581 करोड़ की परियोजना से बनासकांठा के 100 गांवों में बढ़ेगा भूजल रिचार्ज

डीसा और कांकरेंज में सालाना इस्तेमाल के लिए उपलब्ध भूजल से अधिक पानी निकाला जा रहा है। बनास पर प्रस्तावित बांध से रिचार्ज बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन राहत कितनी टिकेगी, यह पानी की उपलब्धता और निकासी, दोनों पर निर्भर करेगा।
गुजरात के बनासकांठा में बनास नदी पर स्थित दांतीवाड़ा बांध का दृश्य।

गुजरात के बनासकांठा में बनास नदी पर स्थित दांतीवाड़ा बांध का दृश्य।

फोटो: कार्तिक मिस्त्री | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

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Summary
  • महादेविया के पास लगभग 581 करोड़ रुपये की परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी मिलने की जानकारी है; 100 गांवों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है।

  • केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2024 के आकलन में डीसा और कांकरेंज, दोनों अतिदोहित श्रेणी में हैं।

  • जलाशय में भंडारण के साथ वास्तविक भूजल रिचार्ज, निकासी और गर्मियों में जलस्रोतों की उपलब्धता का हिसाब जरूरी होगा।

गुजरात के बनासकांठा जिले में बनास नदी पर प्रस्तावित बांध से डीसा और कांकरेंज के 100 गांवों को राहत मिलने की उम्मीद है। योजना नदी का पानी रोककर उसे जमीन में रिसने का अधिक समय देने की है, ताकि आसपास भूजल रिचार्ज बढ़ सके। लेकिन जिन तालुकों के लिए यह योजना बनाई जा रही है, वहां पानी की सालाना निकासी पहले ही उपलब्ध वार्षिक संसाधन से अधिक है।

यही स्थिति इस परियोजना को समझने का आधार है। अतिरिक्त रिचार्ज से कुछ जलस्रोतों को सहारा मिल सकता है। क्षेत्र के भूजल संकट में टिकाऊ कमी के लिए यह भी जरूरी है कि बढ़ती उपलब्धता के मुकाबले निकासी कितनी रहती है। इसलिए संभावित लाभ का आकलन करते समय पानी का पूरा हिसाब जरूरी है कि कितना पानी आएगा, कितना जमीन में पहुंचेगा और कितना निकाला जाएगा।

सात सीढ़ीनुमा स्तरों वाला वीयर बनाने की योजना

सरकारी घोषणा का हवाला देने वाली 3 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, महादेविया गांव के पास लगभग 581 करोड़ रुपये की ‘फिश स्केल स्टेप्ड वीयर’ परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी मिली है। यह नदी में पानी रोकने के लिए प्रस्तावित विशेष सीढ़ीनुमा संरचना है। इससे डीसा के 70 और कांकरेंज के 30 गांवों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है।

प्रस्ताव में 500 मीटर चौड़ी, सात सीढ़ीनुमा स्तरों वाली संरचना, उससे ऊपर की ओर लगभग 2.72 किलोमीटर तक जलाशय और उत्तरी किनारे पर 4,795 मीटर लंबा तटबंध शामिल हैं। दांतीवाड़ा और सिपु बांधों से छोड़े जाने वाले पानी को यहां रोकने की योजना है। तकनीकी सहयोग के लिए आईआईटी रुड़की का उल्लेख है। अंतिम डिजाइन तैयार करने का काम सौंपे जाने और निर्माण 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य भी बताया गया है।

ये विवरण संरचना का आकार बताते हैं। जलाशय में कितना पानी समाएगा, यह उसकी लंबाई के साथ गहराई और डूब क्षेत्र पर निर्भर करेगा। वहीं, जमीन में पहुंचने वाले पानी का अनुमान लगाने के लिए स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और पानी ठहरने की अवधि का अध्ययन चाहिए। इसीलिए जलभंडारण और भूजल रिचार्ज को अलग-अलग मापना जरूरी है।

भूजल निकासी के आंकड़े क्यों महत्वपूर्ण हैं?

