गोरखपुर के रामगढ़ताल का महत्व केवल एक जल पर्यटन स्‍थल तक ही सीमित नहीं है। इस झील के पर्यावरणीय महत्‍व के कारण इसको शहर के “अर्बन वाटर बफर” के रूप में भी देखा जाता है।

गोरखपुर के रामगढ़ताल का महत्व केवल एक जल पर्यटन स्‍थल तक ही सीमित नहीं है। इस झील के पर्यावरणीय महत्‍व के कारण इसको शहर के “अर्बन वाटर बफर” के रूप में भी देखा जाता है।

स्रोत : विकी कॉमंस

गोरखपुर के रामगढ़ताल से जुड़ेगा 42 एकड़ का जलाशय, यूपी को मिलेगा राष्‍ट्रीय स्‍तर का नया जल पर्यटन स्‍थल

रामगढ़ताल को मरीन ड्राइव की तर्ज़ पर विकसित करने की योजना के बाद सीएम योगी का एक और बड़ा ऐलान
Published on
8 min read

गोरखपुर की प्रसिद्ध रामगढ़ताल झील को और विस्‍तार देने के लिए करीब 42 एकड़ में फैली एक वाटर बॉडी को इससे जोड़ा जाएगा। ऐसा करके इसे राष्‍ट्रीय स्‍तर के एक नए जल पर्यटन स्‍थल के रूप में विकसित किया जाएगा। यह ऐलान हाल ही में उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने किया है। 

रामगढ़ताल को मुंबई के मरीन ड्राइव की तर्ज़ पर विकसित करने की योजना पर काम शुरू करने के बाद राज्‍य सरकार अब से पूरे देश में वाटर टूरिज्‍़म के एक हॉटस्‍पॉट के रूप में विकसित करना चाहती है। ऐसा करके गोरखपुर को पर्यटन के राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय मानचित्र में जगह दिलाने की मंशा है। 

इसी को आगे बढ़ाते हुए सीएम योगी ने रामगढ़ताल से एक और प्राकृतिक जलाशय को जोड़ कर इसे विस्‍तार देने की घोषणा की है। इससे इस जलाशय के जीर्णोद्धार के साथ ही रामगढ़ताल की सुंदरता को भी बढ़ाया जा सकेगा। इस योजना की जानकारी देते हुए हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इस क्षेत्र को व्यवस्थित कर यहां बहता हुआ स्वच्छ पानी, नौकायन, बच्चों के खेलने की सुविधा और नागरिकों के लिए आकर्षक पर्यटन स्थल विकसित किया जाएगा। 

खास बात यह है कि इस कार्य में पानी के प्राकृतिक प्रवाह का ख्‍याल रखा जाएगा और जलाशय के जलस्‍तर से भी कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इस बारे में सीएम ने गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) के अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि जलस्तर समान है तो दोनों को जोड़ने का प्रयास किया जाए, अन्यथा ऐसा प्लान बने जिससे पानी रुके नहीं, सड़े नहीं बल्कि गतिमान रहे।

हाल ही में रामगढ़ताल क्षेत्र में 14 करोड़ की लगत से बने टू-लेन ब्रिज का लोकार्पण करने के बाद मुख्यमंत्री रामगढ़ताल और इस जलाशय का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि लगभग 20 वर्ष पहले रामगढ़ताल के आसपास का क्षेत्र बाढ़, गंदगी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण रहने योग्य नहीं था, लेकिन आज यह इलाका गोरखपुर की सबसे पॉश और महंगी कॉलोनियों में शुमार हो चुका है।

उन्होंने कहा कि रामगढ़ताल आज बेहतरीन पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। इसके आसपास जू, होटल, विजयनाथ पार्क और चंपा देवी पार्क का निर्माण हुआ है। इसके अलावा साइंस पार्क, कन्वेंशन सेंटर, रिंग रोड और तारामंडल के पुनरुद्धार जैसे कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। ऐसे में वाटर बॉडी के विकास से यह क्षेत्र राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पर्यटकों के लिए आकर्षक का केंद्र बन जाएगा।

उठने रहे सवाल भी

हालांकि 42.5 एकड़ में फैली इस वाटर बॉडी को जोड़कर रामगढ़ताल के विस्‍तार की इस योजना को लेकर सवाल भी उठने शुरू हो गए हैं। इसकी वजह इस वाटर बॉडी की सफाई के लिए सरकार की ओर से एक निजी क्षेत्र की कंपनी को दिया गया ठेका है।  

