केरल के मडबैंक प्रकृति की अनूठी धरोहर हैं, जिनका अपना ही एक पारस्थितिक तंत्र होता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
केरल को कुदरत की अनूठी सौगात ‘मडबैंक’ क्यों हैं खतरे में? क्या होगा इनके खत्म होने का असर?
भारत के पश्चिमी तट पर बसा केरल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, नारियल के पेड़ों, मसालों के बागान और पश्चिमी घाट (Western Ghats) के बैकवॉटर के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इस सबके बीच इस तटीय राज्य में यहां की एक और प्राकृतिक धरोहर ‘मडबैंक' जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें ‘चाकारा’ कहा जाता है। यह समुद्र के भीतर बनने वाली मुलायम, महीन कीचड़ की परतें होती हैं, जो कुछ खास इलाकों में बनती हैं। यह समुद्र की तेज लहरों को शांत कर देती हैं, जिससे यह शांत जल मछलियों के प्रजनन के लिए उपयुक्त हो जाता है। इसलिए मडबैंक को मछुआरों की आजीविका के लिए भी वरदान माना जाता रहा है। मडबैंकों को खासतौर पर केरल के कोचीन और एलेप्पी तटों की विशेषता माना जाता है, जो देश में कहीं और नहीं मिलते। ये अनोखी संरचनाएं केरल के कोचीन और एलेप्पी तटों की विशेषता हैं। यह मौसमी हवाओं और तटीय ज्वार जैसी कई प्रक्रियाएं इससे जुड़े होते हैं। आज यह मडबैंक जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, तटीय निर्माण और बदलती नदियों की धारा के कारण संकट में हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि इनकी संरचना और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ तो इसका असर केवल मछली उत्पादन पर नहीं, बल्कि तटीय भू-आकृति और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
मडबैंक से जुड़ी कुछ अनूठी और महत्वपूर्ण बातें
• स्थानीय मछुआरे मडबैंक के प्रकट होने का अनुमान समुद्र के रंग और लहरों की चाल देखकर लगा लेते हैं।
• मडबैंक बनने के दौरान समुद्र का पानी हल्का धुंधला और भूरा दिखाई देता है।
• यह घटना आमतौर पर मानसून के चरम पर कुछ हफ्तों के लिए ही सक्रिय रहती है।
• मडबैंक क्षेत्र में कभी-कभी मछली उत्पादन सामान्य दिनों से कई गुना बढ़ जाता है।
• वैज्ञानिक इन्हें तटीय प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण के मॉडल के रूप में भी देखते हैं।
• फोरामिनिफेरा के जीवाश्म पुराने समुद्री पर्यावरण का अध्ययन करने में सहायक होते हैं।
• मडबैंक स्थानीय लोककथाओं और पारंपरिक ज्ञान का भी हिस्सा रहे हैं।
• बदलती जलवायु के कारण पिछले दशकों में इनके पैटर्न में परिवर्तन दर्ज किया गया है।
मडबैंक क्या होते हैं?
