Gandhi Setu Patna

गांधी सेतु पटना 

फोटो - जी लैब - विकीकॉमन्स 

पटना की हवा में घुला जहर, प्रदूषण के मामले में दिल्ली के बेहद करीब पहुँचा शहर

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2024 और 2025 के डाटा पर आधारित इस अध्‍ययन में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु के बाद पटना में स्थिति को चिंताजनक बताया गया है।
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भारत के मेट्रो शहरों में जब-जब खराब एयर क्वालिटी की बात आती है तो सभी के ज़हन में सबसे पहले राजधानी दिल्ली का नाम आता है। फिर बेंगलुरु, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ, आदि। एक ताज़ा शोध में इस बार दिल्ली के बाद दूसरे नंबर पर पटना है। हालांकि मुंबई और चेन्नई वो शहर हैं जहां का प्रदूषण स्तर 2025 में बीते वर्षों के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ा है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2024 और 2025 के डाटा का विश्‍लेषण किया, जिसमें ये तथ्‍य सामने आये हैं। इस नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि मौजूदा राष्‍ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के मापदंड मौसमी प्रदूषण के उछाल को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जिससे आम लोगों के स्वास्थ्य पर जो असर हो रहा है वो सामने नहीं आ पा रहा है।

भारत के कई बड़े शहरों में हवा की गुणवत्ता केवल उत्सर्जन से तय नहीं होती। मौसम की परिस्थितियां भी प्रदूषण के स्तर को गहराई से प्रभावित करती हैं। 2024 से 2025 के सीपीसीबी के एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग डेटा पर हुई इस स्‍टडी की मानें तो केवल मौसम की स्थितियों में बदलाव से ही प्रदूषण का स्तर लगभग 40 प्रतिशत तक बदल सकता है, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव हो चाहे नहीं हो।

<div class="paragraphs"><p>दिल्ली में वायु प्रदूषण&nbsp;</p></div>

दिल्ली में वायु प्रदूषण 

फोटो - ऑल इंडिया रेडियो 

इस रिपोर्ट में क्लाइमेट ट्रेंड्स के मौसम एवं डाटा वैज्ञानिकों ने सरकार को सुझाव दिया है कि एनसीएपी के आगामी फेज 3 में नीतिगत ढांचे को मौसम और मौसम-विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाए। इसके लिए अलग-अलग मौसमों के हिसाब से सिस्टम विकसित करने की जरूरत है।

सर्दियों के दौरान बायोमास और कचरा जलाना प्रमुख स्रोतों में से एक है। कम हवा और कमजोर वेंटिलेशन के कारण PM2.5 सतह के पास जमा हो जाता है और राष्ट्रीय मानकों से ऊपर पहुंच जाता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स का अध्ययन दिखाता है कि कम हवा की गति वाले दिनों में PM2.5 तेजी से बढ़ता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थानीय और क्षेत्रीय स्रोत सर्दियों के प्रदूषण में अहम भूमिका निभाते हैं।

प्रोफेसर अभिजीत चटर्जी, बोस इंस्टीट्यूट, कोलकाता

2024-2025 में भारतीय शहरों की वायु गुणवत्ता पर स्टडी के मुख्‍य बिंदु

  • दिल्ली लगातार सबसे प्रदूषित शहर बना हुआ है। यहां PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर सबसे अधिक है और “गंभीर” या “आपात” श्रेणी में आता है। यहां की वायु गुणवत्ता के खराब होने की बड़ी वजहें स्थानीय उत्सर्जन के साथ-साथ क्षेत्रीय कारक भी हैं।

  • पटना को दिल्ली के बाद दूसरा सबसे प्रदूषित शहर पाया गया है। यहां लगातार उच्च PM2.5 स्तर दर्ज हो रहे हैं, जिनकी एक बड़ी वजह वातावरण में ठहराव की स्थिति है। यह पूर्वी इंडो-गैंगेटिक मैदान में प्रदूषण संकट के और गंभीर होने का संकेत देता है।

  • ऐतिहासिक रूप से अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई में अब सर्दियों के महीनों में वायु गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।

