इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में एक सवाल लगातार उभर रहा है कि ईंधन तो मिल जाएगा, लेकिन इसके लिए आवश्यक पानी कहाँ से आएगा?

इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में एक सवाल लगातार उभर रहा है कि ईंधन तो मिल जाएगा, लेकिन इसके लिए आवश्यक पानी कहाँ से आएगा?

चित्र: ruralvoice 

इथेनॉल तो मिलेगा, लेकिन पानी कहाँ से आएगा?

ऊर्जा सुरक्षा के लिए बढ़ते इथेनॉल उत्पादन का भारत के जल संसाधनों, भूजल और जल गुणवत्ता पर क्या असर पड़ रहा है?
Published on
16 min read
  • E20 लक्ष्य के साथ बढ़ रही है इथेनॉल की मांग।

  • एक लीटर इथेनॉल के पीछे छिपी है बड़ी जल लागत।

  • मक्का समाधान है या जल दबाव का नया रूप?

  • ऊर्जा सुरक्षा के साथ जल सुरक्षा का सवाल भी अहम।

भारत में
पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का स्तर 2013-14 में लगभग 1.5 फ़ीसद था, जो 2023-24 में बढ़कर 15 फ़ीसद से अधिक हो गया।

पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की बढ़ती दौड़

भारत ने पिछले एक दशक में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol) को ऊर्जा सुरक्षा, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की रणनीति के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में अपनाया है। इसी उद्देश्य से सरकार ने पेट्रोल में 20 फ़ीसद इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में लगातार प्रगति का दावा किया जा रहा है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का स्तर 2013-14 में लगभग 1.5 फ़ीसद था, जो 2023-24 में बढ़कर 15 फ़ीसद से अधिक हो गया। इसी अवधि में इथेनॉल आपूर्ति भी तेज़ी से बढ़ी है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2023-24 में तेल विपणन कंपनियों को लगभग 707 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति की गई। 

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, 30 सितंबर 2024 तक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (EBP) के माध्यम से देश को लगभग 1,08,655 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत हुई है। मंत्रालय का यह भी दावा है कि इसी अवधि में कार्यक्रम ने किसानों को लगभग 92,409 करोड़ रुपये के भुगतान में योगदान दिया है।

नीति निर्माताओं के अनुसार, यह कार्यक्रम किसानों की आय बढ़ाने, चीनी उद्योग को स्थिरता देने और ऊर्जा क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

सफल दिख रही कहानी का एक दूसरा पक्ष

इथेनॉल कार्यक्रम की इस सफलता की कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर कम चर्चा होती है। यह पक्ष पानी से जुड़ा है। भारत में इथेनॉल उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों पर आधारित है। इन फसलों की खेती प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी मात्रा में जल संसाधनों पर निर्भर होती है। 

वर्तमान में देश के अनेक हिस्से भूजल स्तर में गिरावट, अनियमित मानसून, बढ़ती सिंचाई मांग और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जल संकट का सामना कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपनाई जा रही यह रणनीति जल सुरक्षा को किस हद तक प्रभावित कर रही है।

दरअसल, इथेनॉल की चर्चा अक्सर कार्बन उत्सर्जन, किसानों की आय और तेल आयात में कमी तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसी भी जैव ईंधन की वास्तविक लागत का आकलन केवल आर्थिक या पर्यावरणीय लाभों से नहीं किया जा सकता। यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि एक लीटर इथेनॉल तैयार करने के लिए खेतों, नहरों, भूजल भंडारों और औद्योगिक संयंत्रों से पानी की कितनी मात्रा की खपत होती है।

भारत में इथेनॉल उत्पादन
का बड़ा हिस्सा गन्ने से जुड़े उत्पादों, मोलासेस, बी-हैवी मोलासेस और सीधे गन्ने के रस से आता है। इस व्यवस्था ने चीनी उद्योग को अतिरिक्त आय का स्रोत दिया है, लेकिन जल संसाधनों पर इसके प्रभाव को लेकर बहस लगातार तेज़ हुई है।

