छारी-ढांढ का क्षेत्रफल करीब 22,700 हेक्टेयर है, यानी लगभग 227 वर्ग किलोमीटर। फ़ोटो: जयेश भेडा
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'हरित ऊर्जा' बनाम 'गीली जमीन': छारी-ढांढ रामसर साइट पर सौर परियोजना का संकट
हर साल मानसून के बाद कच्छ की छारी-ढांढ आर्द्रभूमि पानी से भर जाती है। यहां हजारों प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं, अपना घर बनाते हैं, प्रजनन करते हैं और ठंड खत्म होते-होते इस जगह पर अपने निशान छोड़ जाते हैं। इसी वजह से इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट का दर्जा मिला। लेकिन अब इस आर्द्रभूमि के ईकोसिस्टम पर खतरा मंडराने लगा है। दरअसल यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर एनटीपीसी रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड की करीब 4,500 एकड़ की सौर परियोजना बनाने की योजना है।
इस परियोजना के चलते कई सवाल खड़े हो रहे हैं, जैसे -
क्या इस परियोजना का प्रभाव आर्द्रभूमि के ईकोसिस्टम पर पड़ेगा?
क्या इस परियोजना की वजह से आर्द्रभूमि पर आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या गिरने लगेगी?
क्या आने वाले समय में यहां पर गर्मी बढ़ेगी?
ऐसे तमाम सवालों के साथ इस परियोजना पर नई बहस शुरू हो गई है।
छारी-ढांढ रामसर साइट के बारे में
16 जून 2025 को इस आर्द्रभूमि का रामसर साइट का दर्ज प्राप्त हुआ, जबकि भारत सरकार ने इसकी घोषणा जनवरी 2026 में की।
छारी-ढांढ का क्षेत्रफल करीब 22,700 हेक्टेयर है, यानी लगभग 227 वर्ग किलोमीटर।
यह आर्द्रभूमि कच्छ की पहली और गुजरात की पांचवीं रामसर साइट है।
यह शुष्क बन्नी घासभूमि (Banni Grasslands) और कच्छ के रण के दलदली खारे मैदानों की सीमा पर स्थित है।
स्थानीय कच्छी भाषा में "छारी" का अर्थ "खारा" और "ढांढ" का अर्थ "उथली आर्द्रभूमि" होता है।
यह एक मौसमी रेगिस्तानी आर्द्रभूमि है, जो मानसून के दौरान दलदली हो जाती है।
इस आर्द्रभूमि को उत्तर की ओर बहने वाली नदियों और आसपास की पहाड़ियों से पानी मिलता है।
पक्षी प्रेमियों और पक्षी वैज्ञानिकों के लिए यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
मानसून और सर्दियों के मौसम में यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं।
यहां डलमेशियन पेलिकन, ओरिएंटल डार्टर, ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क और इंडियन स्किमर जैसी संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं।
यहां हजारों फ्लेमिंगो, कॉमन क्रेन, पेंटेड स्टॉर्क, विभिन्न शिकारी पक्षी और स्पूनबिल भी देखे जा सकते हैं।
यह आर्द्रभूमि संकटग्रस्त पक्षियों के अलावा चिंकारा, भेड़िया, कैराकल, रेगिस्तानी बिल्ली और रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे वन्यजीवों का भी आवास है।
छारी-ढांढ आर्द्रभूमि संरक्षण रिज़र्व पक्षी प्रेमियों और वन्यजीव उत्साहियों के लिए एक प्रमुख पर्यटन स्थल है।
एनटीपीसी सोलर परियोजना के बारे में
परियोजना: एनटीपीसी रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड (NTPC REL) की सौर ऊर्जा परियोजना
स्थान: कच्छ के फुलाय (Fulay) क्षेत्र में, छारी-ढांढ रामसर साइट के निकट
प्रस्तावित क्षेत्रफल: करीब 4,500 एकड़
भूमि का स्वरूप: राजस्व भूमि, जो बन्नी घासभूमि और आर्द्रभूमि के आसपास के भू-दृश्य का हिस्सा है
मंजूरी की स्थिति: परियोजना के लिए आवश्यक स्वीकृतियों की प्रक्रिया 2024 में शुरू हुई
प्रमुख सवाल: क्या परियोजना का प्रभाव आर्द्रभूमि, जल प्रवाह, प्रवासी पक्षियों और स्थानीय आजीविका पर पड़ेगा?