  • पूरे सल की बात करें तो बेंगलुरु में अन्य महानगरों की तुलना में सबसे कम और अपेक्षाकृत स्थिर वायु गुणवत्ता बनी हुई है। हालांकि इसका श्रेय बेंगलुरु में ग्रीन ज़ोन और तीन बड़े ग्रीन हब बॉटैनिकल गार्डन, एएससी सेंटर और गोल्‍फ कोर्स हैं। ये शहर के लिए फेफड़ों का काम करते हैं।

  • कोलकाता में प्रदूषण का स्तर चिंता का विषय बना हुआ है। खासकर सर्दियों में यहां द्वितीयक प्रदूषकों की उच्च सांद्रता पायी गई। शहर की हवा में जो कण पाए जा रहे हैं, वो स्वास्थ्‍य के लिए बेहद खतरनाक हैं।

अध्‍ययन में नीति में सुधार के सुझाव

इस अध्‍ययन में एनसीएपी के फेज 3 के लिए कई महत्वपूर्ण सुधारों के सुझाव दिए गए हैं जो इस प्रकार हैं:

  • सर्दियों के लिए अलग प्रदूषण लक्ष्य तय करना

  • मौसम आधारित समायोजित मेट्रिक्स विकसित करना

  • मौसम के आधार पर सक्रिय होने वाली गतिशील कार्ययोजनाएं

  • क्षेत्रीय स्तर पर “एयरशेड आधारित योजना”

रिपोर्ट के अनुसार देश की स्वच्छ हवा की रणनीति को प्रभावी और टिकाऊ बनाने के लिए वायु प्रदूषण प्रबंधन में मौसम की भूमिका को औपचारिक रूप से शामिल करने की आवश्यकता है।

उत्तरी भारत के शहरों में PM2.5 के उच्च स्तर का संबंध अक्सर उन परिस्थितियों से होता है जब हवा की गति 1 मीटर प्रति सेकंड से भी कम होती है और आर्द्रता अधिक रहती है। ऐसी स्थिति में प्रदूषकों का फैलाव बहुत कम होता है। वर्तमान में एनसीएपीके मूल्यांकन के दौरान मौसम के प्रभाव को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया जाता है, जिससे नीति की प्रभावशीलता का आकलन कई बार भ्रामक हो सकता है। वैज्ञानिक रूप से मजबूत मूल्यांकन के लिए मौसमीय विश्लेषण को शामिल करना जरूरी है।

प्रो. सग्निक डे, सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज़, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली

इस रिपोर्ट पर क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला ने कहा कि वार्षिक PM2.5 में 20 से 30 प्रतिशत की कमी भी दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। इन शहरों में 70 प्रतिशत से अधिक दिन ऐसे मौसमीय हालात में गुजरते हैं जहां हवा की गति बहुत कम और नमी अधिक होती है। इसलिए एनसीएपी फेज 3 में मौसम आधारित हस्तक्षेप और एयरशेड स्तर पर प्रबंधन को शामिल करना जरूरी है, ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर वास्तविक सुधार दिखाई दे सके।

पृथ्वी विज्ञान विभाग, IISER कोलकाता के डॉ. अभिनंदन घोष का कहना है कि भारत जैसे उपमहाद्वीप की अपनी विशिष्ट भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियां हैं। यहां की स्थलाकृति, मिट्टी और जलवायु के कारण आधारभूत कणीय प्रदूषण स्तर पहले से अधिक हो सकते हैं। कोलकाता में सर्दियों के दौरान वायुमंडल की सीमा परत की ऊंचाई कम हो जाती है और प्रदूषकों का फैलाव कमजोर पड़ जाता है, जिससे प्रदूषण के गंभीर एपिसोड पैदा होते हैं। हालांकि मौसम को प्रदूषण के लिए बहाना नहीं बनाया जा सकता। उत्सर्जन मानवीय गतिविधियों से ही आते हैं और सर्दियों के अनुरूप ठोस नियंत्रण उपाय जरूरी हैं।

क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा किए गए अध्‍ययन की पूरी रिपोर्ट पीडीएफ में

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