मुंबई के बाणगंगा सरोवर में हजारों मछलियों की मौत ने उठाया आस्‍था बनाम पर्यावरण का सवाल

वालकेश्वर के ऐतिहासिक तालाब में पितृपक्ष के तर्पण से बिगड़े हालात, फूलों के सड़ने दूषित हुआ पानी, दीयों के तेल से घटा ऑक्‍सीजन का स्‍तर
दक्षिण मुंबई के वालकेश्वर में स्थित ऐतिहासिक बाणगंगा सरोवर। 

दक्षिण मुंबई के वालकेश्वर में स्थित ऐतिहासिक बाणगंगा सरोवर। 

फोटो : विकी कॉमंस

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दक्षिण मुंबई के वालकेश्वर में ऐतिहासिक बाणगंगा सरोवर में हजारों मछलियों की मौत से हड़कंप है। ऐसी घटना यहां लगातार दूसरे साल हुई है। पिछले साल भी पितृपक्ष में इस प्राचीन सरोवर से लगभग 10,000 किलोग्राम मरी हुई मछलियां निकाली गई थीं। तब इन मछलियों की मौत का कारण पितृपक्ष में लोगों द्वारा तर्पण के लिए सरोवर में पूजा-पाठ के दौरान इस्‍तेमाल फूलों के सड़ने, जलाए गए दीयों का तेल तालाब में जाने, और आटे के पिंड व दूध जैसे कार्बनिक पदार्थ भारी मात्रा में डाले जाने से पानी दूषित होने और ऑक्‍सीजन में कमी आने को बताया गया था। इस साल फिर से तकरीबन यही सिलसिला दोबारा देखने को मिल रहा है। 

हरकत में आया BMC, हो रही तालाब की सफाई

दो-तीन दिनों में लगातार मरती मछलियों के सरोवर में दिखाई देने के बाद स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों का ध्यान इस ओर गया है। इसके बाद बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) हरकत में आया है। मछलियों की मौत के बाद BMC ने पानी के नमूने जांच के लिए भेजे हैं। साथ ही सरोवर की सफाई शुरू कर दी गई है और भारी मात्रा में मरी हुई मछलियों के साथ ही फूलों का कचरा और अन्य जैविक सामग्री का कचरा निकाला जा रहा है। सफाई का काम तेज करने के लिए बाणगंगा सरोवर की निगरानी व देखरेख के लिए टैंक पर कर्मचारियों की संख्या बढ़ा दी गई है। तालाब में ऑक्‍सीजन का लेवल बढ़ाने के लिए एक एरेशन पंप भी लगाया है, ताकि सरोवर में मौजूद मछलियों को सांस लेने में दिक्‍कत न हो। इसके साथ ही बुरी तरह दूषित हो चुके टैंक के पानी निकालकर उसे दोबारा भरने का काम भी शुरू किया जाने वाला है। मछलियों की मौत के बाद जरूरी कदम उठाने और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदमों पर चर्चा करने के लिए BMC ने स्थानीय निवासियों और पुजारियों के साथ अपने  डी वार्ड कार्यलय में बैठक भी की है।  

पिछले साल भी पितृपक्ष में मरी थीं मछलियां

2025 में, BMC ने तीन दिनों में बाणगंगा से लगभग 10,000 किलोग्राम मरी हुई मछलियां, फूलों का कचरा और अन्य जैविक सामग्री हटाई थी। नगर निकाय ने पहले भी इस जगह पर कचरा इकट्ठा करने के लिए डिब्बे उपलब्ध कराए थे और जलाशय की सफाई का काम किया था। लगातार दूसरे साल पितृपक्ष के दौरान मछलियों की मौत की घटना सामने आने से यह सवाल उठता है कि मौजूदा सफाई व्यवस्था और कचरा प्रबंधन पर्याप्त नहीं हैं। खासकर तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान बड़ी मात्रा में फूल, खाद्य सामग्री और दूसरे जैविक पदार्थ पानी में पहुंचते हैं। ऐसे में केवल मरी हुई मछलियों और कचरे को निकालना स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि प्रदूषण के स्रोत को जलाशय तक पहुंचने से रोकने की जरूरत है। इसके लिए धार्मिक गतिविधियों के दौरान निगरानी, पूजा सामग्री के अलग संग्रह और नियमित रूप से पानी की गुणवत्ता की जांच जैसी व्यवस्था जरूरी हो सकती है।

