नालों का गंदा पानी गंगा की गुणवत्ता और उसमें मौजूद रसायनों को प्रभावित करता है।

नालों का गंदा पानी गंगा की गुणवत्ता और उसमें मौजूद रसायनों को प्रभावित करता है।

फ़ोटो: इंडिया वाटर पोर्टल

पटना के नाले कैसे बढ़ा रहे हैं गंगा का प्रदूषण?

एक नए अध्ययन के मुताबिक, इन नालों से आने वाला पानी गंगा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। असर मौसम और नदी के बहाव के साथ बदलता है और कुछ नालों के मुहाने के पास पानी की गुणवत्ता ज्यादा खराब पाई गई।
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गंगा भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। इसका महत्व केवल धार्मिक नहीं है। लाखों लोग खेती, पीने के पानी और रोजमर्रा की दूसरी जरूरतों के लिए इस नदी पर निर्भर हैं। लेकिन शहरों से गुजरते हुए गंगा पर प्रदूषण का दबाव बढ़ जाता है।

गंगा के प्रदूषण की चर्चा में अक्सर कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी, नदी में जमा कचरे और सीधे गिरने वाले सीवेज की बात होती है। लेकिन पटना जैसे शहरों में वहां के नाले भी गंगा के प्रदूषण का बड़ा स्रोत हैं। ये नाले अलग-अलग इलाकों का गंदा पानी लेकर सीधे गंगा में पहुंचते हैं।

एक नए अध्ययन में पटना के नालों से अलग-अलग मौसम में गंगा में पहुंचने वाले पानी की जांच की गई। इसमें पाया गया कि नालों का गंदा पानी गंगा की गुणवत्ता और उसमें मौजूद रसायनों को प्रभावित करता है। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि नालों का पानी किस रास्ते से नदी तक पहुंचता है और नदी में मिलने के बाद उसका क्या असर होता है।

मार्च 2026 में Cleaner Water में प्रकाशित अध्ययन में इस समस्या का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के लेखक भावना राज, अविनाश दास, उमेश कुमार सिंह और राजेश कुमार रंजन हैं।

शहर का गंदा पानी
छोटे-बड़े नालों के जरिए लगातार नदी तक पहुंचता रहता है और इसका असर हमेशा सीधे दिखाई नहीं देता।

शोधकर्ताओं ने गंगा पर नालों के प्रभाव को समझने के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), आंकड़ों की सांख्यिकीय जांच और सिंचाई के पानी की गुणवत्ता से जुड़े सूचकांकों का इस्तेमाल किया। GIS की मदद से प्रदूषण के स्रोत और उसके फैलाव को नक्शे पर देखा जा सकता है।

अध्ययन में अलग-अलग मौसम और स्थानों पर पानी की गुणवत्ता में होने वाले बदलावों को भी देखा गया। इससे पता चला कि पटना के नालों का गंगा पर असर हर जगह और हर मौसम में एक जैसा नहीं है। मौसम और नदी के बहाव के अनुसार इसका असर बदलता रहता है।

अध्ययन की खास बात यह है कि इसमें केवल गंगा के पानी की गुणवत्ता नहीं, बल्कि शहर के नालों से नदी तक पहुंचने वाले प्रदूषण को भी समझने की कोशिश की गई है। शहर का गंदा पानी छोटे-बड़े नालों के जरिए लगातार नदी तक पहुंचता रहता है और इसका असर हमेशा सीधे दिखाई नहीं देता।

इसलिए गंगा की सफाई के लिए केवल नदी किनारे सफाई करना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि शहर में गंदा पानी कहां से निकल रहा है, किन नालों से होकर नदी तक पहुंच रहा है और नदी में जाने से पहले उसका कितना उपचार हो रहा है।

गंगा को साफ करने की शुरुआत नदी से पहले उन नालों को समझने और नियंत्रित करने से करनी होगी, जो हर दिन शहर का गंदा पानी नदी तक पहुंचाते हैं।

पटना की नदियां और नाले

पटना गंगा बेसिन के बीच बसा है और यहां नदियों व जलधाराओं का जटिल तंत्र है। शहर के उत्तर में गंगा बहती है, पश्चिम में सोन नदी है और पुनपुन नदी का तंत्र पटना के आसपास के इलाकों से होकर गुजरता है।

ये नदियां और जलधाराएं लंबे समय से पटना के लिए महत्वपूर्ण रही हैं। वे बारिश और बाढ़ के पानी की निकासी में मदद करती रही हैं और बिहार के उपजाऊ जलोढ़ मैदानों में खेती के लिए भी जरूरी रही हैं। जलोढ़ मैदान वे इलाके हैं, जहां नदियां अपने साथ लाई मिट्टी और गाद जमा करती हैं। यही मिट्टी इन क्षेत्रों को उपजाऊ बनाती है।

