ढेंकनाल की आदिवासी महिलाएं जो हैं जंगल की रक्षक
फोटो - बृजेंद्र दुबे
थेंगापल्ली ने बनाया ‘आदिवासी इंस्पेक्टर - 56 वर्षों से जंगलों की रक्षा कर रहीं ढेंकनाल की महिलाएं
थेंगापल्ली एक दशकों पुरानी प्रथा है जिसमें आदिवासी समुदाय जंगलों की रक्षा करते हैं।
वन रक्षक महिलाएं, जिन्हें जंगल की ‘आदिवासी इंस्पेक्टर’ कहा जाता है अब उन्हें कानूनी अधिकार मिला है।
आदिवासियों ने ग्रामीणों के साथ मिल कर हाथियों के लिए जंगलों में तालाब बनवाये
ढेंकनाल (ओडिशा)। यह कहानी है ओडिशा के गॉंवों में दशकों से चली आ रही “थेंगापल्ली” प्रथा की। प्रथा जो जंगलों को बचाने एक नैतिक जिम्मेदारी का अहसासस कराती है, प्रथा जो बड़े-बुजुर्ग विरासत में लेकर आये वो प्रथा जिसे सरकार ने कानून का दर्जा दिया। तो चलते हैं ओडिशा के टांडीमुंडा और बालिकुमा गॉंव में।
इन गॉंवों में “थेंगा” का अर्थ होता है छड़ी,और “पल्ली” का मतलब होता है, बारी। थेंगापल्ली वो प्रथा है जिसके अंतर्गत दशकों से, यहां की महिलाएं प्रतिदिन बारी-बारी से छड़ी लेकर अपने जंगलों की गश्त और सुरक्षा करती आ रही हैं। ये महिलाएं दशकों से तस्करों से जंगलों को बचाने के लिए अपनी स्वेच्छा से रखवाली कर रही हैं। उनके पास हथियार के नाम पर महज़ एक छड़ी होती है, वह तीन से छह के समूह में घर के पास के जंगलों में लकड़ी चोरों को भगाने के लिए गश्त करती हैं।
जंगलों के रक्षक जो बारी-बारी से करते हैं गश्त
फोटो - बृजेंद्र दुबे
गंश्त करने वाली महिलाओं में ज्यादातर बुजुर्ग होती हैं, जिनकी हनक मात्र से अच्छे-अच्छों की छुट्टी हो जाती। जब कभी वह किसी को जंगल से लकड़ी चुराते पकड़ती हैं, तो सबसे पहले उसे चेतावनी देतीं और तस्करी के लिए जुटाए गए जंगल के उत्पादों को जब्त कर लेतीं।
फिर चोरों को गांव की सभा में लेकर आती हैं, जहां उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मंगवाई जाती है या जुर्माना लगाया जाता है। जब बात आगे बढ़ जाती या स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है, तो स्वयं सेवी संस्था के माध्यम से पुलिस कार्यवाही कराई जाती है।
जंगल की ‘आदिवासी इंस्पेक्टरों’ को कैसे मिला कानूनी अधिकार
इन महिलाओं के रोज़ाना के प्रयास और उनकी दिनचर्या किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं। आये दिन झगड़े इनके जीवन को खतरे में भी डालते आये हैं। ऐसे में वनों को काटने वाले लोगों और तस्करी से आजीविका चलाने वालों ने कई बार इन पर सवाल उठाये, कि किस अधिकार से ये महिलाएं “जंगल की इंस्पेक्टर” बनने का दावा करती हैं। ऐसे तमाम सवालों के जवाब टांडीमुंडा और बालिकुमा गॉंव के लोगों के अथक प्रयासों के बाद मिले जब ओडिशा सरकार ने इने जंगल की रखवाली करने के अधिकार दिये।
सरकार द्वारा दिए गए मान्यता पत्र को दिखाते बलिकुमा गॉंव के आदिवासी
फोटो - बृजेंद्र दुबे
देश के ऐतिहासिक वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) को 2021 के तहत जंगलों की रक्षा का दायित्व ओडिशा के ढेंकनाल जिले के टांडीमुंडा और बालिकुमा गांव में पारंपरिक रूप से वनों पर निर्भर समुदायों को दिए गए वो भी पूर्ण पूरी तरह से औपचारिक रूप से। इसके परिणामस्वरूप वन अधिकार अधिनियम, ओडिशा में आदिवासी महिलाओं को अपने जंगलों की रक्षा करने में अग्रणी भूमिका निभाने में मददगार साबित हो रहा है।
