

गंगा नदी के भागलपुर क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण के कारण मछलियों की संख्या घटने के साथ-साथ महिलाओं की सेहत प्राभवित हो रही है।
कम उम्र में लड़कियों का विवाह, महिलाओं में गर्भाशय से जुड़ी बीमारियां और उन पर आजीविका का बोझ यहां आम बात है।
एक अध्ययन ने भी इस बात की पुष्टि की है कि महिलाओं में संक्रमण का सबसे बड़ा कारण गंदा पानी और दूषित वातावरण है।
अध्ययन में लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं में Pelvic Inflammatory Disease पायी गईं, जोकि गर्भाशय निकलवाने का मुख्य कारण हैं।
भागलपुर (बिहार)। सुबह की पहली किरण के साथ जब भागलपुर में गंगा नदी पर उजाला फैलता है, तब नावों के साथ-साथ एक और दुनिया जागती है - मछुआर महिलाओं की दुनिया। इन महिलाओं का जीवन नदी के पानी, मछली और उससे जुड़ी आजीविका के इर्द-गिर्द घूमता है। घर का काम ख़त्म करने के बाद इनमें से कुछ नदी में मछली पकड़ने जाती हैं, कुछ औरतें मछलियों को साफ करती हैं तो कुछ उन्हें बाजार में बेचती हैं। एक चीज़ है जिससे इन सभी महिलाओं का दैनिक जीवन गहराई से जुड़ा हुआ है- वो है गंगा नदी का दूषित पानी। प्रदूषण का स्तर इन महिलाओं की सेहत को इतना अधिक प्रभावित कर रहा है कि वे अपना गर्भाशय निकलवाने को मजबूर हैं।
मुश्किल ये है कि ये महिलाएं इस प्रदूषित पानी से दूर नहीं जा सकतीं, क्योंकि इनकी रोजी-रोटी इसी पर टिकी है। सेहत का हाल यह है कि इन महिलाओं में कमजोरी, शरीर में दर्द और पेट संबंधी बीमारिया आम हैं। बीते वर्षों में गर्भाशय से जुड़ी बीमारियां भी तेज़ी से बढ़ी हैं, और ये एक बड़ी चिंता का विषय है।
भागलपुर में गंगा किनारे महिला
फोटो - नीतू सिंह
भागलपुर के गंगा किनारे बसे राघवपुर बिन टोली जैसे गाँवों में मछुआरा समुदाय की जिंदगी पीढ़ियों से नदी के साथ चलती आई है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मछलियों की संख्या कम होने से समुदाय की मुश्किलें बढ़ी हैं। इसका असर केवल पुरुषों की आजीविका पर नहीं, बल्कि महिलाओं की जिंदगी पर भी पड़ा है। पुरुषों के काम की तलाश में बाहर जाने के बाद घर, बच्चों और मछलियों को पकड़ने व उनके रखरखाव की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा महिलाओं के कंधों पर आ जाता है।
राघवपुर बिन टोली की रत्ना कुमारी (स्वास्थ्य संबंधी विवरण की गोपनीयता के चलते नाम बदला हुआ) बताती हैं कि उनकी जाति के करीब 150-200 लोग यहां रहते हैं। ज्यादातर पुरुष रोजगार के लिए बाहर चले जाते हैं। वह कहती हैं, “पहले गंगा में मछली ज्यादा थी, अब कम हो गई हैं। पुरुषों को बाहर कमाने जाना पड़ता है। महिलाओं को पूरा दिन दूषित पानी, गंदगी और दूषित वातावरण में बिताना पड़ता है। इस वजह से बहुत-सी बीमारियां हो रही हैं, ऐसी बीमारियां जिनके बारे में हम खुलकर बता नहीं पाते।”
