"आवा पानी झोकी" अभियान के तहत किसानों ने स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा रिचार्ज संरचनाओं के लिए दिया।

"आवा पानी झोकी" अभियान के तहत किसानों ने स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा रिचार्ज संरचनाओं के लिए दिया।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

पांच प्रतिशत जमीन छोड़ दें तो क्या भूजल लौट आएगा?

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का 5% मॉडल भूजल सुधार के दावे करता है। लेकिन क्या यह प्रयोग भारत के अलग-अलग जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है?
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छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में इसी विचार पर आधारित एक पहल ने हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है। जिला प्रशासन द्वारा शुरू किए गए 5% मॉडल के तहत किसानों से अपील की गई कि वे अपनी कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज के लिए छोड़ें। इस भूमि पर खेत तालाब, सोख्ता गड्ढे, रिचार्ज पिट और अन्य जल संरक्षण संरचनाएं विकसित की गईं ताकि बारिश का पानी खेतों के भीतर ही रुके और धीरे-धीरे जमीन में समा सके। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, "आवा पानी झोकी" अभियान के तहत किसानों ने स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा रिचार्ज संरचनाओं के लिए दिया।

सरकारी दावों के अनुसार इस पहल के तहत हजारों जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गईं, सैकड़ों पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन हुआ और कई क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार के संकेत मिले। कुछ रिपोर्टों में भूजल स्तर में तीन से चार मीटर तक सुधार और दूरस्थ आदिवासी बस्तियों में झरनों के पुनर्जीवन का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि इन दावों के साथ कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हैं। क्या यह सुधार वास्तव में 5% मॉडल का परिणाम है? क्या इसका स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन हुआ है? और क्या यह मॉडल उन क्षेत्रों में भी काम कर सकता है जहाँ भूमि जोत छोटी है, वर्षा कम होती है या भूजल संकट की प्रकृति अलग है?

ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। विश्व बैंक के अनुसार देश हर वर्ष लगभग 230 घन किलोमीटर भूजल का उपयोग करता है और सिंचाई तथा पेयजल दोनों के लिए बड़ी आबादी इसी पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप भी बदल रहा है। कम दिनों में अधिक वर्षा होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, जिससे पानी का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है और भूजल रिचार्ज का अवसर कम हो जाता है।

ऐसे समय में कोरिया जिले का यह प्रयोग केवल एक स्थानीय पहल नहीं रह जाता। यह भूजल प्रबंधन, समुदाय की भागीदारी और जल सुरक्षा से जुड़ी बड़ी चर्चा का हिस्सा बन जाता है।

पानी रोकने का एक सरल विचार

कोरिया जिले में जल संकट की चुनौती नई नहीं थी। पर्याप्त वर्षा होने के बावजूद बरसात का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता था, जबकि गर्मियों में कुओं, हैंडपंपों और छोटे जल स्रोतों पर दबाव बढ़ने लगता था। इसी चुनौती ने प्रशासन को स्थानीय स्तर पर वर्षा जल रोकने के नए उपाय खोजने के लिए प्रेरित किया।

5% मॉडल के तहत किसानों से अपनी कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज के लिए छोड़ने की अपील की गई।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि कई क्षेत्रों में समस्या केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि बारिश के पानी को स्थानीय स्तर पर रोक पाने की सीमित क्षमता भी है। कोरिया में भी यही स्थिति थी। इसी कारण प्रशासन ने वर्षा जल को खेतों और गांवों के भीतर रोकने के उपाय तलाशने शुरू किए।

इसी पृष्ठभूमि में जिला प्रशासन ने "आवा पानी झोकी" अभियान शुरू किया। स्थानीय बोली में इसका अर्थ है, "आइए, पानी को रोकें"। अभियान का उद्देश्य केवल नई संरचनाएं बनाना नहीं था। बल्कि इसकी मदद से वर्षा जल को गांव और खेतों के भीतर ही अधिक समय तक रोकना था ताकि वह धीरे-धीरे जमीन में समा सके।

यहीं से 5% मॉडल की अवधारणा सामने आई। किसानों से अपील की गई कि वे अपनी कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के लिए छोड़ें। इस हिस्से में खेत तालाब, रिचार्ज पिट, सोख्ता गड्ढे, कंटूर ट्रेंच और अन्य संरचनाएं विकसित की गईं।

