भागलपुर में डिजिटल मैपिंग से होगी गंगा के तटबंधों सुधारने की कोशिश

सेटेलाइट डेटा और ड्रोन सर्वे तकनीक की मदद से तैयार किया जाएगा गंगा के बहाव का प्‍वाइंट टू प्‍वाइंट सटीक नक्‍शा, बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में मिलेगी मदद
बिहार में बाढ़ आने पर गंगा के किनारे की जमीनों का कटना और तटबंधों का टूटना हर साल देखने को मिलता है। 

बिहार में बाढ़ आने पर गंगा के किनारे की जमीनों का कटना और तटबंधों का टूटना हर साल देखने को मिलता है। 

फोटो :  फेसबुक 

Published on: 
6 min read

जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के पैटर्न में हो रहे बदलाव हमारी नदियों को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। इसके चलते नदियों के बहाव में बदलाव से उनका मार्ग बदलने और तटों का कटाव तेज होने की समस्‍याएं देखने को मिल रही हैं। देश की सबसे प्रमुख नदियों में गिनी जाने वाली गंगा में तो यह समस्‍या काफी बड़े स्‍तर पर देखने को मिल रही है। उत्‍तराखंड की पहाड़ी ढलानों से लेकर उत्‍तर प्रदेश, बिहार, बंगाल के मैदानी इलाकों तक में गंगा में यह समस्‍या हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है। इसे देखते हुए सरकार नदी के प्रवाह, उसके बहाव के रास्‍ते और तटबंधों के कटाव का अध्‍ययन कर इसे समझने और सुधारने के प्रयास शुरू कर चुकी है। इसी दिशा में एक और कदम उठाते हुए अब बिहार के भागलपुर में गंगा के तटबंधों की डिजिटल मैपिंग शुरू करने की पहल की गई है। इसमें उपग्रह और ड्रोन तकनीक की मदद से गंगा के मार्ग में बदलाव और तटों के कटाव का आकलन कर नदी के बहाव में सुधार लाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा। साथ ही इस अध्‍ययन के आधार पर भागलपुर में गंगा के किनारे ब्रिटिश और जमींदारी के समय बने बांधों के संरक्षण का प्रयास भी किया जाएगा। 

तैयार होगा गंगा तट का बिंदुवार डिजिटल डेटाबेस 

गंगा के तटों को बचाना इसलिए भी जरूरी माना जा रहा है, क्‍योंकि बाढ़ के समय यह तटबंध ही अपने आसपास के एक बड़े भूभाग को बाढ़ में डूबने से बचाते रहे हैं। बाढ़ के इस खतरे को देखते हुए ही ब्रिटिश हुकूमत के दौर और रियासती दौर में भागलपुर में कई 'हाई लेवल तटबंध' बनाए गए थे। स्‍थानीय स्‍तर पर इन्‍हें 'जमींदारी बांध' के नाम से भी जाना जाता है। पर समय के साथ गंगा के मार्ग और धारा में आए अप्रत्याशित बदलावों के कारण यह तटबंध कटाव का शिकार होकर कमजोर या नष्‍ट होते दिखाई दे रहे हैं। दशकों के क्षरण के बाद अब इन तटबंधों के संरक्षण के लिए डिजिटल मैपिंग की तकनीकी पहल होने जा रही है। इसके तहत भागलपुर में गंगा के तटों और तटबंधों का सेटेलाइट डेटा और ड्रोन सर्वे करवा कर भागलपुर जिले में गंगा और उसके विस्तृत कछारी (तटीय) क्षेत्र की विशेष डिजिटल मैपिंग कराई जाएगी। इसमें उपग्रह से प्राप्‍त तस्‍वीरों व ड्रोन से लिए गए वीडियो फुटेज की मदद से गंगा की मुख्य धारा, उसके फैलाव, कटाव की गति और सभी ऐतिहासिक तटबंधों की मौजूदा स्थिति का बिंदुवार डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाएगा।

भागलपुर में हाइपर लोकल लेवल पर की जाने वाली गंगा तट की यह डिजिटल मैपिंग बक्सर से भागलपुर तक प्रस्तावित राज्यस्तरीय मैपिंग से अलग होगी। माइक्रो लेवल पर की जाने वाली यह प्‍वाइंट टू प्‍वाइंट मैपिंग भागलपुर में गगा के मार्ग  का अपना एक अलग ही डिजिटल भौगोलिक रिकॉर्ड तैयार करेगी।