यही नहीं ओडिशा ने FRA के दायरे को 30,000 गॉंव तक विस्तारित करने के लिए एक योजना शुरू की है। इसके तहत आदिवासी समूहों और अन्य समुदायों जो पारंपरिक रूप से वनों पर निर्भर हैं या वहां रहते हैं उन्हें ये अधिकार दिए जाने की योजना चलायी जा रही है।
टांडीमुंडा और बालिकुमा गांव के लोगों को अपने दावे को वैध कराने में 10 साल से अधिक का समय लग गया, लेकिन अब इस कानूनी अधिकार ने मौजूदा सामुदायिक संस्थानों और लगभग चार दशकों से चली आ रही महिलाओं के नेतृत्व वाली वन प्रबंधन योजना 'थेंगापल्ली' को मजबूत करने में मदद की है, साथ ही निवासियों के लिए आजीविका के नए अवसर भी खोले हैं।
ओडिशा के घने जंगल जिनके संरक्षण के लिए चलायी गई मुहिम
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56 वर्ष पूर्व शुरु हुआ था थेंगापल्ली अभियान
थेंगापल्ली की शुरुआत सन् 1970 में ओडिशा के नयागढ़ जिले में हुआ था, लेकिन यह 1990 के दशक में तब लोकप्रिय हुआ, जब महिलाएं भी पुरुषों के साथ जंगलों की रक्षा के लिए आगे आयीं। आज ढेंकनाल जिले के कंकड़ाहाड़ ब्लॉक में 130 गॉंव की महिलाएं जंगल की चौकसी की ज़िम्मेदारी उठा रही हैं। जिले के बालिकुमा गांव में वन संरक्षण समिति ने 53.79 हेक्टेयर जंगल को फिर से आबाद कर दिया।
तस्करी की वजह से यहां से लकड़ी और जंगली उत्पाद बहुत कम रह गए थे। महिलाओं द्वारा लाए जा रहे बदलाव पर बात करते हुए जंगल के आदिवासी समुदाय पर अध्ययन कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ता द्रोण चंद्राकर कहते हैं, "दस साल पहले लुप्त हुई बड़ी भारतीय गिलहरी को भी अब हम ढेंकनाल में देख सकते हैं। यहां जंगल की कटाई पर लगाम लगने से मिट्टी में नमी भी बढ़ रही है।"
तीन पालियों में होती है गश्त
सुबह महिलाएं जंगल से उपयोग का सामान लाने और फिर घरेलू कामों की तैयारी करती हैं। इस दौरान गांव की कुछ महिलाएं लाठी या डंडा उठाती हैं और जंगल की ओर निकल पड़ती हैं। ये महिलाएं न तो मांस के लिए किसी जानवर का शिकार करने जाती हैं और न ही असामाजिक मनुष्यों या जंगली जानवरों से अपनी रक्षा करने का जोखिम उठाती हैं। इसके बजाय, ये जंगल और उसके संसाधनों की रक्षा के लिए निकल पड़ती हैं। जिसमें गांव के सदस्य अपने सामुदायिक वन की रक्षा में भाग लेते हैं। इसमें लगभग 4-6 महिलाएं बारी-बारी से वन की सीमाओं पर गश्त करती हैं। उनकी बारी समाप्त होने पर, महिलाओं का एक और समूह पहरा देता है। गश्त तीन पालियों में की जाती है, जो सुबह 6 बजे शुरू होकर देर रात तक चलती है।
ढेंकनाल का बलिकुमा गॉंव
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46 गॉंव में केवल महिलाएं लगाती हैं गश्त
दिलचस्प बात यह है कि यह प्रथा नई नहीं है और कम से कम पांच दशकों से चली आ रही है, जो वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने से बहुत पहले की बात है। वर्षों से सैकड़ों एकड़ वन क्षेत्र 130 गॉंवों में पुरुषों और महिलाओं द्वारा संरक्षित क्षेत्रों में आ गया है। कुल गॉंवों में से 46 गॉंव में महिलाएं वन संरक्षण की पूरी जिम्मेदारी संभालती हैं। उनके प्रयासों से उनके अंतर्गत आने वाले सैकड़ों एकड़ से अधिक वन क्षेत्र का उद्धार हुआ है। ग्रामीण ही जंगल में पेड़ लगाकर हरा भरा रखते है।
जंगलों को यूं ही छोड़ा तो कुछ नहीं बचेगा
