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उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर में भूजल के कई नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा पीने के पानी के लिए निर्धारित सीमा से अधिक पाये जाने के बाद तमाम लोगों के ज़हन में सवाल उठ रहा है कि आखिर भूजल में नाइट्रेट पहुंचता कैसे है? केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2025 की रिपोर्ट में गौतमबुद्ध नगर को नाइट्रेट प्रदूषण से प्रभावित जिलों में शामिल किया गया है। ऐसे में इस जिले के लोगों को तो यह जरूर जानना चाहिए।
दरअसल नाइट्रेट नाइट्रोजन से बनने वाला एक रासायनिक पदार्थ है। यह मिट्टी और पानी में प्राकृतिक रूप से भी पाया जाता है। लेकिन खेती, सीवेज और कचरे के कारण इसकी मात्रा बढ़ सकती है।
खेती में इस्तेमाल होने वाले यूरिया और दूसरे नाइट्रोजन वाले उर्वरक नाइट्रेट के प्रमुख स्रोत हैं। जब खेतों में फसलों की जरूरत से अधिक उर्वरक डाला जाता है, तो उसका कुछ हिस्सा मिट्टी में रह जाता है। बारिश और सिंचाई के दौरान यह पानी में घुलकर धीरे-धीरे जमीन के नीचे जलभृतों तक पहुंच जाता है।
खुले में छोड़ा गया सीवेज, खराब सेप्टिक टैंक और पशुओं का मल-मूत्र भी नाइट्रेट प्रदूषण बढ़ा सकते हैं। यह दूषित पानी जमीन में रिसकर भूजल तक पहुंच सकता है और उसमें नाइट्रेट की मात्रा बढ़ा सकता है।
इसके अलावा लैंडफिल और कचरे के ढेर नाइट्रेट के बड़े स्रोत हैं जो बारिश के पानी के साथ-साथ भूजल तक पहुंचते हैं। इसमें जैविक कचरे के विघटन से निकलने वाला दूषित तरल जमीन में रिसकर नाइट्रेट को भूजल तक पहुंचा सकता है।
वहीं औद्योगिक अपशिष्ट में नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट का अनुचित निस्तारण भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ा सकता है।
गौतमबुद्ध नगर के 2019 के अध्ययन में भी लीचेट के नमूनों की भी जांच की गई थी। उसमें नाइट्रेट की अधिक मात्रा मिलने से भूजल प्रदूषण में ऐसे पानी की संभावित भूमिका सामने आती है। लेकिन इस आधार पर किसी एक स्रोत को पूरे जिले में प्रदूषण का कारण नहीं माना जा सकता।
प्रदूषण कहां से आ रहा है, यह जानने के लिए खेती, सीवेज और भूजल की अलग-अलग जांच ज़रूरी है। चूंकि भूमिगत जल का एक स्रोत नदी भी होती है, इसलिए गौतमबुद्ध नगर में यमुना और हिंडन नदियों में प्रदूषण को संज्ञान में लेना जरूरी है। इन नदियों के आसपास गांव, खेत और तेजी से विकसित होते शहरी इलाके हैं। खेती में इस्तेमाल होने वाले उर्वरक, सीवेज और कचरे से रिसने वाला पानी भूजल में नाइट्रेट बढ़ा सकता है। हालांकि, जिले में प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पहचान के लिए और जांच की ज़रूरत है।
भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण से यमुना के बाढ़ मैदान में पानी की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठते हैं। यमुना के बाढ़ मैदान में बारिश और नदी का पानी जमीन के नीचे पहुंचकर भूजल भंडार को भरता है। लेकिन इसी प्रक्रिया में घुले हुए प्रदूषक भी नीचे जा सकते हैं। ऐसे में जिले के प्रभावित इलाकों के साथ बाढ़ मैदान के भूजल की जांच भी ज़रूरी हो जाती है।
साल 2019 में वैज्ञानिक पत्रिका Acta Geochimica में गौतमबुद्ध नगर के भूजल की गुणवत्ता पर एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। इसे शोधकर्ता मीनू अग्रवाल, मीनाक्षी सिंह और जाकिर हुसैन ने तैयार किया था।
Assessment of Groundwater Quality with Special Emphasis on Nitrate Contamination in Parts of Gautam Budh Nagar District, Uttar Pradesh, India शीर्षक वाले इस अध्ययन में जिले के 11 गांवों को शामिल किया गया।
शोधकर्ताओं ने भूजल के 22 और लीचेट (पदार्थों से रिसकर निकलने वाला दूषित पानी) के 13 नमूने एकत्र किए। इनमें नाइट्रेट, घुले हुए पदार्थों और पानी के अन्य रासायनिक गुणों की जांच की गई।
अध्ययन में भूजल के 22 में से 21 नमूनों (95.4 प्रतिशत) में नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक मिली। इसी तरह लीचेट के 13 में से 12 नमूनों (92.3 प्रतिशत) में भी नाइट्रेट अधिक पाया गया।