रत्ना की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी। शादी के थोड़े दिन के बाद ही उन्हें अंदरूनी समस्याएं हनोे लगी थीं। वह कहती हैं, “मैंने मैट्रिक तक ही पढाई की है। उसके बाद की पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ता है इसलिए आगे नहीं पढ़ सकी। स्कूल छूटने के तुरंत बाद मेरी शादी हो गई। छोटी उम्र से ही मुझे सफेद पानी की समस्या थी। शुरू से ही सफेद पानी गिरता था। शरीर में कमजोरी लगती थी। खेती-किसानी का काम रहा, मजदूरी भी करते तो कभी ढंग से इलाज नहीं करवा पाये।”
समय पर इलाज नहीं करवा पाने की वजह से रत्ना की जिंदगी में बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती गई। वह बताती हैं, “बहुत साल तक सफेद पानी निकलता रहा (योनि से सफेद पानी आने की बीमारी को लिकोरिया कहते हैं)। शरीर में दर्द रहता था। दरअसल मेरी बच्चेदानी में दिक्कत हो गई थी। जब दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया तो मजबूरन ऑपरेशन करवाकर बच्चेदानी निकलवा दी।”
गर्भाशय निकलवाने के बाद भी उनकी तकलीफ खत्म नहीं हुई। रत्ना बताती हैं, “पहले पीठ में दर्द रहता था, सिर में दर्द होता था और चक्कर भी आते थे। ऑपरेशन के बाद थोड़ा आराम मिला, लेकिन अभी भी जोड़ों और कमर में दर्द रहता है। शरीर सुन्न पड़ जाता है। होम्योपैथी दवा भी चल रही है, पता नहीं कब पूरा आराम मिलेगा।”
गंगा नदी के तट पर बर्तन मांजती महिलाएं
फोटो - नीतू सिंह
सबसे चिंता की बात यह है कि अब उनकी 15 साल की बेटी को भी लिकोरिया से ग्रसित है। रत्ना कहती हैं, “मेरी बेटी को भी सफेद पानी निकलता है। यहां ज्यादातर महिलाओं को यह समस्या है। पेट में दर्द और जलन भी रहती है। समय रहते दिखा ले तो शायद बच जाएं।”
राघवपुर की ही दूसरी महिला रमा सैनी (नाम बदला हुआ) बताती हैं कि यहां महिलाओं के लिए इलाज कराना आसान नहीं है। वो बताती हैं, “यहां लिकोरिया की बहुत दिक्कत होती है। मुझे भी पांच-छह साल से यह समस्या है। पैसा होगा तभी इलाज कराएंगे। यहां हम महिलाओं के पास पैसा नहीं होता इसलिए वे इलाज नहीं करा पातीं। ज्यादा दिक्कत होने पर डॉक्टर ऑपरेशन करने को कहते हैं। हमको डर रहता है कि कहीं गर्भाशय में कैंसर न हो जाए।”
वह बताती हैं, “इस बस्ती में 14-15 साल की उम्र में शादी हो जाती है। लड़कियां आगे की पढ़ाई कर नहीं पातीं, इसलिए जल्दी शादी हो जाती है। जब पैसा नहीं होता तो कमाने के लिए महिलाएं कहां जाएं क्या करें?”