खेत से ईंधन टैंक तक पानी की यात्रा

जब हम एक लीटर इथेनॉल की बात करते हैं, तो आमतौर पर हमारा ध्यान डिस्टिलरी और ईंधन संयंत्रों पर जाता है। लेकिन इथेनॉल की वास्तविक जल-खपत को समझने के लिए इसकी पूरी उत्पादन श्रृंखला को देखना होगा।

सबसे बड़ा जल उपयोग उस फसल की खेती में होता है जिससे इथेनॉल बनाया जाता है। भारत में लंबे समय तक इथेनॉल उत्पादन मूल रूप से गन्ने पर आधारित रहा है। गन्ना देश की सबसे अधिक पानी मांगने वाली फसलों में से एक माना जाता है। 

इसके बाद प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) चरण आता है। चीनी मिलों और डिस्टिलरी में भी पानी की ज़रूरत होती है। हालांकि आधुनिक संयंत्रों में जल पुनर्चक्रण (वाटर रीसाइक्लिंग) और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज जैसी तकनीकों को अपनाया जा रहा है। फिर भी उद्योग स्तर पर पानी की मांग बनी रहती है। 

इथेनॉल के जल फुटप्रिंट को लेकर विभिन्न अध्ययनों में अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं, लेकिन अधिकांश शोध यह संकेत देते हैं कि इसका सबसे बड़ा जल भार खेती के चरण में होता है।

<div class="paragraphs"><p>एक लीटर इथेनॉल के पीछे हजारों लीटर पानी खर्च हो सकता है।</p></div>

एक लीटर इथेनॉल के पीछे हजारों लीटर पानी खर्च हो सकता है।

चित्र: ruralvoice 

Water Footprint Network की Gerbens-Leenes et al., 2009 रिपोर्ट के अनुसार, गन्ने से एक लीटर इथेनॉल उत्पादन का वैश्विक औसत वाटर फुटप्रिंट लगभग 2,855 लीटर पानी है। 

अन्य अध्ययनों में यह आंकड़ा 2,400 से 2,800 लीटर प्रति लीटर इथेनॉल के बीच पाया गया है। इसका अर्थ है कि इथेनॉल उत्पादन में उपयोग होने वाला अधिकांश पानी डिस्टिलरी में नहीं, बल्कि उस फसल की सिंचाई में खर्च होता है जिससे यह ईंधन तैयार किया जाता है।

एक लीटर इथेनॉल केवल एक औद्योगिक उत्पाद नहीं है। इसके पीछे खेतों, नहरों, ट्यूबवेल और डिस्टिलरी की एक लंबी जल-श्रृंखला जुड़ी हुई है।

गन्ना: इथेनॉल उत्पादन की ज्यादा पानी लेने वाली फसल

भारत में इथेनॉल उत्पादन का बड़ा हिस्सा गन्ने से जुड़े उत्पादों, मोलासेस, बी-हैवी मोलासेस और सीधे गन्ने के रस से आता है। इस व्यवस्था ने चीनी उद्योग को अतिरिक्त आय का स्रोत दिया है, लेकिन जल संसाधनों पर इसके प्रभाव को लेकर बहस लगातार तेज़ हुई है।

महाराष्ट्र इस बहस का सबसे प्रमुख उदाहरण है। राज्य देश के कुल गन्ना क्षेत्र का लगभग 10 से 11 फ़ीसद हिस्सा रखता है, लेकिन सिंचाई जल का एक बड़ा भाग गन्ने की खेती में उपयोग होता है। यह स्थिति विशेष रूप से मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में चिंता का विषय बनती है, जहां बार-बार सूखा, अनिश्चित वर्षा और भूजल पर बढ़ती निर्भरता पहले से ही जल संकट को गहरा करती रही है।

2016 के सूखे के दौरान लातूर सहित कई शहरों और गांवों में पेयजल संकट इतना गंभीर हो गया था कि रेलगाड़ियों के माध्यम से पानी पहुंचाना पड़ा। उस समय जल संसाधनों की प्राथमिकता को लेकर व्यापक बहस हुई, क्या सीमित पानी का उपयोग पेयजल के लिए होना चाहिए, सिंचाई के लिए या फिर उद्योगों के लिए?