यह फर्म वर्ष 2026-27 तक इस वाटर बॉडी की सफाई करेगी। बदले में उसे यहां से मछली पालन, मछली पकड़ने और उसे बेचने का भी अधिकार मिलेगा। इसके अलावा प्राधिकरण, फर्म को इस वाटर बॉडी में बोटिंग का भी अधिकार दे सकता है। बदले में फर्म, जीडीए को 20 लाख रुपये देगी। इतनी नाममात्र की रकम के एवज में इतने बड़े जलाशय का ठेका दिए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि 42.5 एकड़ के विशाल जलाशय में मछली पालन से सालाना करोड़ों रुपये की आमदनी हो सकती है, तो महज़ 20 लाख में यह ठेका क्‍यों दे दिया गया। 

कहा जा रहा है कि सरकार इससे कई गुना छोटे तालाबों को पट्टा भी इससे काफी ज्‍यादा रकम में देती है, तो इस जलाशय को इतने सस्‍ते में क्‍यों सौंप दिया गया? हालांकि इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि फर्म को जलाशय की सफाई का काम भी अपने खर्चे पर करना होगा। अभी वाटर बॉडी के ज्यादातर हिस्से में जलकुंभी फैली है। चयनित फर्म को इसे साफ कराना होगा। इसके बाद ही वह वहां मछली पालन व बोटिंग आदि शुरू करा पाएगी।

<div class="paragraphs"><p>पर्यटन स्‍थल के रूप में विकास किए जाने से पूर्व कुछ साल पहले तक कुछ ऐसा दिखता था रामगढ़ताल।&nbsp;</p></div>

पर्यटन स्‍थल के रूप में विकास किए जाने से पूर्व कुछ साल पहले तक कुछ ऐसा दिखता था रामगढ़ताल। 

स्रोत : विकी कॉमंस

रामगढ़ताल के आसपास हैं 7 जलाशय

रामगढ़ताल के पास बौद्ध संग्रहालय से सर्किट हाउस होते हुए पैडलेगंज के पास तक के क्षेत्र में करीब सात वाटर बॉडीज हैं। सुंदरीकरण के लिए चुनी गई वाटर बॉडी भी इन्हीं में शामिल है। यह सर्किट हाउस के पीछे, ऐश्प्रा समूह की ओर से विकसित किए जा रहे होटल और अंबेडकर पार्क के सामने तक फैली है। कोरोना संक्रमण शुरू होने के पहले ही जीडीए ने इस वाटर बॉडी को सुंदर बनाने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिया था। जीडीए ने इसके लिए ई-टेंडर निकाला था, जिसके जरिये सर्वाधिक बोली लगाने वाली फर्म को काम सौंपा गया है।  

एक रिपोर्ट के अनुसार जीडीए सचिव राम सिंह गौतम ने बताया कि रामगढ़ताल के सामने स्थित वाटर बॉडी को सुंदर बनाया जाएगा। सर्वाधिक बोली लगाने वाली फर्म को काम सौंप गया है। चयनित फर्म वाटर बॉडी को सुंदर बनाने के साथ वहां मछली पालन व उसका आखेट भी कर सकेगी। बदले में उसे प्राधिकरण को करीब 20 लाख रुपये देने होंगे। जल्द ही सफाई व सुंदरीकरण का काम शुरू हो जाएगा।

कभी गंदगी से भरा था रामगढ़ताल

रामगढ़ताल की गिनती आज पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित शहरी झीलों में की जाती है। लेकिन, कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था। करीब 700 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैली यह झील कभी गोरखपुर शहर के प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का अहम हिस्सा मानी जाती थी। 

पुराने समय में यह ताल आसपास के खेतों, आर्द्रभूमियों और बरसाती जलधाराओं से जुड़ा हुआ था, जिससे शहर में जल संतुलन बना रहता था। मानसून के दौरान अतिरिक्त पानी को समाहित करने में भी इसकी बड़ी भूमिका थी। लेकिन, तेजी से हुए शहरीकरण, अतिक्रमण, सीवर के पानी और अवैज्ञानिक निर्माण गतिविधियों के कारण रामगढ़ताल का आकार और पारिस्थितिक महत्व धीरे-धीरे कम होता गया। एक समय ऐसा भी आया जब यह झील गंदगी, जलकुंभी और प्रदूषण की समस्या के कारण चर्चा में रहने लगी। स्थानीय पर्यावरणविदों ने लगातार चेतावनी दी कि यदि झील की प्राकृतिक जलधाराएं और कैचमेंट क्षेत्र बचाए नहीं गए, तो इसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने रामगढ़ताल को पर्यटन और शहरी सौंदर्यीकरण परियोजना के रूप में विकसित करना शुरू किया। झील के किनारे सड़क, वॉक-वे, लाइटिंग, पार्क, बोटिंग और मनोरंजन सुविधाएं विकसित की गईं। आज यह गोरखपुर आने वाले पर्यटकों के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हो चुकी है। यहां नौकायन, वाटर स्पोर्ट्स और शाम के समय होने वाली गतिविधियां लोगों को आकर्षित करती हैं।

