

पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी और मयूर विहार क्षेत्र के बीच स्थित इस झील को देखकर अक्सर यह भ्रम होता है कि यह एक प्राकृतिक झील है।
चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी
संजय झील मेरे घर से महज़ डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ही है। यह उन जगहों में से एक है जिनके बारे में मैं केवल अख़बारों या रिपोर्टों के ज़रिए नहीं जानती, बल्कि इसकी मौजूदगी मेरे रोज़मर्रा के भूगोल का हिस्सा है।
इसलिए मई के आख़िरी सप्ताह में जब इस झील में बड़ी संख्या में मछलियों के मरने की खबर सुनी, तो पर्यावरण से जुड़ी तमाम दूसरी खबरों की तुलना में मुझ पर इसका असर थोड़ा ज़्यादा और गहरा हुआ।
शायद इसलिए कि यह खबर किसी दूर-दराज़ के किसी झील या तालाब की नहीं थी। यह उस इलाके की बात थी जिसके रास्तों, मौसम और बदलते परिदृश्य से मेरा अपना परिचय है।
एक पल के लिए लगा जैसे यह किसी झील का नहीं, अपने ही घर-आंगन का संकट हो। और एक मायने में शायद यह सच भी है। शहर में मौजूद झीलें, तालाब और नदियां केवल नक्शे पर दर्ज जल निकाय नहीं होते, वे उस सामूहिक पर्यावरण का हिस्सा होते हैं जिसमें हम सब सांस लेते हैं।
पहली नज़र में यह घटना मछलियों की मौत की एक दुखद खबर भर लग सकती है। लेकिन जब संजय झील के इतिहास, उसके बदलते भूगोल और वर्तमान स्थिति को थोड़ा करीब से देखने की कोशिश की, तो महसूस हुआ कि यह कहानी कहीं अधिक बड़ी है।
संजय झील में बड़ी संख्या में मछलियों की मौत की इस खबर को अगर केवल एक पर्यावरणीय दुर्घटना मान लिया जाए तो शायद हम उस बड़ी कहानी को देखने से चूक जाएंगे जो पिछले कई दशकों से इस झील के भीतर और उसके आसपास के इलाक़ों में आकार ले रही है।
दरअसल यह दिल्ली के शहरी विस्तार, सिकुड़ते जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया), बदलती जल-व्यवस्थाओं और शहर तथा पानी के रिश्ते की कहानी है। यह इस सवाल से भी जुड़ी है कि क्या केवल पानी भर देने से किसी झील और इसकी पारिस्थितिकी को बचाया जा सकता है?
पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी और मयूर विहार क्षेत्र के बीच स्थित इस झील को देखकर अक्सर यह भ्रम होता है कि यह एक प्राकृतिक झील है। जबकि वास्तविकता यह है कि इसे में दिल्ली के नियोजित शहरी विकास के दौरान विकसित किया गया था।
1970 के दशक में जब पूर्वी दिल्ली का तेजी से विस्तार हो रहा था, तब दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने इस क्षेत्र के अपेक्षाकृत निचले भूभाग को जलाशय और हरित क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई। 1980 के दशक की शुरुआत तक इसका स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने आया और इसे संजय झील नाम दिया गया।
यह झील उस दौर की निशानी है जब शहरों के विकास में जल निकायों को कम से कम औपचारिक रूप से ही सही, थोड़ी बहुत जगह दे दी जाती थी।
दिल्ली विकास प्राधिकरण के आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार इस झील का शुरुआती विस्तार लगभग 170-180 एकड़ क्षेत्र में था, जिसमें आसपास के हरित क्षेत्र (ग्रीन एरिया) और पार्क भी शामिल थे। समय के साथ इसका प्रभावी क्षेत्रफल घटता गया और आज इसका सक्रिय जलक्षेत्र लगभग 42 से 50 एकड़ के आसपास हो गया है।
दिल्ली के शहरी वेटलैंड्स पर हुए विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि जल निकायों की समस्या केवल उनके सिकुड़ते जलक्षेत्र तक सीमित नहीं है।
चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी
दिल्ली की संजय झील उस दौर की निशानी है जब शहरों के विकास में जल निकायों को कम से कम औपचारिक रूप से ही सही, थोड़ी बहुत जगह दे दी जाती थी।
किसी झील या जल-निकाय की कहानी केवल उसके आकार से नहीं समझी जा सकती। झील का वास्तविक जीवन उसके जलग्रहण क्षेत्र में बसता है। वर्षाजल के रास्ते, आसपास की खुली ज़मीन, मिट्टी की जलधारण क्षमता और भूजल से उसका संबंध, ये सभी मिलकर किसी जलाशय को जीवित रखते हैं।
