प्रतिमा विसर्जन की परंपरा भारत के सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा है, लेकिन इसके साथ जल गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिकी से जुड़े पर्यावरणीय सवाल भी उठते रहे हैं।
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प्रतिमा विसर्जन के बाद पानी में क्या-क्या घुलता है? कैसे बदलता है जलीय इकोसिस्टम?
हर साल अगस्त से अक्टूबर के बीच देश के अलग-अलग राज्यों में त्योहारों और धार्मिक आयोजनों की रौनक रहती है। कहीं गणेशोत्सव मनाया जाता है, तो कहीं दुर्गा पूजा और अन्य पर्व। इन आयोजनों के समापन पर लाखों प्रतिमाओं का नदियों, झीलों, तालाबों और समुद्र में विसर्जन किया जाता है। यह परंपरा भारत के सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा है, लेकिन इसके साथ जल गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिकी से जुड़े पर्यावरणीय सवाल भी उठते रहे हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और विभिन्न राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की जांच में सामने आया है कि प्रतिमा विसर्जन के बाद कई जलाशयों की जल गुणवत्ता कुछ समय के लिए बदल जाती है। इस दौरान DO, BOD, COD और पानी में मौजूद ठोस कणों जैसे मानकों में बदलाव दर्ज किए गए हैं। कुछ मामलों में भारी धातुओं के अंश भी मिले हैं।
यह समस्या केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। देश के कई जलाशय पहले से ही प्रदूषण का दबाव झेल रहे हैं। ऐसे में प्रतिमा विसर्जन से उन पर और दबाव पड़ सकता है।
भोपाल में गणेश प्रतिमा विसर्जन के बाद मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की जांच में कुछ जलाशयों के पानी में जिंक, तांबा, क्रोमियम, सीसा, कैडमियम और कोबाल्ट जैसी भारी धातुएं मिलीं। हालांकि, बोर्ड के मुताबिक इन धातुओं की मात्रा पिछले वर्षों के मुकाबले कम थी। इसके बावजूद सवाल यह है कि प्रतिमा विसर्जन के बाद पानी और तलछट में क्या बदलता है और क्या हमारी जांच में ये बदलाव सामने आ पाते हैं?
किसी प्रतिमा का विसर्जन होते ही वह पूरी तरह पानी में नहीं घुलती। उसका ढांचा, रंग, वार्निश, गोंद, चमकीली सजावट और अन्य सामग्री अलग-अलग गति से टूटती है। इसी प्रक्रिया में कुछ रासायनिक तत्व पानी और तलछट (Sediment) तक पहुंचते हैं।
यदि प्रतिमा प्राकृतिक मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी हो, तो उसका असर अपेक्षाकृत कम माना जाता है। इसके विपरीत, POP से बनी प्रतिमाएं देर से टूटती हैं। इनके रंग और वार्निश में सीसा, कैडमियम (Cd), क्रोमियम (Cr), तांबा (Pb) और जिंक (Zn) जैसी भारी धातुएं हो सकती हैं। विसर्जन के बाद ये धीरे-धीरे पानी में पहुंचती हैं।
कोलकाता में हुगली नदी पर 2019 के काली पूजा विसर्जन के बाद हुए एक अध्ययन में विसर्जन के बाद जिंक, सीसा, निकल और क्रोमियम जैसी भारी धातुओं की मात्रा बढ़ी मिली थी। शोधकर्ताओं ने इसका प्रमुख कारण प्रतिमाओं में प्रयुक्त रंग, वार्निश और सजावटी सामग्री को माना।
प्राकृतिक मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी प्रतिमाएं अपेक्षाकृत जल्दी विघटित हो जाती हैं। इसके विपरीत, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी प्रतिमाएं देर से टूटती हैं।
प्रतिमा से जलाशय तक: भारी धातुओं की पूरी यात्रा