22 मई 2026 को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर फुलाय के पास 16 गांवों के 500 से अधिक मालधारी और स्थानीय लोग इसके विरोध में जुटे। उनकी चिंता केवल एक सौर परियोजना नहीं है।
असल चिंता उस पूरे भू-दृश्य की है, जिसमें छारी-ढांढ की मौसमी आर्द्रभूमि, बन्नी की घासभूमि, बारिश के पानी का प्राकृतिक बहाव, वन्यजीव और स्थानीय आजीविका एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
क्यों हो रहा है सौर परियोजना का विरोध
बारिश के प्राकृतिक जल प्रवाह और जल निकासी के रास्तों पर संभावित असर की आशंका।
छारी-ढांढ रामसर साइट के पारिस्थितिक तंत्र और जलग्रहण क्षेत्र पर संभावित प्रभाव।
प्रवासी पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के आवास पर असर की चिंता।
बन्नी घासभूमि और चरागाहों के सिकुड़ने का खतरा।
मालधारी समुदाय की आजीविका, पशुओं की चराई और आवाजाही प्रभावित होने की आशंका।
भूमि समतलीकरण, सड़क, बाड़ और अन्य निर्माण कार्यों से पूरे भू-दृश्य में बदलाव की चिंता।
परियोजना के संभावित प्रभावों पर स्वतंत्र और सार्वजनिक वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध न होना।
पानी से बनती है छारी-ढांढ की पहचान
छारी-ढांढ कोई ऐसी स्थायी झील नहीं है, जिसमें पूरे साल एक समान पानी रहता हो। यह एक मौसमी और खारे पानी वाली उथली आर्द्रभूमि है। इसका स्वरूप बारिश और पानी के प्राकृतिक बहाव के साथ बदलता रहता है। अच्छे मानसून में इसमें पानी भरता है, जबकि कम बारिश वाले वर्षों में इसका बड़ा हिस्सा सूख सकता है। स्थानीय भाषा में 'छारी' का अर्थ खारा और 'ढांढ' का मतलब होता है उथली आर्द्रभूमि है।
छारी-ढांढ बन्नी घासभूमि और कच्छ के रण के खारे मैदानों के बीच स्थित है। गुजरात पर्यटन विभाग के अनुसार, मानसून के दौरान इसे उत्तर की ओर बहने वाली नदियों और आसपास की पहाड़ियों के बड़े जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया) से पानी मिलता है।
गुजरात की संस्था सहजीवन (Sahjeevan) से जुड़े पारिस्थितिकीविद् रितेश पोकार के अनुसार, छारी-ढांढ और उसके आसपास का इलाका केवल एक आर्द्रभूमि नहीं है।
यह हर सर्दियों में आने वाले हजारों कॉमन क्रेन सहित अनेक प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है। इसलिए इस पूरे भू-दृश्य को एक इकाई के रूप में समझना जरूरी है।
इसका मतलब है कि इस आर्द्रभूमि की सेहत केवल उस 22,700 हेक्टेयर इलाके पर निर्भर नहीं करती, जहां पानी जमा होता है। यह उन प्राकृतिक रास्तों से भी जुड़ी है, जिनसे बारिश का पानी बहकर यहां तक पहुंचता है।
छारी-ढांढ तक पानी कैसे पहुंचता है?
