

बीते दशकों में ओजोन परत में हुए छेद अब सिकुड़ते दिखाई दे रहे हैं।
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धरती को सूरज की तीखी पराबैंगनी यानी UV किरणों के कहर से बचाने वाली वायुमंडल की ओजोन परत यानी Ozone Layer के महत्व को समझाने के लिए 16 सितंबर को दुनिया भर में विश्व ओजोन परत संरक्षण दिवस (International Day for the Preservation of the Ozone Layer) मनाया जाता है। वायुमंडल के समतापमंडल में मौजूद यह ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक UV-B और UV-C विकिरण को सोखकर पृथ्वी पर जीवन के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती है। पिछली सदी में इंसानी गतिविधियों से निकलने वाले कुछ रसायनों ने इस सुरक्षा-कवच को गंभीर नुकसान पहुंचाया और अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन होल का संकट सामने आया। हालांकि, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत दुनिया के साझा प्रयासों ने इस क्षति को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई है और अब ओजोन परत के धीरे-धीरे सुधरने के संकेत मिल रहे हैं। ओज़ोन परत की सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने के लिए ही हर साल यह दिवस मनाया जाता है।
सूरज की धूप को धरती पर जीवन का आधार माना जाता है। इस धूप में मौजूद पराबैंगनी यानी UV किरणें हमारे जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि यह किरणें हमारे शरीर में विटामिन D के निर्माण में मदद करती हैं, जो हड्डियों, मांसपेशियों और प्रतिरक्षा तंत्र के लिए जरूरी है। लेकिन, यही किरणें जरूरत से ज्यादा मात्रा में धरती की सतह तक पहुंचने पर मुनुष्यों सहित पूरे जीव जगत, पौधों और जलीय पारिस्थितिक तंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। क्योंकि अधिक UV-B विकिरण कोशिकाओं और DNA को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे मनुष्यों में त्वचा कैंसर व आंखों की समस्याओं तथा पौधों और जलीय जीवों के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद ओज़ोन की एक पतली-सी परत (Ozone Layer) इन पराबैंगनी किरणों की मात्रा को नियंत्रित कर हमें इस खतरे से बचाती है। इस तरी ओज़ोन लेयर धरती के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा-कवच की तरह काम करती है। समतापमंडल यानी स्ट्रेटोस्फियर में मौजूद ओज़ोन सूर्य की हानिकारक UV-B और लगभग पूरी UV-C विकिरण को सोख लेता है। लेकिन पिछली सदी में इंसानों ने रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एयरोसोल स्प्रे, फोम और दूसरी औद्योगिक गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों के जरिए इस सुरक्षा-कवच को ही नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। 1980 के दशक में अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन की भारी कमी और “ओज़ोन होल” की खोज ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद ऐसा अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ जिसे आज पर्यावरणीय कूटनीति की सबसे बड़ी सफलताओं में गिना जाता है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओज़ोन को नष्ट करने वाले रसायनों को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की वैश्विक प्रक्रिया शुरू की और अब वैज्ञानिकों को ओज़ोन परत में सुधार के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
16 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र का International Day for the Preservation of the Ozone Layer यानी विश्व ओज़ोन परत संरक्षण दिवस मनाया जाता है। इसकी तारीख का संबंध उस ऐतिहासिक समझौते से है जिसने ओज़ोन परत को बचाने के लिए दुनिया को एकजुट किया। 16 सितंबर 1987 को कनाडा के मॉन्ट्रियल में “Montreal Protocol on Substances that Deplete the Ozone Layer” पर हस्ताक्षर हुए थे।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में प्रस्ताव A/RES/49/114 के जरिए 16 सितंबर को ओज़ोन परत संरक्षण दिवस घोषित किया और 1995 से इसे मनाने की शुरुआत हुई। यानी यह दिवस केवल किसी पर्यावरणीय समस्या की याद दिलाने वाला दिन नहीं है, बल्कि विज्ञान के आधार पर किए गए वैश्विक सहयोग की सफलता को भी सामने लाता है।