मडबैंक समुद्र के भीतर बनने वाली महीन, चिकनी मिट्टी या सिल्ट की अस्थायी या अर्ध-स्थायी परतें होती हैं, जो विशेष मौसम में समुद्र तट के आसपास के इलाकों में जमा हो जाती हैं। यह सामान्य रेत के टीले नहीं होते, बल्कि बहुत ही महीन कणों वाली गाद से बने क्षेत्र होते हैं। अतिसूक्ष्म कणों से बने होने के कारण इनकी संरचना इन्हें समुद्र तट यानी Sea Beach से अलग करती है और इनके तल को काफ़ी मुलायम, लचीला और थोड़ा सा दलदलनुमा बना देती है। मडबैंक की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि इनके ऊपर पहुंचने पर समुद्र की लहरें अचानक शांत हो जाती हैं। इसका कारण यह है कि कीचड़ के महीन कण पानी के साथ मिलकर एक घना सस्पेंशन बनाते हैं, जो लहरों की ऊर्जा को सोख लेता है। इसलिए आसपास का समुद्र उफान पर हो सकता है, लेकिन मडबैंक के ऊपर पानी अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई देता है। केरल में ऐसा अकसर मानसून के दक्षिण-पश्चिम तटीय इलाकों पर पहुंचने के समय देखा जाता है। इस समय समुद्र में हलचल बढ़ जाती है, पर मडबैंक एक प्राकृतिक ‘वेव ब्रेकर’ की तरह काम करते हुए लहरों को शांत कर देते हैं। मडबैंकों इस खूबी के कारण तटीय इलाके समुद्री तूफान की मार से बचे रहते हैं। यही वजह है कि स्थानीय समुदाय इन्हें ‘समुद्र की कृपा’ मानते हैं।
तटीय इलाकों में पाए जाने वाले मडबैंकों को स्थानीय मलयालम भाषा में ‘चाकारा’ कहा जाता है। यह समुद्र तटीय इलाकों को समुद्री तूफान के असर से बचाने और ज़मीन के कटाव को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं।
स्रोत : रिसर्च गेट
मडबैंक क्यों बनते हैं?
मडबैंक जैसी अनूठी और उपयोगी प्राकृतिक संरचना के बनने के पीछे कई कुदरती कारण काम करते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है नदियों द्वारा समुद्र में लाई जाने वाली महीन गाद। पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियां मानसून के दौरान भारी मात्रा में सिल्ट और मिट्टी समुद्र तक पहुंचाती हैं। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित नदियां शामिल हैं-
पेरियार
भरतपुझा (नीला नदी के नाम से भी जानी जाती है)
पंबा
चालियार
अचन्कोविल
कल्लाड़ा
वालपटनम
ये नदियां छोटी लेकिन तीव्र प्रवाह वाली हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इनका जलस्तर अचानक बढ़ जाता है और पश्चिमी घाट की ढलानों से कटकर आई मिट्टी, सिल्ट और जैविक पदार्थ समुद्र में पहुंचता है। यही महीन अवसाद तटीय क्षेत्रों में जमा होकर विशेष परिस्थितियों में मडबैंक बनने की प्रक्रिया को जन्म देता है। जब इन नदियों द्वारा बहा कर लाई गई गाद तटीय क्षेत्रों में जमा होती है, तो विशेष परिस्थितियों में मडबैंक का रूप ले लेती है।
दूसरा कारण समुद्री धाराओं और लहरों की दिशा है। यदि समुद्री प्रवाह की गति कम हो जाए या किसी खास दिशा में स्थिरता आ जाए, तो गाद एक स्थान पर इकट्ठा होकर मोटी परत बना लेती है। मानसूनी हवाएं और ज्वार-भाटा भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।
इसके अलावा, तटीय भू-आकृति जैसे कि खाड़ी, मुहाना या बैकवॉटर से जुड़े क्षेत्र महीन गाद को रोकने और जमाने में मदद करते हैं। इस प्रकार मडबैंक किसी एक कारण से नहीं, बल्कि नदी, समुद्र और मौसम की संयुक्त क्रिया का परिणाम होते हैं।
कैसे बनते हैं: निर्माण की प्रक्रिया
मडबैंक बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए नदी और समुद्र के परस्पर संबंध को देखना जरूरी है। मानसून के दौरान नदियों में जलप्रवाह बढ़ता है और वे भारी मात्रा में महीन अवसाद समुद्र तक पहुंचाती हैं। यह अवसाद तट के पास आकर समुद्री लहरों के साथ मिल जाता है।
कुछ विशेष स्थितियों में, जब लहरों की ऊर्जा सीमित हो और समुद्र तल अपेक्षाकृत समतल हो, तो यह गाद नीचे बैठकर मोटी परत बना लेती है। इसके ऊपर पानी में तैरते महीन कणों का घोल बन जाता है, जिसे ‘फ्लूइड मड’ कहा जाता है। यही फ्लूइड मड लहरों की ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है।
धीरे-धीरे यह परत कई मीटर तक फैल सकती है और कुछ हफ्तों या महीनों तक बनी रह सकती है। हालांकि, समुद्री परिस्थितियों के बदलते ही यह परत टूट भी सकती है। इसीलिए मडबैंक स्थायी संरचना नहीं, बल्कि गतिशील भू-आकृतिक घटना हैं।
केवल केरल में ही क्यों पाए जाते हैं?