विचार यह था कि खेती योग्य भूमि का एक छोटा हिस्सा पानी के लिए छोड़ा जाए ताकि वर्षा जल खेत के भीतर ही रुके और धीरे-धीरे जमीन में समा सके। जिला प्रशासन का कहना है कि इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जो सूखे दौर में फसलों को सहारा दे सकती है और कृषि उत्पादन पर सकारात्मक असर डाल सकती है।

प्रशासन का मानना था कि पांच प्रतिशत भूमि जल संरक्षण के लिए देने का लाभ लंबे समय में मिल सकता है। खेत में अधिक पानी रुकने और मिट्टी में नमी बने रहने से बाकी भूमि की उत्पादकता बेहतर हो सकती है। इसी सोच के आधार पर पांच प्रतिशत भूमि का लक्ष्य चुना गया। हालांकि पांच प्रतिशत का यह आंकड़ा किस वैज्ञानिक आधार पर तय किया गया, इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

मॉडल का तर्क सीधा है। खेतों में कुछ समय तक रुका वर्षा जल धीरे-धीरे जमीन में समा सकता है। इससे भूजल रिचार्ज बढ़ता है, मिट्टी में नमी बनी रहती है और सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है। यही सिद्धांत देश के कई जल संरक्षण कार्यक्रमों की आधारशिला भी रहा है।

इस पहल को केवल प्रशासनिक कार्यक्रम के रूप में नहीं चलाया गया। ग्राम सभाओं, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय समुदायों को इसमें शामिल करने की कोशिश की गई। कई स्थानों पर मनरेगा के माध्यम से श्रम और संसाधन जुटाए गए, जबकि ग्रामीणों ने तालाबों और जल संरचनाओं के रखरखाव में भी भागीदारी की। प्रशासन का मानना था कि जब लोग इन संरचनाओं को अपनी संपत्ति मानते हैं, तो उनका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है।

दरअसल, इस मॉडल की विशेषता केवल पांच प्रतिशत भूमि का विचार नहीं है। इसकी असली ताकत उस सोच में है जो जल संरक्षण को इंजीनियरिंग परियोजना के बजाय सामुदायिक प्रक्रिया के रूप में देखने की कोशिश करती है। यही कारण है कि कोरिया का यह प्रयोग केवल एक तकनीकी मॉडल नहीं माना जा रहा। इसे स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन के एक नए प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।

मॉडल के दावे क्या हैं?

कोरिया जिले के 5% मॉडल को लेकर सबसे अधिक चर्चा इसके परिणामों को लेकर हुई है। जिला प्रशासन, जल शक्ति मंत्रालय और विभिन्न सरकारी प्रस्तुतियों में इस पहल को जल संरक्षण की एक सफल मिसाल के रूप में पेश किया गया है। लेकिन इन दावों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वास्तव में क्या बदलाव दर्ज किए गए हैं और उनके पीछे उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं।

जल शक्ति मंत्रालय की मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1,260 से अधिक किसानों ने 5% रिचार्ज मॉडल अपनाया, 2,000 से अधिक सोख्ता गड्ढे बनाए गए और 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन किया गया। प्रशासन का तर्क है कि इन संरचनाओं ने वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर रोकने और उसे जमीन में समाने का अवसर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपलब्ध स्रोतों के अनुसार अभियान के विस्तार के साथ सोख्ता गड्ढों की संख्या में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, सोख्ता गड्ढों की संख्या 2024 के लगभग 2,000 से बढ़कर 2025 में करीब 30,000 तक पहुंच गई।

इन दावों का स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन अभी सीमित है। विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी मॉडल की सफलता का आकलन दीर्घकालिक निगरानी से ही संभव है।

सबसे महत्वपूर्ण दावा भूजल स्तर में सुधार को लेकर किया गया है। रिपोर्ट कहती है कि कई गांवों में भूजल स्तर में 3 से 4 मीटर तक सुधार दर्ज किया गया है। CGWB आधारित आंकड़े बताते हैं कि, मानसून के बाद औसत भूजल स्तर 2024 में 6.6 मीटर बीजीएल (Below Ground Level) से घटकर 2025 में 3.89 मीटर बीजीएल हो गया। हालांकि इन आंकड़ों का स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन अभी उपलब्ध नहीं है।