किसी प्रतिमा का विसर्जन होते ही वह एक साथ पानी में नहीं घुलती। सबसे पहले उसका बाहरी रंग और सजावटी परतें ढीली पड़ती हैं। इसके बाद प्लास्टर या मिट्टी का ढांचा टूटने लगता है। इसी प्रक्रिया के दौरान रंग, वार्निश, गोंद और अन्य सामग्री में मौजूद कुछ रासायनिक तत्व धीरे-धीरे पानी और तलछट तक पहुंचते हैं।
सभी प्रतिमाओं का पर्यावरणीय प्रभाव एक जैसा नहीं होता। प्राकृतिक मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी प्रतिमाएं अपेक्षाकृत जल्दी विघटित हो जाती हैं। इसके विपरीत, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी प्रतिमाएं देर से टूटती हैं। इन रंगों और वार्निश में सीसा, कैडमियम, क्रोमियम, तांबा और जिंक जैसी भारी धातुएं हो सकती हैं। विसर्जन के बाद यही पदार्थ धीरे-धीरे जलाशय में फैलते हैं।
इसके प्रमाण वैज्ञानिक अध्ययनों में भी मिलते हैं। भारत में किए गए कुछ अध्ययन भी बताते हैं कि प्रतिमा विसर्जन के बाद जलाशयों में भारी धातुओं की मात्रा में अस्थायी वृद्धि दर्ज की जा सकती है।
यह भी है कि सभी भारी धातुएं लंबे समय तक जल में घुली नहीं रहतीं। कुछ पानी में घुली रहती हैं, जबकि बड़ी मात्रा तलछट के महीन कणों से चिपककर नीचे बैठ जाती है। इसलिए केवल पानी की जांच से पूरे प्रदूषण का आकलन नहीं किया जा सकता।
प्रतिमा विसर्जन के प्रभाव को केवल त्योहार के अगले दिन पानी की जांच करके नहीं समझा जा सकता। यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि कौन-से प्रदूषक तलछट में जमा हुए, वे कितने समय तक बने रहे और बाद में उनमें क्या बदलाव आए।
यही वजह है कि अब वैज्ञानिक केवल पानी की गुणवत्ता मापने को पर्याप्त नहीं मानते। CPCB ने अपने संशोधित दिशा-निर्देशों में पानी के साथ-साथ तलछट की भी निगरानी की सिफारिश की है।
बोर्ड का कहना है कि प्रतिमा विसर्जन का सही असर समझने के लिए विसर्जन से पहले, विसर्जन के दौरान और उसके बाद पानी तथा तलछट, दोनों के नमूने लेकर उनमें क्रोमियम, सीसा, जिंक, तांबा, कैडमियम, कोबाल्ट, मैंगनीज़, पारा और अन्य धातुओं का विश्लेषण किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि तलछट सिर्फ़ प्रदूषकों को जमा करके नहीं रखती। तेज़ बारिश, बाढ़, ड्रेजिंग या जलाशय की सफाई जैसी परिस्थितियों में तलछट में जमा तत्त्व दोबारा पानी में आ सकते हैं। यानी एक बार तल में जमा होने के बाद भी उनका असर खत्म नहीं होता।
भारत के कई जलाशयों पर हुए अध्ययनों की समीक्षा भी यही बात बताती है। इसके अनुसार कई नदियों और झीलों के तल में तांबा, जिंक, सीसा और क्रोमियम जैसी धातुओं का स्तर अंतरराष्ट्रीय तलछट गुणवत्ता मानकों से अधिक पाया गया।
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इन धातुओं के स्रोत केवल प्रतिमा विसर्जन नहीं हैं। उद्योग, शहरी बहाव, सीवेज, कृषि गतिविधियां और धार्मिक आयोजन, सभी इनकी मात्रा बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं।
इसलिए किसी एक स्रोत को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि जिन जलाशयों में पहले से प्रदूषण मौजूद हो, वहां प्रतिमा विसर्जन अतिरिक्त प्रदूषण भार (Additional Load) जोड़ सकता है।
दूसरे शब्दों में, प्रतिमा विसर्जन के प्रभाव को केवल त्योहार के अगले दिन पानी की जांच करके नहीं समझा जा सकता। यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि कौन-से प्रदूषक तलछट में जमा हुए, वे कितने समय तक बने रहे और बाद में उनमें क्या बदलाव आए। यही वजह है कि आज वैज्ञानिक प्रतिमा विसर्जन को एक अल्पकालिक घटना नहीं, बल्कि जलाशय की दीर्घकालिक पारिस्थितिकी से जुड़ा विषय मानते हैं।