छारी-ढांढ कोई अलग-थलग झील नहीं है। यह आसपास के पूरे जल तंत्र का हिस्सा है। मानसून के दौरान आसपास की पहाड़ियों और उत्तर की ओर बहने वाली मौसमी नदियों का पानी यहां पहुंचता है। यही पानी इस मौसमी आर्द्रभूमि को जीवन देता है।
इस इलाके में बारिश कुछ ही महीनों तक होती है। इसलिए पानी का हर प्राकृतिक रास्ता महत्वपूर्ण है। अगर कहीं रास्ता बदलता है, रुकता है या पानी का बहाव कम होता है, तो उसका असर आगे चलकर आर्द्रभूमि पर भी पड़ सकता है।
हालांकि हर बदलाव का असर एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है। इसे स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर ही समझा जा सकता है।
इसीलिए विशेषज्ञ केवल आर्द्रभूमि की सीमा नहीं देखते। वे यह भी समझते हैं कि पानी कहां से आता है और किन रास्तों से होकर यहां पहुंचता है। किसी भी बड़े निर्माण से पहले इस पूरे जल तंत्र का अध्ययन करना इसलिए जरूरी माना जाता है।
बन्नी का व्यापक जल तंत्र पहले ही बड़े बदलावों से गुजर चुका है। Key Biodiversity Areas database के अनुसार, उत्तर की ओर बहने वाली कई नदियां पहले बन्नी में आकर आखिर में कच्छ के महान रण की ओर जाती थीं। लेकिन इन नदियों पर बने बांधों से बन्नी के पानी के निकलने वाली व्यवस्था पर असर हुआ है।
पानी की उपलब्धता के लिए काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहने वाले ऐसे शुष्क इलाक़ों में यह बदलाव और भी प्रमुख हो जाता है।
यहीं प्रस्तावित सौर परियोजना को लेकर पानी से जुड़ी एक बहस है। इसके लिए करीब 4,500 एकड़ जमीन के इस्तेमाल का तरीका बदलेगा। इसके साथ जमीन समतल की जाएगी।
सड़कें, बाड़ और दूसरी संरचनाएं भी बनेंगी। ऐसे बदलाव क्या बारिश के पानी के अपने बहाव के रास्ते और जल निकासी के रास्तों, दोनों पर असर डाल सकते हैं?
अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रस्तावित सौर प्लांट से छारी-ढांढ के जल तंत्र को निश्चित रूप से नुकसान होगा।
इस इलाके का कोई सार्वजनिक वैज्ञानिक अध्ययन अभी सामने नहीं आया है। इसलिए यह भी स्पष्ट नहीं है कि योजना के क्षेत्र और छारी-ढांढ के जलग्रहण के बीच क्या संबंध है।
परियोजना की पर्यावरणीय जांच के लिए सबसे पहले यही जानकारी जरूरी है। यह समझना जरूरी है कि बारिश का पानी किन रास्तों से बहकर छारी-ढांढ तक पहुंचता है।
अभी तक यह साफ नहीं है कि प्रस्तावित सौर प्लांट छारी-ढांढ से कितनी दूर है। यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है कि परियोजना का इलाका आर्द्रभूमि के जलग्रहण क्षेत्र या प्राकृतिक जल प्रवाह के रास्तों से किस तरह जुड़ा है। यह साफ होना चाहिए कि प्रस्तावित प्लांट की जमीन पानी के बहाव के इन रास्तों से किस तरह जुड़ी है।
यानी छारी-ढांढ तक पहुंचने वाला पानी केवल आर्द्रभूमि का नहीं, पूरे आसपास के भू-दृश्य का परिणाम है। यही वजह है कि छारी-ढांढ को समझने के लिए केवल आर्द्रभूमि नहीं, उसके पूरे जल तंत्र को समझना जरूरी है।
दुनिया भर में आर्द्रभूमियों की सुरक्षा केवल सीमा तक सीमित नहीं होती
रामसर कन्वेंशन किसी आर्द्रभूमि को केवल उस जगह के रूप में नहीं देखता, जहां पानी जमा होता है। वह उसके पूरे पारिस्थितिक स्वरूप (Ecological Character) को सुरक्षित रखने की बात करता है।
इसमें पानी के बहाव के मार्ग, आसपास का भू-दृश्य, मिट्टी, वनस्पति, जीव-जंतु और उनसे जुड़ी पारिस्थितिक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसलिए किसी आर्द्रभूमि की सुरक्षा केवल उसकी कानूनी सीमा तक सीमित नहीं रहती। उसका संबंध उस पूरे इलाके से होता है, जहां से पानी आकर उसे जीवित रखता है।
छारी-ढांढ जैसी मौसमी आर्द्रभूमियों में यह चुनौती और भी अहम हो जाती है। यहां हर साल मानसून का पानी कुछ महीनों के लिए जीवन लेकर आता है।
यही पानी पक्षियों, घासभूमियों और स्थानीय आजीविका का आधार बनता है। अगर पानी के बहाव की इस मूल व्यवस्था में कहीं बदलाव होता है, तो उसका असर आगे चलकर आर्द्रभूमि पर भी पड़ सकता है।
हालांकि हर निर्माण से ऐसा होगा, यह मान लेना सही नहीं है। इसका आकलन स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ही किया जा सकता है।
इसी वजह से दुनिया भर में आर्द्रभूमियों के संरक्षण के दौरान केवल यह नहीं देखा जाता कि कोई परियोजना उसकी सीमा के भीतर है या बाहर। यह भी समझा जाता है कि उसका आर्द्रभूमि के जल तंत्र से क्या संबंध है। छारी-ढांढ के मामले में भी सबसे अहम बात यही है।
रामसर साइट बनने के बाद भी क्यों उठ रहे हैं सवाल?