जल संरक्षण पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल फसल चयन का प्रश्न नहीं, बल्कि जल शासन का भी मुद्दा है। उनके अनुसार, जल उपयोग से जुड़े निर्णय स्थानीय समुदायों की भागीदारी और क्षेत्रीय जल उपलब्धता को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए।

इसी संदर्भ में जल विशेषज्ञ यह सवाल उठाते हैं कि जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में गन्ना आधारित इथेनॉल उत्पादन का विस्तार कितना टिकाऊ होगा। उनका तर्क है कि इथेनॉल नीति का मूल्यांकन केवल ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक लाभों के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय जल उपलब्धता, भूजल स्थिति और सामाजिक प्रभावों को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए।

<div class="paragraphs"><p>Water Footprint Network की Gerbens-Leenes et al., 2009 रिपोर्ट के अनुसार, गन्ने से एक लीटर इथेनॉल उत्पादन का वैश्विक औसत वाटर फुटप्रिंट लगभग 2,855 लीटर पानी है।</p></div>

Water Footprint Network की Gerbens-Leenes et al., 2009 रिपोर्ट के अनुसार, गन्ने से एक लीटर इथेनॉल उत्पादन का वैश्विक औसत वाटर फुटप्रिंट लगभग 2,855 लीटर पानी है।

चित्र: ruralvoice 

कर्नाटक में भी इसी तरह की बहस उभर रही है। राज्य देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है और हाल के वर्षों में यहाँ इथेनॉल उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ी है। बागलकोट, बेलगावी और विजयपुरा जैसे जिलों में गन्ना आधारित उद्योगों का विस्तार हुआ है, जबकि यही क्षेत्र वर्षा की अनिश्चितता और भूजल पर बढ़ती निर्भरता जैसी चुनौतियों का सामना भी कर रहे हैं।

कर्नाटक का अनुभव बताता है कि इथेनॉल विस्तार और जल उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है।

वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में उत्पादित फसलों का जल दबाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अब केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय जल-स्मार्ट बायोफ्यूल नीति की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ अब केवल आर्थिक उत्पादकता नहीं, बल्कि ‘जल उत्पादकता’ को भी नीति निर्माण का आधार बनाने की बात कर रहे हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, जल उत्पादकता का अर्थ है पानी की एक इकाई से प्राप्त होने वाले उत्पादन या आर्थिक मूल्य का आकलन। जल-संकट वाले क्षेत्रों में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

बिहार का उभरता इथेनॉल मॉडल: क्या मक्का समाधान है?

हाल के वर्षों में सरकार ने मक्का आधारित इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया है। इसके पीछे प्रमुख तर्क यह है कि मक्का को आमतौर पर गन्ने की तुलना में कम पानी की ज़रूरत होती है और इसे विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। इसी कारण इथेनॉल उद्योग अब केवल गन्ना उत्पादक राज्यों तक सीमित नहीं रह गया है।

इस बदलाव के केंद्र में बिहार जैसे राज्य हैं। देश के प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में शामिल बिहार को अब इथेनॉल उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में अनाज आधारित डिस्टिलरियों में निवेश को प्रोत्साहन दिया है और कई नई परियोजनियों को मंजूरी दी है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे किसानों को नया बाजार मिलेगा और राज्य में औद्योगिक निवेश बढ़ेगा।

जल-फुटप्रिंट
किसी उत्पाद या फसल के उत्पादन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग किए गए कुल पानी का आकलन करता है।

लेकिन इस विस्तार के साथ जल संसाधनों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आता है। बिहार को अक्सर जल-समृद्ध राज्य माना जाता है क्योंकि यहाँ बड़ी नदियां हैं और हर वर्ष बाढ़ की स्थिति बनती है। इसके बावजूद राज्य के अनेक हिस्से सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के आंकड़े बताते हैं कि कई जिलों में भूजल दोहन लगातार बढ़ रहा है, जबकि कुछ क्षेत्रों में जल गुणवत्ता भी चिंता का विषय बनी हुई है।

