करना, मछली भंडार घटते देखना और एक ऐसी तटरेखा के साथ खुद को ढालना जो उनकी परंपराओं से तेज बदल रही है। जो द्वीप अतीत को संजोने के लिए जाना जाता है, वहां जीवित रहना अब एक अनिश्चित पर्यावरणीय भविष्य के साथ रोज समझौता करने का नाम है।
दिन ढल रहा है और अंतिम फेरी वापस मुंबई की ओर चल दी है।
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अगर आपको कभी एलिफेंटा द्वीप जाने का मौका मिले और आप पूरा दिन बिताने के बाद जब शाम को लौटेंगे तब ऐसा ही नज़ारा आपको अपनी नाव से दिखाई देगा। हमें उम्मीद है तब आपको हमारा यह लेख जरूर याद आयेगा। अंत तक पढ़ने के लिए इंडिया वाटर पोर्टल की पूरी टीम की ओर से सप्रेम धन्यवाद।
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