रामसर कन्वेंशन सचिवालय के अनुसार, छारी-ढांढ बन्नी की शुष्क घासभूमियों और कच्छ के खारे मैदानों के बीच स्थित एक मौसमी खारे पानी की आर्द्रभूमि है।
हर साल सर्दियों में करीब 30,000 कॉमन क्रेन सहित अनेक प्रवासी और संकटग्रस्त पक्षी यहां आते हैं। इसी वजह से इसे उनके मुख्य आवासों में गिना जाता है।
रामसर दर्जे का अर्थ केवल पक्षियों की सुरक्षा नहीं है। रामसर कन्वेंशन का उद्देश्य आर्द्रभूमियों और उनके संसाधनों का संरक्षण करना है। साथ ही उनका ऐसा विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना भी जिससे उनका पारिस्थितिक स्वरूप बना रहे।
यहीं एक और अहम बात सामने आती है। क्या किसी आर्द्रभूमि को केवल उसकी अधिसूचित सीमा के भीतर होने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करके बचाया जा सकता है?
आर्द्रभूमियां सिर्फ अपनी कानूनी सीमा तक सीमित नहीं होतीं। उनका संबंध आसपास के पूरे भू-दृश्य से होता है। उनमें आने वाला पानी, तलछट और पोषक तत्व अक्सर आसपास के कैचमेंट एरिया से आते हैं।
इसलिए रामसर साइट के बाहर की ज़मीन के इस्तेमाल में होने वाला कोई बड़ा बदलाव भी अहम हो सकता है। खासकर तब, जब उसका असर पानी के बहाव के रास्ते या आसपास के पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने की आशंका हो।
छारी-ढांढ के मामले में भी केवल यह देखना काफी नहीं है कि प्रस्तावित सौर प्लांट रामसर साइट की सीमा के भीतर है या बाहर। यह समझना भी जरूरी है कि प्लांट की जमीन का आर्द्रभूमि के कैचमेंट एरिया से क्या संबंध है।
क्या वह जल निकासी के रास्तों से जुड़ी है? क्या इससे इन रास्तों में कोई बदलाव आ सकता है? परियोजना की जांच में इन मुद्दों को शामिल किया जाना चाहिए।
आर्द्रभूमि विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी रामसर साइट का संरक्षण केवल उसकी सीमा तक सीमित नहीं होता। उसके कैचमेंट एरिया और पानी के बहाव को समझे बिना संरक्षण की तस्वीर अधूरी रहती है। यही वजह है कि दुनिया भर में आर्द्रभूमियों के प्रबंधन में पूरे परिदृश्य (Landscape Approach) पर जोर दिया जाता है।
पारिस्थितिकीविद् और वन्यजीव जीवविज्ञानी चेतन मिशेर का कहना है कि छारी-ढांढ को एक अलग-थलग आर्द्रभूमि की तरह नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, यह पूरे जलग्रहण क्षेत्र और आसपास के पारिस्थितिक तंत्र से मिलकर बनने वाली एक जीवित प्रणाली है।
इसलिए किसी भी परियोजना का आकलन केवल उसकी कानूनी सीमा देखकर नहीं, बल्कि पूरे परिदृश्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
मालधारियों के लिए यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं
बन्नी की घासभूमि लंबे समय से मालधारी पशुपालक समुदायों की आजीविका का आधार रही है। यहां जमीन का महत्व केवल उसके मालिकाना हक या राजस्व रिकॉर्ड से तय नहीं होता। खुले चरागाह पशुओं के चारे, मौसमी आवाजाही और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उनका विरोध सौर ऊर्जा से नहीं है। उनकी चिंता यह है कि इसके तहत चरागाहों और आर्द्रभूमि के आसपास बड़े पैमाने पर निर्माण होगा।
ऐसे में पशुओं की आवाजाही, चराई और पूरे इलाके की पारिस्थितिकी पर इसका असर पड़ सकता है। वे मानते हैं कि विकास की योजनाओं में इस इलाके की प्राकृतिक संवेदनशीलता को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए।
इसी चिंता के साथ 22 मई 2026 को फुलाय के पास 16 गांवों के 500 से अधिक मालधारी और दूसरे ग्रामीण प्रस्तावित सौर प्लांट के विरोध में जुटे।
उनका कहना है कि बड़े इलाके में सौर पैनल और बाड़ लगने से चराई की जमीन कम होने के साथ पशुओं और वन्यजीवों की आवाजाही भी प्रभावित हो सकती है।
यह विरोध एक व्यापक मुद्दे की ओर भी ध्यान खींचता है। सरकारी रिकॉर्ड में जिस जमीन को 'वेस्टलैंड' या बंजर माना जाता है, वह जरूरी नहीं कि पारिस्थितिक या सामाजिक रूप से बेकार हो। घासभूमियां स्थानीय पशुपालकों के लिए साझा संसाधन और अनेक वन्यजीवों के लिए आवास हो सकती हैं।
छारी-ढांढ को रामसर दर्जा मिलने के बाद गुजरात के वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा था कि इस मान्यता से दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष उपाय लागू करने में मदद मिलेगी।
इस प्रस्तावित सौर प्लांट ने एक नई बहस को खड़ा किया है। अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के आसपास की ज़मीन के इस्तेमाल में होने वाले बड़े बदलावों की पर्यावरणीय जांच किस स्तर पर और कैसे की जानी चाहिए?