यही बिहार का जल विरोधाभास है, एक ओर बाढ़ और प्रचुर वर्षा, दूसरी ओर कृषि और उद्योग के लिए भूजल पर बढ़ती निर्भरता। यदि मक्का आधारित इथेनॉल उत्पादन बड़े पैमाने पर विस्तार करता है, तो यह समझना आवश्यक होगा कि अतिरिक्त पानी कहां से आएगा और उसका प्रभाव स्थानीय जल संतुलन पर क्या पड़ेगा।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मक्का गन्ने की तुलना में कम पानी मांगता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसका जल प्रभाव नगण्य है। यदि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मक्का विस्तार होता है, तो जल मांग भी बढ़ सकती है। इसके अलावा मक्का खाद्य और पशु आहार श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और जल उपयोग के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि मक्का की ओर बदलाव तभी टिकाऊ होगा जब इसे स्थानीय जल उपलब्धता और कृषि जरूरतों के अनुरूप लागू किया जाए।

जल-फुटप्रिंट क्या बताता है?

जल-फुटप्रिंट किसी उत्पाद या फसल के उत्पादन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग किए गए कुल पानी का आकलन करता है। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि जैव ईंधनों का वाटर फुटप्रिंट उनके स्रोत और उत्पादन प्रणाली के आधार पर काफी अलग हो सकता है।

भारत में किए गए शोध बताते हैं कि गन्ना आधारित इथेनॉल का वाटर फुटप्रिंट विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक होता है जहां सिंचाई के लिए भूजल का व्यापक उपयोग किया जाता है। 

दूसरी ओर, वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में उत्पादित फसलों का जल दबाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अब केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय जल-स्मार्ट बायोफ्यूल नीति की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।

उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार गन्ने से बने इथेनॉल का जल फुटप्रिंट आमतौर पर मक्का आधारित इथेनॉल की तुलना में अधिक पाया गया है, हालांकि यह स्थानीय जलवायु, सिंचाई पद्धति और उत्पादन प्रणाली के अनुसार बदल सकता है।

<div class="paragraphs"><p>इथेनॉल विस्तार और जल उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है।</p></div>

इथेनॉल विस्तार और जल उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है।

चित्र: ruralvoice 

डिस्टिलरी की अपनी प्यास

इथेनॉल के जल फुटप्रिंट की चर्चा अक्सर खेती तक सीमित रह जाती है, लेकिन उत्पादन प्रक्रिया का औद्योगिक चरण भी जल संसाधनों पर प्रभाव डालता है। डिस्टिलरी में फ़रमेंटेशन, कूलिंग, बॉयलर संचालन और सफाई जैसी प्रक्रियाओं के लिए पानी की ज़रूरत होती है।

हालांकि आधुनिक संयंत्रों में जल रीसाइक्लिंग तकनीकों के उपयोग से ताज़े पानी की मांग कम करने की कोशिश की जा रही है। फिर भी उत्पादन बढ़ने के साथ कुल जल उपयोग का सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है।

डिस्टिलरी उद्योग की एक प्रमुख पर्यावरणीय चुनौती ‘स्पेंट वॉश’ (spent wash) है, जो इथेनॉल उत्पादन के दौरान निकलने वाला अत्यधिक प्रदूषित अपशिष्ट जल होता है। विभिन्न तकनीकी अध्ययनों और CSIR-CSMCRI के अनुसार, गन्ना आधारित डिस्टिलरियों में एक लीटर इथेनॉल उत्पादन पर लगभग 8 से 15 लीटर तक स्पेंट वॉश उत्पन्न हो सकता है। 

इसकी जैविक और रासायनिक प्रदूषण क्षमता इतनी अधिक होती है कि बिना उपचार के इसे नदियों, जलाशयों या भूमि पर छोड़ना गंभीर पर्यावरणीय खतरा पैदा कर सकता है। इसी कारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) डिस्टिलरी उद्योग को ‘रेड कैटेगरी’ में रखता है।