लेकिन शहर के तेजी से फैलने के साथ यह प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था भी बदल गई है। पटना की आबादी 20 लाख से अधिक है और शहर से हर दिन घरेलू सीवेज, बारिश का पानी और शहरी कचरा निकलता है। इसका एक हिस्सा बिना उपचार के खुले नालों के जरिए गंगा में पहुंच जाता है।

दीघा, कुर्जी, भद्रघाट और घाघाघाट के नाले ऐसे ही प्रमुख स्रोत हैं। इनके जरिए घरेलू गंदे पानी के साथ खेतों से बहकर आने वाले प्रदूषक भी गंगा तक पहुंचते हैं। समय के साथ ये नाले प्रदूषण के स्थानीय स्रोत बन गए हैं और पटना के आसपास गंगा की पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं।

सर्दियों में शहरों के नालों से आने वाला प्रदूषण गंगा के लिए ज्यादा गंभीर हो सकता है। गर्मी और मानसून में तेज बहाव से इसका असर कुछ कम दिखाई देता है, लेकिन प्रदूषण खत्म नहीं होता।

इसके बावजूद पानी की निगरानी का ध्यान अब तक मुख्य रूप से गंगा पर रहा है। नदी में गंदा पानी पहुंचाने वाले नालों और उनकी स्थिति पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।

इसी कमी को देखते हुए यह अध्ययन उन जगहों पर केंद्रित है जहां शहर के नाले गंगा में मिलते हैं। यही वे बिंदु हैं जहां शहर का गंदा पानी सीधे नदी में पहुंचता है।

गंगा में गिरने वाले नालों का पानी नदी की गुणवत्ता को कहां और कितना प्रभावित कर रहा है, यह समझने के लिए शोधकर्ताओं ने अलग-अलग जगहों से पानी के नमूने लिए। नमूने गर्मी और सर्दी, दोनों मौसमों में जुटाए गए। इनमें गंगा के अलग-अलग हिस्सों के साथ प्रमुख नालों के नदी में मिलने से पहले और बाद के स्थान भी शामिल थे।

नमूनों में पानी की गुणवत्ता से जुड़े कई मानकों की जांच की गई, जिनमें शामिल थे:

  • pH और पानी का धुंधलापन (टर्बिडिटी)

  • विद्युत चालकता (EC), जो पानी में घुले लवण और खनिजों का संकेत देती है

  • कुल घुले ठोस पदार्थ (TDS)

  • घुली हुई ऑक्सीजन (DO)

  • सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम

  • क्लोराइड, नाइट्रेट, सल्फेट और फॉस्फेट

इसके बाद शोधकर्ताओं ने आंकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया। उन्होंने देखा कि पानी में अलग-अलग रसायनों की मात्रा में होने वाले बदलावों के बीच क्या संबंध है। इससे पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारकों और अलग-अलग प्रदूषकों के बीच संबंध समझने में मदद मिली।

इन आंकड़ों को GIS की मदद से नक्शे पर भी दिखाया गया। इससे गंगा के अलग-अलग हिस्सों में पानी की गुणवत्ता में बदलाव और प्रदूषण के संभावित हॉटस्पॉट साफ तौर पर सामने आए।

पानी के नमूनों, सांख्यिकीय विश्लेषण और GIS नक्शों को एक साथ देखकर शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि अलग-अलग नालों का पानी गंगा की गुणवत्ता को कहां और किस हद तक प्रभावित कर रहा है।

गंगा की निगरानी पूरे साल करना जरूरी है। किसी एक मौसम के आंकड़े नदी की पूरी तस्वीर नहीं दिखा सकते। अलग-अलग मौसम में गंगा और उसमें मिलने वाले नालों के पानी की नियमित जांच से ही प्रदूषण की सही स्थिति समझी जा सकती है।

गंगा के पानी की गुणवत्ता में मौसमी बदलाव

अध्ययन में पाया गया कि गंगा के पानी की गुणवत्ता मौसम के साथ बदलती है। सर्दियों में पानी में सोडियम, मैग्नीशियम, क्लोराइड और कुल घुले ठोस पदार्थ (TDS) की मात्रा गर्मियों की तुलना में अधिक थी।

इसका एक प्रमुख कारण नदी का बहाव है। गर्मी और मानसून में नदी में पानी अधिक होने से प्रदूषक ज्यादा पानी में फैल जाते हैं और उनकी सांद्रता कम हो जाती है। इस प्रक्रिया को Dilution यानी पानी में प्रदूषकों का घुलकर कम सांद्रता में फैलना कहते हैं।