दूसरी ओर, कच्छ के वन संरक्षक धीरज मित्तल का कहना है कि योजना के लिए चिन्हित जमीन रामसर साइट की अधिसूचित सीमा के बाहर राजस्व भूमि पर स्थित है। उनके अनुसार, वन विभाग छारी-ढांढ रामसर साइट और प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के लिए जरूरी प्रयास जारी रखे हुए है।
इस संबंध में NTPC Renewable Energy Limited की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्ट बताते हैं कि इसके लिए ज़रूरी मंज़ूरियों की प्रक्रिया 2024 में शुरू हुई थी।
हरित ऊर्जा जरूरी है, लेकिन कहां और कैसे?
छारी-ढांढ का मामला सौर ऊर्जा के खिलाफ नहीं है। यह उस जगह के चुनाव पर बहस है, जहां ऐसे निर्माण किए जा रहे हैं। भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं।
इस बदलाव में सौर ऊर्जा की बड़ी भूमिका है। जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए रिन्युएबल एनर्जी का विस्तार जरूरी है।
छारी-ढांढ का मामला पेचीदा है। क्या किसी ऊर्जा संयंत्र से जुड़ी योजना को केवल इसलिए पर्यावरण के लिए बेहतर माना जा सकता है, क्योंकि वह रिन्युएबल एनर्जी पैदा करती है, चाहे उसकी जगह कोई भी हो?
बड़े सौर संयंत्रों के लिए काफी जमीन की जरूरत होती है। इसलिए यह भी उतना ही ज़रूरी है कि उन्हें किस जगह लगाया जा रहा है। संवेदनशील घासभूमियों और आर्द्रभूमियों के पास बनने वाली विकास परियोजनियां केवल जमीन को ही प्रभावित नहीं करतीं। उनका असर आसपास के पारिस्थितिक तंत्र और स्थानीय समुदायों पर भी पड़ सकता है।
एक दूसरी ख़ास बात यह है कि सौर फोटोवोल्टिक परियोजनाएं मौजूदा पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व्यवस्था के तहत अनिवार्य पर्यावरण मंजूरी वाली परियोजनाओं की सूची में शामिल नहीं हैं।
इसका मतलब यह है कि किसी बड़ी सौर परियोजना को हर मामले में ताप विद्युत संयंत्रों, राजमार्गों या दूसरी सूचीबद्ध योजनाओं के लिए जरूरी पर्यावरणीय जांच से नहीं गुजरना पड़ता है।
छारी-ढांढ पहले से एक Conservation Reserve है। अब इसे रामसर साइट का दर्जा भी मिल चुका है। ऐसे में यह मामला एक बड़ा नीतिगत सवाल खड़ा करता है। क्या पर्यावरण से जुड़े मौजूदा नियम घासभूमियों, मौसमी आर्द्रभूमियों और उनके कैचमेंट एरिया की सुरक्षा के लिए पर्याप्त है? या फिर ऐसे संवेदनशील इलाकों के पास प्रस्तावित बड़ी सौर ऊर्जा प्लांट के लिए अलग और अधिक विस्तृत पर्यावरणीय जांच की जरूरत है?