राघवपुर और आसपास की बस्तियों में महिलाओं के गर्भाशय निकलवाने के कई मामले सामने आये हैं। चालीस वर्षीय सुषमा देवी (नाम बदला हुआ) भी अपना गर्भाशय निकलवा चुकी हैं। वह बताती हैं, “एक साल पहले यूट्रस निकलवा दिया था। हमारी बच्चेदानी में घाव हो गए थे। करीब एक लाख रुपये खर्च हुआ। कर्ज लेकर ऑपरेशन करवाया। क्या करते, जरूरी था।”
सुषमा देवी भी बताती हैं कि करीब एक साल पहले डॉक्टर ने गर्भाशय में समस्या बताकर ऑपरेशन की सलाह दी थी। सुषमा कहती हैं, “बच्चेदानी में दिक्कत निकली तो डॉक्टर ने ऑपरेशन बताया। अभी एक साल होने वाला है। बहुत कमजोरी महसूस होती है। जोड़ों और कमर में दर्द रहता है। पहले बहुत लिकोरिया निकलता था। डॉक्टर ने कहा कि यूट्रस बढ़ गया है। सफेद पानी बहुत साल से निकल रहा था।”
वो आगे कहती हैं, “इलाज करवाया दवाइयां खाई पर कोई आराम नहीं मिला। लिकोरिया तो शादी से पहले से आता था। होम्योपैथी की दवा की। मेरी बेटी को भी सफेद पानी निकलता है। वह 15 साल की है। यहां ज्यादातर महिलाओं को यह समस्या है।”
यहाँ रहने वाली जानकी सैनी (नाम बदला हुआ) बताती हैं कि उनकी माँ ने सफेद पानी रोकने के लिए जड़ी-बूटी का इस्तेमाल किया था। कुछ दिन ठीक रहा अभी फिर वही दिक्कत है। मेरी बेटी को भी सफेद पानी निकलने की शिकायत है। दवा तो करवा रही हूँ पर कोई फायदा नहीं हो रहा।
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के साथ जुड़कर काम कर रहीं सोनी कुमारी मछुवारी महिलाओं के स्वास्थ्य पर कम करती हैं। सोनी कुमारी बताती हैं, “इस इलाके में 13-14 साल की बच्चियों में ही लिकोरिया की शिकायत होने लगती है। 30-35 साल की उम्र में कई महिलाएं यूट्रस निकलवा देती हैं। पहले दवाइयां खाती हैं जब इन्हें आराम नहीं मिलता तो ये यूट्रस निकलवा देती हैं। उन्हें यह डर भी रहता है कि कहीं कैंसर न हो जाए।”
सोनी कुमारी आगे बताती हैं कि एक बस्ती में 200-300 घर हैं और कई जगहों पर तीन-चार महिलाएं गर्भाशय निकलवा चुकी हैं। हम सात टोले में काम करते हैं। हर जगह यही समस्या दिखाई देती है। हर दूसरी महिला लिकोरिया की शिकायत बताती है।
सार्वजनिक शौचालय जिसकी साफ-सफाई का कोई ठिकाना नहीं
फोटो - नीतू सिंह
सदर अस्पताल भागलपुर के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. राजू कुमार ने बातचीत में मछुआर समुदाय की स्वास्थ्य समस्याओं की सबसे बड़ी वजह स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता की कमी को बताया।
डॉ. राजू कुमार कहते हैं, “नदी के किनारे रहने वाले लोग हाइजीन मेंटेन नहीं कर पाते। सरकार की क्या योजनाएं हैं उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए और क्या किया जा सकता है, इसकी जानकारी का उनमें अभाव है। सरकार बहुत कुछ सप्लाई करती है जैसे सैनिटरी पैड। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को महिलाओं और किशोरियों को जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है।”
वह आगे बताते हैं कि इस इलाके में व्हाइट डिस्चार्ज की समस्या है और लोग समय पर साफ-सफाई तथा इलाज पर ध्यान नहीं दे पाते। PID की वजह से बच्चेदानी में सूजन हो जाती है जिस वजह से लोगों को यूट्रस निकलवाना पड़ता है। कम उम्र में यूट्रस नहीं निकलवाना चाहिए लेकिन महिलाओं को तकलीफ ज्यादा होती है तो वे निकलवा देती हैं। ऐसा कोई अध्यादेश नहीं है कि यूट्रस नहीं निकलवाना चाहिए लेकिन हमारी कोशिश है कि लोग साफ-सफाई का ध्यान रखें, समय पर इलाज करवाएं और यूट्रस निकलवाने से बचें।