2026 में इस दिवस की थीम “Global action for a cooler planet” है। इस साल खास जोर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और उसके Kigali Amendment के जलवायु लाभों पर है। किगाली संशोधन के तहत HFCs यानी हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से कम करने का लक्ष्य रखा गया है। HFCs ओज़ोन को सीधे नष्ट नहीं करते, लेकिन कई HFC शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।
ओज़ोन कोई आधुनिक दौर में पैदा हुआ पदार्थ नहीं है। इसका अस्तित्व वैज्ञानिकों ने 19वीं सदी में पहचाना। जर्मन-स्विस रसायनशास्त्री क्रिश्चियन फ्रेडरिक शॉनबाइन (Christian Friedrich Schönbein) ने 1839 में एक अलग तरह की ऑक्सीजन जैसी गैस की पहचान की, जिसे बाद में ओज़ोन नाम दिया गया। लेकिन वायुमंडल में एक ऊंचाई पर ओज़ोन की परत मौजूद होने का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण बाद में मिला।
1913 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक चार्ल्स फैब्री और हेनरी बुइसॉन ने सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण के अवशोषण का अध्ययन करते हुए वायुमंडल में ओज़ोन की ऊंची परत के अस्तित्व का प्रमाण दिया। बाद में ब्रिटिश वैज्ञानिक सिडनी चैपमैन ने 1930 में उस रासायनिक प्रक्रिया को समझाया जिसके जरिए ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन बनता और टूटता रहता है।
यह समझना जरूरी है कि ओज़ोन परत की खोज और ओज़ोन होल की खोज दो अलग घटनाएं हैं। ओज़ोन परत के अस्तित्व का प्रमाण 1913 में मिल गया था, जबकि अंटार्कटिका के ऊपर बड़े पैमाने पर ओज़ोन क्षरण यानी ओज़ोन होल का पता 1985 में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे (BAS) के वैज्ञानिक जो फार्मन, ब्रायन गार्डिनर और जोनाथन शैंकलिन ने लगाया। उनका शोध Nature में प्रकाशित हुआ।
ओज़ोन की सबसे खास बात यह है कि वायुमंडल में इसकी मात्रा बेहद कम है, लेकिन इसका पर्यावरणीय महत्व बहुत बड़ा है। NASA के मुताबिक वायुमंडल में मौजूद कुल ओज़ोन का द्रव्यमान करीब 3 अरब मीट्रिक टन है, लेकिन यह पूरे वायुमंडल के द्रव्यमान का सिर्फ लगभग 0.00006 प्रतिशत है। स्ट्रेटोस्फियर में इसकी अधिकतम सांद्रता करीब 32 किलोमीटर की ऊंचाई पर होती है और वहां भी यह औसतन केवल कुछ parts per million के स्तर पर होती है।
अगर वायुमंडल के एक पूरे ऊर्ध्वाधर स्तंभ में मौजूद सारी ओज़ोन को धरती की सतह पर सामान्य तापमान और दबाव में एक जगह जमा कर दिया जाए तो इसकी मोटाई औसतन केवल करीब 3 मिलीमीटर होगी। फिर भी यही बेहद पतली परत सूर्य की खतरनाक UV-B विकिरण का बड़ा हिस्सा रोकती है। ओज़ोन की मात्रा को वैज्ञानिक Dobson Unit यानी DU में मापते हैं। सामान्य वैश्विक औसत कुल ओज़ोन करीब 300 DU के आसपास माना जाता है।
स्ट्रेटोस्फियर में मौजूद ओज़ोन पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सनस्क्रीन की तरह काम करती है। सूर्य से आने वाली UV-C विकिरण लगभग पूरी तरह वायुमंडल में अवशोषित हो जाती है और ओज़ोन UV-B का भी बड़ा हिस्सा रोकता है। अगर यह सुरक्षा-कवच कमजोर हो जाए तो ज्यादा UV विकिरण पृथ्वी की सतह तक पहुंचेगा।
इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। अत्यधिक UV-B संपर्क से सनबर्न, त्वचा कैंसर और आंखों में मोतियाबिंद का जोखिम बढ़ता है और प्रतिरक्षा तंत्र भी प्रभावित हो सकता है। लेकिन कहानी केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। UV-B पौधों की वृद्धि और विकास को प्रभावित कर सकता है और समुद्र में फाइटोप्लैंकटन समेत छोटे जीवों पर असर डाल सकता है, जो जलीय खाद्य-श्रृंखला की बुनियाद हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क भी समझना जरूरी है—स्ट्रेटोस्फियर की ओज़ोन “अच्छी ओज़ोन” है, जबकि धरती की सतह के पास यानी ट्रोपोस्फियर में मौजूद अधिक मात्रा की ओज़ोन वायु प्रदूषक है। इसलिए हर जगह ओज़ोन का बढ़ना अच्छी खबर नहीं है।