अभियान से जुड़े एक अन्य दावे का संबंध प्राकृतिक जल स्रोतों से है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार जिले की 17 दूरस्थ आदिवासी बस्तियों में कई झरने और प्राकृतिक जल स्रोत फिर सक्रिय हुए हैं। पहाड़ी और वन क्षेत्रों में झरनों का पुनर्जीवन केवल पेयजल उपलब्धता ही नहीं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी और आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्रशासन का यह भी दावा है कि खेतों में नमी बढ़ने और सिंचाई की स्थिति में सुधार से खेती से जुड़ी गतिविधियों को फ़ायदा पहुंचता है। प्रशासनिक रिपोर्टों में भी इसका ज़िक्र है कि अभियान के बाद कई किसानों ने खेत स्तर पर सोख्ता गड्ढे और रिचार्ज संरचनाएं अपनाईं। अधिकारियों का दावा है कि इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने और सूखे दौर में फसलों को सहारा देने में मदद मिली। हालांकि इन प्रभावों का स्वतंत्र कृषि अध्ययन अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

यहीं पर इस मॉडल के मूल्यांकन का महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। जल संरक्षण परियोजनाओं में अक्सर निर्माण कार्यों की संख्या को सफलता का संकेतक मान लिया जाता है। लेकिन किसी भी हस्तक्षेप का वास्तविक प्रभाव यह देखकर आंका जाता है कि क्या जलस्तर में सुधार लंबे समय तक बना रहता है, क्या स्थानीय समुदाय संरचनाओं का रखरखाव करता है और क्या कृषि तथा पेयजल उपलब्धता में स्थायी परिवर्तन दिखाई देते हैं।

भूजल स्तर में परिवर्तन को समझना भी आसान नहीं है। किसी एक वर्ष में अच्छी वर्षा होने पर भी जलस्तर बेहतर दिखाई दे सकता है। इसी तरह कम दोहन, फसल पैटर्न में बदलाव या अन्य स्थानीय कारक भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञ आमतौर पर कम से कम तीन से पांच वर्षों के आंकड़ों के आधार पर ही किसी जल संरक्षण मॉडल की दीर्घकालिक सफलता का आकलन करने की सलाह देते हैं।

इसलिए इन दावों को एक संकेत की तरह देखा जा सकता है, अंतिम निष्कर्ष की तरह नहीं। इस पहल की वास्तविक सफलता का पता स्वतंत्र अध्ययनों और दीर्घकालिक निगरानी से ही चलेगा।

फिर भी, उपलब्ध आंकड़े यह संकेत जरूर देते हैं कि स्थानीय स्तर पर जल संचयन और सामुदायिक भागीदारी के संयोजन ने जिले में जल संरक्षण को एक नई चर्चा का विषय बना दिया है।

ACWADAM और सहभागी भूजल प्रबंधन पर काम करने वाले विशेषज्ञों का तर्क है कि भूजल मूलतः एक साझा संसाधन है, लेकिन उसका प्रबंधन अक्सर व्यक्तिगत स्वामित्व की तरह किया जाता है।

इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

कोरिया मॉडल की चर्चा अक्सर उसके 5 प्रतिशत भूमि वाले विचार के कारण होती है, लेकिन कई जल विशेषज्ञों के अनुसार इसकी असली ताकत स्थानीय समुदाय की भागीदारी में है।

भारत में जल संरक्षण की कोई कमी नहीं रही है। पिछले दो दशकों में केंद्र और राज्य सरकारों ने जल संरक्षण, जलागम विकास, तालाब पुनर्जीवन और भूजल रिचार्ज से जुड़ी अनेक योजनाएँ चलाई हैं। लाखों जल संरचनाएं बनी हैं और इन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद कई क्षेत्रों में जल संकट बना हुआ है। इसका एक कारण यह माना जाता है कि अनेक परियोजनाएँ निर्माण कार्य तक सीमित रह गईं, जबकि उनके दीर्घकालिक रखरखाव और स्थानीय स्वामित्व पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

पुणे स्थित भूजल शोध संस्था ACWADAM और सहभागी भूजल प्रबंधन पर काम करने वाले विशेषज्ञों का तर्क है कि भूजल मूलतः एक साझा संसाधन है, लेकिन उसका प्रबंधन अक्सर व्यक्तिगत स्वामित्व की तरह किया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण तभी टिकाऊ बनता है, जब स्थानीय लोग उसकी जिम्मेदारी भी साझा करें। कोरिया मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यही है। इसमें लोगों को योजना और रखरखाव दोनों में शामिल करने की कोशिश की गई है।

