

पितृपक्ष में पूर्वजों के तर्पण और पिंडदान के लिए पटना की पुनपुन और गया की फल्गु नदी के किनारे हर साल उमड़ती है लाखों श्रद्धालुओं की भीड़।
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पितृपक्ष शुरू होते ही अपने पूर्वजों के पिंड दान के लिए बिहार के बोधगया में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई है। पितरों की मुक्ति या मोक्ष के लिए तर्पण के लिए हर साल दुनिया भर से लाखों की संख्या में लोग यहां फल्गु के किनारे श्राद्ध व पिंडदान करने पहुंचते हैं। पर क्या आपको मालूम है गया में श्राद्ध या पिंडदान को तबतक अधूरा माना जाता है, अगर वहां जाने से पूर्व पटना के पास पुनपुन नदी में स्नान करके पूजा-अर्चना नहीं की जाती। पिंडदान के लिए अगर गया के फल्गु घाट को अगर 'पितृ तीर्थ' माना गया है, तो गया जाने से पहले पुनपुन घाट पर पिंडदान को 'मोक्ष का प्रथम द्वार' माना गया है। सदियों पुरानी इस मान्यता को देखते हुए हर साल की तरह इस साल भी पुनपुन में पितृपक्ष मेला शुरू हो गया है।
प्रशासनिक स्तर पर पितृपक्ष मेले के लिए कई तरह की तैयारियां भी की गई हैं। पिंडदान व तर्पण से जुड़े पूजा-पाठ के लिए यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए स्नान घाटों पर बैरिकेडिंग से लेकर 24 घंटे पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही घाट पर मेडिकल टीम की तैनाती भी की गई है। किसी भी अप्रिय घटना, दुर्घटना या अपराध को रोकने के लिए पूरे मेला क्षेत्र की सीसीटीवी से निगरानी की जा रही है। साथ ही श्रद्धालुओं के ठहरने, वाहनों की पार्किंग और मेला क्षेत्र तक पहुंचने के लिए ई-रिक्शा की भी व्यवस्था की गई है।
बिहार पर्यटन के अनुसार गया में पिंडदान के लिए 48 प्रमुख वेदियां हैं और इनमें फल्गु नदी प्रमुख अनुष्ठान स्थलों में शामिल है। इस साल यहां पितृपक्ष मेले का आयोजन 25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक किया जा रहा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि फल्गु नदी के किनारे अपने पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध करने के लिए पहुंच रहे कई श्रद्धालुओं को नदी की मौजूदा हालत पर चिंता है। पुनपुन का बड़ा हिस्सा बरसाती प्रवाह पर निर्भर है और फल्गु तो गया में साल के बड़े हिस्से में ऊपर से सूखी दिखाई देती है। शहरों का फैलाव, गंदे पानी का प्रवेश, अतिक्रमण, बालू और नदी तल में बदलाव तथा जलग्रहण क्षेत्र में पानी रोकने की घटती क्षमता इन नदियों के संकट को बढ़ाते हैं। ऐसे में पितृपक्ष केवल धार्मिक आयोजन नहीं, इन दोनों नदियों की सेहत पर सवाल उठाने का अवसर भी है।
पटना से दक्षिण बहने वाली पुनपुन नदी को धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष का पहला पड़ाव माना जाता है। मान्यता है कि गया जाकर पिंडदान करने वाले श्रद्धालु पहले पुनपुन में स्नान, तर्पण और पिंडदान करते हैं। इसके बाद वे गया की ओर जाते हैं। इसी कारण पुनपुन को ‘मोक्ष का प्रथम द्वार’ कहा जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा इसे भगवान राम से भी जोड़ती है। मान्यता है कि राम ने अपने पितरों के लिए गया जाने से पहले पुनपुन के तट पर पहला पिंडदान किया था। यह धार्मिक आख्यान है, जिसका ऐतिहासिक प्रमाण अलग विषय है, लेकिन इस मान्यता ने पुनपुन को गया की पिंडदान यात्रा में विशिष्ट स्थान दिया है।
बिहार सरकार की पितृपक्ष संबंधी वेबसाइट पर भी पुनपुन को पिंडदान की वेदियों में शामिल किया गया है। साथ ही 2026 के सरकारी पर्यटन पैकेज में पटना-पुनपुन-गया की यात्रा को अलग पैकेज के रूप में शामिल किया गया है। यानी धार्मिक महत्व केवल स्थानीय परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी राज्य की तीर्थ व्यवस्था का हिस्सा है।