अर्बन वाटर बफर का काम करती है यह लेक

रामगढ़ताल का महत्व केवल पर्यटन तक ही सीमित नहीं है। विशेषज्ञ इसे गोरखपुर शहर के “अर्बन वाटर बफर” के रूप में भी देखते हैं। यह झील भूजल रिचार्ज, तापमान नियंत्रण और शहरी बाढ़ के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है। यही वजह है कि अब सरकार इसे आसपास की अन्य जल संरचनाओं से जोड़कर एक बड़े जल-पर्यटन और पर्यावरणीय क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। यदि यह योजना वैज्ञानिक तरीके से लागू होती है, तो रामगढ़ताल पूर्वांचल में जल संरक्षण और शहरी झील पुनर्जीवन का एक बड़ा मॉडल बन सकती है।

नदियों, तालाबों और वेटलैंड्स का शहर है गोरखपुर

गोरखपुर इलाका राप्ती और रोहिणी जैसी नदियों के बाढ़ मैदान में स्थित है, इसलिए यहां प्राकृतिक रूप से बड़ी संख्या में तालाब, झीलें और मौसमी वेटलैंड विकसित हुए। यही वजह है कि गोरखपुर लंबे समय से “तालों और तराई” वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता रहा है।रामगढ़ताल के अलावा भी यहां कई बड़े प्राकृतिक जलस्रोत और समृद्ध आर्द्रभूमियां मौजूद हैं।

<div class="paragraphs"><p>हाल के वर्षों में हुए विकास के बाद कभी गंदगी से भरा रामगढ़ताल अब पूर्वांचल का एक बड़ा पर्यटन स्‍थल बन चुका है।&nbsp;</p></div>

हाल के वर्षों में हुए विकास के बाद कभी गंदगी से भरा रामगढ़ताल अब पूर्वांचल का एक बड़ा पर्यटन स्‍थल बन चुका है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

रामगढ़ताल के अलावा भी हैं कई महत्वपूर्ण जलाशय

रामगढ़ताल के अलावा भी कई वेटलैंड्स और जलक्षेत्र गोरखपुर के आसपास स्थित हैं। इनमें से  प्रमुख वेटलैंड्स व जलक्षेत्रों के नाम इस प्रकार हैं : 

  • रामगढ़ताल

  • चिलुआताल

  • अमीयां ताल

  • नकहा ताल

  • मोतीझील

  • महेसरा ताल क्षेत्र

  • गोरखपुर चिड़ियाघर वेटलैंड

  • कुसम्ही क्षेत्र की आर्द्रभूमियां

  • राप्ती नदी का बाढ़क्षेत्र

  • रोहिणी नदी के तटीय जलभराव क्षेत्र

इनमें से चिलुआताल को गोरखपुर की प्रमुख प्राकृतिक झीलों में गिना जाता है। इसे कभी प्रवासी पक्षियों और स्थानीय मत्स्य उत्पादन के लिए जाना जाता था। इसीलिए चिडि़यों के नाम पर इसका नाम ‘ चिलुआताल' पड़ा। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में आसपास के इलाकों में तेजी से शहरी विस्तार और अतिक्रमण के दबाव ने इस झील के क्षेत्रफल और जैव विविधता को काफी बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके बावजूद यह आज भी शहर के जल संतुलन में भूमिका निभाती है।

गोरखपुर चिड़ियाघर का वेटलैंड भी है। चिड़ियाघर परिसर में लगभग एक एकड़ क्षेत्र में स्थित यह वेटलैंड स्थानीय और प्रवासी पक्षियों (जैसे पेंटेड स्टॉर्क, एशियन ओपन बिल) का प्रमुख आवास है। 