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की गुजरात भूजल संसाधन रिपोर्ट, 2024 में डीसा और कांकरेंज अतिदोहित श्रेणी में दर्ज हैं।

स्रोत: केंद्रीय भूजल बोर्ड, गुजरात भूजल संसाधन रिपोर्ट, 2024।

भूजल निकासी का स्तर, सालाना निकासी और सालाना निकाले जा सकने वाले भूजल संसाधन का अनुपात है। आसान उदाहरण में, डीसा में प्रत्येक 100 इकाई वार्षिक दोहन योग्य संसाधन के मुकाबले करीब 164 इकाई निकासी का आकलन है। कांकरेंज में यह करीब 128 इकाई है।

ये आंकड़े तालुका स्तर पर भूजल संसाधन और निकासी का संबंध बताते हैं। इनसे किसी खास गांव या कुएं में जलस्तर कितना बदला है, यह नहीं पता चलता। फिर भी ये क्षेत्र में रिचार्ज बढ़ाने के साथ निकासी का प्रबंधन करने की जरूरत बताते हैं।

दोनों तालुकों के भूजल संकट को कम करने में यह बांध कितना योगदान देगा, इसे समझने के लिए उसके संभावित प्रभाव क्षेत्र में भूजल निकासी और अनुमानित अतिरिक्त रिचार्ज की तुलना जरूरी होगी। इससे योजना से मिलने वाली राहत का आकलन किया जा सकेगा।

बनासकांठा के जल संकट को समझने के लिए बारिश और पानी के इस्तेमाल को साथ देखना जरूरी है। कम बारिश रिचार्ज को प्रभावित कर सकती है, जबकि उपलब्ध वार्षिक संसाधन से अधिक निकासी भूजल पर दबाव बढ़ाती है। इसलिए नया बांध पानी रोकने का अवसर देता है, लेकिन उससे मिलने वाली राहत का संबंध खेती और अन्य जरूरतों के लिए होने वाली निकासी से भी रहेगा।

किन गांवों के जलस्रोतों तक पहुंचेगा लाभ?

नदी में पानी ठहरने से रिचार्ज की संभावना बनती है, लेकिन पानी कहां और कितनी तेजी से रिसेगा, यह नदी के तल और नीचे की परतों पर निर्भर करेगा। जलभृत जमीन के भीतर मिट्टी, रेत या चट्टान की ऐसी परत है, जिसमें पानी जमा होता है और बह सकता है।

 आसपास के कुओं और नलकूपों को मिलने वाला लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि रिसने वाला पानी किन जलभृतों तक पहुंचता है और उनका इन जलस्रोतों से कैसा संबंध है।

CGWB की कृत्रिम भूजल रिचार्ज मार्गदर्शिका ऐसी योजनाओं के लिए पानी की उपलब्धता और भूमिगत परिस्थितियों के आकलन को महत्वपूर्ण मानती है। महादेविया में नदी के तल से पानी रिसने की क्षमता और आसपास के कुओं की गहराई का अध्ययन यह समझने में मदद करेगा कि लाभ कहां तक पहुंच सकता है। उपलब्ध विवरण से सभी 100 गांवों में समान सुधार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

लाभार्थी गांवों की सूची के साथ जलभृतों और संभावित प्रभाव क्षेत्र का नक्शा सामने आए तो यह संबंध अधिक स्पष्ट होगा। उससे समझा जा सकेगा कि किन गांवों के किन जलस्रोतों को सहारा मिलने की उम्मीद है।

पानी का लाभ परिवारों तक पहुंचने का रास्ता भी महत्वपूर्ण है। निजी नलकूप से सिंचाई करने वाले किसान और सार्वजनिक पेयजल स्रोत पर निर्भर परिवार की जरूरतें अलग हैं। लाभ का आकलन करते समय सिंचाई वाले निजी नलकूपों और सार्वजनिक जलस्रोतों की स्थिति अलग-अलग दर्ज करना उपयोगी होगा।

इससे स्पष्ट होगा कि बढ़े रिचार्ज का लाभ किन परिवारों तक पहुंचता है।

कम बारिश वाले साल में पानी की उपलब्धता

प्रस्तावित वीयर में दांतीवाड़ा और सिपु बांधों से छोड़े जाने वाले पानी को रोकने की योजना है। इसलिए यहां पानी की उपलब्धता उन जलाशयों में भंडारण और उनसे पानी छोड़े जाने के समय व मात्रा पर भी निर्भर करेगी।

अच्छी बारिश के वर्ष में अधिक पानी रोकने का अवसर मिल सकता है। कम बारिश वाले वर्ष में ऊपर के जलाशयों की जरूरतें पूरी करने के बाद कितना पानी उपलब्ध रहेगा, इसका अलग अनुमान चाहिए। हर साल समान आवक मानकर रिचार्ज की गणना करने से राहत की तस्वीर अधूरी रहेगी।

खेती के लिए पानी की मात्रा के साथ यह भी मायने रखता है कि वह कब और कितनी नियमितता से मिलेगा। परियोजना के जल-हिसाब में कम, सामान्य और अधिक बारिश वाले वर्षों की संभावित आवक शामिल होनी चाहिए। इससे स्पष्ट होगा कि योजना किन परिस्थितियों में कितनी मदद कर सकती है।

