बदलेगा दुनिया का नक्शा : नए मानचित्र से कितना बदलेगा सागरों, नदियों, झीलों और पर्यावरण को देखने-समझने का नज़रिया?

अमेरिका के विरोध के बावजूद 164 देशों के समर्थन से संयुक्त राष्ट्र में पारित हुआ Equal Earth projection का प्रस्‍ताव, वास्‍तविकता के ज्‍यादा करीब होगा नया वैश्विक मानचित्र
सदियों से प्रचलित विश्‍व के मानचित्र में बदलाव का प्रस्‍ताव संयुक्‍त राष्‍ट्र में पारित हो गया है।  नक्‍शे में मौजूद विसंगतियों को दूर करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। 

सदियों से प्रचलित विश्‍व के मानचित्र में बदलाव का प्रस्‍ताव संयुक्‍त राष्‍ट्र में पारित हो गया है। नक्‍शे में मौजूद विसंगतियों को दूर करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। 

फोटो : विकी कॉमंस

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दुनिया में अपने या अन्‍य देशों, राज्‍यों, शहरों, गांवों या किसी भी स्‍थान की स्थिति जानने के लिए हमें नक्‍शे की ज़रूरत होती है। पर, क्‍या आप यकीन करेंगे कि आजतक दुनिया का जो नक्‍शा हम देखते आए हैं, वह धरती की वास्तविक तस्वीर नहीं है। दुनिया के इस मानचित्र में दर्ज़नों बड़ी ख़ामियां हैं। गोल पृथ्वी का नक्‍शा एक सपाट सतह (कागज या स्क्रीन) पर बनाए जाने के कारण किसी न किसी हिस्से में आकार, दूरी, दिशा या क्षेत्रफल का अनुपात विश्‍व मानचित्र में बिगड़ गया है, जिसे सुधारने की मांग कई दशकों से उठाई जा रही है। इस समस्‍या के समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब संयुक्त राष्ट्र ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने "Correct the Map: Rebalancing Global Cartographic Representation and Promoting Equitable Representation of the World's Regions, Particularly Africa" प्रस्ताव को 164 देशों के समर्थन से मंजूरी दी। 

प्रस्ताव में दुनिया के नक्शों में Equal Earth जैसी equal-area projections के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही गई है। हालांकि यह बाध्यकारी फैसला नहीं है और न ही इससे दुनिया की वास्तविक भौगोलिक या समुद्री सीमाएं बदलती हैं। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि दुनिया का नक्शा बदलने की कोशिश हो रही है, दुनिया की भौगोलिक संरचना नहीं। इसका असर हमारी आंखों के सामने दिखाई देने वाली दुनिया की तस्वीर पर पड़ेगा। और यहीं से पानी और पर्यावरण की एक महत्वपूर्ण कहानी निकलती है।

समर्थन, विरोध और तटस्‍थता के बीच प्रस्‍ताव पारित

संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा कराई गई रायशुमारी में पूरी दुनिया में अकेले अमेरिका ने नक्‍शे के बदलाव के विरोध में मतदान किया। इसके अलावा छह देश मतदान से दूर रहे। वोटिंग में शामिल न होने वाले या या "तटस्थ" राष्‍ट्रो में यह देश शामिल हैं -

  1. एस्टोनिया (Estonia)

  2. जॉर्जिया (Georgia)

  3. लिथुआनिया (Lithuania)

  4. मोल्दोवा गणराज्य (Republic of Moldova)

  5. सर्बिया (Serbia)

  6. यूक्रेन (Ukraine)

कुछ महत्‍वपूर्ण बातें

  • संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश: 193

  • इस मतदान में हिस्सा लेने वाले: 171 देश — 164 पक्ष में, 1 विरोध में और 6 ने मतदान से परहेज किया।

  • बाकी 22 सदस्य देश: इस मतदान में वोट नहीं डाला।

  • UN के बाहर/गैर-सदस्य पर्यवेक्षक: 2Holy See (Vatican) और State of Palestine। इन्हें महासभा में पर्यवेक्षक का दर्जा है, लेकिन सदस्य देशों की तरह मतदान का अधिकार नहीं है।

दुनिया के नक्‍शे में बदलाव के इस मतदान से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह है कि यूक्रेन ने मतदान से पहले अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन उसने ‘No’ वोट नहीं दिया। यूक्रेन ने कहा कि वह प्रस्ताव के मूल उद्देश्य का विरोध नहीं करता, लेकिन उसे आशंका है कि Equal Earth projection को अपनाने की भाषा का गलत इस्तेमाल राजनीतिक सीमाओं और संप्रभुता के सवालों में हो सकता है। इसके बावजूद उसका अंतिम वोट abstention में गया। इसी तरह यूरोपीय संघ ने प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन स्पष्ट किया कि इससे किसी देश की अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सीमाओं, संप्रभुता या क्षेत्रीय अखंडता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

आखिर क्यों पड़ी नक्शे में बदलाव की जरूरत?