जीवों, पौधों और जलीय पारिस्थितिक तंत्र को तीखी पराबैंगनी किरणों के UV-B और UV-C विकिरण की मार से बचाती है ओज़ोन परत।
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20वीं सदी में रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग, एयरोसोल स्प्रे, फोम बनाने और औद्योगिक प्रक्रियाओं में CFCs यानी chlorofluorocarbons का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हुआ। ये रसायन निचले वायुमंडल में बेहद स्थिर रहते हैं और लंबे समय तक बने रह सकते हैं। धीरे-धीरे वे स्ट्रेटोस्फियर तक पहुंचते हैं, जहां तेज UV विकिरण उनके अणुओं को तोड़ता है और क्लोरीन जैसे अत्यधिक प्रतिक्रियाशील परमाणु मुक्त होते हैं।
यही क्लोरीन ओज़ोन अणुओं को तोड़ने वाली रासायनिक श्रृंखलाओं में शामिल होता है। इसमें खास बात यह है कि क्लोरीन खुद खत्म नहीं होता, बल्कि बार-बार प्रतिक्रिया कर सकता है। इसके अलावा हैलोन और दूसरे ब्रोमीनयुक्त रसायन भी ओज़ोन क्षरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंटार्कटिका में समस्या और गंभीर इसलिए हुई क्योंकि वहां की बेहद ठंडी सर्दियों में Polar Stratospheric Clouds यानी ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल बनते हैं। इन बादलों की सतह पर ऐसी रासायनिक प्रतिक्रियाएं होती हैं जो निष्क्रिय क्लोरीन को अत्यधिक प्रतिक्रियाशील रूप में बदल देती हैं। जब अंटार्कटिका की सर्दियों के बाद सूर्य का प्रकाश लौटता है तो UV विकिरण इन प्रतिक्रियाओं को तेजी से सक्रिय करता है और थोड़े समय में बड़ी मात्रा में ओज़ोन नष्ट हो सकता है।
अगर ओज़ोन क्षरण अनियंत्रित रहता तो समस्या केवल त्वचा कैंसर या आंखों की बीमारी तक सीमित नहीं रहती। ज्यादा UV-B विकिरण पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया और विकास को प्रभावित कर सकता है। इससे कृषि उत्पादकता और प्राकृतिक वनस्पतियों पर असर पड़ सकता है।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी संवेदनशील है। फाइटोप्लैंकटन समुद्री खाद्य-श्रृंखला का आधार हैं और UV-B में बढ़ोतरी उनके जीवित रहने और उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है। मछलियों, झींगा, केकड़ा और उभयचरों के शुरुआती विकास चरण भी UV-B के प्रति संवेदनशील पाए गए हैं। इसके अलावा कुछ प्लास्टिक और दूसरे पॉलिमर पदार्थ भी बढ़े हुए UV-B से तेजी से खराब हो सकते हैं।
इसका एक और कम चर्चित पहलू जलवायु परिवर्तन है। CFCs खुद भी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें थीं। इसलिए उनका उत्पादन रोकने से एक साथ ओज़ोन परत और जलवायु दोनों को फायदा हुआ।
ओज़ोन क्षरण की वैज्ञानिक चिंता 1970 के दशक में तेजी से बढ़ी। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि CFCs जैसे रसायन स्ट्रेटोस्फियर में पहुंचकर ओज़ोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन की भारी कमी की खोज ने इस चिंता को वैश्विक संकट में बदल दिया। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के लंबे रिकॉर्ड से पता चला कि अंटार्कटिका में ओज़ोन की मात्रा 1970 के दशक से लगातार गिर रही थी। 1985 में प्रकाशित शोध ने दुनिया को पहली बार यह स्पष्ट तस्वीर दी कि मानव गतिविधियों से पृथ्वी के वायुमंडलीय सुरक्षा तंत्र को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंच रहा है।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने उपग्रहों, जमीन पर लगे उपकरणों, गुब्बारों और उच्च ऊंचाई वाले विमानों के जरिए निगरानी बढ़ाई। अलग-अलग अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की कि अंटार्कटिका में ओज़ोन क्षरण और मानव निर्मित क्लोरीन-ब्रोमीनयुक्त रसायनों के बीच मजबूत संबंध है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम अब वायुमंडल में दिखाई देने लगा है। नियंत्रित ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों की मात्रा लगातार घट रही है और वैज्ञानिकों ने स्ट्रेटोस्फियर के ऊपरी हिस्से में ओज़ोन की रिकवरी के प्रमाण देखे हैं।