कोरिया मॉडल इसी सोच पर आधारित दिखाई देता है। यहां जल संरक्षण को केवल इंजीनियरिंग परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई। ग्राम सभाओं को योजना का हिस्सा बनाया गया, स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा गया और महिलाओं तथा युवाओं को जल संरक्षण गतिविधियों में शामिल किया गया।

नीर नायिका और जल दूत जैसे स्थानीय समूह भी इस अभियान का हिस्सा थे। जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं ने नीर नायिका के रूप में घर-घर जाकर जल संरक्षण का संदेश फैलाया। उन्होंने परिवारों को सोख्ता गड्ढे बनाने के लिए भी प्रेरित किया। युवाओं ने जल दूत के रूप में कई गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने खाइयों का मानचित्रण किया, नहरों की सफाई में सहयोग दिया और नुक्कड़ नाटक तथा दीवार लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक किया। रिपोर्ट के अनुसार, 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों के पुनर्जीवन में सामुदायिक श्रमदान की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कोरिया मॉडल की
चर्चा केवल जल संरक्षण संरचनाओं तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक बहस से भी जुड़ता है जिसमें विशेषज्ञ केवल भूजल रिचार्ज नहीं, बल्कि भूजल के उपयोग और प्रबंधन पर भी जोर दे रहे हैं।

हालांकि यह मान लेना सही नहीं होगा कि समुदाय के सभी लोगों की भागीदारी एक जैसी होती है। कई जल प्रबंधन अध्ययनों ने दिखाया है कि महिलाओं, छोटे किसानों, भूमिहीन परिवारों और आदिवासी समुदायों की भागीदारी अक्सर अलग-अलग स्तरों पर होती है। इसलिए किसी भी सामुदायिक मॉडल का मूल्यांकन केवल भागीदारी की मात्रा से नहीं, बल्कि उसकी समावेशिता से भी किया जाना चाहिए।

यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जल संरचनाओं की सफलता केवल उनके निर्माण पर नहीं, बल्कि उनके रखरखाव पर भी निर्भर करती है। तालाबों की सफाई न होने, सोख्ता गड्ढों के भर जाने या जल निकासी मार्ग बाधित हो जाते हैं। नतीजतन, कुछ सालों में संरचनाओं का प्रभाव कम होने लगता है। इसके विपरीत, सामुदायिक स्वामित्व की भावना इन संरचनाओं को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायक हो सकती है।

कई जल संरक्षण कार्यक्रमों का अनुभव बताता है कि केवल संरचनाएं बना देना पर्याप्त नहीं होता। उनकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि स्थानीय समुदाय उनके रखरखाव और उपयोग में कितनी सक्रिय भूमिका निभाता है।

हालांकि सामुदायिक भागीदारी को किसी जादुई समाधान की तरह भी नहीं देखा जा सकता। ग्रामीण समाज एक समान नहीं होता। गांवों में सभी लोगों की भागीदारी एक जैसी नहीं होती। जमीन, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रभाव जैसी बातें अक्सर तय करती हैं कि किसकी बात सुनी जाएगी और किसकी नहीं। इसलिए किसी भी सामुदायिक मॉडल की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसमें छोटे किसानों, भूमिहीन परिवारों, महिलाओं और आदिवासी समुदायों की भागीदारी कितनी वास्तविक है।

यहीं पर कोरिया मॉडल से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं। यदि इस पहल ने लोगों को जल संरक्षण से जोड़ने में सफलता पाई है, तो इसका असर केवल भूजल स्तर तक सीमित नहीं रहेगा। यह जल संरक्षण को स्थानीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

भूजल प्रबंधन की बड़ी तस्वीर में यह मॉडल कहां खड़ा है?

कोरिया मॉडल की चर्चा केवल जल संरक्षण संरचनाओं तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक बहस से भी जुड़ता है जिसमें विशेषज्ञ केवल भूजल रिचार्ज नहीं, बल्कि भूजल के उपयोग और प्रबंधन पर भी जोर दे रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भूजल संरक्षण केवल रिचार्ज बढ़ाने का सवाल नहीं है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उपलब्ध पानी का उपयोग कैसे हो रहा है। किसी भी पहल की सफलता का पता उसके लंबे समय के असर से चलता है।

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी यह सोच महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के अनेक हिस्सों में वर्षा की कुल मात्रा से अधिक उसका वितरण बदल रहा है। कम दिनों में अधिक वर्षा होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

बदलते वर्षा पैटर्न के बीच स्थानीय स्तर पर पानी रोकने की आवश्यकता और बढ़ गई है। इस लिहाज से कोरिया मॉडल जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सीख देता है।

क्या यह मॉडल पूरे देश में लागू हो सकता है?

