बिजवासन का मामला भविष्य की शहरी विकास परियोजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
फ़ोटो: इंडियन रेलवे
क्या बिजवासन रेलवे टर्मिनल दिल्ली की पुरानी जल व्यवस्था पर बन रहा है?
बिजवासन रेलवे टर्मिनल को लेकर पेड़ों की कटाई से आगे जल संबंधी कौन-सा बड़ा सवाल सामने आ रहा है।
साहिबी नदी और नजफगढ़ झील का दिल्ली की जल सुरक्षा से क्या संबंध है।
परियोजना के सार्वजनिक दस्तावेज़ जलग्रहण और जल निकासी के बारे में क्या बताते हैं और क्या नहीं बताते।
क्यों बिजवासन का मामला भविष्य की शहरी विकास परियोजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
दिल्ली के बिजवासन में प्रस्तावित नए रेलवे टर्मिनल के लिए करीब 780 पेड़ काटे जाएंगे। पेड़ों की कटाई को मंजूरी दिए जाने के साथ-साथ नुकसान की भरपाई के लिए वृक्षारोपण की योजना बन चुकी है। लेकिल क्या यह वृक्षारोपण दिल्ली की प्राकृतिक जल व्यवस्था को होने वाले नुकसान को पूरा कर पाएगा?
दरअसल बिजवासन रेलवे टर्मिनल के लिए जिस भूभाग को आवंटित किया गया है वह कभी दिल्ली की प्राकृतिक जल व्यवस्था का हिस्सा था?
रेल मंत्रालय के तहत इस परियोजना को विकसित करने की ज़िम्मेदारी रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) और उत्तरी रेलवे को दी गई है। इसका उद्देश्य नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन जैसे प्रमुख स्टेशनों पर दबाव कम करना है। साथ ही इसके तहत पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली के लिए एक नया रेल केंद्र भी विकसित किया जाएगा। इसके लिए नए प्लेटफॉर्म, स्टेशन परिसर, पहुंच मार्ग और अन्य सहायक अवसंरचना बनाई जानी है।
रेलवे के अनुसार यह परियोजना केवल एक नए स्टेशन का निर्माण नहीं है। इसका उद्देश्य दिल्ली के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर भीड़ कम करना, यात्री सुविधाओं में सुधार करना और स्टेशन को मेट्रो, बस तथा अन्य परिवहन माध्यमों से जोड़कर एक बहु-माध्यमीय (मल्टी-मोडल) परिवहन केंद्र के रूप में विकसित करना भी है।
पेड़ों की कटाई, वन भूमि और पर्यावरणीय स्वीकृतियों को लेकर परियोजना पर कई स्तरों पर आपत्तियां दर्ज हुई हैं। इसी वजह से यह मामला सार्वजनिक बहस के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया तक भी पहुंचा। लेकिन एक पहलू अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा। क्या पर्यावरणीय आकलन में इस क्षेत्र के प्राकृतिक जलग्रहण, स्वाभाविक जल निकासी और नजफगढ़-साहिबी जल परिदृश्य को पर्याप्त महत्व दिया गया है?
साहिबी नदी और नजफगढ़ झील का कैचमेंट एरिया
बिजवासन दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में, दिल्ली-गुरुग्राम सीमा के निकट स्थित है। यह इलाका कभी साहिबी नदी और नजफगढ़ झील से जुड़े विस्तृत जल परिदृश्य का हिस्सा था। नजफगढ़ झील केवल एक मौसमी जलाशय नहीं थी। यह वर्षा जल को रोकने और भूजल को रिचार्ज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इसके साथ ही बाढ़ के अतिरिक्त पानी को समेटकर दिल्ली और हरियाणा की मौलिक जल व्यवस्था को भी संतुलित रखती थी।
इसीलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नया रेलवे टर्मिनल कहां बन रहा है। असली सवाल यह है कि क्या दिल्ली नई विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय उन स्वाभाविक जल क्षेत्रों को भी ध्यान में रख रही है, जिन्होंने सदियों तक शहर के जल संतुलन को बनाए रखा था?