बाढ़ से सुरक्षा में मददगार होगी डिजिटल मैपिंग

स्‍थानीय स्‍तर पर की जा रही गंगा के किनारों की इस डिजिटल मैपिंग का मुख्य उद्देश्य का गंगा के मार्ग और उसके किनारों का अप टू डेट और सटीक नक्‍शा तैयार करने के साथ ही तटबंधों की संरचना, उनकी कटाव व बाढ़ को झेलने की क्षमता, ढलान और ऊंचाई का पता लगाना भी है। इस सर्वे के जरिये सबसे ज्‍यादा कटाव वाले हिस्‍सों और अत्यंत संवेदनशील हिस्सों की सटीक जियो-टैगिंग भी की जाएगी, ताकि बाढ़ के समय इनकी सुरक्षा के खास इंतज़ाम किए जा सकें। गंगा की धारा अपने मौजूदा बहाव में किस जगह, किनती रफ्तार से किस कोण पर किनारों और तटबंधों से टकरा रही है और इसके कारण किनारों पर मिट्टी का कटाव किस तरह हो रहा है, इसका वैज्ञानिक व हाइड्रोलॉजिकल अध्‍ययन भी डिजिटल मैपिंग के दौरान किया जाएगा।

प्रशासनिक स्‍तर पर इस डिजिटल रिकॉर्ड का एक सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि जिले के दर्जनों छोटे और स्थानीय महत्व के बांध, जो अब तक जल संसाधन या राजस्व विभाग के आधिकारिक नक्शों और अभिलेखों में दर्ज नहीं हो सके थे, उन्‍हें भी पहली बार सरकारी नक्‍शे व रिकॉर्ड में शामिल किया जाएगा। इससे भूमि के रिकॉर्ड में सटीकता के साथ ही बाढ़ के समय किए जाने वाले आपदा प्रबंधन और बाढ़ राहत के लिए बजट आवंटन में मदद मिलेगी और इसमें किसी भी संवेदनशील तटबंध की अनदेखी नहीं होगी।

पुराने बांधों पर मंडराता खतरा होगा कम

रियासतों के दौर में और ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भागलपुर में बनाए गए कई ऊंचे (हाई लेवल) तटबंध सुरक्षा की दृष्टि से आज भी काफी महत्‍वपूर्ण हैं। इन तटबंधों को उस समय गंगा में आने वाली बाढ़ के उच्चतम जलस्तर से भी अधिक ऊंचा बनाया गया था। इसी कारण इस तटबंधों पर सड़के बनाने के साथ ही रेलवे लाइनें तक बिछाई गई थी। कुल मिलाकर भागलपुर के गंगा तटवर्ती इलाके में फैले इन तटबंधों का निर्माण तत्कालीन प्रशासनिक प्राथमिकताओं और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया था। इसी तरह स्‍थानीय ज़मीदारों द्वारा बनवाए गए जमींदारी बांध स्थानीय रसूखदारों व जमींदारों के दूरदर्शिता भरे भूमि प्रबंधन व बाढ़ नियंत्रण का हिस्सा थे। क्‍योंकि, यह मजबूत मिट्टी के बांध सदियों तक यह उपजाऊ कृषि भूमि, अन्न के भंडारों और ग्रामीण बस्तियों को बाढ़ के पानी से महफूज रखने का काम करते रहे। इनमें सबसे खासतौर पर दियारा क्षेत्र के रंगरा, इस्माइलपुर, गोपालपुर और बिहपुर जमींदारी बांध तो अपने इलाके के लिए जीवन रेखा की तरह माने जाते रहे हैं। इन बांधों में धोबनिया जमींदारी बांध, काजीकोरैया-राघोपुर बांध भागलपुर की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में गिने जाते हैं। इस तरह सदियों पुराने इन बांधों की अहमियत केवल शहर की बाढ़ सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इन तटबंधों से भागलपुर की बसावट, कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन का गहरा नाता है। 

कटाव से गंगा डॉल्फिन का आवास भी हो रहा प्रभावित 

गंगा नदी के मार्ग व बहाव में परिवर्तन और उसके कारण हो रहे तटों के कटाव का विश्‍व प्रसिद्ध गंगा डॉल्फिन के आवास पर भी प्रभाव पड़ रहा है। भागलपुर के सुल्तानगंज से कहलगांव तक फैला विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य देश में इन जलीय स्‍तनधारियों का एकमात्र आश्रय स्‍थल है। विलुप्‍त होने के कगार पर पहुंच चुकी इस प्रजाति पर मंडराते संकट के बीच फिलहाल यहां करीब 200 गंगा डॉल्फिन का बसेरा है। गंगा डॉल्फिन आमतौर पर स्थिर धारा, कम हलचल और शांत जलक्षेत्र को प्राथमिकता देती हैं। नदी की मुख्य धारा में तेज बहाव और अत्यधिक उफान होने के कारण डॉल्फिन का कुनबा शहर से सटे बरारी, बूढ़ानाथ और बाबूपुर आदि तटीय इलाकों की ओर शिफ्ट हो गया है। बाढ़ का पानी घटने के बाद डॉल्फिन के अपने मूल प्राकृतिक क्षेत्र में वापस लौटने की प्रबल संभावना रहती है, किंतु जलस्तर अचानक कम होने से उनके उथले पानी या जलकुंभी वाले किनारों पर भटककर फंसने का जोखिम भी बना रहता है। गंगा के अप्रत्याशित रूप से जलस्तर बढ़ने और बाढ़ की स्थिति में इन जलीय जीवों के प्राकृतिक ठिकाने में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। 