भूगोल की दृष्टि से पुनपुन गंगा की एक सहायक नदी है। इसका उद्गम झारखंड के पलामू क्षेत्र में छोटानागपुर पठार से माना जाता है। बिहार में यह औरंगाबाद, जहानाबाद और पटना जिलों से होकर गुजरती है और फतुहा के पास गंगा में मिल जाती है। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार नदी की लंबाई करीब 200 किलोमीटर और इसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 8,530 वर्ग किलोमीटर है। हालांक, बिहार जल संसाधन विभाग के आंकड़ों में बिहार के भीतर इसकी लंबाई 235 किलोमीटर और जलग्रहण क्षेत्र 9,026 वर्ग किलोमीटर दर्ज है। इन आंकड़ों में अंतर अलग-अलग प्रशासनिक और भौगोलिक गणना पद्धतियों के कारण हो सकता है, लेकिन दोनों स्रोत एक बात स्पष्ट करते हैं कि पुनपुन कोई छोटी स्थानीय धारा नहीं, बल्कि दक्षिण बिहार की महत्वपूर्ण नदी प्रणाली है। इसका अधिकांश प्रवाह वर्षा पर निर्भर है। गर्मी और सूखे के समय नदी में पानी काफी कम हो जाता है, जबकि मानसून में यही नदी पटना के आसपास बाढ़ का कारण भी बन सकती है।
पुनपुन की सबसे बड़ी समस्या उसका असमान प्रवाह है। बरसात में पानी और बाढ़, जबकि गर्मी में घटता प्रवाह नदी के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है। इसके ऊपर शहरीकरण, नदी के किनारों पर निर्माण, जलनिकासी और गंदे पानी की समस्या अलग दबाव पैदा करती है। पटना और आसपास के तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र में नालों और जलधाराओं का संबंध पुनपुन तंत्र से जुड़ता है। नदी के निचले हिस्से में बाढ़ का दबाव भी इसलिए बढ़ता है क्योंकि प्राकृतिक जलनिकासी और बाढ़ क्षेत्र पर मानवीय दबाव बढ़ता गया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पुराने जल गुणवत्ता आकलनों में पुनपुन और फल्गु दोनों की निगरानी दर्ज है; फल्गु के कुछ निगरानी स्थलों पर जैविक जल गुणवत्ता को ‘Moderate’ श्रेणी में दर्ज किया गया था। इससे यह स्पष्ट है कि इन दोनों ही नदियों की समस्या केवल पानी की मात्रा की नहीं, पानी की गुणवत्ता की भी है। इसलिए पुनपुन और फल्गु को बचाने का मतलब सिर्फ घाटों की सफाई, तटबंधों की मरम्मत और सुंदरीकरण के ऊपरी कामों से नहीं हो सकता। इसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र, नालों, बाढ़ क्षेत्र और भूजल पुनर्भरण को एक साथ देखना होगा।
पितृपक्ष में गया की फल्गु नदी के घाट पर सदियों से पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा चली आ रही है।
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पुनपुन के मामले में सरकारी हस्तक्षेप का बड़ा हिस्सा अभी तक बाढ़ नियंत्रण और तट संरक्षण के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। बिहार जल संसाधन विभाग के रिकॉर्ड में 2024-25 के दौरान पुनपुन के किनारे पालिगंज के रुपापुर और समदा तथा नौबतपुर के पितमास जैसे स्थानों पर कटावरोधी और तट संरक्षण कार्य दर्ज हैं। ये काम नदी के किनारे को तत्काल कटाव से बचाने के लिहाज से तो ठीक हैं, लेकिन इन्हें नदी के पारिस्थितिक पुनर्जीवन के बराबर नहीं माना जा सकता। यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी नदी के किनारे को पक्का कर देना या कटाव रोक देना नदी को जीवित करने के बराबर नहीं है। पुनपुन के लिए वर्षा जल को जलग्रहण क्षेत्र में रोकना, पुराने तालाबों और आहर-पइन जैसी जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करना, नदी में जाने वाले गंदे पानी को रोकना और बाढ़ क्षेत्र को अतिक्रमण से बचाना ज्यादा व्यापक उपाय होंगे। अभी उपलब्ध सरकारी सूचनाओं से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि पुनपुन का समग्र नदी-पुनर्जीवन सफल हो चुका है।