बिजवासन दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में, दिल्ली-गुरुग्राम सीमा के निकट स्थित है। यह इलाका कभी साहिबी नदी और नजफगढ़ झील से जुड़े विस्तृत जल परिदृश्य का हिस्सा था।
एक नदी जिसे हमने नाला कहना शुरू कर दिया
दिल्ली में बहने वाली नदियों की बात होती है तो अधिकांश लोगों के मन में केवल यमुना का नाम आता है। लेकिन 2025 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि आज जिसे नजफगढ़ ड्रेन कहा जाता है, वह वास्तव में साहिबी नदी है।
NGT के अनुसार किसी नदी को केवल ड्रेन या नाला मान लेना उसके मूल स्वरूप और पर्यावरणीय महत्व के साथ न्याय नहीं है। आदेश में यह भी कहा गया है कि साहिबी एक नदी है और उसके पुनरुद्धार के लिए विस्तृत योजना की आवश्यकता है।
इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि नजफगढ़ ड्रेन नाम दिया जाना इस नदी के मूल स्वभाव के साथ अन्याय है। इसी आधार पर केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार, पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को नदी के पुनर्जीवन के लिए कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए।
यह आदेश केवल नाम बदलने का प्रश्न नहीं उठाता। यह नदी को केवल उसकी धारा नहीं, बल्कि उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र, मूल प्रवाह और उससे जुड़े वेटलैंड के साथ देखने की जरूरत पर जोर देता है। ऐसे में बिजवासन जैसे क्षेत्रों का महत्व भी बढ़ जाता है, क्योंकि वे उसी मूल नदी-वेटलैंड तंत्र का हिस्सा रहे हैं, जिसके पुनर्जीवन की बात आज की जा रही है।
NGT के अनुसार नजफगढ़ ड्रेन नाम दिया जाना इस नदी के मूल स्वभाव के साथ अन्याय है।
नजफगढ़ झील: दिल्ली के जल तंत्र की खोई हुई कड़ी
साहिबी नदी अरावली की पहाड़ियों से निकलकर राजस्थान और हरियाणा से होती हुई दिल्ली तक पहुंचती थी। ऐतिहासिक रूप से इसका पानी नजफगढ़ क्षेत्र में फैलकर एक विशाल मौसमी झील का रूप लेता था। वर्षा की मात्रा के अनुसार इसका विस्तार बदलता रहता था। अलग-अलग ऐतिहासिक और पर्यावरणीय अध्ययनों में इसका क्षेत्रफल लगभग 220 से 300 वर्ग किलोमीटर तक बताया गया है। उस समय यह उत्तर भारत की सबसे बड़ी मौसमी वेटलैंड में गिनी जाती थी।
नजफगढ़ झील केवल अतिरिक्त वर्षा जल को रोकने वाला जलाशय नहीं थी बल्कि यह साहिबी नदी-झील प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। मानसून के दौरान यह अतिरिक्त पानी को कुछ समय तक अपने भीतर समेटती थी जिससे बाढ़ का पानी कुछ समय के लिए रुक जाता था और धीरे-धीरे जमीन में समा जाता था। इससे आसपास के इलाकों का भूजल भी रिचार्ज होता था।
झील के आसपास विकसित वेटलैंडयां पारिस्थितिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध थीं। यह क्षेत्र प्रवासी और स्थानीय पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास था। मछलियां, उभयचर जीव और अनेक जलीय प्रजातियां भी इसी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा थीं। आसपास के गाँवों की आजीविका भी लंबे समय तक इसी नदी-वेटलैंड भूमि पर निर्भर रही। सिंचाई, पशुपालन और सीमित स्तर पर मत्स्य पालन जैसी गतिविधियां इसी स्वाभाविक जल व्यवस्था से जुड़ी थीं।
ब्रिटिश काल में बनाए गए ड्रेनेज चैनल
नजफगढ़ झील को संरक्षण का दर्जा दिलाने का सवाल केवल एक जलाशय बचाने का नहीं है। उनके अनुसार यह दिल्ली-हरियाणा क्षेत्र के जलग्रहण, बाढ़ प्रबंधन और भूजल सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है, इसलिए इसे नदी और वेटलैंड के एकीकृत तंत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
मनु भटनागर, प्रधान निदेशक, INTACH
उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान खेती योग्य भूमि बढ़ाने और जलभराव कम करने के लिए नजफगढ़ झील की निकासी पर काम शुरू हुआ। इसके लिए ड्रेनेज चैनल बनाए गए और मूल जल प्रवाह को नियंत्रित किया गया। बाद के दशकों में कृषि विस्तार, शहरीकरण और नई अवसंरचना परियोजनाओं ने झील और उसके जल फैलाव क्षेत्र को लगातार छोटा कर दिया।