दिल्ली के शहरी वेटलैंड्स पर हुए विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि जल निकायों की समस्या केवल उनके सिकुड़ते जलक्षेत्र तक सीमित नहीं है। बल्कि शहरीकरण के कारण प्रभावित होते जलग्रहण क्षेत्रों और प्राकृतिक जलप्रवाह मार्गों से भी जुड़ी है। संजय झील की स्थिति को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
दूसरे मायनों में इस झील की कहानी दरअसल दिल्ली के शहरीकरण की कहानी भी है। मयूर विहार, आई.पी. एक्सटेंशन, वसुंधरा एन्क्लेव, पटपड़गंज और आसपास के इलाकों का विस्तार ऐसे समय में हुआ जब शहरी नियोजन का प्रमुख उद्देश्य आवास, सड़कें और बुनियादी ढांचे विकसित करना था। जल निकाय और उनके प्राकृतिक जलमार्ग अक्सर प्राथमिकताओं की सूची में पीछे रह जाते थे।
आज झील के चारों ओर बहुमंज़िला इमारतें, चौड़ी सड़कें, पार्किंग स्थल और पक्की सतहें दिखाई देती हैं। ये केवल शहरी विकास के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि इस बात के संकेत भी हैं कि पानी के लिए उपलब्ध प्राकृतिक भूमि लगातार कम हुई है।
कंक्रीट की सतहें वर्षाजल को जमीन में समाने नहीं देतीं। परिणामस्वरूप एक ओर जलभराव बढ़ता है और दूसरी ओर भूजल पुनर्भरण (रिचार्ज) घटता है। धीरे-धीरे झील जैसी जल-इकाइयां अपने प्राकृतिक जल स्रोतों से कटने लगती हैं।
पिछले चार दशकों में संजय झील के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वर्षा का वह पानी जो कभी धीरे-धीरे बहकर झील तक पहुंचता था, अब सीधे नालों और ड्रेनेज नेटवर्क में चला जाता है। झील तो बची रही, लेकिन उसके पानी तक पहुंचने वाले रास्ते धीरे-धीरे गायब हो गए।
किसी भी जल निकाय का भविष्य केवल उसके भीतर मौजूद पानी से तय नहीं होता, बल्कि उन भूभागों और प्राकृतिक मार्गों से भी तय होता है जो उसे पानी उपलब्ध कराते हैं।
वर्तमान में संजय झील चारों ओर बहुमंज़िला इमारतें, चौड़ी सड़कें, पार्किंग स्थल और पक्की सतहें दिखाई देती हैं।
चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी
लैंडफ़िल से निकलने वाला लीचेट, सूक्ष्म प्लास्टिक और भारी धातुएं आसपास के जल स्रोतों और भूजल को प्रभावित कर सकती हैं।
संजय झील के पर्यावरणीय संदर्भ को समझना हो तो गाज़ीपुर लैंडफ़िल को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लैंडफ़िल से निकलने वाला लीचेट, सूक्ष्म प्लास्टिक और भारी धातुएं आसपास के जल स्रोतों और भूजल को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि संजय झील पर गाज़ीपुर लैंडफिल के प्रत्यक्ष प्रभावों को लेकर विस्तृत अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन पर्यावरण वैज्ञानिकों ने दिल्ली के पूर्वी हिस्से के भूजल और जल निकायों पर लैंडफिल लीचेट के संभावित प्रभावों की ओर बार-बार ध्यान दिलाया है।
जब किसी जलाशय का जलस्तर घटता है, उसका प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र सिकुड़ता है और ताज़े पानी का प्रवाह कम हो जाता है, तब गर्मी के प्रभाव में भी वृद्धि होती है। संजय झील के संदर्भ में भी समस्या केवल तापमान की नहीं, बल्कि उस जल-व्यवस्था की है जो वर्षों से कमजोर होती चली गई है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, जब तापमान अत्यधिक बढ़ता है और जलाशय में पानी का स्तर कम होता है, तो पानी में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen - DO) का स्तर अचानक खतरनाक रूप से गिर जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी परिस्थितियां बड़े पैमाने पर मछलियों की मौत का कारण बन सकती हैं। संजय झील में हुई हालिया घटना को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
इसके साथ ही पानी में मौजूद ऑर्गेनिक कचरे के सड़ने से अमोनिया का स्तर बढ़ता है और यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है, जिससे जलीय जीवों का दम घुटने लगता है। मई के आख़िरी सप्ताह में हुई मछलियों की सामूहिक मौत इसी वैज्ञानिक असंतुलन का एक दर्दनाक नतीजा है।