इसी चुनौती को देखते हुए CPCB और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों ने नई डिस्टिलरियों के लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) प्रणाली को बढ़ावा दिया है। इसके तहत अपशिष्ट जल का उपचार कर उसे दोबारा उपयोग में लाने का प्रयास किया जाता है। इसके बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में डिस्टिलरी प्रदूषण को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। 

स्पष्ट है कि केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। पर्यावरणीय अनुपालन और जल प्रबंधन की प्रभावी निगरानी भी उतनी ही ज़रूरी है।

जल-संकट वाले क्षेत्रों में ऊर्जा फसलों के विस्तार का आकलन केवल आर्थिक लाभों के आधार पर नहीं किया जा सकता। जल उपलब्धता, भूजल स्तर और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को नीति निर्माण के केंद्र में रखना आवश्यक है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ कृषि और पेयजल पहले से दबाव में हैं।

हिमांशु ठक्कर, जल नीति विश्लेषक, कॉर्डिनेटर (SANDRP)

केवल पानी की मात्रा नहीं, गुणवत्ता का भी सवाल

इथेनॉल उत्पादन पर होने वाली चर्चा अक्सर पानी की खपत तक सीमित रहती है, लेकिन जल विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पर्यावरणीय प्रभावों को समझने के लिए जल गुणवत्ता के प्रश्न को भी शामिल करना आवश्यक है।

डिस्टिलरियों से निकलने वाला अपशिष्ट जल, जिसे स्पेंट वॉश (Spent Wash) कहा जाता है, अत्यधिक जैविक और रासायनिक प्रदूषण वाला होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, यदि इसका उचित उपचार न किया जाए तो यह सतही जल स्रोतों और भूजल दोनों को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण डिस्टिलरी उद्योग को प्रदूषण की दृष्टि से 'रेड कैटेगरी' उद्योगों में रखा गया है।

हालांकि पिछले कुछ सालों में नई डिस्टिलरियों के लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) जैसी व्यवस्थाओं को अनिवार्य बनाया गया है। फिर भी विभिन्न राज्यों में प्रदूषण को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। 

पंजाब के ज़ीरा में स्थानीय समुदायों ने एक डिस्टिलरी पर भूजल और सतही जल प्रदूषण का आरोप लगाते हुए लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन किया था। इसके बाद 2022 में NGT और पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) के हस्तक्षेप के बाद संयंत्र के संचालन पर कार्रवाई हुई थी।

ज़ीरा में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान स्थानीय ग्रामीणों ने बार-बार यह चिंता जताई कि उनके लिए सबसे बड़ा सवाल केवल उद्योग की मौजूदगी नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई ग्रामीणों का कहना था कि क्षेत्र के कुछ बोरवेलों के पानी में दुर्गंध आने लगी थी और लोग उसे पीने योग्य नहीं मानते थे। 

स्थानीय समुदायों का आरोप था कि इससे उनकी खेती, पशुपालन और स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। हालांकि उद्योग प्रबंधन ने इन आरोपों से इनकार किया, लेकिन यह विवाद इस बात का उदाहरण बन गया कि जल संसाधनों से जुड़े प्रश्न स्थानीय स्तर पर कितने संवेदनशील हो सकते हैं।

इसी तरह तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी डिस्टिलरी अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर समय-समय पर शिकायतें दर्ज की गई हैं। हालांकि सभी मामलों में प्रदूषण सिद्ध नहीं हुआ। लेकिन इन घटनाओं ने यह सवाल ज़रूर उठाया है कि इथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ निगरानी व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए।

जल विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी इथेनॉल परियोजना का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह कितना पानी उपयोग करती है, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह स्थानीय जल स्रोतों की गुणवत्ता को किस हद तक प्रभावित कर सकती है। ऐसे में जल मात्रा और जल गुणवत्ता दोनों को साथ लेकर चलना ही दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए आवश्यक होगा।