हालांकि झील का अधिकांश हिस्सा अब शहरी विकास में बदल चुका है, लेकिन इसके अवशेष आज भी नजफगढ़ ड्रेन और आसपास की वेटलैंड में दिखाई देते हैं। विभिन्न उपग्रह अध्ययनों और पर्यावरणीय आकलनों के अनुसार यह क्षेत्र अब भी वर्षा जल निकासी, मौसमी जलभराव और प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसके बावजूद जलवैज्ञानिक दृष्टि से यह परिदृश्य पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उपलब्ध जलवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार वर्षा का पानी आज भी इसी पुराने जलग्रहण क्षेत्र की ओर बहता है। इसलिए INTACH का कहना कि नजफगढ़ क्षेत्र को केवल शहरी भूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक नदी-वेटलैंड तंत्र के रूप में समझना आवश्यक है। इसी संदर्भ में बिजवासन जैसी परियोजनाएं भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं, क्योंकि वे इसी बदले हुए जल परिदृश्य का हिस्सा हैं।
नदी, झील और आसपास के वेटलैंड एक-दूसरे से जुड़ी प्राकृतिक प्रणाली
इस बदलते भू-दृश्य को समझने में भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास (INTACH) का 2023 का उपग्रह आधारित मानचित्रण महत्वपूर्ण माना जाता है। GIS तकनीक और उपग्रह चित्रों की सहायता से तैयार इस अध्ययन ने साहिबी नदी के ऐतिहासिक प्रवाह मार्ग का पुनर्निर्माण किया। अध्ययन बताता है कि आज भले ही नदी का अधिकांश हिस्सा नजफगढ़ ड्रेन के रूप में दिखता हो, लेकिन उसका पुराना मार्ग और जल फैलाव क्षेत्र अब भी भू-दृश्य में पहचाना जा सकता है।
INTACH का कहना है कि ऐतिहासिक मानचित्रों, अभिलेखों और उपग्रह चित्रों से स्पष्ट होता है कि साहिबी नदी, नजफगढ़ झील और आसपास के वेटलैंड एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्राकृतिक प्रणाली का हिस्सा थे। संस्था का मानना है कि इस क्षेत्र से जुड़ी विकास और संरक्षण संबंधी नीतियां केवल वर्तमान भूमि उपयोग के आधार पर नहीं बननी चाहिए। उनमें इस पूरे नदी-आर्द्रभूमि तंत्र के ऐतिहासिक और पारिस्थितिक महत्व को भी शामिल किया जाना चाहिए।
INTACH का कहना कि नजफगढ़ क्षेत्र को केवल शहरी भूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक नदी-वेटलैंड तंत्र के रूप में समझना आवश्यक है।
8 प्लेटफॉर्म वाला रेलवे स्टेशन
रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) और रेलवे का कहना है कि बिजवासन रेलवे टर्मिनल का उद्देश्य केवल एक नया स्टेशन बनाना नहीं, बल्कि दिल्ली के नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन जैसे प्रमुख रेलवे स्टेशन पर बढ़ते यात्री दबाव को कम करना है।
परियोजना के तहत स्टेशन को आठ प्लेटफॉर्म, अलग आगमन और प्रस्थान क्षेत्र, कई सबवे तथा बस, मेट्रो और सड़क परिवहन से बेहतर संपर्क के साथ एक बहु-माध्यमीय परिवहन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।
हाल में परियोजना से जुड़े दस्तावेज़ों में प्रतिपूरक वृक्षारोपण और स्थानांतरित किए जाने वाले पेड़ों का भी उल्लेख किया गया है। बिजवासन रेलवे टर्मिनल से जुड़े सार्वजनिक दस्तावेज़ों में परियोजना के तकनीकी और निर्माण संबंधी विवरण उपलब्ध हैं।
हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेज़ों में जलग्रहण क्षेत्र, वर्षाजल निकासी और भूजल रिचार्ज पर विस्तृत जलवैज्ञानिक विश्लेषण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता। इसलिए इस पहलू पर और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता महसूस होती है। यही वह प्रश्न है जो इस परियोजना को जल प्रबंधन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।
यह परियोजना ऐसे भूभाग के निकट विकसित हो रही है, जिसका मूल संबंध साहिबी नदी और नजफगढ़ झील की जल प्रणाली से रहा है। इसलिए इस परियोजना का मूल्यांकन केवल परिवहन अवसंरचना के रूप में नहीं, बल्कि उसके जलवैज्ञानिक संदर्भ को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए।
इसका आकलन विस्तृत तकनीकी और पर्यावरणीय अध्ययनों के बाद ही किया जा सकता है। ऐसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग परिवर्तन से पहले विस्तृत पर्यावरणीय और जलवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक माना जाता है। योजना बनाते समय पारंपरिक जल निकासी, वर्षा जल के प्रवाह, भूजल रिचार्ज और आसपास की वेटलैंड को ध्यान में रखना आवश्यक है।