पूर्वी दिल्ली का पर्यावरण आज इसी विचित्र विरोधाभास के बीच खड़ा है, जहां एक ओर पानी का घटता स्तर और दम तोड़ता जीवन है, तो दूसरी ओर कचरे का विशाल पहाड़।
संजय झील को समझने के लिए उसके किनारे खड़ा होना ज़रूरी है। झील के कुछ हिस्सों की सतह सूखी है और मिट्टी में दरारें पड़ चुकी हैं। जबकि दूसरे हिस्सों में हाल में छोड़े गए पानी का असर नज़र आता है। यह असमानता ख़ुद ही झील की वर्तमान स्थिति की कहानी बयान करती है।
इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में झील परिसर में तैनात एक सुरक्षा गार्ड (नाम न बताने की शर्त पर) और आसपास की बस्तियों से वहां खेलने आए बच्चों ने बताया कि कुछ साल पहले तक झील में बड़ी संख्या में मछलियां दिखाई देती थीं। उनके अनुसार हालिया घटनाओं के बाद मछलियों की संख्या में बहुत अधिक कमी आई है।
बच्चों के लिए यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि उस जगह का बदल जाना है जहां वे रोज़ आते रहे हैं। उनका कहना है कि पहले झील में बड़ी मछलियां आसानी से दिखाई देती थीं, जबकि अब बची हुई मछलियां संख्या और आकार दोनों में पहले से छोटी नज़र आती हैं।
सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में खबर आने के बाद प्रशासन ने झील में पानी छोड़ना शुरू किया।
चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी
संजय झील का प्रबंधन मुख्य रूप से दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के पास है, जबकि इसमें शोधित पानी (STP वॉटर) की आपूर्ति की ज़िम्मेदारी दिल्ली जल बोर्ड (DJB) की है।
शहरी जल निकायों के पुनर्जीवन की अधिकांश परियोजनाएं जलस्तर बनाए रखने पर केंद्रित रहती हैं। लेकिन जल विज्ञान (Hydrology) के दृष्टिकोण से किसी झील का पुनर्जीवन केवल पानी भर देने का सवाल नहीं है। यह उसके जलग्रहण क्षेत्र, भूजल संपर्क और प्राकृतिक जल प्रवाह को पुनर्स्थापित करने का भी प्रश्न है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में खबर आने के बाद प्रशासन ने झील में पानी छोड़ना शुरू किया। लेकिन इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि झील में छोड़े जा रहे पानी की गुणवत्ता कैसी है?
संजय झील का प्रबंधन मुख्य रूप से दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के पास है, जबकि इसमें शोधित पानी (STP वॉटर) की आपूर्ति की ज़िम्मेदारी दिल्ली जल बोर्ड (DJB) की है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दोनों विभागों के बीच तालमेल की कमी इस बदहाली का कारण है? क्या इसकी नियमित रूप से 'डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन' और 'बीओडी' जांच हो रही है? क्या यह जल केवल जलस्तर बनाए रखने के लिए है या पारिस्थितिक पुनर्जीवन का भी हिस्सा है?
शहरी जल निकायों के संदर्भ में ये सभी सवाल महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पानी के स्तर का बढ़ना और जल गुणवत्ता सुनिश्चित होना दो अलग-अलग बातें हैं।
झील का निरीक्षण करने पर यह भी स्पष्ट होता है यह महज़ कोई संयोग नहीं है कि पानी केवल उसी हिस्से में दिखाई देता है जो एडवेंचर पार्क के व्यावसायिक दायरे में आता है। यह सीधे तौर पर शहरी नियोजन की उस प्राथमिकता को उजागर करता है जहां पर्यावरण और पारिस्थितिकी से पहले दृश्य सौंदर्य (Landscape Aesthetics) और व्यापार को तरजीह दी जाती है।
अगर झील का एक हिस्सा पानी से भर रहा है और दूसरा हिस्सा सूख रहा है, तो ऐसे में पुनर्जीवन के प्रयास को किस आधार पर आंका जाना चाहिए?
संजय झील का एक और विरोधाभासी दृश्य यह है कि जहां एक ओर झील का बड़ा हिस्सा सूखा दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर परिसर में सौंदर्यीकरण और संरचनात्मक विकास के कार्य जारी हैं।
झील के पूरे परिसर में पक्के रास्ते, पेवमेंट, ईंटों की मेड़ और अन्य निर्माण गतिविधियां दिखाई देती हैं। सार्वजनिक स्थलों का विकास महत्वपूर्ण है, लेकिन जल निकायों के मामले में मूल प्रश्न अलग होता है। यह प्रश्न इससे जुड़ा है कि क्या किसी झील के संरक्षण का पहला संकेत उसके किनारों पर बनी नई संरचनाएं हैं या उसके भीतर मौजूद पानी?