Also Read
कालाहांडी में जल संकट: पाइपलाइन के बावजूद पानी नहीं, भूजल गिरा, पानी की गुणवत्ता बिगड़ी
<div class="paragraphs"><p>इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में एक सवाल लगातार उभर रहा है कि ईंधन तो मिल जाएगा, लेकिन इसके लिए आवश्यक पानी कहाँ से आएगा? </p></div>

भारत में सिंचाई और ऊर्जा नीतियों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता, क्योंकि दोनों का सीधा असर भूजल पर पड़ता है। उनके अनुसार, किसी भी नई ऊर्जा रणनीति का आकलन स्थानीय जल संसाधनों और भूजल स्थिति के संदर्भ में भी किया जाना चाहिए।

तुषार शाह, वैज्ञानिक और जल नीति विशेषज्ञ, अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान के भूतपूर्व सदस्य वैज्ञानिक

भूजल पर बढ़ता दबाव

इथेनॉल उत्पादन और जल उपयोग के बीच संबंध को समझने के लिए भारत की भूजल स्थिति पर भी नज़र डालना जरूरी है। देश की सिंचाई व्यवस्था का बड़ा हिस्सा आज भी भूजल पर निर्भर है। ऐसे में गन्ना एवं मक्का जैसी फसलों के विस्तार से कई क्षेत्रों में इस संसाधन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) और राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए 2024 के गतिशील भूजल संसाधन आकलन (Dynamic Ground Water Resource Assessment) के अनुसार, देश की 6,796 आकलन इकाइयों में से 751 इकाइयां (11.13 फ़ीसद) ‘अतिदोहित’ (Over-exploited) श्रेणी में हैं। 

इसके अलावा 206 इकाइयां ‘क्रिटिकल’ और 711 ‘अर्ध-क्रिटिकल’ श्रेणी में आती हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर भूजल रिचार्ज में सुधार और दोहन दर में कुछ कमी दर्ज की गई है। लेकिन कई राज्यों में भूजल पर दबाव अब भी गंभीर बना हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) के पूर्व वैज्ञानिक और जल नीति विशेषज्ञ तुषार शाह लंबे समय से जल–ऊर्जा–कृषि संबंधों पर काम करते रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत में सिंचाई और ऊर्जा नीतियों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों का सीधा असर भूजल पर पड़ता है। उनके अनुसार, किसी भी नई ऊर्जा रणनीति का आकलन स्थानीय जल संसाधनों और भूजल स्थिति के संदर्भ में भी किया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य इस संदर्भ में विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि ये गन्ना और इथेनॉल उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। महाराष्ट्र की 359 आकलन इकाइयों में से बड़ी संख्या अभी भी विभिन्न स्तरों के भूजल दबाव का सामना कर रही है। वहीं, कर्नाटक में भूजल सुधार के कुछ संकेत मिलने के बावजूद कई तालुक वर्षा की अनिश्चितता और सिंचाई पर बढ़ती निर्भरता से जूझ रहे हैं। 

राज्य सरकारों ने जल संरक्षण, रिचार्ज संरचनाओं और सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा दिया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जल-गहन फसलों के विस्तार के साथ इन प्रयासों की प्रभावशीलता पर लगातार नज़र रखना आवश्यक होगा।

जल संसाधन विशेषज्ञों का कहना है कि इथेनॉल नीति का मूल्यांकन केवल ऊर्जा सुरक्षा या किसानों की आय के संदर्भ में नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ इथेनॉल उत्पादन के विस्तार वाले क्षेत्रों में जल उपलब्धता, भूजल पुनर्भरण और कृषि जल मांग के बीच संतुलन पर भी निगरानी रखनी होगी। 

स्थानीय जल परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजनाएँ लागू करने पर भविष्य में कृषि, उद्योग और पेयजल आवश्यकताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि भारत कितना इथेनॉल उत्पादन कर सकता है, बल्कि यह भी है कि इसके लिए आवश्यक पानी कहां से आएगा और उसका दीर्घकालिक प्रभाव स्थानीय जल संसाधनों पर क्या होगा।

उद्योग क्या कहता है?