दिल्ली का विकास और जलग्रहण का सवाल
दिल्ली में जलवायु परिवर्तन के साथ कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और दिल्ली सरकार के जलवायु आकलनों के अनुसार, हाल के वर्षों में कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे शहरी जल निकासी व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।
पिछले तीन दशकों में दिल्ली का शहरी विस्तार लगातार उन क्षेत्रों तक पहुंचा है, जिनका पारंपरिक संबंध नदियों, बाढ़ क्षेत्रों और वेटलैंड से रहा है। ऐसे में शहरी नियोजन केवल सड़कों, इमारतों और परिवहन तक सीमित नहीं रह सकता। इसमें वर्षा जल निकासी, प्राकृतिक जल प्रवाह और भूजल रिचार्ज को भी योजना का हिस्सा बनाना होगा।
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के मास्टर प्लान 2041 में पहली बार 'ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' को शहरी नियोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। योजना नदियों, नालों, झीलों, वेटलैंड और हरित क्षेत्रों को एक-दूसरे से जुड़े पारिस्थितिक नेटवर्क के रूप में विकसित करने पर जोर देती है। इसका उद्देश्य वर्षा जल को प्राकृतिक रूप से बहने और जमीन में समाने का अवसर देना, शहरी बाढ़ के जोखिम को कम करना और शहर की जल सुरक्षा को मजबूत करना है।
यदि इस दृष्टिकोण को व्यवहार में लागू किया जाए, तो बिजवासन जैसी परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल भूमि उपयोग के आधार पर नहीं, बल्कि वर्षा जल निकासी, भूजल रिचार्ज और वेटलैंड पर उनके संभावित प्रभावों को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए।
दिल्ली अकेला शहर नहीं है, जिसे विकास और जल प्रबंधन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। 2015 की विनाशकारी बाढ़ और उसके बाद आए जल संकट के बाद चेन्नई ने झीलों, जल निकासी तंत्र और वर्षाजल संचयन को शहरी नियोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना शुरू किया।
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के मास्टर प्लान 2041 में पहली बार 'ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' को शहरी नियोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। योजना नदियों, नालों, झीलों, वेटलैंड और हरित क्षेत्रों को एक-दूसरे से जुड़े पारिस्थितिक नेटवर्क के रूप में विकसित करने पर जोर देती है।
इसी तरह सिंगापुर ने वर्षाजल को जलापूर्ति के एक प्रमुख स्रोत के रूप में अपनाते हुए जलाशयों, नहरों और हरित क्षेत्रों को एकीकृत जल नेटवर्क के रूप में विकसित किया। ये अनुभव बताते हैं कि शहरों की जल सुरक्षा केवल नई अवसंरचना बनाने से नहीं, बल्कि प्राकृतिक जल प्रणालियों को शहरी नियोजन में शामिल करने से भी मजबूत होती है। बिजवासन जैसी परियोजनाओं के संदर्भ में भी यही दृष्टिकोण प्रासंगिक है।
क्या विकास और नदी संरक्षण साथ चल सकते हैं?
साहिबी नदी के पुनर्जीवन और बिजवासन परियोजना को पहली नज़र में अलग-अलग विषय माना जा सकता है। लेकिन दोनों एक ही जल परिदृश्य से जुड़े हैं। किसी नदी का पुनर्जीवन केवल उसके जल की सफाई या नाम बदलने से नहीं होता। इसके लिए उसके कैचमेंट एरिया प्राकृतिक प्रवाह मार्ग, बाढ़ क्षेत्र और वेटलैंड को भी सुरक्षित रखना पड़ता है।
यदि नदी तक पहुंचने वाले प्राकृतिक जल मार्ग लगातार संकुचित होते जाएँ या भूमि उपयोग में ऐसे बदलाव हों जो वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करें, तो नदी का पुनर्जीवन अधूरा रह जाएगा।
इसी संदर्भ में बिजवासन परियोजना जैसे विकास कार्यों को देखने की जरूरत है। प्रश्न यह नहीं है कि परियोजना बने या न बने। बल्कि यह है कि क्या परियोजना की योजना में इस क्षेत्र की जलवैज्ञानिक विशेषताओं को शामिल किया गया है? क्या वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर रोकने, भूजल रिचार्ज बढ़ाने और प्राकृतिक जल निकासी बनाए रखने के लिए पर्याप्त उपाय किए गए हैं?