आज सबसे ज्‍़यादा प्रचलित और मान्‍य दुनिया के नक्‍शे में Mercator projection का प्रभाव लंबे समय से रहा है। इसे 16वीं सदी में बेल्जियम के मानचित्रकार या नक्शानवीस (फ्लेमिश कार्टोग्राफर) जेरार्डस मर्केटर Gerardus Mercator ने विकसित किया था। 1569 में प्रकाशित उनका मानचित्र समुद्री नौवहन की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इस projection की खासियत थी कि निश्चित दिशा में चलने वाले समुद्री रास्ते यानी rhumb lines नक्शे पर सीधी रेखाओं के रूप में दिखाई देते थे, जिससे उस दौर के नाविकों के लिए दिशा तय करना आसान होता था। सदियों पुराना यह नक्‍शा बुनियादी तौर पर नाविकों के लिए समुद्र में रास्ता खोजने के मकसद से बनाया गया था, पर आगे चलकर उसका इस्तेमाल बाद में दुनिया को सामान्य रूप से देखने और पढ़ाने के लिए भी होने लगा। यही नक्‍शा संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनाए गए विश्‍व मानचित्र का आधार बना। पर, इस नक्‍शे में Mercator projection में भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए क्षेत्रफल का विकृतिकरण लगातार बढ़ता जाता है। इसलिए उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के करीब स्थित भू-भाग वास्तविकता से कहीं बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्यरेखीय क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं। यही कारण है कि अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और भारत जैसे बड़े भू-भागों का दृश्य प्रभाव उनकी वास्तविक विशालता से कम दिखाई दे सकता है। इन्‍हीं विसंगतियों की वजह से पिछले कई दशकों में विश्‍व मानचित्र में बदलाव की मांग की जा रही थी। इस मुहिम की अगुवाई अफ्रीका महाद्वीप के देश कर रहे थे, क्‍योंकि नक्‍शे में आकार संबंधी सबसे ज्‍यादा विसंगति इसी महाद्वीप के आकार में थी। 

Mercator Map में ख़ामियों की वजह

दरअसल हमारी धरती तो गोल यानी त्रिआयामी है, लेकिन उसका नक्शा सपाट (द्विआयामी) है। इसलिए lat world map में पृथ्वी को उसके 100 प्रतिशत वास्तविक रूप में नहीं दिखाया जा सकता। मानचित्र बनाने की प्रक्रिया में किसी projection में क्षेत्रफल बेहतर दिखाई देता है तो, कहीं आकार या दूरी में समझौता करना पड़ता है। चूंकि Mercator का नक्‍शा मूलत- नाविकों के दिशाबोध और मार्गदर्शन के लिए तैयार किया गया था। इसलिए इस नक्‍शे में दिशा और कोणों को प्राथमिकता दी गई थी। जबकि Equal Earth की अवधारणा में क्षेत्रफल को प्राथमिकता दी गई है। इसलिए Robinson और Winkel Tripel जैसी projections अलग-अलग संतुलन बनाने की कोशिश की गई। इसलिए सवाल यह नहीं है कि "सबसे सही नक्शा कौन सा है?" बल्कि, सही सवाल तो यह है कि "किस उद्देश्य के लिए कौन सा नक्शा सबसे उपयुक्त है?" समुद्री नौवहन के लिए Mercator आज भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन दुनिया के महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना करने के लिए equal-area projection ज्यादा उपयुक्त है। संयुक्त राष्ट्र का मौजूदा प्रस्ताव भी Mercator को हर जगह से प्रतिबंधित नहीं करता, बल्कि ज्यादा उपयुक्त वैश्विक representations के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करता है।

मौजूदा विश्व मानचित्र की प्रमुख विसंगतियां

वर्तमान समय में प्रचलित विश्‍व मानचित्र की कुछ सबसे प्रमुख विसंगतियां या खामियां इस प्रकार हैं- 

● ग्रीनलैंड बनाम अफ्रीका:
Mercator मानचित्र में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका के बराबर आकार का दिखाई दे सकता है। वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना है।

● अफ्रीका का वास्तविक आकार छोटा नजर आता है:
अफ्रीका भूमध्य रेखा को काटता हुआ विशाल महाद्वीप है, लेकिन Mercator में उसकी तुलना में यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे ऊंचे अक्षांशों के भू-भाग अनुपात से ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं।

● उत्तरी यूरोप और कनाडा का आकार बढ़ा हुआ दिखाई देता है:
उत्तरी अक्षांशों पर स्थित भू-भाग Mercator में ज्यादा फैल जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि इन देशों का नक्शा "गलत" है, बल्कि projection के कारण उनका दिखाई देने वाला क्षेत्रफल वास्तविक क्षेत्रफल से अलग हो जाता है।