जैविक कचरा पानी में कैसे करता है प्रदूषण

बाणगंगा सरोवर जैसी अपेक्षाकृत छोटी और स्थिर जलराशि में पूजा-अनुष्ठान से जुड़ा जैविक कचरा अचानक बढ़ जाए तो उसका असर केवल पानी की गंदगी तक सीमित नहीं रहता। फूल, पत्तियां, पिंड जैसी जैविक सामग्री और तेल मिलकर पानी में ऑक्सीजन की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक अध्‍ययन के मुताबिक फूल, पत्तियां, आटे या अनाज से बने पिंड जैसी सामग्री प्राकृतिक और जैविक होने के बावजूद जलाशय में बड़ी मात्रा में पहुंचने पर प्रदूषण का कारण बन सकती है। पानी में पड़े ये पदार्थ धीरे-धीरे सड़ने लगते हैं। इस अपघटन में बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं। उन्हें जैविक पदार्थ को तोड़ने के लिए पानी में घुली ऑक्सीजन की जरूरत होती है। किसी जलाशय में जितना अधिक जैविक पदार्थ पहुंचेगा, उसके अपघटन के लिए सूक्ष्मजीवों की गतिविधि भी उतनी बढ़ सकती है और पानी में घुली ऑक्सीजन की खपत बढ़ सकती है। इसी आवश्यकता को बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) के जरिए मापा जाता है। EPA के अनुसार अतिरिक्त जैविक पदार्थ सीधे BOD बढ़ा सकता है और इसके परिणामस्वरूप घुली ऑक्सीजन कम हो सकती है। 

फूल और दूसरे पौधों के अवशेषों के साथ यदि आटा, चावल या दूसरे खाद्य पदार्थ भी पानी में बड़ी मात्रा में जाएं तो वे सूक्ष्मजीवों के लिए अतिरिक्त कार्बन और पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। इससे माइक्रोबियल गतिविधि बढ़ सकती है। आगे चलकर नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्वों की अधिकता शैवाल की वृद्धि को भी बढ़ावा दे सकती है। शैवाल और दूसरे जैविक पदार्थों के मरने-सड़ने का चक्र ऑक्सीजन की कमी को और बढ़ा सकता है।

दीयों के तेल से क्यों घट जाती है पानी में ऑक्सीजन

दीपदान के दौरान दीये जलाने में इस्तेमाल होने वाला तेल पानी में पहुंचने पर दो तरह से ऑक्सीजन की समस्या पैदा कर सकता है। पहला, तेल पानी की सतह पर फैलकर एक पतली परत बना सकता है। इससे वातावरण और पानी के बीच गैसों के आदान-प्रदान में बाधा आ सकती है और पानी में वायुमंडलीय ऑक्सीजन के घुलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। दूसरा और महत्वपूर्ण कारण तेल का जैविक अपघटन है। साइंस जर्नल Environmental Science & Technology में प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट Assessment of Aquatic Toxicity and Oxygen Depletion during Aerobic Biodegradation of Vegetable Oil: Effect of Oil Loading and Mixing Regime के मुताबिक सूक्ष्मजीव तेल में मौजूद कार्बनिक यौगिकों को तोड़ते हैं और इस प्रक्रिया में घुली ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं। यानी तेल की मात्रा बढ़ने पर उसकी जैविक ऑक्सीजन मांग भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

वनस्पति तेलों पर किए गए प्रयोगशाला अध्ययनों में भी पानी में तेल की मात्रा बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की कमी देखी गई है। 2012 के एक अध्ययन में वनस्पति तेल के अलग-अलग भार और मिश्रण की परिस्थितियों में ऑक्सीजन की खपत मापी गई। अधिक तेल भार पर पानी के नमूनों में ऑक्सीजन पूरी तरह समाप्त होने तक की स्थिति देखी गई।

 समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब सीमित मात्रा वाले तालाब में बहुत बड़ी संख्या में दीपक जलाए जाते हैं और इन दीयों के डूबने पर इनका तेल पानी के ऊपर तैरने लगता है। तेल, फूल, पिंड और दूसरे जैविक अवशेष एक साथ बड़ी मात्रा में पानी में पहुंचने से पानी बुरी तरह दूषित हो जाता है। पानी के ऊपर तेल की परत के कारण पानी में नई ऑक्‍सीजन नहीं घुल पाती। दूसरी ओर पानी में डाले गए जैविक पदार्थों के सड़ने से कई ऑक्सीजन-खपत करने वाली प्रक्रियाएं एक साथ सक्रिय हो जाती हैं। इससे तालाब में मौजूद मछलियों और अन्‍य जलीय जीवों का जीवन खतरे में पड़ जाता है।

मछलियों को सांस लेने में क्यों होती है दिक्कत

वैज्ञानिक अध्‍ययन के मुताबिक मछलियां पानी में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen या DO) को गलफड़ों के जरिए अपने शरीर में लेती हैं। गलफड़ों से पानी लगातार गुजरता है और उसमें मौजूद ऑक्सीजन रक्त में पहुंचती है। इसलिए पानी के दूषित होने पर जब पानी में DO बहुत कम हो जाने पर मछलियों के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में मछलियों को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। वे तेजी से गलफड़े चलाने, पानी की सतह के पास आने या अधिक ऑक्सीजन वाले हिस्से की ओर जाने जैसी प्रतिक्रियाएं दिखा सकती हैं। 

सामान्य तौर पर 5 mg/L से कम DO मछलियों के लिए तनावपूर्ण हो सकता है और 3 mg/L से कम स्तर कई मछलियों के लिए बहुत कम माना जाता है। लगभग 1 mg/L से नीचे की स्थिति गंभीर हाइपोक्सिया से जुड़ी होती है। ऐसे में पानी में जलीय जीवन के लिए परिस्थितियां बेहद प्रतिकूल हो जाती हैं। ऑक्सीजन की कमी लंबे समय तक बनी रहे तो मछलियां कमजोर पड़ सकती हैं, उनका व्यवहार और भोजन लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और अंततः बड़े पैमाने पर फिश किल यानी मछलियों की सामूहिक मौत हो सकती है। इस तरह पानी में घुलित ऑक्सीजन का स्‍तर कम होने से मछलियों में श्वसन संकट पैदा हो जाता है।

पानी में गंदगी बढ़ने से होती हैं कई और भी समस्याएं

जलाशय में पूजा सामग्री, खाद्य पदार्थ और दूसरे जैविक अवशेषों की गंदगी का लगातार जमा होते जाना पानी में ऑक्‍सीजन के स्‍तर को घटाने के साथ ही और भी कई तरह समस्‍याएं पैदा करता है। यह पानी की गुणवत्ता को कई स्तरों पर प्रभावित करता है। एक अध्‍ययन के मुताबिक जैविक पदार्थ के अपघटन से BOD बढ़ने और घुली ऑक्सीजन घटने के अलावा पानी में नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है। यह स्थिति शैवाल और जलीय खरपतवार की अत्यधिक वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है। 

इस प्रक्रिया को सुपोषण या Eutrophication कहा जाता है। इससे पानी की सतह पर शैवाल या पौधों की मात्रा अनियंत्रित रूप से बढ़ती है। यह काफी तेजी से पानी में घुली ऑक्सीजन की खपत करते हैं, जिससे पानी में ऑक्‍सीजन का स्‍तर तेजी से घटने लगता है। ऑक्सीजन की कमी का असर केवल मछलियों पर नहीं पड़ता। जलीय कीट, प्लवक और दूसरे सूक्ष्‍म जीव भी प्रभावित होते हैं। बहुत कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में तलछट में जमा पदार्थों से फास्फोरस, अमोनिया, आयरन और मैंगनीज जैसे तत्वों का पानी में वापस आना बढ़ जाता है। 

गंभीर ऑक्सीजन-हीन परिस्थितियों में हाइड्रोजन सल्फाइड और मीथेन जैसे यौगिक भी बन सकते हैं, जिनसे दुर्गंध और पर्यावरणीय समस्याएं पैदा होती हैं। इसके अलावा शैवाल की अत्यधिक वृद्धि पानी की पारदर्शिता घटा कर पानी के भीतर रोशनी की पहुंच को सीमित कर देती है। इससे जलीय पौधों के लिए ऑक्‍सीजन बनाना मुश्किल हो जाता है। इस तरह तालाब में जमा फूल-पत्तियां और खाद्य सामग्री केवल सौंदर्य या ठोस कचरे की समस्या नहीं हैं, बल्कि वे जल गुणवत्ता, ऑक्सीजन और पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डालता है।