गया पहुंचते ही फल्गु नदी का दृश्य दूसरी तरह का है। यह नदी शहर के पूर्वी हिस्से से गुजरती है और सामान्य मौसम में इसका बड़ा नदी तल रेत से भरा दिखाई देता है। बिहार सरकार के गया जिला प्रशासन के अनुसार फल्गु मूलतः बरसाती नदी है और साल के दूसरे समय नदी तल ऊपर से सूखा दिखाई देता है। रेत या मिट्टी हटाने पर नीचे पानी मिलने की बात भी सरकारी विवरण में दर्ज है। यही भौगोलिक विशेषता धार्मिक कथा में ‘अंतःसलिला’ यानी जमीन के भीतर बहने वाली नदी के रूप में सामने आती है।
भूगोल में फल्गु वास्तव में लिलाजन या निरंजना और मोहाना नदियों के संगम से बनने वाली नदी है। दोनों धाराएं बोधगया के नीचे मिलती हैं और आगे गया से गुजरती हुई फल्गु कहलाती हैं। बिहार के पर्यावरण एवं वन विभाग की नदी पुनर्जीवन समिति भी फल्गु को प्राचीन ग्रंथों में ‘नैरंजना’ नाम से वर्णित नदी बताती है। बौद्ध परंपरा में भी निरंजना का विशेष महत्व है और गया-बोधगया क्षेत्र के इतिहास में इस नदी का स्थान धार्मिक सीमाओं से कहीं बड़ा है।
गया की फल्गु नदी के सूखी और रेतीली दिखाई देने की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक कथा माता सीता से जुड़ी है। मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम और लक्ष्मण के साथ सीता गया पहुंचीं और वहां दशरथ के लिए पिंडदान करना था। राम और लक्ष्मण के फल लाने जाने के दौरान सीता ने फल्गु के किनारे बालू से ही पिंड बनाकर दशरथ का श्राद्ध कर दिया। कथा के अनुसार सीता ने फल्गु नदी, गाय, तुलसी, वटवृक्ष और वहां मौजूद एक ब्राह्मण को इस अनुष्ठान का साक्षी बनाया। लेकिन राम के लौटने पर इन साक्षियों ने सीता के पिंडदान की पुष्टि नहीं की। इससे नाराज सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया कि उसका जल ऊपर से दिखाई नहीं देगा और वह अंतःसलिला होकर जमीन के नीचे बहेगी। धार्मिक मान्यता में इसी श्राप को फल्गु के ऊपर से सूखी और रेतीली दिखाई देने का कारण माना जाता है, जबकि रेत के नीचे पानी मिलने की बात कही जाती है। वैज्ञानिक रूप से फल्गु का मौसमी प्रवाह, चौड़ा रेतीला नदी तल और उसके नीचे भूजल इस प्राकृतिक स्थिति को समझाने वाले कारक हैं।
फल्गु में पानी की समस्या को दूर करने के लिए गया में गया डैम, जिसे देश के बड़े रबर डैम के रूप में प्रचारित किया गया, बनाया गया। सितंबर 2022 में इसका उद्घाटन हुआ। इसका उद्देश्य फल्गु में सालभर पानी उपलब्ध कराना और श्रद्धालुओं को तर्पण तथा पिंडदान के लिए जल उपलब्ध कराना था। परियोजना की लागत करीब 350 करोड़ रुपये बताई गई थी। लेकिन, डैम बनाने का मतलब नदी का पुनर्जीवन नहीं है। 2023 में डैम की सफाई के लिए पानी निकालकर जमा गाद हटाने का काम करना पड़ा। प्रशासन ने फल्गु के देवघाट से सीता पथ तक गाद हटाने और घाटों पर कूड़ेदान लगाने जैसे कदम भी उठाए। इससे धार्मिक आयोजन के लिए जल उपलब्ध कराने और घाटों की स्थिति सुधारने में मदद मिल सकती है, लेकिन नदी के पूरे जलग्रहण क्षेत्र में पानी की उपलब्धता, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक प्रवाह का सवाल इससे अपने आप हल नहीं होता।
गया के पितृपक्ष मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए बिहार सरकार द्वारा तंबू में बिस्तरों का इंतज़ाम किया गया है।