● रूस का आकार भी वास्तविक अनुपात से बहुत बड़ा दिख सकता है:
रूस का बड़ा हिस्सा उच्च उत्तरी अक्षांशों में है। इसलिए विश्व मानचित्र पर इसका दृश्य क्षेत्रफल वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में अधिक बढ़ा हुआ नजर आता है।

● दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं:
दोनों महाद्वीपों का बड़ा हिस्सा निम्न अक्षांशों में है। इसलिए Mercator की ध्रुवों की ओर बढ़ती scale distortion की वजह से उनकी तुलना उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों से करने पर आकार का अंतर भ्रम पैदा कर सकता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि Mercator Map "बेकार" या "गलत नक्शा" नहीं है। उसका उद्देश्य क्षेत्रफल की सही तुलना कराना नहीं था। वह एक खास काम, खासकर नौवहन, के लिए बनाया गया projection था। समस्या तब पैदा होती है जब उसी projection को पूरी दुनिया के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

<div class="paragraphs"><p>संयुक्‍त राष्‍ट्र में हुई वोटिंग में 164 देशों ने विश्‍व मानचित्र में बदलाव के पक्ष में वोट किया, जबकि केवल अमेरिका ने इसके विरोध में वोट दिया। छह देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया।</p></div>

संयुक्‍त राष्‍ट्र में हुई वोटिंग में 164 देशों ने विश्‍व मानचित्र में बदलाव के पक्ष में वोट किया, जबकि केवल अमेरिका ने इसके विरोध में वोट दिया। छह देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया।

फोटो : X

क्‍या है Equal Earth Projection की अवधारणा?

हालांकि विश्‍व मानचित्र के मामले में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में किसी एक नक्शे को कानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं बनाया गया है। लेकिन Equal Earth projection की अवधारणा को एक प्रमुख विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। Equal Earth की अवधारणा को 2018 में Bojan Savric, Tom Patterson और Bernhard Jenny ने विकसित किया था। यह equal-area projection है, यानी इसमें दुनिया के विभिन्न भू-भागों के बीच क्षेत्रफल का वास्तविक अनुपात बरकरार रखने की कोशिश की जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि Equal Earth में हर देश और महाद्वीप बिल्कुल वैसा ही दिखाई देगा जैसा ग्लोब पर दिखाई देता है। सपाट नक्शे में पृथ्वी को दिखाने पर आकार, कोण, दूरी और दिशा में किसी न किसी तरह का समझौता करना पड़ता है। फर्क यह है कि Equal Earth में क्षेत्रफल को प्राथमिकता दी गई है।

विश्व मानचित्र बदलने में कब क्‍या हुआ (टाइम लाइन)

क्या समुद्रों और महासागरों का नक्शा भी बदलेगा?

इस पूरी कवायद की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानचित्र में होने वाले बदलाव के तहत कई स्‍थलीय भागों का आकार व अनुपात बदलने से दुनिया के नक्‍शे पर समुद्री सीमाओं में कुछ बदलाव तो होंगे, पर इससे समुद्र यानी सागरों और महासागरों और नदियों के आकार, लंबाई आदि में कोई बदलाव नहीं होगा। प्रशांत महासागर का वास्तविक क्षेत्रफल वही रहेगा। अटलांटिक, हिंद, दक्षिणी और आर्कटिक महासागर भी उतने ही बड़े रहेंगे जितने आज हैं। इसी तरह गंगा, अमेजन या नील जैसी दुनिया भर की नदियों की लंबाई या किसी झील का वास्तविक क्षेत्रफल भी इस बदलाव से नहीं बदलेगा। कुल मिलाकर, नक्‍शे में केवल Map projection बदलेगा, भौगोलिक सीमाएं नहीं बदलेंगी। संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव से किसी देश की भूमि, समुद्री सीमा, Territorial Waters, Exclusive Economic Zone यानी EEZ या Continental Shelf पर कोई बदलाव या नया अधिकार क्षेत्र पैदा नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश करते समय भी यह स्पष्ट किया गया कि इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं को बदलना नहीं है। इसलिए इस बदलाव को इस तरह समझना ज्यादा सही होगा कि नक्शे पर समुद्र का आकार और स्थिति अलग दिखाई दे सकती है, लेकिन समुद्र पर किसी देश का अधिकार इस प्रस्ताव से नहीं बदलने वाला।

पानी और पर्यावारण को समझने में क्या फर्क पड़ेगा?