असली खतरा केवल पानी में नहीं, तलछट में भी
भारी धातुओं का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक पानी में घुला नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे नदी, झील या तालाब की तलछट के महीन कणों से चिपककर नीचे जमा हो जाता है। इसलिए केवल पानी के नमूनों के आधार पर पूरे प्रदूषण का आकलन नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक तलछट को भारी धातुओं का सबसे बड़ा भंडार मानते हैं। एक अंतरराष्ट्रीय समीक्षा के अनुसार पानी में पहुंचने वाली धातुओं का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अंततः तलछट में जमा हो सकता है। इसलिए इसे भारी धातुओं का अंतिम भंडार (Ultimate Sink) कहा जाता है।
लेकिन प्रदूषक हमेशा वहीं नहीं बने रहते। यदि पानी की स्थिति बदले, तो तलछट में जमा तत्त्व दोबारा पानी में लौट सकते हैं। इस प्रक्रिया को रीमोबिलाइजेशन (Remobilization) कहा जाता है। तेज़ बारिश, बाढ़, ड्रेजिंग, नावों की आवाजाही या तेज़ बहाव जैसी परिस्थितियां इसे बढ़ा सकती हैं।
स्प्रिंगर में प्रकाशित एक समीक्षा बताती है कि बाढ़ और अन्य प्राकृतिक घटनाएं वर्षों से तलछट में जमा प्रदूषकों को फिर से सक्रिय कर सकती हैं। यानी किसी जलाशय में आज दिखाई देने वाला प्रदूषण केवल हाल की गतिविधियों का परिणाम नहीं होता। उसमें पहले से जमा प्रदूषकों की भी भूमिका हो सकती है।
भारत के जलाशयों की तलछट पर उपलब्ध शोध भी इसी निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं। 1979 से 2017 के बीच प्रकाशित अध्ययनों की एक समीक्षा में कई स्थानों पर तांबा, जिंक, सीसा, क्रोमियम और आर्सेनिक जैसी धातुओं का स्तर अंतरराष्ट्रीय तलछट गुणवत्ता मानकों से अधिक पाया गया। समीक्षा यह भी बताती है कि इन धातुओं का स्रोत केवल प्रतिमा विसर्जन नहीं है। उद्योग, सीवेज, शहरी बहाव, कृषि गतिविधियां और धार्मिक आयोजन, सभी इन धातुओं की मात्रा बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं।
केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं है कि किसी जलाशय में भारी धातुओं की कुल मात्रा कितनी है। जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि धातुएं किस रासायनिक रूप में मौजूद हैं और उनका कितना हिस्सा जीवों द्वारा अवशोषित (Bioavailable) हो सकता है। पानी का pH, घुलित ऑक्सीजन और तलछट में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
इसी कारण CPCB प्रतिमा विसर्जन के प्रभाव का आकलन करते समय पानी के साथ-साथ तलछट की निगरानी की भी सिफारिश करता है। क्योंकि यदि तलछट की नियमित जांच नहीं होगी, तो प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा हमारी निगरानी से बाहर रह जाएगा।
दूसरे शब्दों में, प्रतिमा विसर्जन का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए पानी और तलछट, दोनों को साथ देखकर ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। यही वजह है कि आज वैज्ञानिक प्रतिमा विसर्जन के प्रभाव का आकलन केवल पानी की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि तलछट में होने वाले बदलाव और उसमें जमा प्रदूषकों के दीर्घकालिक अध्ययन से भी करते हैं।
जलीय पारिस्थितिकी पर क्या असर पड़ता है?
भारी धातुओं का असर केवल पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहता। यदि वे लंबे समय तक पानी में बनी रहें, तो उनका प्रभाव पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। सबसे पहले असर सूक्ष्म जीवों पर दिखाई देता है। इसके बाद यह प्रभाव मछलियों, अन्य जलीय जीवों, पक्षियों और अंततः मनुष्यों तक पहुंच सकता है।
इसलिए सीसा, कैडमियम, पारा और क्रोमियम जैसी भारी धातुओं को पर्यावरण के लिए चिंता का ख़ास कारण माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार ये धातुएं आसानी से नष्ट नहीं होतीं। ये लंबे समय तक बनी रहती हैं और जलीय जीवों के शरीर में जमा हो सकती हैं।
सबसे पहले असर सूक्ष्म जीवों पर
किसी भी जलाशय की खाद्य श्रृंखला प्लवक (Plankton), शैवाल (Algae), बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीवों से शुरू होती है। यही जीव मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के भोजन का पहला स्रोत हैं।
उपलब्ध शोध बताते हैं कि भारी धातुओं की अधिक मात्रा प्लवकों की वृद्धि और भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) को प्रभावित कर सकती है। इससे पूरी खाद्य श्रृंखला पर असर पड़ता है। जल पारिस्थितिकी वैज्ञानिक वेन-श्योंग वांग के अनुसार घुली हुई धातुएं सबसे पहले प्लवकों के माध्यम से खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करती हैं। यह अध्ययन समुद्री पारिस्थितिकी पर आधारित था, लेकिन यही सिद्धांत मीठे पानी के अधिकांश जलाशयों पर भी लागू माना जाता है।
मछलियों और अन्य जलीय जीवों पर प्रभाव
यदि भारी धातुओं का संपर्क लंबे समय तक बना रहे, तो वे मछलियों के गलफड़ों, लीवर, गुर्दों और मांसपेशियों में जमा हो सकती हैं। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि इससे उनकी बढ़त, प्रजनन, रोगों से लड़ने की क्षमता और व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं। कुछ मामलों में अंडों के विकास और बच्चों के जीवित रहने की दर भी घटती देखी गई है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CIFRI) का भी मानना है कि शहरी प्रदूषण वाले जलाशयों में भारी धातुएं अंतर्देशीय मछली संसाधनों के लिए चिंता का विषय हैं।
ऑक्सीजन और शैवाल पर असर
भारी धातुएं सीधे पानी से ऑक्सीजन नहीं हटातीं। लेकिन प्रतिमा विसर्जन के साथ पानी में पहुंचने वाले फूल, कपड़ा, जैविक सामग्री और अन्य अवशेष सड़ने लगते हैं। इस प्रक्रिया में सूक्ष्मजीव बड़ी मात्रा में घुलित ऑक्सीजन (DO) का उपयोग करते हैं। इससे DO घट सकती है और जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) बढ़ सकती है।
यदि किसी जलाशय में पहले से पोषक तत्वों की मात्रा अधिक हो, तो विसर्जन के साथ आने वाली जैविक सामग्री शैवाल की अत्यधिक वृद्धि को भी बढ़ावा दे सकती है। इस प्रक्रिया को यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) कहा जाता है। इससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और इससे जलीय जीवों को नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि CPCB प्रतिमा विसर्जन के बाद जल गुणवत्ता की निगरानी में DO और BOD दोनों की नियमित जांच की भी सिफारिश करता है।
खाद्य श्रृंखला से मानव तक
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता बायोएक्यूम्यूलेशन (Bioaccumulation) और बायोमैग्नीफिकेशन (Biomagnification) को लेकर है। भारी धातुएं सबसे पहले सूक्ष्म जीवों में पहुंचती हैं। इसके बाद वे छोटी मछलियों और फिर बड़ी मछलियों के शरीर में जमा होने लगती हैं। इस प्रक्रिया में खाद्य श्रृंखला में ऊपर जाते-जाते कुछ धातुओं की मात्रा बढ़ सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार यदि ऐसे जलाशय मछली पालन का स्रोत हों, तो कुछ भारी प्रदूषक मछलियों के माध्यम से मनुष्यों तक भी पहुंच सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि प्रतिमा विसर्जन के बाद हर जलाशय में तुरंत ऐसा प्रभाव दिखाई देगा। प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि जलाशय पहले से कितना प्रदूषित है, वहां कितनी प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ और प्रदूषक कितने समय तक बने रहे।
फिर भी उपलब्ध अध्ययन यह संकेत देते हैं कि जल गुणवत्ता का आकलन केवल पानी की जांच तक सीमित नहीं होना चाहिए। जलीय जीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को भी साथ लेकर देखना आवश्यक है।
क्या मानव स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है?
