मुंबई में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधन के रूप में मेट्रो को बेहतर और इको फ्रेंडली बनाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मेट्रो लाइन 2B के फेज-1 के सभी पांच स्टेशनों को प्लेटिनम रेटिंग मिलने के रूप में हासिल हुई है।
फोटो : विकी कॉमंस
मुंबई मेट्रो के 5 स्टेशन Platinum Rating के साथ बने ग्रीन मॉडल, जानिए क्यों हैं खास
मुंबई की करीब सवा दो करोड़ की आबादी के कामकाज को सुचारु रूप से चलाने में यहां की सर्वजनिक परिवहन प्रणाली (public transport system) काफी अहम भूमिका निभाती है। इस पब्लिक ट्रांसपोर्ट को और बेहतर और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए हाल के वर्षों में कई बड़े कदम उठाए गए हैं। इस दिशा में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां भी देखने को मिली हैं। हाल ही में ऐसी ही एक बड़ी खबर मेट्रो लाइन 2B के फेज-1 के सभी पांच स्टेशनों को प्लेटिनम रेटिंग (Platinum Rating) मिलने के रूप में सामने आई है।
मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA) के तहत विकसित मेट्रो लाइन 2B के इन स्टेशनों को देश की सबसे उच्च रेटिंग इनके Green Design और Construction के लिए दी गई है। यह द्वारा Indian Green Building Council द्वारा दी जाती है, जो यह दिखाती है कि इन स्टेशनों को बनाते समय पर्यावरण, ऊर्जा बचत और टिकाऊ विकास का खास ध्यान रखा गया है।
किन मेट्रो स्टेशनों को मिला Platinum Rating
मेट्रो लाइन 2B फेज-1 के जिन पांच स्टेशनों को यह रेटिंग मिली है, वे हैं-
देशभक्त एन.जी.आचार्य उद्यान-डायमंड गार्डन (Deshbhakt N.G. Acharya Udyan–Diamond Garden)
छत्रपति शिवाजी महाराज चौक (Chhatrapati Shivaji Maharaj Chowk)
बीएसएनएल स्टेशन (BSNL)
मानखुर्द स्टेशन (Mankhurd)
महाराष्ट्र नगर-मंडाले स्टेशन (Maharashtra Nagar–Mandale)
इन सभी स्टेशनों को IGBC के Green MRTS रेटिंग प्रोग्राम के तहत जांचने के बाद सबसे उच्च स्तर की प्लेटिनम रेटिंग दी गई है। इस रेटिंग प्रोग्राम में भवनों और परिवहन ढांचे की डिजाइन, ऊर्जा उपयोग, जल प्रबंधन, निर्माण सामग्री, यात्री सुविधाओं और नवाचारों का विस्तृत आकलन किया जाता है।
मेट्रो स्टेशन कैसे बने 'ग्रीन'?
यह उपलब्धि इसलिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह सिर्फ एक सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि मुंबई की विशाल आकार वाली सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को एक Sustainable Transport बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके तहत इन स्टेशनों के डिजाइन में ऊर्जा की बचत, पानी का बेहतर इस्तेमाल और पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। मेट्रो स्टेशन सामान्य इमारतों की तुलना में काफी अधिक बिजली की खपत करते हैं। ऐसे में ग्रीन डिजाइन के तहत इन स्टेशनों में कुछ खास तकनीकों को अपनाया गया है-
एलईडी आधारित प्रकाश व्यवस्था : ग्रीन मेट्रो स्टेशनों में पारंपरिक बल्बों और ट्यूबलाइट की जगह एलईडी लाइट्स का उपयोग किया जाता है। एलईडी कम बिजली खर्च करती हैं, अधिक समय तक चलती हैं और कम गर्मी पैदा करती हैं। इससे ऊर्जा की बचत होने के साथ-साथ रखरखाव की लागत भी कम होती है।
ऊर्जा-कुशल एयर कंडीशनिंग : मेट्रो स्टेशनों में बड़ी संख्या में यात्रियों की आवाजाही के कारण एयर कंडीशनिंग पर काफी ऊर्जा खर्च होती है। इसलिए ग्रीन स्टेशनों में उच्च दक्षता वाले एसी सिस्टम लगाए जाते हैं, जो कम बिजली में बेहतर शीतलन प्रदान करते हैं और कार्बन उत्सर्जन को घटाने में मदद करते हैं।
स्मार्ट लाइटिंग कंट्रोल : स्मार्ट लाइटिंग सिस्टम दिन के समय प्राकृतिक रोशनी और यात्रियों की संख्या के अनुसार अपने आप प्रकाश की तीव्रता को नियंत्रित करता है। इससे अनावश्यक रूप से लाइटें जलती नहीं रहतीं और बिजली की खपत में उल्लेखनीय कमी आती है।