जलीय पारिस्थितिक तंत्र को लेकर भी बढ़ रही चिंता 

गंगा तटों के कटाव से उसके जलीय पारिस्थितिक तंत्र को भी खतरा पैदा हो रहा है। गंगा नदी के समग्र पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) में कई प्रकार के जलीय जीव और वनस्‍पतियां शामिल हैं। गंगा डॉल्फिन इसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसे स्वच्छ और अविरल नदी तंत्र का प्राकृतिक वातावरण पसंद है। पर कटाव के कारण पानी उथला होने और उसमें रेत व मिट्टी बढ़ने से इन्‍हें दिक्‍कतें हो रही हैं। कई बार नदी के किनारों पर उथले पानी में डॉल्फिनों के फंसने की घटनाएं भी सामने आई हैं। इस बारे में वन विभाग कई बार स्‍थानीय लोगों व मछुआरों से अपील कर चुका है कि गंगा डॉल्फिन की सुरक्षा केवल वन विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नदी से जुड़े स्थानीय समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। यदि किसी क्षेत्र में डॉल्फिन जाल में फंसी, घायल या संकट की स्थिति में दिखाई दे, तो तुरंत वन विभाग को सूचित करें, ताकि समय रहते बचाव के उपाय करके उसका जीवन बचाया जा सके। 

गाद से बाधित हो रहा जलमार्ग, फंस रहे जहाज

गंगा नदी में हो रहे कटाव और बहाव क्षेत्र के फैलाव का बुरा असर सरकार की अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन को बढ़ाने की योजना पर भी पड़ रहा है। कटाव के कारण नदी में गाद बढ़ने और जलस्‍तर घटने से बड़ी नावों का संचालन मुश्किल हो जाता है। एमवी राजेंद्र प्रसाद' (MV Rajendra Prasad) जहाज अक्टूबर 2026 में बिहार के भागलपुर जिले के बियाडा घाट स्थित जेटी नंबर एक के पास गंगा नदी में गाद (सिल्ट) और उथले पानी के कारण फंस गया था। बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम का यह विशालकाय जहाज नदी में पानी का स्तर कम होने और भारी मात्रा में गाद जमा होने की वजह से रेत में धंस गया था। इसे ड्रेजिंग करके रेत से निकालने में काफी मशक्‍कत करनी पड़ी। अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) और तकनीकी टीमों ने जहाज को निकालने के लिए लगभग 10 फीट तक ड्रेजिंग (गाद सफाई) की और दूसरे भारी जहाजों की मदद से इसे खींचने की कोशिश की, लेकिन शुरुआती प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी। ड्रेजिंग और टगबोट्स के जरिये जहाज को रेत से निकालने के प्रयास नाकाम होने के बाद, उसे सुरक्षित गहरे पानी में वापस लाने के लिए 'शिप लॉन्चिंग एयरबैग' तकनीक का सहारा लिया गया। इसके लिए विशेष प्रकार के हाई-टेक एयरबैग असम के गुवाहाटी से मंगाए गए, जिन्हें जहाज के नीचे लगाकर उसे धीरे-धीरे पानी की तरफ धकेला गया। लगातार करीब 15 दिनों से अधिक समय तक बालू में अटके रहने के बाद कोलकाता से विशेष नौकाएं और ड्रेजिंग मशीनें मंगा कर आखिरकार लंबी मशक्‍कत के बाद 28-29 अक्टूबर को इसे किसी तरह निकाला गया।

Also Read
गंगा सफाई के नाम पर ‘स्वच्छ गंगा मिशन’ में हो रहा ‘खिलवाड़’ CAG रिपोर्ट में कई बड़ी खामियां उजागर
<div class="paragraphs"><p>बिहार में बाढ़ आने पर गंगा के किनारे की जमीनों का कटना और तटबंधों का टूटना हर साल देखने को मिलता है।&nbsp;</p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें