

पिछोला झील, उदयपुर
फोटो: प्रभात रंजन
फरवरी 2026 में उदयपुर प्रशासन ने पेट्रोल और डीजल से चलने वाली नावों के नए लाइसेंस जारी नहीं करने के निर्देश दिए।
जुलाई 2026 में झीलों की क्षमता के अनुसार नावों की संख्या तय करने और सुरक्षित नौकायन के लिए नई नीति का मसौदा तैयार किया गया।
फतेहसागर झील पर हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन में अलग-अलग स्थानों पर पानी की गुणवत्ता और जलीय जीवों की स्थिति में अंतर पाया गया।
झीलों का प्रदूषण कम करने के लिए नावों पर नियंत्रण के साथ सीवेज, कचरे, अतिक्रमण और जलग्रहण क्षेत्रों की समस्याओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।
उदयपुर की पिछोला और फतेहसागर जैसी झीलें पर्यटन के साथ शहर की जल व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन बढ़ते पर्यटन, सीवेज, कचरे और झीलों के आसपास हो रहे निर्माण से इनके संरक्षण की चिंता बढ़ रही है। खासकर पेट्रोल और डीजल से चलने वाली नावों से होने वाले प्रदूषण को लेकर चिंता रही है।
फरवरी 2026 में जिला स्तरीय झील विकास समिति की बैठक में तत्कालीन जिला कलेक्टर नमित मेहता ने पेट्रोल और डीजल से चलने वाली नावों के नए लाइसेंस जारी नहीं करने के निर्देश दिए। साथ ही पहले से चल रही ऐसी नावों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया।
इसके बाद जुलाई 2026 में उदयपुर की झीलों में नौकायन और जेट्टी के प्रबंधन के लिए नई नीति का मसौदा तैयार किया गया। नगर निगम ने 30 जुलाई को इसकी सूचना जारी कर लोगों से सुझाव और आपत्तियां मांगीं।
प्रस्तावित नीति में झीलों की क्षमता के अनुसार नावों की संख्या तय करने, सुरक्षित नौकायन और पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया गया है। लेकिन सवाल है कि क्या नावों के संचालन पर नियंत्रण से झीलों का प्रदूषण कम होगा?
फरवरी 2026 की एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछोला झील में 59 नावें चल रही थीं। इनमें 35 पेट्रोल, 17 इलेक्ट्रिक और सात बिना इंजन वाली नावें थीं। वहीं फतेहसागर में 14 इलेक्ट्रिक नावें चल रही थीं।
पेट्रोल और डीजल से चलने वाली नावें हवा और पानी को प्रदूषित कर सकती हैं। इसलिए इनकी संख्या सीमित करना और कम प्रदूषण वाली नावों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना झीलों के संरक्षण का एक उपाय हो सकता है।
हालांकि, फरवरी के निर्देशों के बाद कितने लाइसेंस रोके गए और कितनी नावें बंद हुईं, इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है। प्रतिबंध का वास्तविक असर जानने के लिए यह जानकारी जरूरी है।
जुलाई की नई नौकायन नीति में क्या प्रस्ताव है?
28 जुलाई 2026 को उदयपुर की झीलों में नौकायन, जेट्टी और झील संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े नियमों का मसौदा जारी किया गया। जिला झील संरक्षण एवं विकास समिति ने इसे तैयार किया था। नगर निगम ने 30 जुलाई को इसकी सूचना प्रकाशित कर 15 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगीं।
प्रस्तावित नीति में मुख्य रूप से ये व्यवस्थाएं शामिल हैं:
हर झील में नावों की संख्या तय करना।
झील की क्षमता के अनुसार नौकायन की अनुमति देना और यात्री क्षमता इकाइयां (Passenger Capacity Units) तय करना।
नावों और यात्रियों की सुरक्षा के नियम बनाना।
नावों के ठहरने और यात्रियों के चढ़ने-उतरने की जगहों (जेट्टी) के लिए नियम बनाना।
पर्यटन के साथ झीलों के पर्यावरण का भी ध्यान रखना।
मसौदे के अनुसार, झीलें सार्वजनिक संसाधन हैं। नाव चलाने की अनुमति मिलने से किसी व्यक्ति या संस्था का झील पर स्थायी अधिकार नहीं हो जाता। यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है, क्योंकि झीलों का उपयोग केवल पर्यटन के लिए नहीं होता।
इनका संबंध स्थानीय पर्यावरण, पानी की उपलब्धता और जैव विविधता से भी है। हालांकि, अक्टूबर 2026 तक इस नीति को अंतिम मंजूरी मिलने या इसके लागू होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए अभी इसे प्रस्तावित नियमों के रूप में ही देखना चाहिए।
नई नीति में हर झील की वहन क्षमता (Carrying Capacity) के अनुसार नावों की संख्या तय करने का प्रस्ताव है। यानी यह देखना कि किसी झील में कितनी नावें चलाई जा सकती हैं, ताकि उसके पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।
उदयपुर की सभी झीलों का आकार, गहराई और पानी की मात्रा एक जैसी नहीं है। उनके आसपास की गतिविधियां भी अलग हैं। इसलिए सभी झीलों के लिए नावों की एक समान संख्या तय करना उचित नहीं होगा।
इसके लिए नावों की संख्या और आकार के साथ यह भी देखना होगा कि उनमें किस तरह के इंजन लगे हैं और वे रोज कितने घंटे चलती हैं। झील में पक्षियों और जलीय जीवों के रहने वाले हिस्सों को भी ध्यान में रखना होगा।
उदाहरण के लिए, अगर किसी किनारे पर जलपक्षी रहते हैं या वहां जलीय वनस्पतियां अधिक हैं, तो उस हिस्से में नावों की आवाजाही सीमित की जा सकती है। नावों से उठने वाली लहरों का झील के किनारों पर क्या असर पड़ता है, इसकी जांच भी जरूरी है।
इसके लिए हर झील का अलग वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। अध्ययन के आधार पर तय किया जा सकता है कि किस झील में कितनी नावों का संचालन उचित होगा।
नावों से होने वाले प्रदूषण को रोकना जरूरी है, लेकिन उदयपुर की झीलों में प्रदूषण के लिए केवल नावों को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
पेट्रोल और डीजल से चलने वाली नावों से तेल और ईंधन का रिसाव हो सकता है। इंजन का शोर जलीय जीवों को परेशान कर सकता है। वहीं नावों से उठने वाली लहरें झील के किनारों पर असर डाल सकती हैं।
हालांकि, उदयपुर की अलग-अलग झीलों में नावों से कितना प्रदूषण हो रहा है, इसे समझने के लिए वैज्ञानिक आंकड़ों की जरूरत है।
इसके अलावा झीलों में पहुंचने वाला सीवेज और कचरा भी प्रदूषण के स्रोत हैं। घरों से निकलने वाला गंदा पानी बिना साफ किए झील में पहुंचता है, तो उसमें जैविक पदार्थ और पोषक तत्व बढ़ सकते हैं।
इससे शैवाल तेजी से बढ़ सकते हैं और पानी में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। ऐसी स्थिति मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के लिए नुकसानदायक होती है।इसलिए यह जांचना जरूरी है कि उदयपुर की झीलों में किस वजह से कितना प्रदूषण हो रहा है।
उदयपुर की झीलों के संरक्षण को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने 5 जून 2026 को स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने झीलों, तालाबों, नहरों और उनके जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति पर चिंता जताई।
अदालत ने पिछोला, फतेहसागर, स्वरूपसागर, रंगसागर, गोवर्धन सागर और दूसरी झीलों का उल्लेख किया। आदेश में कहा गया कि ये झीलें एक-दूसरे से जुड़ी जल व्यवस्था का हिस्सा हैं। इनके बीच नहरें और प्राकृतिक जलमार्ग हैं। इसलिए किसी एक झील या जलमार्ग को नुकसान पहुंचने का असर पूरी व्यवस्था पर पड़ सकता है।
अदालत ने रूपसागर तालाब की सीमाओं, मदार नहर की दीवारों में बार-बार आ रही खराबी और फतेहसागर के आसपास प्रस्तावित निर्माण से जुड़ी खबरों पर भी ध्यान दिया।
अदालत ने संबंधित विभागों से झीलों की सीमाओं, अतिक्रमण, पानी की गुणवत्ता और संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी। साथ ही झीलों में बिना साफ किया गया सीवेज, उद्योगों का गंदा पानी, कचरा और निर्माण सामग्री पहुंचने से रोकने के निर्देश दिए।
राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी प्रमुख झीलों के पानी की गुणवत्ता की जांच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया।
इस आदेश से झील संरक्षण की एक बड़ी जरूरत सामने आती है। केवल पानी की सतह को साफ रखना पर्याप्त नहीं है। झीलों तक पानी पहुंचाने वाली नहरों, जलमार्गों और जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण भी जरूरी है।
झीलों का पानी कितना प्रदूषित है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव हो रहा है, यह जानने के लिए नियमित जांच जरूरी है। पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए कई मानक इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें घुली ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen), जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD), पीएच और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया शामिल हैं।
पानी में घुली ऑक्सीजन से पता चलता है कि जलीय जीवों के लिए उसकी स्थिति कैसी है। बीओडी पानी में जैविक प्रदूषण का संकेत देता है। वहीं कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की जांच से पता चलता है कि पानी में मल से जुड़ा प्रदूषण मौजूद हो सकता है या नहीं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2021 के जल गुणवत्ता आंकड़ों में उदयपुर की झीलों की जानकारी भी शामिल है। इनसे उस समय पानी की स्थिति समझी जा सकती है।
अप्रैल 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में फतेहसागर झील के पांच स्थानों पर पानी की गुणवत्ता और जलीय कीटों की जांच की गई। इसके लिए जनवरी से दिसंबर 2019 के बीच नमूने लिए गए थे। अध्ययन में पाल क्षेत्र का औसत बीओडी 3.6 मिलीग्राम प्रति लीटर और सीओडी 36.7 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज हुआ। ये दोनों मान बाकी चार स्थानों से अधिक थे। वहीं देवाली रोड के पास पानी में घुली ऑक्सीजन का औसत स्तर सबसे कम, 6.2 मिलीग्राम प्रति लीटर था।
अध्ययन में पाल क्षेत्र से कोई जलीय कीट नहीं मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसके पीछे पानी की गुणवत्ता के साथ जलीय जीवों के रहने की जगह की स्थिति भी जिम्मेदार हो सकती है। इससे पता चलता है कि एक ही झील के अलग-अलग हिस्सों में पानी और जलीय जीवों की स्थिति अलग हो सकती है।
हालांकि, ये आंकड़े 2026 में नावों पर सख्ती किए जाने से पहले के हैं। इस फैसले का असर समझने के लिए नए आंकड़ों की जरूरत होगी। इसके लिए जहां नावें चलती हैं, जेट्टी के आसपास और जहां नाले झील में गिरते हैं, वहां पानी की नियमित जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी देखना होगा कि प्रदूषण में नावों और दूसरे स्रोतों की कितनी भूमिका है।
प्रस्तावित नौकायन नीति तभी उपयोगी होगी, जब इसे लागू करने के साथ नियमित निगरानी भी की जाए। सबसे पहले हर झील में चलने वाली नावों की संख्या, उनके इंजन के प्रकार और लाइसेंस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। इससे बिना अनुमति चलने वाली नावों की पहचान करना आसान होगा।
हर झील में कितनी नावें चल सकती हैं, इसका वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक होना चाहिए। इससे नावों की संख्या तय करने का आधार स्पष्ट होगा।
कम प्रदूषण वाली नावों को बढ़ावा देना भी एक विकल्प है। इनमें पैडल बोट और इलेक्ट्रिक नावें शामिल हो सकती हैं। हालांकि, इलेक्ट्रिक नावों की बैटरी के रखरखाव और सुरक्षित निपटान की व्यवस्था जरूरी होगी।
नावों के संचालन पर सख्ती का असर स्थानीय नाव संचालकों और पर्यटन से जुड़े लोगों की आजीविका पर भी पड़ सकता है। इसलिए नए नियम लागू करते समय उनकी जरूरतों को ध्यान में रखना होगा। नई तरह की नावें चलाने के लिए नाव संचालकों को जरूरी प्रशिक्षण, मदद और पर्याप्त समय भी दिया जा सकता है।
इसके अलावा जेट्टी के आसपास कचरे के उचित प्रबंधन और ईंधन का रिसाव रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए।
झीलों को बचाने के लिए जिला प्रशासन, नगर निगम, जल संसाधन विभाग और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मिलकर काम करना होगा। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नावों की जांच, पानी की गुणवत्ता और प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी किस विभाग की है।
स्थानीय निवासियों, नाव संचालकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की राय लेकर नियमों को अधिक व्यावहारिक बनाया जा सकता है।
केवल नावों पर नियंत्रण से झीलें साफ नहीं होंगी
उदयपुर की नई नौकायन नीति का मसौदा झीलों में नावों की संख्या और उनके संचालन पर नियंत्रण की बात करता है। लेकिन इससे प्रदूषण कितना कम होगा, यह नियम लागू होने और पानी की गुणवत्ता की जांच के बाद ही पता चलेगा। इसके साथ सीवेज, कचरे और अतिक्रमण की समस्याओं पर भी काम करना जरूरी है। झीलों तक पानी पहुंचाने वाले प्राकृतिक जलमार्गों और जलग्रहण क्षेत्रों को बचाए बिना इनका संरक्षण अधूरा रहेगा।
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