मोशन सेंसर आधारित सिस्टम : स्टेशन के शौचालयों, गलियारों, सीढ़ियों और कम उपयोग वाले क्षेत्रों में मोशन सेंसर लगाए जाते हैं। जब किसी व्यक्ति की मौजूदगी दर्ज होती है, तभी लाइट या अन्य उपकरण चालू होते हैं और क्षेत्र खाली होने पर अपने आप बंद हो जाते हैं, जिससे काफी ऊर्जा बचती है।
बिजली की निगरानी और प्रबंधन तंत्र : ग्रीन मेट्रो स्टेशनों में ऊर्जा प्रबंधन प्रणाली (Energy Management System) स्थापित की जाती है, जो हर उपकरण की बिजली खपत पर लगातार नजर रखती है। इससे ऊर्जा की बर्बादी वाले क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें तुरंत ठीक किया जा सकता है और पूरे स्टेशन की ऊर्जा दक्षता बढ़ाई जा सकती है।
बिजली बचत का बड़ा असर : मेट्रो स्टेशनों में इन पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाया गया है। इनसे बिजली की खपत में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई गई है। इससे न केवल परिचालन लागत घटती है, बल्कि बिजली उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
हाल ही में मेट्रो लाइन 2B के पांच स्टेशनों को उनकी ग्रीन डिजाइन और पर्यावरण अनुकूल निर्माण के लिए देश की सबसे उच्च प्लेटिनम टिंग दी गई है।
फोटो : विकी कॉमंस
मुंबई के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि ?
मुंबई दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले महानगरों में शामिल है। यह शहर पहले से ही वायु प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, शहरी बाढ़, हीट वेव, और बिजली की बढ़ती मांग जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन को इको फ्रेंडली बनाना केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन की रणनीति भी है।
इस उपलब्धि से पर्यावरण को होने वाले लाभों की बात की जाए तो सबसे पहला लाभ कार्बन उत्सर्जन में कमी आने का है। क्योंकि, परिवहन क्षेत्र दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत है और अगर अधिक से अधिक लोग निजी वाहनों की बजाय मेट्रो का उपयोग करते हैं तो मुंबई जैसे शहर में यह बदलाव वायु प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। साथ ही इससे यह लाभ भी होंगे-
पेट्रोल और डीजल की खपत कम होगी,
वाहनों से निकलने वाला धुआं घटेगा,
शहरी हीट आइलैंड प्रभाव कम होगा।
बिजली की बचत : इसके अलावा ऊर्जा दक्ष स्टेशन अपने पूरे जीवनकाल में लाखों यूनिट बिजली की बचत कर सकते हैं। कम बिजली की मांग का मतलब है, कम जीवाश्म ईंधन, कम कोयला आधारित बिजली उत्पादन और कम कार्बन उत्सर्जन।
जल संसाधनों पर दबाव कम : वर्षा जल संचयन (rain water harvesting) और जल पुनर्चक्रण (water recycling) जैसी प्रणालियां शहर के पेयजल संसाधनों पर निर्भरता कम करती हैं। भविष्य में जब जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट और बढ़ने पर ऐसी प्रणालियां अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होंगी।
निर्माण क्षेत्र का पर्यावरणीय सोच को बढ़ावा : निर्माण क्षेत्र को देश में हवा की गुणवत्ता (AQI) को खराब करने वाला सबसे बड़ा जिम्मेदार माना जाता है। भारत में भवन निर्माण क्षेत्र देश के कुल कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा उत्पन्न करता है। ऐसे में ग्रीन मेट्रो स्टेशनों के निर्माण की पहल यह संदेश देती है कि बड़े बुनियादी ढांचे भी पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ बनाए जा सकते हैं।
ग्रीन मेट्रो यात्रियों के व्यवहार में भी ला रही बदलाव