प्रतिमा विसर्जन के बाद जलाशयों में भारी धातुओं की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि वे तुरंत मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाती हैं। जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी मात्रा कितनी है, वे कितने लंबे समय तक बनी रहती हैं और क्या वे पेयजल या खाद्य श्रृंखला तक पहुंच रही हैं।
इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सीसा, कैडमियम, पारा और आर्सेनिक जैसी धातुओं के लिए पीने के पानी और खाद्य पदार्थों में सुरक्षित सीमा तय की है। WHO के अनुसार इन धातुओं के लंबे समय तक संपर्क से तंत्रिका तंत्र, गुर्दों, हड्डियों और अन्य अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
यदि किसी प्रदूषित जलाशय का उपयोग मत्स्य पालन, सिंचाई या स्थानीय जलापूर्ति के लिए किया जाता है, तो ऐसे मामलों में नियमित निगरानी ज़रूरी होती है। विशेष चिंता तब होती है, जब भारी प्रदूषक तत्त्व पहले जलीय जीवों के शरीर में जमा हों और फिर खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंचने लगें। इस प्रक्रिया को बायोएक्यूम्यूलेशन (Bioaccumulation) और बायोमैग्नीफिकेशन (Biomagnification) कहा जाता है।
फिलहाल भारत में ऐसे दीर्घकालिक अध्ययन सीमित हैं, जो प्रतिमा विसर्जन और मानव स्वास्थ्य के सीधे संबंध की पड़ताल करते हों। इसलिए वैज्ञानिक किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले नियमित निगरानी, स्थानीय परिस्थितियों और अन्य प्रदूषण स्रोतों को साथ लेकर देखने की सलाह देते हैं।
यही वजह है कि स्वास्थ्य जोखिम का आकलन केवल एक बार की जांच से नहीं, बल्कि लंबे समय तक जुटाए गए वैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
प्रतिमा विसर्जन के बाद जलाशयों में भारी धातुओं की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि वे तुरंत मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाती हैं। जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी मात्रा कितनी है, वे कितने लंबे समय तक बनी रहती हैं और क्या वे पेयजल या खाद्य श्रृंखला तक पहुंच रही हैं।
क्या केवल प्रतिमाएं ही जिम्मेदार हैं?