बाणगंगा सरोवर के लिए दायर की जा चुकी है याचिका

बाणगंगा सरोवर को प्रदूषण से बचाने और इसकी सुरक्षा के उपायों की मांग करते हुए स्‍थानीय निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता वालकेश्वर के निवासी संजय शिर्के अगस्‍त 2025 में एक जनहित याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर कर चुके हैं। पिछले साल पितृपक्ष में बड़ी संख्‍या में तालाब में मछलियों की मौत के बाद उन्होंने याचिका दायर कर इस ऐतिहासिक जलाशय को बचाने के लिए और कड़े कदम उठाने की मांग की थी। 

इस याचिका में उन्‍होंने बाणगंगा के संरक्षण, साफ-सफाई और इसके आसपास होने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरूरत पर जोर दिया था। उनका कहना था कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले इस जलाशय की देखरेख केवल नियमित सफाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पानी की गुणवत्ता, कचरा प्रबंधन और जलाशय में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के पर्यावरणीय असर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। मछलियों की सामूहिक मौत की घटना के बाद स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठ रही है कि बाणगंगा में पूजा सामग्री और अन्य जैविक कचरा डालने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था हो तथा श्रद्धालुओं के लिए ऐसी वैकल्पिक सुविधाएं विकसित की जाएं, जिनसे सरोवर पर दबाव कम हो।

ASI के दायरे में आता है तालाब

बृहन्मुंबई नगर निगम का कहना है कि इस जगह पर दखल देने की उसकी क्षमता सीमित है क्योंकि बाणगंगा निजी स्वामित्व में है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकार क्षेत्र में आती है। निवासियों ने धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एक वैकल्पिक सुविधा की भी मांग की है। यही बहुस्तरीय अधिकार क्षेत्र बाणगंगा के संरक्षण की चुनौती को जटिल बनाता है। 

जलाशय की सफाई, आसपास की नागरिक सुविधाओं और कचरा प्रबंधन में स्थानीय निकाय की भूमिका हो सकती है, जबकि ऐतिहासिक और संरक्षित स्मारक से जुड़े मामलों में पुरातत्व संबंधी नियम लागू होते हैं। ऐसे में किसी एक एजेंसी के स्तर पर कार्रवाई करने के बजाय नगर निगम, ASI, स्थानीय प्रशासन और जलाशय के स्वामित्व से जुड़े पक्षों के बीच स्पष्ट समन्वय जरूरी है। खासकर धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही और पूजा सामग्री के इस्तेमाल को देखते हुए पहले से ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिससे श्रद्धालुओं की धार्मिक गतिविधियां भी जारी रहें और उनका असर सरोवर के पानी तथा जलीय जीवन पर न्यूनतम हो।

प्रभु राम से जुड़ी बाणगंगा सरोवर की कहानी

बाणगंगा का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मुंबई के ऐतिहासिक जलाशय और सदियों पुराना एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान शिव की पूजा करने से पहले भगवान राम ने जमीन पर तीर चलाकर यहां गंगा की एक धारा बनाई थी। इसलिए यह सरोवर लोगों की धार्मिक आस्‍था और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इस कारण यहां  लंबे समय से यहां विभिन्न धार्मिक संस्कार को संपन्‍न करने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि इसके संरक्षण का सवाल एक साथ विरासत, आस्था और पर्यावरण से जुड़ जाता है। 

ऐतिहासिक जलाशय होने के कारण इसके पानी और संरचना की रक्षा करना केवल सौंदर्य बनाए रखने का मामला नहीं है। जलाशय में लगातार जमा होने वाला कचरा, पूजा सामग्री और दूसरे प्रदूषक इसकी पारिस्थितिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए बाणगंगा के संरक्षण के लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें इसकी धार्मिक परंपरा और जलाशय के पर्यावरणीय स्वास्थ्य, दोनों को साथ लेकर चला जाए।

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