इस बदलाव का पर्यावरणीय महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी है। लेकिन, हमारी सामान्य भौगोलिक समझ अकसर देशों और महाद्वीपों के आकार के आसपास केंद्रित रहती है। यानी मानचित्र का projection हमारी इस धारणा को सबसे ज्‍यादा प्रभावित करता है कि हम पृथ्वी के भू-भागों और जल-भागों के आपसी अनुपात को किस तरह देखते हैं। Equal Earth जैसे equal-area नक्शे का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारी क्षेत्रफल की तुलना ज्यादा वास्तविक होगी। उदाहरण के लिए अफ्रीका को उसके वास्तविक आकार में देखने पर यह समझना आसान होगा है कि यह केवल एक बड़ा महाद्वीप नहीं, बल्कि अपने बड़े आकार की वजह से यह पृथ्वी की जलवायु, जैव विविधता, नदी प्रणालियों और समुद्री तटों को व्‍यापक स्‍तर पर प्रभावित करने वाला विशाल भू-भाग है। भूभाग के सही अनुपात से हम इस बात को भी बेहतर ढंग से समझ सकेंगे कि दुनिया की सबसे लंबी नील नील नदी दरअसल कितनी ज्‍यादा दूरी तक बहने के बाद भूमध्य सागर में मिलती है। कांगो वास्‍तव में किस तरह अटलांटिक महासागर के कितने करीब है और  नाइजर नदी गिनी की खाड़ी तक जाती है। इस तरह विश्‍व के नए मानचित्र में अफ्रीका को उसके वास्तविक आकार में देखना सिर्फ "नक्शा सुधारने" का विषय नहीं है। अफ्रीका के विशाल भू-भाग में सहारा मरुस्थल, कांगो वर्षावन, विशाल नदी बेसिन, सवाना, झीलें और हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा शामिल हैं। इस पूरे भूगोल का वैश्विक जलवायु और जैव विविधता में बड़ा योगदान है। इसी तरह दक्षिण अमेरिका को उसके वास्तविक क्षेत्रफल में देखने पर अमेजन बेसिन और वर्षावन का वैश्विक संदर्भ अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

इस तरह नक्‍शे में होने वाले बदलाव से समुद्रों, नदियों और पर्यावरण को लेकर हमारे नज़रिये और समझ में सुधार हो सकता है। संक्षेप में कहें, तो ज्यादा सटीक area-based world map हमें यह देखने में मदद कर सकता है कि नदी बेसिन, भूमि, समुद्र और महासागर एक-दूसरे से कितने गहरे जुड़े हुए हैं। वास्‍तव में पर्यावरणीय समस्याएं नक्‍शे में उकेरी गई राजनीतिक सीमाओं से कहीं बड़ी होती हैं। जलवायु परिवर्तन, समुद्र का बढ़ता तापमान, समुद्री अम्लीकरण, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र स्तर में वृद्धि, मरुस्थलीकरण, वन क्षेत्र और जैव विविधता जैसे विषयों को समझने में वैश्विक भौगोलिक संदर्भ काफी महत्वपूर्ण होता है।  यदि दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के आकार को गलत अनुपात में देखा जाए तो हमारी मानसिक तस्वीर भी प्रभावित हो सकती है। 

निष्‍कर्ष : अतीत की गलतियों पर अड़ें नहीं, करते रहें सुधार

सदियों से देखे और माने जा रहे मानचित्र का अचानक बदल जाना और इस बदलाव को सहजता से स्‍वीकार कर पाना आसान नहीं होता। पर, हमें यह बात समझनी होगी दुनिया का नक्‍शा कोई पत्थर की लकीर नहीं है। वे किसी खास समय की तकनीक, जरूरत और उपलब्ध जानकारियों के आधार पर ही बनाए जाते हैं। इनमें बदलाव आने पर मानचित्र में बदलाव होना भी स्‍वाभाविक प्रक्रिया है। ठीक उसी तरह, जैसे नई वैज्ञानिक खोजों और आविष्‍कारों के चलते समय के साथ ही तमाम वैज्ञानिक अवधारणाओं में बदलाव होते रहे हैं। 

बेशक, Mercator projection अपने समय में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि थी। उसने समुद्री यात्राओं को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन, बाद की सदियों में हमारी जानकारियों में काफी व्‍यापक बदलाव हुए हैं। आज हमारे पास पृथ्वी के आकार, क्षेत्रफल, उपग्रह चित्रों, समुद्री भूगोल, जलवायु और भौगोलिक सूचनाओं के बारे में 16वीं सदी की तुलना में कहीं ज्यादा जानकारी है। इसलिए बेहतर जानकारी के आधार पर पुरानी कमियों को सुधार लिया जाए, जोकि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि दुनिया का नक्शा बदलने से न तो वास्‍तव में अफ्रीका बड़ा होगा, न ग्रीनलैंड छोटा, न महासागर अपनी जगह बदलेंगे और न नदियों का बहाव। बदलेगी तो सिर्फ हमारी नजर और समझ, जोकि अब वास्‍तविकता के ज्‍़यादा करीब होगी।

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