“हम जंगल को तस्करों, लकड़ी चोरों और बिना अनुमति के जंगल के अनमोल खजाने को लूटने वालों से बचाते हैं। जंगल हमें लकड़ी, कंद, जड़ें, तंबाकू के पत्ते, महुआ के फूल, औषधियां और हमारी आजीविका के सभी पहलुओं में आवश्यक सभी संसाधन देता है। अगर हम इसे ऐसे ही छोड़ देंगे, तो हमारे लिए कुछ भी नहीं बचेगा,” गांव की संरक्षण समिति की कार्यकर्ता अहिल्या साहू 70 कहती हैं।
वह आगे कहती हैं,"पहले जंगलों में अत्यधिक कटाई और शिकार होने के कारण जंगल का एक बड़ा हिस्सा बंजर हो गया था। अवैध पेड़ों और जानवरों के शिकार की लूट बड़े पैमाने पर हो रही थी। ग्रामीणों को लगा कि जल्द ही कुछ भी नहीं बचेगा, इसलिए हमने इसकी रक्षा करना शुरू कर दिया।”
ढेंकनाल का बलिकुमा गॉंव
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इसलिए महिलाओं ने संभाली कमान
हड़ियानी प्रधान कहती है, “पुरुष अक्सर तस्करों से संघर्ष में उलझ जाते हैं और कभी-कभी तो नरम रुख भी अपना लेते हैं। कुछ पैसे या शराब का लालच मिलने पर वो लकड़ी बेच देते हैं। जबकि, महिलाएं जंगल के महत्व और उनके मूल्यों को गहराई से समझती हैं। वे अपराधियों को तब तक नहीं छोड़तीं जब तक उन्हें न्याय के कटघरे में नहीं लाया जाता। इसीलिए महिलाओं ने जंगलों की रक्षा का जिम्मा संभालना शुरू कर दिया।”
जयंती नाईक (62) का कहना है कि जैसे-जैसे वन संसाधनों की लूट का खतरा बढ़ने लगा, ग्रामीणों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। “जिन ग्रामीणों को 1-2 किलोमीटर के दायरे में उनकी जरूरत के सामान मिल जाते थे, उन्हें अब 10 किलोमीटर या उससे अधिक दूर जाना पड़ रहा था। कुछ गॉंवों में लकड़ी की इतनी कमी हो गई थी कि उनके पास खाना पकाने के लिए जलाने के लिए भी लकड़ी नहीं थी,” वे बताती हैं।
ग्रामीणों को जंगल के खत्म होने से पहले ही खतरे का एहसास हुआ और धीरे-धीरे गॉंवों ने जंगलों की सीमाओं पर पहरा देना शुरू कर दिया तथा अपने आसपास के जंगलों की रक्षा के लिए ग्रामीणों के समूह बना लिए। उन्होंने कहा, "उन्होंने लकड़ी माफिया और तस्करों के रास्ते पहचान लिए और गांव के नेटवर्क के जरिए उनका भंडाफोड़ किया।"
रोज़ तीन से पॉंच किलोमीटर की दूरी तय करते हैं ग्रामीण
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सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक पहलू भी
बालिकुमा गांव के बीजू टुडू कहते हैं कि गश्त के अलावा अन्य सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू भी वर्षों से इसमें समाहित होते गए, जिससे एक मजबूत संरक्षण प्रणाली के निर्माण में मदद मिली। आदिवासियों ने अन्य गॉंवों के साथ सामाजिक-आर्थिक संबंध बनाना शुरू कर दिया। गॉंवों के भीतर विवाह होने लगे जिससे सामाजिक बंधन मजबूत हुए, ग्रामीणों के बीच होने वाले संघर्ष कम हो गए, ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से नियम और कानून बनाए हैं।
हाथियों के लिए बनवाये तालाब
ग्रामीण आवश्यकता या मौसम के अनुसार यह तय किया है कि किन पौधों या पेड़ों का उपयोग करना है। उसी लकड़ी का उपयोग हम लोग करते है जो फिर से उगती है। जंगल में आग लगने की स्थिति में पानी की बाल्टी रखी जाती है। इसके लिए वन क्षेत्रों में पानी के तालाब भी हैं। जिन्हें ग्रामीणों ने हाथियों के पानी पीने के लिए बनाया है।
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