स्थानीय आशा कार्यकर्ता आशा कुमारी बताती हैं कि आयुष्मान भारत योजना और आभा कार्ड जैसी योजनाओं के जरिए लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, लेकिन जागरूकता और पहुंच अब भी बहुत सीमित है।
राघवपुर बिनटोली की आशा कार्यकर्त्ता आशा देवी ने बताया कि यहाँ महिलाओं और लड़कियों में लिकोरिया की समस्या बहुत ज्यादा है
फोटो - नीतू सिंह
इन व्यक्तिगत अनुभवों के पीछे एक व्यापक तस्वीर भी है। Wildlife Conservation Trust (WCT) के Riverine Ecosystems and Livelihoods Programme (REAL) के तहत बिहार के गंगीय मैदानों में मछुआर समुदायों के बीच स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी स्थितियों को समझने के लिए एक अध्ययन किया गया। यह अध्ययन गंगा नदी के तट से लगे शहरों में किया गया जहां मछुआरा समुदाय के लोग रहते हैं। इनमें भागलपुर और पश्चिम चंपारण भी शामिल हैं।
इस अध्ययन के लिए सरयू शर्मा जो Ashoka Trust for Research in Ecology and the Environment, बेंगलुरु में M.Sc. Conservation Practice की छात्रा हैं, ने REAL टीम के साथ मिलकर शोध किया। इसका उद्देश्य भागलपुर और पश्चिम चंपारण जिलों में मछुआर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याओं को समझना और यह देखना था कि महिलाओं तथा उनके परिवारों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कितनी है।
अध्ययन में नौ गांवों की 77 महिलाओं से बातचीत की गई। इन महिलाओं की उम्र 15 से 68 वर्ष के बीच थी। महिलाओं के समूहों के साथ फोकस ग्रुप चर्चा की गई और आशा कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों तथा सरकारी अधिकारियों से भी बातचीत की गई। साथ ही पीने के पानी की गुणवत्ता की निगरानी की गई।
अध्ययन में पीने के पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन, नाइट्रेट और E. coli जैसे तत्व निर्धारित सीमा से थोड़े अधिक पाए गए। भागलपुर में जहां पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचाने की व्यवस्था है, वहां भी महिलाओं ने पानी की आपूर्ति नियमित नहीं होने और साफ-सफाई की स्थिति खराब होने की बात बताई। वहीं पश्चिम चंपारण के बगाहा इलाके में अधिकांश परिवार अब भी ट्यूबवेल पर निर्भर हैं। वहां गंदे पानी और ठोस कचरे के निस्तारण की उचित व्यवस्था नहीं है।
बगाहा में टाइफाइड, दस्त और Pelvic Inflammatory Disease (PID) जैसी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आईं। अध्ययन में लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं में PID पाया गया।
हैंडपम्प जिसका पानी यहां के लोग पीते हैं
फोटो - नीतू सिंह
अध्ययन में शामिल 37 महिलाओं में से 11 ने बताया कि PID के कारण उन्हें सर्जरी करानी पड़ी और उनका गर्भाशय निकाल दिया गया। शोध में यह भी सामने आया कि इन महिलाओं ने PID के इलाज के लिए दवा की बजाय सर्जरी को प्राथमिकता दी। बातचीत से संकेत मिला कि लगातार होने वाला दर्द इसका एक प्रमुख कारण था। इससे यह सवाल उठता है कि महिलाओं को बीमारी के इलाज के उपलब्ध विकल्पों और उससे जुड़े फैसलों की पर्याप्त जानकारी मिल रही है या नहीं।
अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में टाइफाइड, किडनी स्टोन, पित्ताशय की पथरी, दस्त,सफेद पानी, गैस, मौसमी एलर्जी और गठिया शामिल हैं। गठिया की समस्या खासकर बुजुर्ग महिलाओं में अधिक पाई गई।