कृषि जनगणना 2015-16
के अनुसार देश की लगभग 86 प्रतिशत जोतें छोटे और सीमांत किसानों के पास हैं।

कोरिया जिले के 5% मॉडल की चर्चा बढ़ने के साथ एक स्वाभाविक सवाल भी सामने आता है कि क्या इसे देश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जा सकता है? पहली नजर में यह विचार सरल और आकर्षक लगता है। पहली नजर में यह विचार सरल लगता है। खेत का एक छोटा हिस्सा जल संरक्षण के लिए इस्तेमाल कर बारिश का पानी रोका जाए, तो भूजल स्तर में सुधार हो सकता है। लेकिन जमीन पर इसे लागू करना उतना आसान नहीं है।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि भूजल संकट हर जगह एक जैसा नहीं होता, इसलिए किसी एक मॉडल को पूरे देश में बिना बदलाव लागू नहीं किया जा सकता। हर क्षेत्र की वर्षा, भूगर्भीय स्थिति और जल उपयोग की चुनौतियां अलग होती हैं। इसलिए किसी एक जगह सफल मॉडल को दूसरे क्षेत्र में मूल रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

सबसे पहले भूमि के प्रश्न को ही लें। कोरिया मॉडल का आधार किसानों द्वारा अपनी भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के लिए उपलब्ध कराना है। लेकिन भारत के कई राज्यों में कृषि जोत लगातार छोटी होती जा रही है।

कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार देश की लगभग 86 प्रतिशत जोतें छोटे और सीमांत किसानों के पास हैं। ऐसे किसानों के लिए अपनी जमीन का पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के लिए छोड़ना आसान नहीं हो सकता। खासकर तब, जब उनकी कुल जमीन पहले से ही बहुत कम हो। 

यही वजह है कि किसी भी जल संरक्षण मॉडल का मूल्यांकन केवल तकनीकी आधार पर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि छोटे किसान उसमें भाग ले सकते हैं या नहीं। साथ ही, जल संरक्षण के भविष्य के लाभ और वर्तमान आय पर पड़ने वाले असर के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।

दूसरा सवाल वर्षा और भौगोलिक परिस्थितियों का है। कोरिया में अपेक्षाकृत अधिक बारिश होती है। यहां समस्या पानी की कमी से ज्यादा उसे संभालकर रखने की रही है। लेकिन देश के सभी हिस्सों की स्थिति ऐसी नहीं है।

राजस्थान के शुष्क इलाकों, बुंदेलखंड और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में बारिश कम और अनिश्चित होती है। इसलिए वहाँ जल संरक्षण के उपाय भी अलग हो सकते हैं। इसी तरह मैदानी, पहाड़ी और चट्टानी क्षेत्रों में पानी के जमीन में समाने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है। ऐसे में एक ही मॉडल हर जगह समान परिणाम नहीं दे सकता।

तीसरा सवाल समुदाय की भागीदारी का है। कोरिया मॉडल की सफलता काफी हद तक इसी पर निर्भर मानी जा रही है। लेकिन हर गांव में सहमति बनाना आसान नहीं होता। जमीन और पानी के इस्तेमाल को लेकर अक्सर अलग-अलग हित और मतभेद होते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि छोटे किसान, महिलाएं और आदिवासी समुदाय भी फैसलों में शामिल हों। उनकी भागीदारी के बिना ऐसे मॉडल की सफलता सीमित रह सकती है।

जल संरक्षण केवल संरचनाएं बनाने का मामला नहीं है। जमीन में अधिक पानी पहुंचने से मदद जरूर मिलती है, लेकिन यदि पानी का उपयोग भी लगातार बढ़ता रहे, तो लंबे समय में इसका लाभ कम हो सकता है।

इसीलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भूजल प्रबंधन में पानी को बचाने और उसके उपयोग, दोनों को साथ-साथ देखना चाहिए। केवल पानी को जमीन में पहुंचाना पर्याप्त नहीं है, उसके उपयोग पर भी नजर रखना जरूरी है।