भारत के लंबे समुद्री तट के बावजूद मडबैंक मुख्य रूप से केरल में ही पाए जाते हैं। इसका कारण यहां की विशिष्ट भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां हैं। पश्चिमी घाट की नदियां छोटी लेकिन तेज प्रवाह वाली हैं, जो भारी वर्षा के दौरान बड़ी मात्रा में महीन गाद समुद्र तक पहुंचाती हैं।
केरल का तट अपेक्षाकृत संकरा है और यहां बैकवॉटर प्रणाली समुद्र से गहराई से जुड़ी हुई है। यह जटिल जल-जाल गाद को रोकने और जमाने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की तीव्रता भी यहां अधिक होती है, जो मडबैंक निर्माण की प्रक्रिया को सक्रिय करती है।
अन्य तटीय राज्यों में या तो नदियों की प्रकृति अलग है, या समुद्री धाराएं इतनी तेज हैं कि गाद स्थिर नहीं हो पाती। इस अनोखे संयोजन ने केरल को मडबैंक जैसी दुर्लभ प्राकृतिक घटना का घर बना दिया है।
मडबैंक में प्रचुर मात्रा में सूक्ष्म जीवों और कीड़े-मकौड़ों के पाए जाने के कारण यहां मछलियों के साथ ही पक्षी भी भोजन के लिए मंडराते रहते हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
पर्यावरणीय, भौगोलिक और भूगर्भीय महत्व
मडबैंक तटीय पारिस्थितिकी में बहुस्तरीय भूमिका निभाते हैं। सबसे पहले, वे लहरों की ऊर्जा को कम कर तट को कटाव से बचाते हैं। मानसून के दौरान जब समुद्र उग्र होता है, तब मडबैंक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।
भौगोलिक दृष्टि से वे तटीय भू-आकृति को स्थिर रखने में मदद करते हैं। गाद का जमाव समुद्र तल की बनावट को प्रभावित करता है और नए सूक्ष्म आवास बनाता है। भूगर्भीय दृष्टि से ये अवसाद भविष्य में तलछटी चट्टानों के निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं।
इनकी उपयोगिता केवल तटीय इलाकों की कटाव से भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। मडबैंक के ऊपर शांत जल मछलियों के झुंड को आकर्षित करता है, जिससे स्थानीय मछुआरों को अधिक पकड़ मिलती है। इस प्रकार यह प्राकृतिक घटना सामाजिक-आर्थिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
मडबैंक्स का अनूठा इकोसिस्टम
मडबैंक केवल कीचड़ का ढेर नहीं, बल्कि अपने आप में एक अनूठा और जीवंत सूक्ष्म संसार होते हैं। इसमें फोरामिनिफेरा, डायटम, बैक्टीरिया, छोटे क्रस्टेशियन, केंचुएनुमा जीव और शैवाल भी इस क्षेत्र में पनपते हैं। यह जीव अपना ही एक इको सिस्टम बनाते हैं और कुछ इस तरह से काम करते हैं-
फोरामिनिफेरा (Foraminifera) - यह खोल वाले एक कोशिकीय जीव होते हैं, जो समुद्री पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये सूक्ष्म जीव कैल्शियम कार्बोनेट के छोटे-छोटे खोल बनाते हैं और तलछट में कार्बन चक्र को प्रभावित करते हैं।
डायटम (Diatoms) – ये एककोशिकीय शैवाल होते हैं जिनकी कोशिका दीवार सिलिका से बनी कांच जैसी संरचना की होती है। ये प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से ऊर्जा बनाते हैं और समुद्री खाद्य श्रृंखला की नींव माने जाते हैं, साथ ही वैश्विक ऑक्सीजन उत्पादन में भी योगदान देते हैं।