शोधकर्ताओं ने अछेजा, बिसरख रोड, दुजाना, बादलपुर और सादोपुर जैसे स्थानों के भूजल को पीने के लिए अनुपयुक्त पाया।
अध्ययन में पानी की गुणवत्ता से जुड़ी एक और समस्या सामने आई। लगभग 73 प्रतिशत भूजल नमूनों में कुल घुलित ठोस पदार्थों (TDS) की मात्रा स्वीकार्य सीमा से अधिक थी। इससे पता चलता है कि इन स्थानों पर पानी में नाइट्रेट के अलावा दूसरे पदार्थों की मात्रा भी अधिक थी।
हालांकि, ये निष्कर्ष अध्ययन में शामिल गांवों और नमूनों के हैं। इन्हें पूरे गौतमबुद्ध नगर या यमुना के पूरे बाढ़ मैदान की स्थिति नहीं माना जा सकता।
तीन अलग-अलग रिसर्च पेपर इस बात को सिद्ध करते हैं कि गौतमबुद्ध नगर के भूजल में नाइट्रेट के पहुंचने के प्रमुख कारण मानवजनित गतिविधियां ही हैं। गलगोटिया विश्वविद्यालय की शोधकर्ता मीनाक्षी और मीनू अग्रवाल के शोध में यह पाया गया कि शहर के बाहरी क्षेत्रों में कूड़े के ढेर (लैंडफिल) से रिस कर जमीन में जाने वाला केमिकल भूजल में नाइट्रेट का बड़ा कारण है। इसी रिसर्च में हिंडन और यमुना में औद्योगिक अपशिष्ट में नाइट्रेट होने की बात कही गई है।
वहीं सेंट्रल ग्राउंउवाटर बोर्ड की रिसर्चर सुप्रिया सिंह के एक सवाल पर वैज्ञानिकों के जवाब में शहर में बसी अवैध कालोनियों में सेप्टिक टैंकों को भूजल में नाइट्रेट का प्रमुख कारण बताया गया। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और दादरी के जिन इलाकों में सीवेज पाइपलाइन का नेटवर्क नहीं पहुंचा है, वहां घरों में शौचालय के लिए सेप्टिक टैंक बनाए। ये सेप्टिक टैंक आम तौर पर नीचे से सीमेंटेड नहीं होते हैं, जिसकी वजह से मानव मल में नाइट्रेट युक्त केमिकल सीधे ग्राउंड वाटर में जाता है।
नाइट्रेट प्रदूषण की समस्या केवल गौतमबुद्ध नगर तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों के भूजल में इसकी मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक मिल चुकी है।
11 मार्च 2026 को लोकसभा में दिए गए एक जवाब में केंद्र सरकार ने केंद्रीय भूजल बोर्ड की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 के आंकड़े साझा किए।
इसके अनुसार, उत्तर प्रदेश में भूजल के 1,333 नमूनों की जांच की गई थी। इनमें 107 नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई। यह कुल नमूनों का 8.03 प्रतिशत है।
राज्य के 48 जिलों में कम से कम एक नमूने में नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक थी। गौतमबुद्ध नगर भी इन जिलों में शामिल है।
सरकारी आंकड़ों में जिले के कुछ नमूनों में फ्लोराइड, यूरेनियम और अधिक लवणता की समस्या भी दर्ज की गई। इससे स्पष्ट है कि भूजल की गुणवत्ता जांचते समय केवल एक प्रदूषक पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
ये आंकड़े भूजल की निगरानी के दौरान एकत्र किए गए नमूनों पर आधारित हैं। इन्हें राज्य के कुल भूजल का प्रतिशत नहीं माना जाना चाहिए।
यमुना का बाढ़ मैदान नदी के किनारे फैला वह क्षेत्र है, जहाँ बाढ़ आने पर पानी फैल सकता है। बारिश और बाढ़ के दौरान पानी जमीन में रिसता है। इससे भूजल भंडार को दोबारा भरने में मदद मिलती है।
लेकिन पानी के साथ घुले हुए प्रदूषक भी जमीन के नीचे पहुंच सकते हैं। बाढ़ मैदान में कुछ स्थानों पर भूजल अपेक्षाकृत कम गहराई पर मिलता है। ऐसे में प्रदूषित पानी के भूजल तक पहुंचने की आशंका रहती है।
नोएडा स्थित ओखला पक्षी विहार में यमुना का जलक्षेत्र। गौतमबुद्ध नगर के कुछ हिस्सों में भूजल की गुणवत्ता को लेकर चिंता बनी हुई है।
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नाइट्रेट जमीन के नीचे कितनी गहराई तक पहुंचेगा, यह मिट्टी की बनावट, भूजल की गहराई और पानी के बहाव पर निर्भर करता है। इसलिए बाढ़ मैदान में अलग-अलग स्थानों और गहराइयों से पानी के नमूने लेकर उनकी जांच करना ज़रूरी है।
नोएडा के बाढ़ मैदान में खेती, निर्माण, सीवेज के निपटान और भूजल के इस्तेमाल का अलग-अलग आकलन किया जाना चाहिए। खासकर यह देखना होगा कि नदी के निकट मौजूद उथले जलभृतों में नाइट्रेट की मात्रा कितनी है।
हालांकि, अध्ययन के नतीजों को पूरे यमुना बाढ़ मैदान पर लागू नहीं किया जा सकता। गौतमबुद्ध नगर में नाइट्रेट मिलने के सबूत मौजूद हैं, लेकिन उपलब्ध अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि यमुना का पूरा बाढ़ मैदान नाइट्रेट से प्रदूषित है।