पद्रौना के एक सरकारी डॉक्टर ने भी मछुआर महिलाओं में इन्हीं स्वास्थ्य शिकायतों के अधिक सामने आने की बात कही। उन्होंने पोषण की कमी को महिलाओं की एक बड़ी समस्या बताया। एक अन्य डॉक्टर के अनुसार PID के संभावित कारणों में पानी में अधिक आयरन, पोषण की कमी और पति के कई सेक्सुअल पार्टनर होना शामिल हो सकते हैं। डॉक्टरों ने सामान्य तौर पर सर्जरी से पहले दवा से इलाज की सलाह देने की बात कही।
भागलपुर में गंगा किनारे इालका
फोटो - नीतू सिंह
महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं को सिर्फ बीमारी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। जिस पर्यावरण में वे रहती हैं, वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी भी उनकी मुश्किल बढ़ाती है। रमा सैनी बताती हैं, “पानी का कोई साधन नहीं है। सरकारी शौचालय भी नहीं हैं। नहाने, कपड़े धोने और बर्तन धोने के लिए गंगा जी में ही जाना पड़ता है। नाली नहीं बनी है। पानी की निकासी की कोई जगह नहीं है।”
किसी के घर में शौचालय नहीं है तो सामुदायिक जगह का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में पानी, स्वच्छता और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ी जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।
अध्ययन में भी पाया गया कि कई युवा लड़कियां और महिलाएं किफायती सैनिटरी पैड नहीं खरीद पातीं और मासिक धर्म के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। इससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
स्वास्थ्य का यह संकट केवल शारीरिक नहीं है। आर्थिक अस्थिरता, पुरुषों का रोजगार के लिए पलायन और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी महिलाओं के मानसिक और भावनात्मक दबाव को भी बढ़ाते हैं। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच कई महिलाएं अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दे पातीं।
इन महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं को उनकी आजीविका से अलग करके नहीं देखा जा सकता। नदी में मछली कम होने का सीधा असर परिवारों की आय पर पड़ा है।
मछुआर सोहन सैनी बताते हैं, “मछली का काम तो पुश्तैनी है। 15 साल से मछली धीरे-धीरे कम हुई है। कभी चार-पांच क्विंटल मछली फंस जाती है तो महीना चल जाता है। इसमें बड़ी मछली फंसती है। जब इधर काम नहीं होता तो दिल्ली, मुंबई, गुजरात कहीं भी चले जाते हैं।”
उनकी दिनचर्या भी आसान नहीं है। वो कहते हैं, “सुबह पांच बजे जाते हैं और साढ़े 12 बजे तक वापस आते हैं। फिर तीन-चार बजे चले जाते हैं और रात में कई बार वहीं रहना पड़ता है।”
वह बताते हैं कि मछली का भाव करीब 300-350 रुपये तक चलता है, लेकिन मछली की उपलब्धता लगातार घट रही है।
भागलपुर में अपनी बस्ती में जाल बुनते मछुआरे
फोटो - नीतू सिंह
सुभाष कुमार महतो भी इसी चिंता को सामने रखते हैं। वो कहते हैं, “हम मछुआरे हैं। बाल-बच्चा इसी से चलता है। दो-तीन दिन उधर ही रह जाते हैं। अभी मछली कभी मिलती है, कभी नहीं मिलती। चार-पांच दिन में हजार-1500 रुपये मिलते हैं। बच्चों को नहीं पढ़ा पाते।”
उनका कहना है, “सरकार हम लोगों पर ध्यान नहीं देती। बिहार में रोजगार नहीं है, इसलिए बाहर जाना पड़ता है। अब इतनी मछली भी नहीं है। हमारा कोई जीवन नहीं है। सरकार को हमारे ऊपर भी नजर डालनी चाहिए। बच्चों की चिंता है कि उनका क्या भविष्य होगा?”