पर्यावरण पर प्रतिमा विसर्जन के पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा करते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना जरूरी है। किसी जलाशय में भारी धातुओं की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि वे केवल प्रतिमा विसर्जन से आई हैं। भारत की अधिकांश शहरी नदियां, झीलें और तालाब पहले से ही कई तरह के प्रदूषण के दबाव में हैं। इसलिए प्रतिमा विसर्जन को पूरे प्रदूषण का एकमात्र कारण मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
CPCB के जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (NWMP) के अनुसार देश के अनेक शहरी जलाशय पहले से ही घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरे, कृषि अपवाह और वर्षा के साथ बहकर आने वाले प्रदूषकों से प्रभावित हैं।
कई जगहों पर सबसे बड़ी समस्या बिना उपचार का सीवेज है। इसके अलावा चमड़ा उद्योग, धातु प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), इलेक्ट्रोप्लेटिंग, वस्त्र रंगाई, बैटरी निर्माण और रासायनिक उद्योग भी सीसा, क्रोमियम, कैडमियम और निकेल जैसी भारी धातुओं के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं।
यही स्थिति देश के अनेक नगरों में दिखाई देती है। कई शहरी तालाब और झीलें पूरे वर्ष घरेलू सीवेज और ठोस कचरे का दबाव झेलते हैं। ऐसे जलाशयों में प्रतिमा विसर्जन को अलग घटना के रूप में नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रदूषण के साथ जोड़कर देखना अधिक उचित है।
दिल्ली की यमुना, हैदराबाद की हुसैन सागर और बेंगलुरु की कई झीलें पहले से ही सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और शहरी बहाव के दबाव में हैं। ऐसे जलाशयों में प्रतिमा विसर्जन पूरे प्रदूषण का अकेला कारण नहीं होता। लेकिन त्योहारों के दौरान यह पहले से मौजूद प्रदूषण में कुछ और भार जोड़ सकता है।
इसलिए किसी भी जलाशय का मूल्यांकन पूरे जलग्रहण क्षेत्र को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यदि विसर्जन के बाद भारी धातुओं का स्तर बढ़ता है, तो केवल प्रतिमाओं को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि विसर्जन से पहले जलाशय की स्थिति क्या थी, उसमें कौन-कौन से नाले गिरते हैं, आसपास औद्योगिक गतिविधियां हैं या नहीं और वर्षा के दौरान कितना शहरी बहाव उसमें पहुंचता है।
दुनिया के दूसरे देशों के अध्ययनों में भी यही बात सामने आई है। अधिकांश शहरी जलाशयों में भारी धातुओं का स्रोत एक नहीं, बल्कि कई होते हैं। औद्योगिक गतिविधियां, शहरी बहाव, सीवेज और अन्य मानवीय गतिविधियां मिलकर प्रदूषण बढ़ाती हैं। इसलिए किसी एक स्रोत के आधार पर पूरे प्रदूषण का आकलन नहीं किया जा सकता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिमा विसर्जन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जहां जलाशय पहले से प्रदूषित हों, वहां त्योहारों के दौरान बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का विसर्जन निलंबित ठोस, रंग, प्लास्टर और कुछ धातुओं के रूप में अतिरिक्त प्रदूषण भार (Additional Pollutant Load) जोड़ सकता है। इसलिए प्रतिमा विसर्जन के प्रभाव का आकलन हमेशा पूरे जलाशय और उसके सभी संभावित प्रदूषण स्रोतों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
दूसरे शब्दों में, सवाल केवल यह नहीं है कि प्रतिमा विसर्जन से कितना प्रदूषण हुआ। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि जलाशय पहले से किस स्थिति में था। यही तरीका प्रतिमा विसर्जन के वास्तविक प्रभाव को समझने में मदद करता है और आगे के समाधान की दिशा भी तय करता है।
दिल्ली की यमुना, हैदराबाद की हुसैन सागर और बेंगलुरु की कई झीलें पहले से ही सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और शहरी बहाव के दबाव में हैं। ऐसे जलाशयों में प्रतिमा विसर्जन पूरे प्रदूषण का अकेला कारण नहीं होता।
समाधान क्या हैं?