इथेनॉल उद्योग का तर्क है कि इसे केवल पानी के उपयोग की नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार और उद्योग संगठनों का कहना है कि इस कार्यक्रम से देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई है और तेल आयात पर निर्भरता कम हुई है। इसके अलावा, किसानों को अपनी उपज के लिए एक अतिरिक्त बाजार भी मिला है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, 2013-14 में लगभग 1.5 फ़ीसद रहा इथेनॉल मिश्रण स्तर 2023-24 में 15 फ़ीसद से अधिक हो गया। मंत्रालय का दावा है कि इस कार्यक्रम के कारण देश को अब तक एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिली है और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आई है। सरकार का यह भी कहना है कि इथेनॉल आपूर्ति श्रृंखला के विस्तार से किसानों और चीनी मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है।

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के अनुसार, इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने चीनी क्षेत्र में अधिशेष उत्पादन की समस्या को कम करने में मदद की है। पहले अतिरिक्त चीनी भंडारण और निर्यात पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन अब गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इससे चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है और किसानों को भुगतान में भी मदद मिली है।

उद्योग संगठन भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा निर्माता संघ (ISMA) का कहना है कि नई डिस्टिलरियों में जल दक्षता बढ़ाने, अपशिष्ट जल उपचार और ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ जैसी तकनीकों को अपनाया जा रहा है।

उद्योग का दावा है कि आधुनिक संयंत्रों में पानी के पुनर्चक्रण और ऊर्जा दक्षता पर पहले की तुलना में अधिक ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही गन्ने पर निर्भरता कम करने के लिए खेती के अवशेषों, टूटे चावल, मक्का और अन्य फीडस्टॉक से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।

Also Read
हर घर सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के लिए कैसे काम कर रहा है भारत?
<div class="paragraphs"><p>इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में एक सवाल लगातार उभर रहा है कि ईंधन तो मिल जाएगा, लेकिन इसके लिए आवश्यक पानी कहाँ से आएगा? </p></div>

हालांकि जल विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी तकनीकी सुधार का मूल्यांकन उसके वास्तविक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, जल दक्ष डिस्टिलरियां और वैकल्पिक फीडस्टॉक निश्चित रूप से सकारात्मक कदम हैं। लेकिन इथेनॉल नीति की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उत्पादन विस्तार को स्थानीय जल उपलब्धता और भूजल स्थिति के अनुरूप कैसे संतुलित किया जाता है।

जल नीति विश्लेषक और SANDRP के कॉर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर का मानना है कि जल-संकट वाले क्षेत्रों में ऊर्जा फसलों के विस्तार का आकलन केवल आर्थिक लाभों के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि जल उपलब्धता, भूजल स्तर और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को नीति निर्माण के केंद्र में रखना आवश्यक है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ कृषि और पेयजल पहले से दबाव में हैं।

जल और ऊर्जा के बीच संतुलन कैसे बने?

भारत के सामने चुनौती केवल इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि यह विस्तार जल संसाधनों की कीमत पर न हो।

इसके लिए कुछ कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं:

  • इथेनॉल उत्पादन से पहले क्षेत्रीय जल उपलब्धता का आकलन।

  • जल-संकट वाले क्षेत्रों में गन्ना विस्तार पर पुनर्विचार।

  • माइक्रो-इरिगेशन और जल दक्ष खेती को बढ़ावा।

  • फसल चयन में जल उत्पादकता को नीति का हिस्सा बनाना।

  • डिस्टिलरियों में जल पुनर्चक्रण और अपशिष्ट प्रबंधन की सख्त निगरानी।

  • कृषि अवशेषों और गैर-खाद्य स्रोतों से इथेनॉल उत्पादन पर निवेश।

  • राज्य स्तर पर जल बजट और इथेनॉल नीति के बीच बेहतर समन्वय।

दुनिया में भी जारी है यह बहस

इसी तरह अमेरिका में मक्का-आधारित इथेनॉल को लेकर जल उपयोग, जल गुणवत्ता और कृषि संसाधनों पर इसके प्रभाव को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ जल उपलब्धता और पर्यावरणीय प्रभावों को भी नीति निर्माण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

क्या इथेनॉल नीति में जल बजट शामिल है?