सोना देवी की बात इस अस्थिरता को कुछ शब्दों में समेट देती है, “मछली होगी तो खाएंगे, नहीं होगी तो भूखे रहेंगे।”
नदी के किनारे रहने वाले लोगों का जीवन कैसा है ये आपको इन बस्तियों में आकर पता चलेगा। इन बस्तियों में साफ-सफाई की काफी कमी है। पीने के पानी के जो श्रोत हैं उनके चारो तरफ गंदगी है. लड़कियों की कम उम्र में शादी और फिर माँ बनना आम बात है। कम उम्र में शादी और फिर माँ बनने की वजह से ये शारीरिक रूप से कमजोर हैं इनको कुछ न कुछ बीमारी है।
मछली छांटने के काम में हाथ बटाती मछुआर महिला
फोटो - नीतू सिंह
मछली कम होने के बावजूद महिलाएं परिवार की आय बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही हैं। कुछ महिलाएं मछली पकड़ने में सहयोग करती हैं, तो कई दूसरी बस्ती की महिलाओं से मछली खरीदकर उसे दूर के बाजारों में बेचने जाती हैं।
भागलपुर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर सुल्तानगंज ब्लॉक के जहांगीरा गाँव की रहने वाली रमा सैनी बताती हैं, “मछली दूसरों से खरीदते हैं फिर बाजार में बेचने जाते हैं। पूरे टोले की मछली खरीदती हूं। मालदा तक लेकर जाते हैं। रात में स्टेशन के पास सोते हैं और सुबह बेचकर वापस आते हैं।”
उनकी यात्रा कई बार करीब 32 घंटे तक चलती है। वो बताती हैं, “आज दोपहर तीन बजे निकलेंगे तो कल 11 बजे वापस आएंगे। खाना लेकर जाते हैं। रात में वहीं सो जाते हैं। पैसा कमाने के लिए मेहनत तो करनी पड़ती है।”
वह अपने परिवार की स्थिति बताते हुए कहती हैं, “दस लोग हैं घर में। पति बीमार हैं। दो लड़के बाहर कमाते हैं। गंगा जी से ही रोजगार है, बाकी किसी से कुछ नहीं है।”
उनकी चार बेटियां और एक बेटा है। अभी किसी बेटी की शादी नहीं की है और बच्चों को पढ़ा रही हैं। लेकिन आमदनी इतनी नहीं कि बचत की जा सके। रमा कहती हैं, “एक कमाई से पूर्ति नहीं हो सकती। बचाने का तो सोच भी नहीं सकते। खर्चा चल जाए, यही बड़ी बात है।”
उनकी बस्ती की दूसरी महिलाएं भी इसी तरह संघर्ष कर रही हैं। कोई आधा किलो मछली खरीदती है तो कोई पांच किलो तक। फिर उसे बाजार तक ले जाना पड़ता है। नदी किनारे स्थित जहांगीरा बस्ती की स्तिथि यह है कि यहाँ पानी का कोई साधन नहीं इसलिए लोग यहाँ गंगा नदी के गंदे पानी में बर्तन धुलने से लेकर नहाने और कपड़े धुलने तक का पूरा काम इसी में करते हैं।
बरारी के रविन्द्र कुमार बताते हैं कि मछली पकड़ना उनके समुदाय के लिए केवल रोजगार नहीं बल्कि पीढ़ियों पुरानी परंपरा है। रविन्द्र कहते हैं, “हम लोग सदियों से मछली मार रहे हैं। फिशिंग की तकनीक बुजुर्गों को बहुत आती थी। लेकिन अब नदी और मछली पकड़ने का तरीका दोनों बदल रहे हैं।“ वह बताते हैं कि कुछ जालों में छोटी मछलियां भी फंस जाती हैं, जो मछली की अगली पीढ़ी के लिए नुकसानदेह है।
रविन्द्र के अनुसार फरक्का बैराज, जाल के इस्तेमाल और नदी में बदलती परिस्थितियों का भी असर पड़ा है। वह बताते हैं कि बरारी के पास गंगा में करीब 8-10 डॉल्फिन हैं, जबकि पहले यहां बड़ी संख्या में नावें लगी रहती थीं। “अभी आठ-नौ नाव ही बची हैं। पिछले 15 सालों से नाव कम हो गई हैं।”
ये बरारी के डालफिन मित्र हैं इनका नाम रविन्द कुमार है. ये करीब 11 साल से गंगा में डालफिन बचाने का कम कर रहे हैं।
फोटो - नीतू सिंह
महिलाएं भी परिवार की आय में सहयोग के लिए काम करने निकलती हैं। रविन्द्र कहते हैं, “माता-पिता अनपढ़ हैं, इसलिए बच्चे पढ़ नहीं पाते। जब घर में कमाई नहीं होती तो महिलाएं भी थोड़ा-बहुत कमाने के लिए निकल जाती हैं।”