सर्दियों में नदी का बहाव कम होने से नालों से आने वाले प्रदूषकों को फैलने के लिए कम पानी मिलता है। इसलिए पानी की गुणवत्ता पर उनका असर ज़्यादा दिखाई देता है।

इसका मतलब है कि सर्दियों में शहरों के नालों से आने वाला प्रदूषण गंगा के लिए ज्यादा गंभीर हो सकता है। गर्मी और मानसून में तेज बहाव से इसका असर कुछ कम दिखाई देता है, लेकिन प्रदूषण खत्म नहीं होता।

इसलिए गंगा की निगरानी पूरे साल करना जरूरी है। किसी एक मौसम के आंकड़े नदी की पूरी तस्वीर नहीं दिखा सकते। अलग-अलग मौसम में गंगा और उसमें मिलने वाले नालों के पानी की नियमित जांच से ही प्रदूषण की सही स्थिति समझी जा सकती है।

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पटना के पास गंगा का पानी सिंचाई के लिए कितना उपयुक्त है?

अध्ययन के मुताबिक पटना के आसपास गंगा का पानी ज्यादातर नमूनों में सिंचाई के लिए उपयुक्त पाया गया। पानी का pH खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की स्वीकार्य सीमा में था। कुल घुले ठोस पदार्थ (TDS) और विद्युत चालकता (EC) के आंकड़े भी आमतौर पर उस स्तर से कम थे, जो खेती के लिए नुकसानदेह माने जाते हैं। यानी ज्यादातर जगहों पर पानी में घुले नमक और खनिजों की मात्रा सिंचाई के लिए बड़ी समस्या नहीं थी।

हालांकि, नदी के सभी हिस्सों की स्थिति एक जैसी नहीं थी। कुछ नालों के मुहाने के पास पानी की गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। खासकर कुर्जी और भद्रघाट नालों के आसपास EC और सोडियम की मात्रा अधिक पाई गई।

सिंचाई के पानी के साथ सोडियम लगातार मिट्टी में जमा होता रहे तो उसकी संरचना खराब हो सकती है। इससे मिट्टी में पानी के रिसने की क्षमता घट सकती है और जल निकासी की समस्या बढ़ सकती है।

फिलहाल पटना के आसपास गंगा का पानी कुल मिलाकर सिंचाई के लिए ठीक है। लेकिन नालों से लगातार गंदा पानी नदी में पहुंचता रहा तो आगे चलकर इसका असर नदी के आसपास की मिट्टी और खेती पर पड़ सकता है। इसलिए केवल नदी के पानी की निगरानी पर्याप्त नहीं है। सिंचाई वाले इलाकों में पानी के साथ मिट्टी की गुणवत्ता पर भी नजर रखना जरूरी है।

प्रदूषण के स्रोतों की पहचान में आंकड़ों की मदद

शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि गंगा में पहुंचने वाला प्रदूषण किन स्रोतों से आ रहा है। इसके लिए पानी की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया गया, जिसमें प्रमुख घटक विश्लेषण (Principal Component Analysis) भी शामिल था।

विश्लेषण से पता चला कि गंगा के पानी में रसायनों की मात्रा पर मुख्य रूप से तीन तरह के स्रोतों का असर है:

  • प्राकृतिक प्रक्रियाएं: चट्टानों और खनिजों के टूटने और पानी में घुलने से कई तत्व नदी तक पहुंचते हैं।

  • शहरी गंदा पानी: घरों से निकलने वाला सीवेज और बारिश के साथ शहर से बहकर आने वाला पानी कई प्रदूषक नदी में पहुंचाता है।

  • खेती से आने वाले पोषक तत्व: खेतों से बहकर आने वाली खाद और जैविक पदार्थ पानी में नाइट्रेट और फॉस्फेट की मात्रा बढ़ा सकते हैं।

अध्ययन में सोडियम, क्लोराइड, EC और TDS की मात्रा में भी आपसी संबंध पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि इनकी बढ़ी हुई मात्रा के पीछे चट्टानों और खनिजों के घुलने के साथ-साथ शहरों से आने वाला गंदा पानी भी जिम्मेदार हो सकता है। वहीं, पानी में फॉस्फेट और नाइट्रेट की अधिक मात्रा खेती और घरेलू सीवेज से आने वाले प्रदूषण की ओर इशारा करती है।

इससे साफ है कि शहरों में नदी का प्रदूषण किसी एक स्रोत से नहीं आता। प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ खेती, घरेलू सीवेज और शहर की जल निकासी व्यवस्था भी इसमें भूमिका निभाती है। इसलिए नदी की सफाई के लिए इन सभी स्रोतों पर एक साथ ध्यान देना जरूरी है।

पूरे शहर को एक इकाई
मानकर काम करने के बजाय हर नाले को अलग-अलग समझना जरूरी है। यह देखना होगा कि कौन-सा नाला कितना और किस तरह का प्रदूषण नदी में पहुंचा रहा है।

नदी की सफाई में नालों पर ध्यान क्यों जरूरी है?