छोटे क्रस्टेशियन (Small Crustaceans) – इनमें कोपेपॉड, छोटे झींगा जैसे जीव और एम्फीपॉड शामिल होते हैं। ये तलछट और पानी के बीच पोषक तत्वों का चक्र बनाए रखते हैं तथा मछलियों और अन्य बड़े जीवों के लिए प्रमुख भोजन स्रोत होते हैं।
केंचुएनुमा जीव (Polychaete worms) – ये मुलायम शरीर वाले समुद्री कीट होते हैं जो कीचड़ में सुरंग बनाकर रहते हैं। ये तलछट को उलट-पलट कर ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करते हैं, जिससे समुद्र तल की जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं सक्रिय और संतुलित बनी रहती हैं।
मडबैंक के इकोसिस्टम में यह सूक्ष्म और लघु जीव काफी अहम भूमिका निभाते हैं। यह जैवविविधता मछलियों और झींगों के लिए भोजन का आधार बनती है। कई प्रजातियां यहां अंडे देती हैं या किशोर अवस्था में पनपती हैं। मडबैंक का यह सूक्ष्म इकोसिस्टम समुद्र और तट के बीच पोषक तत्वों के आदान-प्रदान को संतुलित करता है। यदि इस संतुलन में गड़बड़ी होती है, तो इसका असर पूरी खाद्य श्रृंखला पर पड़ सकता है।
मडबैंक और उनके इकोसिस्टम को खतरे
आज मडबैंक कई खतरों से जूझ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी पैटर्न में बदलाव आ रहा है, जिससे नदियों द्वारा लाई जाने वाली गाद की मात्रा और समय प्रभावित हो रहा है। समुद्र के बढ़ते तापमान और अम्लीकरण का असर सूक्ष्म जीवों पर पड़ सकता है।
तटीय निर्माण, बंदरगाह परियोजनाएं और ड्रेजिंग जैसी गतिविधियां समुद्र तल की संरचना बदल देती हैं, जिससे मडबैंक बनने की प्रक्रिया बाधित होती है। औद्योगिक और प्लास्टिक प्रदूषण भी इनकी गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
यदि नदियों पर अत्यधिक बांध बनाए जाते हैं, तो समुद्र तक पहुंचने वाली गाद कम हो सकती है। इससे मडबैंक की आवृत्ति और आकार दोनों घट सकते हैं। यह केवल एक भूगर्भीय घटना का लोप नहीं होगा, बल्कि तटीय समुदायों की आजीविका पर सीधा प्रहार होगा।
मडबैंक में मौजूद सूक्ष्म जीव यानी माइक्रोब्स इन इलाकों में भूगर्भ में तेल की मौजूदगी का भी संकेत देते हैं।
NIO की रिसर्च में चिंताजनक नतीजे
गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography) के शोधकर्ताओं ने अपने एक हालिया रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत केरल के एलेप्पी के कीचड़ वाले तटबंधों में फोरैम या फोरामिनिफेरा के नाम से जाने जाने वाले खोल वाले एक कोशिकीय जीवों के मौसमी वितरण का अध्ययन किया है। यह अध्ययन कीचड़ तटबंध निर्माण से जुड़े पर्यावरण में भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों के प्रति फोरैम की प्रतिक्रिया को समझने के लिए किया गया था। यह अध्ययन समुद्र तल पर रहने वाले फोराम्स व अन्य सूक्ष्म जीवों पर मडबैंक निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं के प्रभाव का दस्तावेजीकरण करने का पहला प्रयास है। क्योंकि यह जीव तेल अन्वेषण में भी सहायक होते हैं और यह तेल कुओं की उपस्थिति का संकेत देता है। रिसर्च में शोधकर्ताओं की टीम ने समुद्र में कार्बन के अवशोषण पर मडबैंक निर्माण के प्रभाव को समझने के लिए कुल कार्बन, कैल्शियम कार्बोनेट, कार्बनिक कार्बन और कार्बनिक नाइट्रोजन में मौसमी परिवर्तनों का अध्ययन किया। यह चीजें समुद्र में कार्बन का अवशोषण वैश्विक तापमान वृद्धि में कमी लाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