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पुनपुन और फल्गु की समस्या सिर्फ इनका पानी सूखने और प्रदूषित होने तक सीमित नहीं है। नदी के किनारों पर अतिक्रमण की मार, नदी में सीधे गिराया जा रहा नालों का गंदा पानी और नदी तल में कचरे का पहुंचना लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। 2018 में भी फल्गु में नालों के पानी और नदी तल में मलबा डाले जाने को लेकर शिकायतें अकसर सामने आती हैं, पर ज्यादातर मौकों पर इसका कोई स्थायी समाधान करने के बजाय कुछ कामचलाऊ कार्रवाई करके मामला निपटा दिया जाता है। इस साल (2026) इस समस्या पर फिर कार्रवाई की तैयारी हुई। हालिया मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जिला प्रशासन ने दोनों किनारों पर करीब 900 स्थायी अतिक्रमण चिन्हित किए और चरणबद्ध तरीके से उन्हें हटाने की योजना बनाई। यह कार्रवाई पहले भी लंबित रही थी। इसलिए यहां भी यही सवाल महत्वपूर्ण है कि अतिक्रमण हटाने के बाद क्या नदी का बाढ़ क्षेत्र और प्राकृतिक प्रवाह सुरक्षित किया जाएगा, या केवल धार्मिक और पर्यटन क्षेत्र का सौंदर्यीकरण होगा।
फल्गु को बचाने के लिए हाल के वर्षों में केवल इंजीनियरिंग उपाय ही नहीं, वैज्ञानिक अध्ययन भी सामने आए हैं। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB) के शोधकर्ताओं के अध्ययन में फल्गु बेसिन के उन क्षेत्रों की पहचान की गई जहां पुनर्जीवन के लिए प्राथमिकता से काम करने की जरूरत है। अध्ययन में ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र के क्षरण, भूजल और नदी प्रवाह के संबंध तथा स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर जोर दिया गया है। अध्ययन ने फल्गु के पुनर्जीवन के लिए भूजल संसाधनों की बहाली को महत्वपूर्ण बताया है। इसमें सूखे कुओं और पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने, भूजल रिचार्ज बढ़ाने और स्थानीय समुदाय को संरक्षण में शामिल करने की जरूरत बताई गई। इसका अर्थ यह है कि फल्गु को केवल गया शहर के बीच बहने वाली नदी मानकर नहीं, बल्कि झारखंड-बिहार में फैले उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र के रूप में देखना होगा।
पुनपुन और फल्गु की कहानी में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि दोनों नदियां पितृपरंपरा में मुक्ति से जुड़ी हैं, लेकिन खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। पितृपक्ष में कुछ दिनों के लिए घाटों की सफाई, अस्थायी रोशनी, शौचालय, पेयजल और कूड़ेदान की व्यवस्था हो जाती है। मगर नदी का जीवन केवल मेले के दिनों से नहीं चलता। केवल पिंडदान स्थलों की सफाई को ही नदी संरक्षण का पर्याय न माना जाए। इन नदियों के संरक्षण के लिए कुछ जरूरी कदम व्यवस्थित ढंग से उठाए जाने चाहिए। इनमें से कुछ प्रमुख कदम इस प्रकार हैं -
नदी में आने वाले हर नाले का सीवेज ट्रीटमेंट किया जाए।
नदी के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र और किनारों पर नए अतिक्रमण पर पूरी रोक लगे तथा पुराने अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी हो।
केवल नदी तल में पानी जमा करने के बजाय पूरे जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल का संरक्षण और भूजल रिचार्ज बढ़ाया जाए।
बालू, गाद और नदी तल के साथ छेड़छाड़ का वैज्ञानिक आकलन हो।
सबसे जरूरी कदम यह होगा कि पुनपुन और फल्गु के लिए अलग-अलग घाट परियोजनाओं के बजाय पूरे नदी बेसिन की पुनर्जीवन योजना बने।
पिंडदान और पितरों की मुक्ति की परंपरा से जुड़ी इन नदियों की दशा सुधारन के लिए पितृपक्ष में की जाने वाली घाट सफाई और मरम्मत कार्यो से आगे बढ़ कर झारखंड से लेकर बिहार तक उद्गम क्षेत्र, छोटी धाराएं, तालाब, भूजल, कृषि क्षेत्र, शहरों के नाले और नदी का मुख्य प्रवाहों के स्तर पर काम करने की जरूरत है। तब पितृपक्ष में नदी के किनारे किया जाने वाला तर्पण केवल परंपरा नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन नदियों को बचाने का संकल्प भी बन सकेगा।
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