कोरिया मॉडल की सबसे बड़ी सीख शायद उसे उसी रूप में दोहराने में नहीं, बल्कि उसके मूल विचारों में है। यह स्थानीय स्तर पर वर्षा जल को रोकने, समुदाय को योजना का हिस्सा बनाने और जल संरचनाओं के रखरखाव को साझा जिम्मेदारी मानने पर जोर देता है। यही ऐसे सिद्धांत हैं जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरतों के अनुसार अपनाया जा सकता है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जल संरक्षण के लिए कोई एक तरीका हर जगह काम नहीं कर सकता। अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरतें और चुनौतियां भी अलग हैं। इसी वजह से कोरिया मॉडल को किसी तैयार नुस्खे की तरह नहीं देखना चाहिए। इसकी असली सीख इसके मूल विचारों में है।

यह मॉडल दिखाता है कि जल संरक्षण केवल बड़े निवेश या नई तकनीकों का सवाल नहीं है। स्थानीय स्तर पर पानी को समझना, समुदाय को साथ जोड़ना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कोरिया मॉडल की सबसे बड़ी सीख शायद पांच प्रतिशत भूमि का विचार नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि जल संरक्षण को स्थानीय समुदायों से जोड़ना होगा। लोगों की भागीदारी और साझा जिम्मेदारी के बिना ऐसे प्रयास लंबे समय तक टिक नहीं पाते।

दूसरे जल संरक्षण प्रयोगों से मिलने वाली सीख 

कोरिया का 5% मॉडल भले ही हाल के वर्षों में चर्चा में आया हो, लेकिन समुदाय की भागीदारी के साथ जल संरक्षण का विचार भारत के लिए नया नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई प्रयोग हुए हैं। इनसे पता चलता है कि जल संकट का समाधान केवल तकनीकी उपायों में नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका में भी छिपा है।

राजस्थान के अलवर जिले का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। 1980 और 1990 के दशक में स्थानीय समुदायों और नागरिक संगठनों ने मिलकर पारंपरिक जोहड़ों को दोबारा कारगर बनाया। इन छोटे जल संचयन ढांचों ने बारिश का पानी रोकने में मदद की और कई इलाकों में भूजल स्तर बेहतर हुआ। इस पहल की खास बात यह थी कि स्थानीय लोग खुद जल संरक्षण की प्रक्रिया का हिस्सा बने।

महाराष्ट्र में भी पिछले दो दशकों में जल संरक्षण के कई प्रयोग हुए हैं। जलयुक्त शिवार अभियान जैसे कार्यक्रमों में नालों का सुधार, छोटे बाँधों और जल संचयन संरचनाओं के निर्माण पर जोर दिया गया। इन पहलों को लेकर अलग-अलग मत रहे हैं और कुछ अध्ययनों ने इनके प्रभाव पर सवाल भी उठाए हैं। फिर भी उन्होंने वर्षा जल संरक्षण को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया। 

आंध्र प्रदेश का सामुदायिक भूजल प्रबंधन कार्यक्रम (APFAMGS) एक अलग उदाहरण है। इसमें केवल जल संरचनाएं बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया। किसानों को भूजल, जल बजट और फसल चयन की जानकारी भी दी गई। कई गांवों में लोगों ने मिलकर यह समझने की कोशिश की कि उपलब्ध पानी के अनुसार खेती की योजना कैसे बनाई जाए।

इस अनुभव ने दिखाया कि भूजल संकट का समाधान केवल रिचार्ज बढ़ाने में नहीं, बल्कि पानी के बेहतर उपयोग में भी है। FAO के अनुसार इस कार्यक्रम ने किसानों को भूजल और जल उपयोग को बेहतर ढंग से समझने में मदद की। इससे वे उपलब्ध पानी के अनुसार खेती की योजना बना सके।

इसी तरह कच्छ में सहभागी भूजल प्रबंधन पर काम किया गया। अर्घ्यम की इस पहल के तहत जल सुरक्षा योजनाएं तैयार की गईं और भूजल निगरानी को मजबूत किया गया। इस अनुभव ने दिखाया कि भूजल प्रबंधन केवल पानी को जमीन में पहुंचाने का नहीं, बल्कि बेहतर योजना और निगरानी का भी सवाल है।