पिछले कुछ वर्षों में प्रतिमा विसर्जन के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए कई राज्यों और नगर निकायों ने नए उपाय अपनाए हैं। CPCB, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना है।
समाधान केवल किसी एक सामग्री पर प्रतिबंध लगाने से नहीं निकलेगा। प्रतिमा निर्माण से लेकर विसर्जन, अवशेषों के निस्तारण और जलाशय की निगरानी तक पूरी प्रक्रिया को अधिक प्रकृति के अनुकूल बनाना होगा।
CPCB के वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रतिमा विसर्जन को रोकना उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विसर्जन सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से हो, ताकि प्राकृतिक जलाशयों को सुरक्षित रखा जा सके।
प्राकृतिक सामग्री और सुरक्षित रंग
CPCB की Guidelines for Idol Immersion (2020) प्राकृतिक मिट्टी (Natural Clay) से बनी प्रतिमाओं और जल में घुलने वाले, गैर-विषैले (Non-toxic) रंगों के उपयोग का सुझाव देती है। इसके विपरीत, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP), सिंथेटिक रंग और गैर-जैव अपघटनीय सजावटी सामग्री जलाशयों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने से पारंपरिक कारीगरों और स्थानीय शिल्प को भी प्रोत्साहन मिलता है।
शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि पर्यावरण के लिए सुरक्षित परंपराओं के लिए प्राकृतिक और आसानी से गलने वाली (Biodegradable) सामग्री से बनी प्रतिमाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
बेहतर विसर्जन और वैज्ञानिक निस्तारण
जहां संभव हो, CPCB कृत्रिम विसर्जन कुंड (Artificial Immersion Tanks) के उपयोग की सलाह देता है। इससे प्रतिमा के अवशेष, प्लास्टर, रंग और अन्य सामग्री को अलग करना आसान होता है और प्राकृतिक जलाशयों पर दबाव कम पड़ता है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में स्थानीय निकाय इस व्यवस्था को अपनाने लगे हैं।
हैदराबाद की हुसैन सागर झील इसका एक उदाहरण है। वर्षों तक यहां बड़ी संख्या में गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता रहा। इसके बाद जल गुणवत्ता को लेकर लगातार चिंताएं सामने आईं।
इस झील पर हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि जल प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बिना उपचार का सीवेज था। प्रतिमा विसर्जन भी प्रदूषण में योगदान देता है, लेकिन उसे अकेला कारण नहीं माना जा सकता।
पिछले कुछ सालों में प्रशासन ने कृत्रिम विसर्जन कुंडों की संख्या बढ़ाई है। विसर्जन के बाद प्रतिमा अवशेषों को अलग से एकत्र करने और विशेष सफाई अभियान चलाने की व्यवस्था भी की गई है। इन उपायों का उद्देश्य धार्मिक परंपरा को रोकना नहीं, बल्कि जलाशय पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है।
विसर्जन के बाद त्वरित सफाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। प्रतिमा के अवशेष, फूल-मालाएं, कपड़ा, प्लास्टिक और अन्य पूजा सामग्री को अलग-अलग इकट्ठा कर उनका वैज्ञानिक निस्तारण या पुनर्चक्रण (Recycling) किया जाना चाहिए। जैविक सामग्री से कम्पोस्ट बनाया जा सकता है, जबकि अन्य सामग्री का सुरक्षित प्रबंधन आवश्यक है।
केवल पानी नहीं, तलछट की भी निगरानी
प्रतिमा विसर्जन के प्रभाव का सही आकलन करने के लिए केवल पानी की जांच पर्याप्त नहीं है। CPCB विसर्जन से पहले, उसके दौरान और बाद में जल गुणवत्ता की निगरानी की सिफारिश करता है। इसमें DO, BOD, pH, निलंबित ठोस और आवश्यकता होने पर भारी धातुओं की जांच शामिल है। कई वैज्ञानिक इसके साथ तलछट की नियमित निगरानी को भी आवश्यक मानते हैं।
कई शहरों में तालाब और झीलें केवल धार्मिक आयोजनों के लिए नहीं, बल्कि स्थानीय जल निकासी, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए उनका संरक्षण केवल प्रशासन की नहीं, स्थानीय समुदायों की भी जिम्मेदारी है।
प्रतिमा के अवशेष, फूल-मालाएं, कपड़ा, प्लास्टिक और अन्य पूजा सामग्री को अलग-अलग इकट्ठा कर उनका वैज्ञानिक निस्तारण या पुनर्चक्रण (Recycling) किया जाना चाहिए।
साझा जिम्मेदारी
केवल नियम बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रतिमा निर्माता, पूजा समितियां, स्थानीय निकाय, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियां और नागरिक, सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। कई शहरों में पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा निर्माण, प्राकृतिक रंगों के उपयोग और जनजागरूकता अभियानों जैसी पहलें इसी दिशा में काम कर रही हैं।
आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में देखने की आवश्यकता नहीं है। यदि पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग बढ़े, विसर्जन की बेहतर व्यवस्था हो, अवशेषों का समय पर वैज्ञानिक निस्तारण किया जाए और पानी के साथ-साथ तलछट की भी नियमित निगरानी हो, तो दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। यही दृष्टिकोण आज अधिकांश वैज्ञानिक और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियां अपनाने की सलाह देती हैं।
आगे क्या?