जहांगीरा क्षेत्र के अरुण सैनी बताते हैं कि यहाँ करीब 60 घर मछुआरों के हैं। यहां की बस्ती में बहुत समस्याएं हैं। ठंड में मछली न के बराबर होती है। मछली नहीं होती तो यहां के मछुआरे मजदूरी की तलाश में दिल्ली-पंजाब जाते हैं।
अरुण के लिए बच्चों की शिक्षा सबसे बड़ी चिंता है। वो कहते हैं, “मल्लाह के बाल-बच्चे सब सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। हम अपने बच्चों को प्राइवेट में नहीं पढ़ा सकते। गंगा के पास रहने वालों का जीवन कभी नहीं सुधर सकता। अगर हमारे बच्चे पढ़कर कुछ नहीं कर पाए तो उनकी जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाएगी।”
गंगा के मैदानों में मछुआरा समुदाय की समस्या केवल मछली कम होने या गरीबी तक सीमित नहीं है। नदी का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र, प्रदूषण, रेत खनन, बांधों के कारण जल प्रवाह में बदलाव, नदी किनारे का विकास और अनियंत्रित मछली पकड़ने की प्रथाएं जलीय जीवों के साथ उन समुदायों को भी प्रभावित कर रही हैं जो सदियों से इन पर निर्भर हैं।
मछली की उपलब्धता घटती है तो परिवार की आमदनी घटती है। पुरुष रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं तो महिलाओं पर घर और बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ती है। इलाज महंगा है तो बीमारी लंबे समय तक चलती रहती है। साफ पानी और शौचालय नहीं हैं तो संक्रमण का खतरा बढ़ता है। और जब स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित हो, तो छोटी बीमारी भी बड़ी समस्या में बदल सकती है।
मछुआर समुदाय के लिए यह दोहरी मार है एक तरफ आजीविका का संकट और दूसरी तरफ स्वास्थ्य का।
भागलपुर में छुआरों की बस्ती
फोटो - नीतू सिंह
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के REAL कार्यक्रम के तहत किए गए अध्ययन का निष्कर्ष भी यही संकेत देता है कि केवल स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्य जागरूकता, साफ पानी, स्वच्छता, पोषण, महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच और स्थिर आजीविका इन सभी को एक साथ देखने की जरूरत है।
सोचने वाली बात यह है कि क्या मछुआरा समुदाय को नदी से अलग किए बिना ऐसी आजीविका मिल सकती है, जिससे उनकी आय भी सुरक्षित रहे और नदी तथा उसके जलीय जीव भी?
भागलपुर की मछुआर महिलाओं के लिए यह सवाल और भी गहरा है। वे जिस पानी के सहारे जीवन चलाती हैं, उसी पानी के आसपास साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझती हैं। जिस मछली से घर का चूल्हा जलता है, वही मछली अब पहले की तरह उपलब्ध नहीं है। और जिस समुदाय की नदी तथा डॉल्फिन के संरक्षण में अहम भूमिका है, उसके अपने भविष्य की सुरक्षा अब भी अनिश्चित है।
मछुआर समुदाय की जिंदगी में नदी सिर्फ पानी नहीं है वह रोजगार है, भोजन है, संस्कृति है और पीढ़ियों से चली आ रही पहचान है। लेकिन जब नदी बदलती है तो उसके साथ इन लोगों की जिंदगी भी बदलती है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि गंगा में कितनी मछली बची है या पानी कितना प्रदूषित है। सवाल यह भी है कि गंगा के किनारे रहने वाली उन महिलाओं की सेहत और जिंदगी का क्या होगा, जिनका हर दिन इसी नदी से शुरू होता है।
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