अध्ययन से पता चलता है कि गंगा हर जगह एक जैसी प्रदूषित नहीं है। कुछ जगहों पर प्रदूषण अधिक है, खासकर उन स्थानों पर जहां शहर के नाले गंगा में मिलते हैं।

यह गंगा की सफाई की मौजूदा रणनीति पर फिर से सोचने की जरूरत बताता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) और शहर की सफाई व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। लेकिन अगर नालों का गंदा पानी लगातार नदी में पहुंचता रहे तो ऐसे में केवल बड़े ट्रीटमेंट प्लांट बनाना पर्याप्त नहीं होगा।

पटना का यह अध्ययन बताता है कि पूरे शहर को एक इकाई मानकर काम करने के बजाय हर नाले को अलग-अलग समझना जरूरी है। यह देखना होगा कि कौन-सा नाला कितना और किस तरह का प्रदूषण नदी में पहुंचा रहा है।

इसके आधार पर हर नाले के लिए अलग उपचार और निगरानी की व्यवस्था की जा सकती है। इससे गंदे पानी को नदी में पहुंचने से पहले ही रोका या साफ किया जा सकेगा।

भारत के नदी किनारे बसे शहरों के लिए सबक

पटना में नालों के जरिए गंदा पानी गंगा में पहुंच रहा है, लेकिन यह समस्या केवल पटना की नहीं है। देश के कई शहरों में नदियां इसी तरह प्रदूषित हो रही हैं। दिल्ली की यमुना, हैदराबाद की मूसी और अहमदाबाद की साबरमती इसके उदाहरण हैं।

इन शहरों में नाले शहर के गंदे पानी और नदी के बीच की आखिरी कड़ी हैं। घरों और दूसरे स्रोतों से निकलने वाला गंदा पानी इन्हीं रास्तों से नदी तक पहुंचता है।

इसलिए नदी की सफाई को शहर के नालों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पटना का अध्ययन बताता है कि नदी की निगरानी के साथ उन नालों पर भी नजर रखना जरूरी है, जो रोज शहर का गंदा पानी नदी तक पहुंचाते हैं।

हर प्रमुख नाले की नियमित जांच होनी चाहिए। यह पता लगाना जरूरी है कि उसमें कितना पानी और किस तरह का प्रदूषण आ रहा है। इसके बाद नदी में मिलने से पहले उस पानी के उपचार की व्यवस्था की जा सकती है। 

नदी की सफाई की शुरुआत नदी तक पहुंचने वाले नालों से करनी होगी।

नालों पर केंद्रित नदी प्रबंधन की जरूरत

शोधकर्ताओं के मुताबिक गंगा को लंबे समय तक प्रदूषण से बचाने के लिए बेहतर निगरानी और हर नाले की स्थिति के अनुसार अलग उपाय जरूरी हैं। इसके लिए सीवेज उपचार की व्यवस्था मजबूत करनी होगी और नगर निकायों तथा प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा।

प्रदूषण वाले इलाकों की पहचान के लिए GIS आधारित निगरानी भी बढ़ाई जानी चाहिए। इससे पता लगाया जा सकता है कि नदी के किन हिस्सों में प्रदूषण ज्यादा है और इसके पीछे कौन-से नाले या दूसरे स्रोत जिम्मेदार हैं।

निगरानी केवल नदी के पानी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि नदी का पानी सिंचाई के लिए कितना उपयुक्त है और उसकी गुणवत्ता का मिट्टी व फसलों पर क्या असर पड़ रहा है। गंगा पर लाखों किसान खेती के लिए निर्भर हैं, इसलिए सिंचाई के लिहाज से पानी की गुणवत्ता पर नजर रखना भी जरूरी है।

इस अध्ययन से एक अहम बात सामने आती है कि पटना जैसे शहरों में गंगा का भविष्य केवल बड़ी नदी सफाई योजनाओं से तय नहीं होगा। शहर से निकलने वाले छोटे-बड़े नालों की भी इसमें बड़ी भूमिका है। अलग-अलग देखें तो ये नाले छोटे लग सकते हैं, लेकिन मिलकर नदी पर शहर के प्रदूषण का बड़ा दबाव बनाते हैं।

इसलिए गंगा को बचाने की शुरुआत शायद वहीं से करनी होगी, जहां शहर का गंदा पानी चुपचाप नदी में मिलता है।

इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।

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