अध्ययन में मानसून से पहले और मानसून दोनों मौसमों में मडबैंक में फोरम्स की कम संख्या और कम विविधता पाई गई, जो तनावपूर्ण वातावरण का संकेत देती है। शोधकर्ताओं का कहना है, “कार्बनिक कार्बन का उच्च प्रतिशत और स्थिर कार्बनिक नाइट्रोजन यह दर्शाते हैं कि भोजन की उपलब्धता और उसका स्रोत समुद्र तल में मडबैंक में रहने वाले फोरम्स को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक नहीं है। इसके बजाय, पानी में मैलापन बढ़ना और खारेपन में कमी मडबैंक में मौसमी तनावपूर्ण वातावरण का मुख्य कारण है। अध्ययन के अनुसार, कीचड़युक्त तटबंध में तल पर रहने वाले फोरामों की आबादी में एग्ग्लूटिनेटेड फोराम (ये बाहरी कणों से अपना खोल बनाते हैं) की संख्या अधिक है और कैल्केरियस फोराम (ये अपना खोल स्वयं बनाते हैं) की संख्या में कमी आई है। एग्ग्लूटिनेटेड फोरामों की अधिकता से पता चलता है कि इस क्षेत्र में कार्बोनेट की मात्रा कम है और यह ताजे पानी के प्रभाव में भी है।
अध्ययन के अनुसार, सभी मौसमों में मडबैंक क्षेत्रों में फोरम की कम संख्या का एक कारण कार्बनिक कार्बन का क्षरण और ताजे पानी के प्रवाह के कारण तल जल के पीएच में गिरावट है। हालांकि, समुद्र तल में कैल्शियमयुक्त फोरम की कम संख्या, उच्च कार्बनिक कार्बन प्रतिशत के कारण मडबैंक में कार्बन अवशोषण को प्रभावित नहीं करती है। इस प्रकार, इस अध्ययन में एलेप्पी के कीचड़युक्त टीलों में मौजूद जैव विविधता और भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के बीच महत्वपूर्ण संबंधों पर प्रकाश डाला गया है।
प्राकृतिक संतुलन के लिए ज़रूरी है मडबैंक को बचाना
इस तरह हम देखते हैं कि मडबैंक प्रकृति की एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली रचना हैं। वे यह दिखाते हैं कि नदी, समुद्र और मौसम के बीच संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। यदि इस संतुलन को हमने अनदेखा किया, तो केरल की यह अनूठी धरोहर केवल किताबों और शोधपत्रों तक सीमित रह जाएगी।
मडबैंक केवल भू-आकृतिक घटना नहीं, बल्कि तटीय समुदायों की आजीविका, जैवविविधता और प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा का भी हिस्सा हैं। बदलती जलवायु, अनियंत्रित तटीय निर्माण और नदियों में घटती गाद की आपूर्ति इनकी निरंतरता को प्रभावित कर सकती है। यदि समय रहते इनके वैज्ञानिक अध्ययन, नियमित मॉनिटरिंग और संरक्षण की ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में इनकी आवृत्ति और प्रभाव दोनों कम हो सकते हैं।
अब आवश्यकता है कि तटीय विकास योजनाओं, नदी प्रबंधन रणनीतियों और जलवायु नीतियों में मडबैंक जैसे प्राकृतिक तंत्रों को गंभीरता से शामिल किया जाए। स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को साथ लेकर ही इनका संरक्षण संभव है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी समुद्र की इस शांत, जीवनदायी परत का अनुभव कर सकें।
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