भारत की इथेनॉल नीति में ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और तेल आयात में कमी जैसे लक्ष्य स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, लेकिन जल संसाधनों की भूमिका अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ अब यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इथेनॉल उत्पादन के विस्तार को स्थानीय जल उपलब्धता और भूजल स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है।

वर्तमान व्यवस्था में नई डिस्टिलरी परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति और जल उपयोग से संबंधित विभिन्न अनुमतियां लेनी होती हैं। परियोजना प्रस्तावों में पानी के स्रोत, दैनिक जल आवश्यकता और अपशिष्ट जल प्रबंधन की जानकारी भी देनी पड़ती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना-स्तर के आकलन और नदी बेसिन या जलग्रहण क्षेत्र स्तर की जल उपलब्धता के आकलन के बीच अभी भी एक अंतर मौजूद है। कई मामलों में यह स्पष्ट नहीं होता कि किसी क्षेत्र में एक साथ स्थापित होने वाली अनेक परियोजनियों का जल संसाधनों पर संयुक्त प्रभाव क्या होगा।

इसी तरह, जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में फीडस्टॉक चयन का प्रश्न भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। सरकार ने हाल के वर्षों में मक्का, टूटे चावल और अन्य अनाजों से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया है। सरकार का तर्क है कि मक्का जैसे कुछ फीडस्टॉक गन्ने की तुलना में अपेक्षाकृत कम पानी की मांग करते हैं और इथेनॉल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं।

यही कारण है कि कई शोधकर्ता और जल नीति विशेषज्ञ ‘वाटर-स्मार्ट बायोफ्यूल प्लानिंग’ की आवश्यकता पर जोर देते हैं। उनका तर्क है कि जिस तरह ऊर्जा क्षेत्र में लंबी अवधि की मांग और आपूर्ति का आकलन किया जाता है, उसी तरह इथेनॉल उत्पादन की योजनाओं को भी जल उपलब्धता, भूजल पुनर्भरण और जलवायु जोखिमों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। अन्यथा ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में हासिल की गई प्रगति भविष्य में जल सुरक्षा की नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा की राह में जल सुरक्षा को न भूलें

इथेनॉल भारत की ऊर्जा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यह तेल आयात पर निर्भरता कम करने और उत्सर्जन घटाने में भूमिका निभा सकता है। लेकिन किसी भी हरित समाधान का मूल्यांकन केवल उसके कार्बन लाभों से नहीं किया जा सकता।

जलवायु परिवर्तन, भूजल क्षरण और बढ़ती जल मांग के दौर में यह समझना आवश्यक है कि ऊर्जा और पानी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि इथेनॉल उत्पादन की नीति जल संसाधनों की वास्तविक लागत को ध्यान में रखकर आगे बढ़ती है, तभी इसे दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ कहा जा सकेगा।

महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे जल-संकटग्रस्त राज्यों से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे उभरते इथेनॉल केंद्रों तक, भारत के अनुभव यह संकेत देते हैं कि ऊर्जा परिवर्तन की सफलता केवल उत्पादन क्षमता से नहीं, बल्कि संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से तय होगी।

आखिरकार, सवाल केवल यह नहीं है कि भारत कितना इथेनॉल बना सकता है। सवाल यह भी है कि उसे बनाने के लिए कितना पानी खर्च करने को तैयार है।

Also Read
क्या है जल सुरक्षा: भारत की चुनौतियां और समाधान
<div class="paragraphs"><p>इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में एक सवाल लगातार उभर रहा है कि ईंधन तो मिल जाएगा, लेकिन इसके लिए आवश्यक पानी कहाँ से आएगा? </p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org