अतिरिक्त रिचार्ज के बाद इस्तेमाल में बदलाव भी परिणाम को प्रभावित करेगा। बढ़ी उपलब्धता मौजूदा खेती की सिंचाई अधिक भरोसेमंद बना सकती है। यदि उसके साथ सिंचित क्षेत्र या कुल खपत भी बढ़े तो निकासी बढ़ सकती है। इसलिए रिचार्ज से मिलने वाली राहत को बनाए रखने के लिए फसलवार पानी की मांग और वास्तविक निकासी का रिकॉर्ड उपयोगी होगा।

गुजरात का सुजलाम सुफलाम अनुभव यहां एक उपयोगी संदर्भ देता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में उद्धृत शुरुआती अध्ययनों में कुछ स्थानों पर भूजल स्तर सुधरने और सिंचित क्षेत्र बढ़ने का उल्लेख है। बनास की परियोजना के लिए यह दो परिणामों को साथ मापने की जरूरत सामने लाता है कि रिचार्ज से उपलब्ध पानी कितना बढ़ता है और उसके बाद खेती में पानी का इस्तेमाल कितना बदलता है।

बांध से आगे नदी के प्रवाह पर क्या असर होगा?

परियोजना का प्रभाव जलाशय और उसके आसपास तक सीमित मानकर नहीं आंका जा सकता। महादेविया में पानी रोकने के बाद नीचे की ओर प्रवाह की मात्रा और समय में होने वाले बदलाव भी अध्ययन में शामिल होने चाहिए।

विशेष रूप से यह स्पष्ट होना चाहिए कि जिस पानी को भंडारण के लिए अतिरिक्त माना गया है, उसका आकलन कैसे किया गया। नदी के नीचे के हिस्से में बसे गांवों, किनारे के कुओं और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए मौजूदा प्रवाह की भूमिका समझना जरूरी है।

इन पहलुओं का अध्ययन करने से परियोजना के लाभ और संभावित प्रभावों की अधिक स्पष्ट तस्वीर मिलेगी। उसके आधार पर नीचे की ओर पानी छोड़ने की मात्रा और समय तय किए जा सकते हैं। एक स्थान पर बढ़े भंडारण के साथ नदी के दूसरे हिस्सों में उपलब्धता का रिकॉर्ड रखने से परियोजना की व्यापक तस्वीर सामने आएगी।

गर्मियों में जलस्रोतों को मिली राहत से परखें परिणाम

परियोजना के निर्माण से पहले चुनिंदा कुओं का जलस्तर दर्ज किया जाना चाहिए। इनमें संभावित प्रभाव क्षेत्र के भीतर और उससे बाहर, तुलनीय परिस्थितियों वाले कुएं शामिल हों। निर्माण के बाद उन्हीं स्रोतों में मानसून से पहले, मानसून के बाद और गर्मियों के अंत में माप जारी रहे।

इस रिकॉर्ड को बारिश, पंपिंग और जलाशय में पानी ठहरने की अवधि से जोड़ने पर बदलाव का कारण समझने में मदद मिलेगी। किसी एक अच्छे मानसून के बाद जलस्तर बढ़ना, अपने-आप में परियोजना के पूरे प्रभाव का प्रमाण नहीं होगा।

रखरखाव भी नियमित होना चाहिए। CGWB की रिचार्ज नियमावली के अनुसार गाद, रासायनिक जमाव और जैविक पदार्थ पानी रिसने की क्षमता घटा सकते हैं। इसलिए तलछट प्रबंधन, निगरानी और रखरखाव के लिए जिम्मेदारी तथा बजट तय होना जरूरी है।

भूजल के इस्तेमाल का असर आने वाले वर्षों की उपलब्धता पर भी पड़ता है। यदि अतिरिक्त पुनर्भरण के साथ निकासी उतनी ही या उससे अधिक बढ़ जाए, तो भविष्य की जरूरतों के लिए स्थिति बेहतर होना जरूरी नहीं है। इसलिए परियोजना की सफलता में आज की राहत के साथ यह भी शामिल होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गांवों के जलस्रोत कितने भरोसेमंद बने रहते हैं।

बनास पर प्रस्तावित बांध से भूजल रिचार्ज बढ़ने की संभावना है। इसका योगदान समझने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि आसपास के जलस्रोतों में कितना सुधार हुआ, गर्मियों में पानी कितने समय तक उपलब्ध रहा और निकासी के मुकाबले भूजल की स्थिति कैसी रही। साथ ही, बांध से आगे नदी के प्रवाह में बदलाव का भी हिसाब रखना होगा। इन्हीं परिणामों से स्पष्ट होगा कि 100 गांवों के लिए की गई पहल कितनी टिकाऊ राहत दे पाई।

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