प्रशासनिक स्तर पर भविष्य में झील में फिर से मछलियों के बीज डाले जाएंगे और इस पर चर्चा हो रही है।
रघुवर (बदला हुआ नाम), स्थानीय निवासी, त्रिलोकपुरी
दिल्ली जैसे महानगर में जहां खुले जलस्रोत लगातार कम हो रहे हैं, वहां ऐसे संजय झील जैसे जल निकाय केवल पारिस्थितिक संसाधन नहीं बल्कि स्थानीय जीवन और आजीविका का हिस्सा भी होते हैं।
चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी
संजय झील का महत्व केवल मछलियों और अन्य जलीय जीवों तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार आसपास के पशुपालक परिवारों की गायों और भैंसों के लिए भी यह क्षेत्र लंबे समय से उपयोगी रहा है। गर्मियों में पानी और चराई की उपलब्धता के कारण यह एक महत्वपूर्ण स्थानीय संसाधन था।
दिल्ली जैसे महानगर में जहां खुले जलस्रोत लगातार कम हो रहे हैं, वहां ऐसे जल निकाय केवल पारिस्थितिक संसाधन नहीं बल्कि स्थानीय जीवन और आजीविका का हिस्सा भी होते हैं।
संजय झील के पास ही बसे त्रिलोकपुरी गांव के रघुवर (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हमें बताया गया है कि प्रशासनिक स्तर पर भविष्य में झील में फिर से मछलियों के बीज डाले जाएंगे और इस पर चर्चा हो रही है।
अगर ऐसा होता है तो यह जैविक गतिविधियों को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक कदम हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल नई मछलियों के आ जाने भर से झील का पारिस्थितिक संतुलन लौट आएगा?
अगर जल गुणवत्ता, जलग्रहण क्षेत्र और पारिस्थितिक परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं, तो मछलियों की नई खेप को भी उन्हीं चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा जिनसे पुरानी आबादी प्रभावित हुई थी।
हालांकि झील के परिसर में सब कुछ नक़ारात्मक या उदास करने वाला ही नहीं दिखता है। इस ढहती और नष्ट हो रही व्यवस्था के बीच एक छोटा-सा दृश्य हम जैसों के मन में एक उम्मीद भी जगाता है।
कुछ लोग आज भी झील के परिसर में पक्षियों और अन्य जीवों के लिए जगह-जगह मिट्टी के बर्तनों में पानी भरकर रखते हैं। कबूतर, कुत्ते और दूसरे जीव वहां पानी पीते दिखाई देते हैं।
यह छोटा सा प्रयास हमें याद दिलाता है कि जलाशयों का संकट केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं होता। यह समाज और प्रकृति के बीच रिश्ते का भी प्रश्न है।
कुछ लोग आज भी झील के परिसर में पक्षियों और अन्य जीवों के लिए जगह-जगह मिट्टी के बर्तनों में पानी भरकर रखते हैं। कबूतर, कुत्ते और दूसरे जीव वहां पानी पीते दिखाई देते हैं।
चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी
शायद संजय झील की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि आज उसका अस्तित्व उसके अपने प्राकृतिक जल स्रोतों की तुलना में बाहरी जलापूर्ति पर अधिक निर्भर है। यह केवल एक झील की कहानी नहीं, बल्कि उन अनेक शहरी जल निकायों की कहानी है जो अपने मूल जल चक्र से कट चुके हैं।
उपचारित अपशिष्ट जल और अन्य कृत्रिम स्रोत आज संजय झील के जलस्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन यह स्थिति एक बुनियादी सवाल भी खड़ा करती है कि क्या किसी झील में केवल पानी भर देने से उसका पारिस्थितिक जीवन लौट आता है?
संजय झील की कहानी केवल मरी हुई मछलियों की कहानी नहीं है। यह उस शहर की कहानी है जिसने झील को बचाने की कोशिश तो की, लेकिन पानी के रास्तों को बचाना भूल गया।
दिल्ली में बढ़ते शहरीकरण, जल संकट और भूजल दोहन के बीच यह झील हमें याद दिलाती है कि शहरों का भविष्य केवल नई पाइपलाइनों और जलापूर्ति परियोजनाओं से सुरक्षित नहीं होगा।
सवाल केवल यह नहीं है कि संजय झील में पानी कब लौटेगा, बल्कि यह है कि क्या दिल्ली अपने उन जलग्रहण क्षेत्रों को भी बचा पाएगी जिनके बिना किसी भी झील का पुनर्जीवन अधूरा है। क्योंकि किसी झील का जीवन केवल उसके भीतर मौजूद पानी से नहीं, बल्कि उन रास्तों से भी तय होता है जिनसे पानी उसके पास पहुंचता है।
संजय झील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक जल-इकाई ही नहीं, बल्कि दिल्ली के पानी का अधूरा इतिहास भी है।
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