इसके अलावा कुसम्ही क्षेत्र की आर्द्रभूमियां और आसपास के छोटे-छोटे तालाब भी स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बरसात के मौसम में ये क्षेत्र अतिरिक्त पानी को रोकते हैं और भूजल रिचार्ज में मदद करते हैं। ग्रामीण इलाकों में कई पारंपरिक पोखरे और जलभराव क्षेत्र अब भी सिंचाई, पशुपालन और मछली पालन का आधार बने हुए हैं।

तराई क्षेत्र होने के कारण समृद्ध है वेटलैंड नेटवर्क

गोरखपुर भौगोलिक रूप से नेपाल की तराई से जुड़ा हुआ है। मानसूनी बारिश और नदियों की बहाव प्रणाली के कारण यहां बड़ी संख्या में मौसमी व स्थायी वेटलैंड बनते हैं। ये आर्द्रभूमियां केवल जल संरक्षण ही नहीं करतीं, बल्कि बाढ़ नियंत्रण में भी मददगार होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, शहर के आसपास मौजूद प्राकृतिक वेटलैंड्स भारी वर्षा के दौरान “स्पंज” की तरह काम करते हैं और अतिरिक्त पानी को समाहित करते हैं।

दरअसल, तराई क्षेत्र की मिट्टी में पानी को लंबे समय तक रोककर रखने की क्षमता अधिक होती है। यही कारण है कि गोरखपुर के आसपास मौजूद ताल, दलदली क्षेत्र और जलभराव वाली भूमि भूजल पुनर्भरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि इन प्राकृतिक वेटलैंड्स को संरक्षित रखा जाए तो यह क्षेत्र भविष्य में शहरी बाढ़, जलभराव और भूजल गिरावट जैसी समस्याओं से काफी हद तक राहत पा सकता है। इसके विपरीत, जब इन जलक्षेत्रों को पाटकर निर्माण किया जाता है, तो शहरों में पानी निकासी की समस्या और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। 

पक्षियों और जैव विविधता के लिए भी अहम

गोरखपुर और उसके आसपास की कई आर्द्रभूमियां सर्दियों में प्रवासी पक्षियों का अस्थायी ठिकाना बनती हैं। स्थानीय स्तर पर यहां बतख, बगुले, सारस और कई जलीय पक्षी देखे जाते रहे हैं। जलकुंभी, प्रदूषण और अतिक्रमण जैसी समस्याओं के बावजूद ये वेटलैंड्स अब भी क्षेत्र की जैव विविधता को सहारा देते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, आर्द्रभूमियां केवल पक्षियों के लिए ही नहीं, बल्कि मछलियों, उभयचरों, कीटों और जलीय पौधों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास का काम करती हैं। यही जैव विविधता स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने में मदद करती है। कई ग्रामीण समुदायों की आजीविका भी इन जलक्षेत्रों से जुड़ी हुई है, क्योंकि मछली पालन, सिंघाड़ा उत्पादन और अन्य पारंपरिक गतिविधियां इन्हीं वेटलैंड्स पर निर्भर करती हैं। इसलिए पर्यावरणविद मानते हैं कि गोरखपुर की आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी जरूरी है। 

तेजी से घट रहे हैं प्राकृतिक जलक्षेत्र

विशेषज्ञों का मानना है कि गोरखपुर की अनेक छोटी जल संरचनाएं पिछले दो-तीन दशकों में या तो पाट दी गईं या निर्माण गतिविधियों की भेंट चढ़ गईं। कई तालाबों का उपयोग अब कूड़ा फेंकने या अवैध निर्माण के लिए होने लगा है। इसी कारण पर्यावरणविद लगातार मांग कर रहे हैं कि रामगढ़ताल के विकास के साथ-साथ शहर की अन्य प्राकृतिक जल संरचनाओं और वेटलैंड्स का भी वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए, ताकि भविष्य में बाढ़, जलभराव और भूजल संकट जैसी समस्याओं को नियंत्रित किया जा सके।

Also Read
गोरखपुर में बोतलबंद पानी की गुणवत्ता पर सवाल: क्या पैक्ड वाटर सच में सुरक्षित है?
<div class="paragraphs"><p>गोरखपुर के रामगढ़ताल का महत्व केवल एक जल पर्यटन स्‍थल तक ही सीमित नहीं है।&nbsp;इस झील के पर्यावरणीय महत्‍व के कारण इसको शहर के “अर्बन वाटर बफर” के रूप में भी देखा जाता है।</p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org