2022 के WMO-UNEP Scientific Assessment of Ozone Depletion के मुताबिक मौजूदा नीतियों और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के निरंतर पालन की स्थिति में कुल ओज़ोन 1980 के स्तर पर लगभग 2040 में वैश्विक मध्य-अक्षांश क्षेत्रों, 2045 में आर्कटिक और 2066 में अंटार्कटिका के ऊपर लौटने का अनुमान है।
यहां एक सावधानी जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि ओज़ोन होल हर साल लगातार छोटा ही होता जाएगा। अंटार्कटिका में इसका आकार मौसम, स्ट्रेटोस्फियर के तापमान, हवाओं और polar vortex जैसी परिस्थितियों से काफी बदलता है। इसलिए किसी एक साल बड़ा या छोटा ओज़ोन होल दिखना अपने आप में दीर्घकालिक रिकवरी या गिरावट का निर्णायक प्रमाण नहीं है। 2025 में सितंबर के अंत तक अंटार्कटिक ओज़ोन होल का आकार करीब 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर तक पहुंचा था, जो 2015–2024 के औसत से कम था, हालांकि सामान्य प्राकृतिक उतार-चढ़ाव की सीमा में था।
ओज़ोन संकट की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वैज्ञानिक चेतावनी के बाद सरकारों ने अपेक्षाकृत तेजी से कार्रवाई की। 1985 में Vienna Convention for the Protection of the Ozone Layer अपनाया गया और इसके दो साल बाद 16 सितंबर 1987 को Montreal Protocol हुआ।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओज़ोन को नष्ट करने वाले पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के लिए बाध्यकारी वैश्विक व्यवस्था बनाई। समय के साथ इसमें कई संशोधन और बदलाव किए गए और नियंत्रित रसायनों की सूची तथा चरणबद्ध समाप्ति की समयसीमा लगातार कड़ी की गई।
UNEP के मुताबिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत नियंत्रित करीब 100 ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों में से 99 प्रतिशत तक का चरणबद्ध उन्मूलन हो चुका है। यही वजह है कि आज इसे इतिहास की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय संधियों में गिना जाता है। वियना कन्वेंशन और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल दोनों को सार्वभौमिक समर्थन प्राप्त है।
CFCs को हटाने के बाद उद्योगों में कई जगह HFCs का इस्तेमाल विकल्प के रूप में बढ़ा। HFCs ओज़ोन को सीधे नष्ट नहीं करते, लेकिन इनमें कई बहुत शक्तिशाली greenhouse gases हैं। इसलिए 2016 में रवांडा के किगाली में Kigali Amendment अपनाया गया।
इसके तहत HFC उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से कम करने का लक्ष्य रखा गया। इससे ओज़ोन संरक्षण की वैश्विक व्यवस्था का फोकस एक नए चरण में पहुंचा—ओज़ोन संरक्षण के साथ कम-कार्बन और ऊर्जा-कुशल cooling sector विकसित करना।
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2026 के ओज़ोन दिवस की थीम में भी किगाली संशोधन के इसी जलवायु पक्ष को प्रमुखता दी गई है।
भारत ने 18 मार्च 1991 को Vienna Convention और 19 जून 1992 को Montreal Protocol को अपनाया। भारत में इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के तहत Ozone Cell को दी गई है।
भारत ने 1993 में ODS को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के लिए अपना Country Programme तैयार किया। मंत्रालय के अनुसार भारत ने CFCs के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया और 2010 से CTC यानी carbon tetrachloride तथा halons के उत्पादन और खपत को भी समाप्त किया। CFCs का metered dose inhalers में इस्तेमाल दिसंबर 2012 से समाप्त किया गया। अब भारत HCFCs और HFCs से जुड़े चरणबद्ध कार्यक्रमों पर काम कर रहा है।
भारत ने 27 सितंबर 2021 को Kigali Amendment का अनुमोदन भी किया। UNEP के मुताबिक भारत में ODS और HFC के लिए licensing systems भी स्थापित हैं।
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