भारतीय मानक ब्यूरो के पेयजल मानक IS 10500:2012 के अनुसार, पानी में नाइट्रेट की अधिकतम स्वीकार्य मात्रा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इस मानक में नाइट्रेट के लिए अधिक मात्रा की छूट नहीं दी गई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पीने के पानी में नाइट्रेट के लिए 50 मिलीग्राम प्रति लीटर का दिशानिर्देश निर्धारित किया है।
नाइट्रेट की अधिक मात्रा विशेष रूप से छोटे शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है। शरीर में नाइट्रेट का कुछ हिस्सा नाइट्राइट में बदल सकता है। इससे खून की शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता कम हो सकती है।
इस स्थिति को मेथेमोग्लोबिनेमिया (Methemoglobinemia) कहते हैं। इसे ब्लू बेबी सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है। गंभीर मामलों में शिशु की त्वचा नीली पड़ सकती है और साँस लेने में परेशानी हो सकती है।
खतरा खासकर तब बढ़ता है, जब अधिक नाइट्रेट वाले पानी से शिशुओं के लिए दूध तैयार किया जाता है।
हालांकि, भूजल में नाइट्रेट मिलने का मतलब यह नहीं है कि उस क्षेत्र में रहने वाले सभी लोग स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसके लिए यह जानना ज़रूरी है कि लोग कौन-सा पानी पी रहे हैं और कितने समय से उसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
नाइट्रेट से दूषित पानी को उबालना पर्याप्त नहीं है। पानी उबालने से रोगाणु नष्ट हो सकते हैं, लेकिन नाइट्रेट नहीं हटता। पानी का कुछ हिस्सा भाप बनकर उड़ जाने से उसकी मात्रा प्रति लीटर और बढ़ सकती है।
नाइट्रेट हटाने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (RO), आयन एक्सचेंज और आसवन जैसी तकनीकें इस्तेमाल की जा सकती हैं। लेकिन हर घरेलू फिल्टर नाइट्रेट हटाने में सक्षम नहीं होता।
इसलिए जहां पानी में नाइट्रेट की मात्रा अधिक हो, वहां पहले पानी की जांच और फिर उपयुक्त उपचार की जरूरत है। प्रभावित इलाकों में लोगों को पीने के लिए सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना ज़रूरी है।
गौतमबुद्ध नगर में नाइट्रेट प्रदूषण की समस्या समझने के लिए प्रभावित इलाकों की नियमित निगरानी ज़रूरी है। खासकर उन स्थानों पर दोबारा जांच की जानी चाहिए, जहां पुराने अध्ययनों में नाइट्रेट की मात्रा अधिक मिली थी।
जांच में मौसम और भूजल की गहराई का भी ध्यान रखना होगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि बारिश और सिंचाई के दौरान प्रदूषण में क्या बदलाव आता है।
प्रदूषण रोकने के लिए खेतों में उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल, सीवेज का उचित उपचार और सेप्टिक टैंकों के रखरखाव पर ध्यान देना होगा। कचरे से निकलने वाले दूषित पानी को जमीन में पहुंचने से रोकना भी ज़रूरी है।
केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में लोकसभा को बताया था कि केंद्रीय भूजल बोर्ड ने भूजल की गुणवत्ता की निगरानी के लिए नई मानक संचालन प्रक्रिया अपनाई है। इसके तहत प्रदूषण की आशंका वाले क्षेत्रों में अधिक स्थानों से और नियमित अंतराल पर पानी के नमूने लेकर जांच की जाएगी।
इन जांचों के नतीजे स्थानीय लोगों तक पहुंचने चाहिए। इससे वे अपने पानी की गुणवत्ता जान सकेंगे और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित विकल्प अपना सकेंगे।
गौतमबुद्ध नगर में हुए पुराने अध्ययन और केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि जिले के कुछ हिस्सों में नाइट्रेट प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। अब यह पता लगाना ज़रूरी है कि प्रदूषण कहां से आ रहा है और किन इलाकों का पानी प्रभावित है।
यमुना के बाढ़ मैदान में भी भूजल की नियमित जांच होनी चाहिए। नदी के किनारे की जमीन को बचाने के साथ यह देखना भी ज़रूरी है कि वहां जमीन के नीचे पहुंचने वाला पानी कितना सुरक्षित है।
भूजल संरक्षण का मतलब केवल पानी की मात्रा बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे प्रदूषण से बचाना भी है।
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