ग्रीन मेट्रो स्टेशनों की चर्चा अक्सर ऊर्जा बचत, जल संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण सामग्री तक सीमित रह जाती है, लेकिन इनका एक कम चर्चित पहलू यह भी है कि ये लोगों के यात्रा व्यवहार और पर्यावरण के प्रति सोच को भी बदल रहे हैं। दुनिया के कई शहरों में यह पाया गया है कि जब सार्वजनिक परिवहन सुविधाजनक, स्वच्छ और आधुनिक होता है, तो लोग निजी वाहनों की तुलना में उसका अधिक उपयोग करने लगते हैं। इससे सड़कों पर वाहनों की संख्या कम होती है, ट्रैफिक जाम घटता है और वायु प्रदूषण में कमी आती है।
ग्रीन सर्टिफाइड मेट्रो स्टेशन यात्रियों को यह एहसास भी कराते हैं कि आधुनिक बुनियादी ढांचा पर्यावरण के अनुकूल भी हो सकता है। स्टेशनों में ऊर्जा दक्ष प्रकाश व्यवस्था, जल संरक्षण प्रणालियां, प्राकृतिक रोशनी और हरित डिजाइन जैसे तत्व आम लोगों के बीच टिकाऊ विकास की अवधारणा को प्रत्यक्ष रूप से सामने लाते हैं। कई विशेषज्ञ इसे "लिविंग लैब" यानी ऐसी जगह मानते हैं, जहां लोग रोजमर्रा की जिंदगी में हरित तकनीकों को काम करते हुए देख सकते हैं।
इसके अलावा, ग्रीन मेट्रो स्टेशन शहरों की ब्रांडिंग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज दुनिया के कई शहर खुद को "सस्टेनेबल सिटी" के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक परिवहन प्रणाली किसी शहर की वैश्विक पहचान और निवेश आकर्षित करने की क्षमता को बढ़ाती है। मुंबई जैसे महानगर के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाती है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच भी विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चला जा सकता है। भविष्य में ये स्टेशन देश के अन्य शहरों के लिए एक ऐसे मॉडल के रूप में सामने आ सकते हैं, जहां परिवहन, जलवायु कार्रवाई और टिकाऊ शहरी विकास एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करते हैं।
7 स्टेशनों को पहले भी मिल चुकी है सर्वोच्च रेटिंग
इससे पहले मुंबई मेट्रो लाइन 2A और मुंबई मेट्रो लाइन 7 के स्टेशनों को भी Platinum Rating मिल चुकी है। खास बात यह है कि इन दोनों मेट्रो लाइनों को कार्बन न्यूट्रल (Carbon Neutral) भी घोषित किया जा चुका है, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। MMRDA के मेट्रोपोलिटन कमिश्नर डॉ. संजय मुखर्जी का कहना है कि उनका लक्ष्य सिर्फ यात्रा को आसान बनाना नहीं, बल्कि Green, Safe और Sustainable Commute देना है। यही वजह है कि मेट्रो प्रोजेक्ट्स में शुरुआत से ही पर्यावरण को ध्यान में रखा जा रहा है।
निष्कर्ष: ग्रीन मेट्रो बनेगी ग्रीन सिटी का आधार स्तंभ
पर्यावरण अनुकूल ढंग से बनाए गए मेट्रो लाइन 2B के पांच स्टेशनों को मिली प्लेटिनम रेटिंग इस बात का संकेत है कि भारत का शहरी विकास मॉडल धीरे-धीरे कंक्रीट आधारित विकास से आगे बढ़कर "सतत विकास" की ओर बढ़ रहा है। इससे उम्मीद जगती है कि आने वाले वर्षों में कार्बन बाजार और ESG निवेश बढ़ने के साथ ऐसी परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता और हरित निवेश प्राप्त होने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
जब कोई मेट्रो स्टेशन कम बिजली खर्च करता है, पानी बचाता है, कम कार्बन उत्सर्जित करता है और यात्रियों को बेहतर वातावरण देता है, तब वह केवल एक परिवहन केंद्र नहीं रहता, बल्कि वह भविष्य के शहरों का एक नमूना बन जाता है। इसलिए मुंबई मेट्रो की यह उपलब्धि देश के अन्य शहरों के लिए भी एक संदेश है कि अगर बुनियादी ढांचे को पर्यावरणीय सोच के साथ बनाया जाए, तो विकास और प्रकृति दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। यदि भविष्य के सभी शहरी परिवहन प्रोजेक्ट इसी मॉडल पर विकसित किए जाएं, तो भारत के शहरों के कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
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