प्रतिमा विसर्जन पर सार्वजनिक चर्चा अक्सर कुछ दिनों तक ही सीमित रहती है। जलाशयों में तैरती प्रतिमाओं और बदले हुए पानी की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन बहस जल्दी समाप्त हो जाती है। उपलब्ध शोधों के अनुसार असली सवाल इसके बाद शुरू होते हैं।
विसर्जन के बाद भारी धातुओं का स्तर कितने समय तक बना रहता है? इनमें से कितना हिस्सा तलछट में जमा होता है? क्या बाद में ये तत्व फिर पानी में लौटते हैं? जलीय जीवों और मत्स्य संसाधनों पर इनका दीर्घकालिक प्रभाव क्या होता है? और क्या भारत में इन सवालों के जवाब देने के लिए पर्याप्त निगरानी व्यवस्था मौजूद है?
फिलहाल ऐसे दीर्घकालिक अध्ययन बहुत कम हैं। अधिकांश निगरानी कार्यक्रम विसर्जन से पहले और उसके तुरंत बाद पानी की गुणवत्ता तक सीमित रहते हैं। पानी, तलछट और जलीय जीवों में लंबे समय तक होने वाले बदलावों पर अभी बहुत कम अध्ययन हुए हैं।
CPCB राज्यों और स्थानीय निकायों को जल गुणवत्ता की नियमित जांच करने और उसका रिकॉर्ड रखने की सलाह देता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में इस निगरानी में पानी के साथ तलछट, जलीय जैव विविधता और जहां आवश्यक हो, मछलियों में भारी धातुओं की निगरानी भी शामिल की जानी चाहिए।
वैज्ञानिक प्रतिमा विसर्जन को सिटीजन साइंस की पहल से जोड़ने का भी सुझाव देते हैं। ऐसी पहलें केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं, स्थानीय लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकती हैं। यदि हर वर्ष एक ही जलाशय की नियमित निगरानी हो, तो यह समझना आसान होगा कि उसकी स्थिति बेहतर हो रही है या बिगड़ रही है। इससे स्थानीय समुदाय भी जलाशय संरक्षण की प्रक्रिया में सीधे जुड़ सकते हैं।
प्रतिमा विसर्जन का सवाल केवल एक धार्मिक आयोजन का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित जल प्रबंधन का भी है। आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तभी संभव है, जब निर्णय तात्कालिक तस्वीरों या धारणाओं के बजाय नियमित निगरानी, पारदर्शी आँकड़ों और स्वतंत्र वैज्ञानिक शोधों पर आधारित हों।
शायद अगली बार प्रतिमा विसर्जन पर सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि पानी का रंग बदला या नहीं। सवाल यह होगा कि पानी, तलछट और जलीय जीवन में आए बदलावों को हमने कितना समझा और कितना दर्ज किया।
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