जल संरक्षण केवल संरचनाएं बनाने का मामला नहीं है। जमीन में अधिक पानी पहुंचने से मदद जरूर मिलती है, लेकिन यदि पानी का उपयोग भी लगातार बढ़ता रहे, तो लंबे समय में इसका लाभ कम हो सकता है।

गुजरात, कर्नाटक और तेलंगाना के कई हिस्सों में भी ऐसे प्रयोग हुए हैं, जिनमें स्थानीय संस्थाओं को जल प्रबंधन में भूमिका दी गई। इन पहलों के परिणाम अलग-अलग रहे, लेकिन एक बात लगभग सभी जगह समान दिखाई देती है। जहां समुदाय निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बना, वहां प्रयास अधिक टिकाऊ साबित हुए।

इन अनुभवों से एक और महत्वपूर्ण सीख मिलती है। जल संरक्षण केवल पानी रोकने का सवाल नहीं है। पानी को जमीन में पहुंचाने के साथ-साथ उसके उपयोग पर भी ध्यान देना जरूरी है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ केवल भूजल रिचार्ज नहीं, बल्कि भूजल प्रबंधन की बात करते हैं।

कोरिया मॉडल को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। अलवर के अनुभव ने समुदाय की ताकत दिखाई, जबकि APFAMGS ने उपलब्ध पानी के अनुसार खेती की योजना बनाने का महत्व बताया। कोरिया मॉडल इन दोनों विचारों को निजी कृषि भूमि से जोड़ने की कोशिश करता है।

इसकी सफलता केवल खेत तालाबों, सोख्ता गड्ढों या रिचार्ज संरचनाओं से नहीं आंकी जाएगी। असली सवाल यह है कि क्या लोग इन संरचनाओं का रखरखाव जारी रखते हैं और क्या जल उपयोग के प्रति अधिक जिम्मेदार व्यवहार विकसित होता है।

भारत के अनुभव बताते हैं कि जल संरक्षण का कोई एक तरीका हर जगह काम नहीं करता। लेकिन स्थानीय भागीदारी, सामुदायिक जिम्मेदारी और पानी के समझदारी भरे उपयोग की भूमिका लगभग हर सफल पहल में दिखाई देती है। इसी वजह से कोरिया मॉडल को भारत में सामुदायिक जल प्रबंधन की विकसित होती परंपरा की एक नई कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।

पानी बचाने की लड़ाई केवल संरचनाओं की नहीं

कोरिया जिले का 5% मॉडल अभी भी एक विकसित होता हुआ प्रयोग है। इसके दीर्घकालिक परिणामों को समझना अभी बाकी है। इसके कई दावों की स्वतंत्र अध्ययनों से पुष्टि भी होनी है। फिर भी इस पहल ने जल संरक्षण पर एक महत्वपूर्ण चर्चा को आगे बढ़ाया है।

पिछले कुछ दशकों में भारत में जल संरक्षण के लिए लाखों संरचनाएं बनाई गई हैं। तालाबों का पुनर्जीवन हुआ है, चेक डैम बने हैं और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया गया है। इन प्रयासों से कई जगह सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं। लेकिन अनुभव बताते हैं कि केवल संरचनाएं बना देना पर्याप्त नहीं होता। उनका रखरखाव, लोगों की भागीदारी और पानी के जिम्मेदार उपयोग पर भी उतना ही ध्यान देना पड़ता है।

कोरिया मॉडल की सबसे बड़ी सीख शायद पांच प्रतिशत भूमि का विचार नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि जल संरक्षण को स्थानीय समुदायों से जोड़ना होगा। लोगों की भागीदारी और साझा जिम्मेदारी के बिना ऐसे प्रयास लंबे समय तक टिक नहीं पाते।

जलवायु परिवर्तन के दौर में इस सोच का महत्व पहले भी अधिक हो जाता है। वर्षा का स्वरूप बदल रहा है और कई क्षेत्रों में पानी पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में स्थानीय स्तर पर पानी बचाने और उसका बेहतर प्रबंधन करने की जरूरत पहले से अधिक है।

संभव है कि कोरिया मॉडल हर जगह उसी रूप में काम न करे। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण संदेश जरूर देता है। जल सुरक्षा केवल सरकारों या योजनाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें स्थानीय समुदायों की भी बड़ी भूमिका है।

शायद यही इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत है। यह याद दिलाता है कि पानी बचाने की लड़ाई केवल संरचनाओं की नहीं, बल्कि लोगों, संस्थाओं और सामूहिक प्रयासों की भी है।

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