पानी के सवाल को केंद्र में रखना जरूरी
छारी-ढांढ को लेकर सामने आई ज्यादातर चिंताएं पक्षियों, घासभूमि और मालधारियों की आजीविका से जुड़ी हैं। ये सभी अहम हैं। यही कारण है कि एक मौसमी आर्द्रभूमि होने के कारण उसके जल तंत्र को भी इस बहस के केंद्र में रखने की जरूरत है।
छारी-ढांढ में पानी स्थायी रूप से नहीं रहता। उसका फैलाव, गहराई और पानी ठहरने की अवधि मानसून और आसपास से आने वाले पानी के बहाव पर निर्भर करती है।
ऐसे में किसी ज़मीन के इस्तेमाल में आए बदलाव को जानना केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह रामसर साइट की कानूनी सीमा के भीतर है या बाहर।
मुख्य मुद्दा यह होना चाहिए कि योजना के लिए प्रस्तावित जगह और आर्द्रभूमि के बीच कोई जल संबंध है या नहीं। क्या बारिश का पानी इस क्षेत्र से होकर छारी-ढांढ की ओर जाता है? क्या निर्माण के दौरान जमीन समतल करने, सड़कें बनाने या जल निकासी में बदलाव से सतही बहाव प्रभावित हो सकता है? और क्या इस जगह का कोई स्वतंत्र, विशेष अध्ययन किया गया है?
इन बिंदुओं का अभी तक कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए संभावित नुकसान को पहले से तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। वहीं, ज़मीन के उपयोग में आए इतने बड़े बदलाव से पहले ये सब स्पष्ट करना एक मौसमी और रामसर साइट के संरक्षण के लिए जरूरी है।
आगे क्या होना चाहिए?
छारी-ढांढ के मामले को केवल 'विकास बनाम पर्यावरण' के पुराने ढांचे में देखना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को रिन्यूएबल ऊर्जा चाहिए और आर्द्रभूमियों तथा घासभूमियों का संरक्षण भी जरूरी है। ऐसे में असली चुनौती यह है कि बेहतर योजना और सही जगह के चुनाव प्रक्रिया के बीच टकराव कम किया जाए।
इसके लिए सबसे पहले प्रस्तावित योजना और छारी-ढांढ के बीच जल संबंधों का स्वतंत्र गहरा अध्ययन जरूरी है। एक ऐसा सार्वजनिक नक्शा उपलब्ध होना चाहिए, जिसमें इसका इलाका, रामसर साइट, जलग्रहण क्षेत्र और पानी के प्राकृतिक रास्ते और बारिश के पानी का बहाव एक साथ दिखाई दें।
दूसरा, योजना से पहले इलाके के मौजूदा जल तंत्र की स्थिति दर्ज की जानी चाहिए। इसकी जानकारी होनी चाहिए कि बारिश का पानी कहां से आता है, किन रास्तों से बहता है।
इसके अलावा इसका भी विश्लेषण करना होगा कि वह पानी आर्द्रभूमि में कितने समय तक ठहरता है। इसके बिना भविष्य में होने वाले किसी बदलाव को मापना मुश्किल होगा।
तीसरा, फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में स्थानीय मालधारी समुदायों के ज़मीन के पारंपरिक इस्तेमाल और चराई के रास्तों को जगह मिलनी चाहिए। किसी जमीन को केवल सरकारी रिकॉर्ड में 'वेस्टलैंड' दर्ज होने के कारण पारिस्थितिक या सामाजिक रूप से खाली या अनुपयोगी नहीं माना जा सकता।
छारी-ढांढ का मामला भारत के ऊर्जा बदलाव के सामने एक अहम चुनौती रखता है। जीवाश्म ईंधन से रिन्यूएबल ऊर्जा की ओर बढ़ना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि ऐसी परियोजनाओं के लिए सही जगह चुनी जाए, ताकि उनकी पर्यावरणीय कीमत कम हो।
यह बहस केवल एक सौर परियोजना की नहीं है। यह इस सवाल से जुड़ी है कि क्या भारत का हरित ऊर्जा अभियान अपनी आर्द्रभूमियों और उनके जल तंत्र के साथ संतुलन बना पाएगा। छारी-ढांढ याद दिलाता है कि किसी आर्द्रभूमि की रक्षा केवल वहां जमा पानी की नहीं, बल्कि उन प्राकृतिक रास्तों की भी होती है, जिनसे होकर पानी वहां तक पहुंचता है।
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