नजफगढ़ झील पर तैयार दिल्ली सरकार के पर्यावरण प्रबंधन ढांचे (Environmental Management Plan) में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि साहिबी नदी और नजफगढ़ झील को अलग-अलग इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही नदी-वेटलैंड तंत्र के रूप में समझा जाना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, साहिबी नदी, जिसकी प्राकृतिक बाढ़भूमि नजफगढ़ झील थी, आज लगभग एक ड्रेन में बदल चुकी है।
इसके साथ ही वेटलैंड के क्षरण ने दिल्ली और हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में वर्षाजल से होने वाली बाढ़ और भूजल स्तर में गिरावट का जोखिम बढ़ाया है। इसलिए नदी के पुनर्जीवन और नई अवसंरचना परियोजनाओं को साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। इनका मूल्यांकन केवल नदी की धारा या परियोजना स्थल तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे जलग्रहण क्षेत्र के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
INTACH के प्रधान निदेशक मनु भटनागर का कहना है कि नजफगढ़ झील को संरक्षण का दर्जा दिलाने का सवाल केवल एक जलाशय बचाने का नहीं है। उनके अनुसार यह दिल्ली-हरियाणा क्षेत्र के जलग्रहण, बाढ़ प्रबंधन और भूजल सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है, इसलिए इसे नदी और वेटलैंड के एकीकृत तंत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
बिजवासन परियोजना से जुड़े सार्वजनिक दस्तावेज़ कुछ महत्वपूर्ण सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं देते। यह स्पष्ट नहीं है कि परियोजना के लिए विस्तृत जलवैज्ञानिक अध्ययन किया गया है या नहीं। यह जानकारी भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है कि वर्षाजल निकासी का मॉडल आधारित आकलन हुआ या नहीं। इसी तरह पुराने जलग्रहण मार्गों और जलवायु परिवर्तन से जुड़े बाढ़ जोखिम का मूल्यांकन भी स्पष्ट नहीं है। इन पहलुओं पर अधिक पारदर्शिता भविष्य की शहरी अवसंरचना परियोजनाओं के लिए भी उपयोगी होगी।
नदी के साथ उसके जलग्रहण क्षेत्र को भी योजना का हिस्सा बनाना होगा
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के निर्देश, दिल्ली सरकार का नजफगढ़ झील पर्यावरण प्रबंधन ढांचा और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) का मास्टर प्लान 2041, तीनों इस ओर संकेत करते हैं कि शहरी विकास और जल संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
बिजवासन रेल टर्मिनल का भविष्य चाहे जो हो, इस परियोजना ने एक ज़रूरी सवाल सामने रखा है। क्या भारत के शहर नई विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय अपने पुराने जल परिदृश्यों को भी समझते हैं? इस प्रश्न का उत्तर परियोजना के पक्ष या विपक्ष तक सीमित नहीं है। भविष्य की ऐसी सभी शहरी अवसंरचना परियोजनाओं में परिवहन आवश्यकताओं के साथ-साथ जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक जल निकासी, भूजल रिचार्ज और वेटलैंड पर संभावित प्रभावों का भी पारदर्शी आकलन सार्वजनिक होना चाहिए। तभी विकास और जल सुरक्षा के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।
साहिबी नदी और नजफगढ़ झील की कहानी यही याद दिलाती है कि किसी शहर की जल सुरक्षा केवल उसकी नदियों पर नहीं, बल्कि उन भू-दृश्यों पर भी निर्भर करती है, जो सदियों से पानी का रास्ता बनाते रहे हैं।
बिजवासन का सवाल केवल एक रेलवे टर्मिनल का नहीं है। यह उन चुनौतियों का उदाहरण भी है, जिनका सामना भारत के शहर तब करते हैं, जब नई अवसंरचना परियोजनाएं ऐतिहासिक जल परिदृश्यों से जुड़ती हैं। शायद यही कारण है कि अब शहरी विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल इंजीनियरिंग या परिवहन की दृष्टि से नहीं, बल्कि जलग्रहण क्षेत्र और जल सुरक्षा के संदर्भ में भी किया जाना आवश्यक होता जा रहा है।
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