कश्मीर की झीलें सिर्फ पानी का स्रोत नहीं हैं। ये यहाँ के लोगों की ज़िंदगी, आजीविका और स्थानीय संस्कृति का अहम हिस्सा रही हैं।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
झील से थाली तक: कश्मीर की झीलों में भारी धातुओं का बढ़ता ज़हर, खतरे में पानी फल कहा जाने वाला सिंघाड़ा
कश्मीर की झीलों से मिलने वाले सिंघाड़ों में कैडमियम सहित कई भारी धातुएं सुरक्षित सीमा से ऊपर मिलीं।
डल झील का प्रदूषण अब पानी और तलछट से आगे बढ़कर खाद्य श्रृंखला तक पहुंच चुका है।
अध्ययन में सिंघाड़ों को प्रदूषण का संकेतक और जहरीली धातुओं का संभावित वाहक दोनों बताया गया है।
खाद्य सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और झीलों पर निर्भर समुदायों की आजीविका को लेकर गंभीर चिंता।
विशेषज्ञों ने प्रदूषण नियंत्रण और नियमित खाद्य सुरक्षा जांच की जरूरत बताई है।
एक नए अध्ययन में सामने आया है कि कश्मीर की झीलों और उनमें उगने वाले सिंघाड़ों में भारी धातुओं (हेवी मेटल्स) का खतरनाक स्तर पाया गया है। इससे खाद्य सुरक्षा, जनस्वास्थ्य, वेटलैंड इकोसिस्टम और सिंघाड़े की खेती व उससे जुड़े हज़ारों लोगों की आजीविका को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।
कश्मीर की झीलें सिर्फ पानी का स्रोत नहीं हैं। ये यहाँ के लोगों की ज़िंदगी, आजीविका और स्थानीय संस्कृति का अहम हिस्सा रही हैं। इन झीलों से लोगों को मछली, सिंघाड़ा और दूसरे संसाधन मिलते हैं। वहीं कई पक्षियों, मछलियों और जलीय जीवों का जीवन भी इन्हीं पर निर्भर है। इन झीलों की शांत सतह के नीचे कैडमियम जैसे भारी धातु पशु-पक्षियों, पर्यावरण और लोगों की सेहत के लिए चिंता का विषय बन गए हैं।
नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक नए अध्ययन में पाया गया है कि कश्मीर की झीलों से मिलने वाले सिंघाड़ों में भारी धातुओं (हेवी मेटल्स) की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। इससे खाद्य सुरक्षा और लोगों के स्वास्थ्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। साथ ही अपनी आजीविका के लिए इन झीलों पर निर्भर हज़ारों परिवारों की आजीविका भी ख़तरे में आ गई है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक समस्या सिर्फ सिंघाड़ों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ में झीलों के पानी की बिगड़ती गुणवत्ता है। बिना उपचार वाला सीवेज, खेतों से बहकर आने वाले रसायन और दूसरे प्रदूषण स्रोत लगातार झीलों को प्रभावित कर रहे हैं।
अध्ययन में कश्मीर की चार प्रमुख झीलों और वेटलैंड्स का विश्लेषण किया गया। इसमें डल झील, होकर्सर वेटलैंड, मानसबल झील और वुलर झील शामिल हैं। इन चारों जलाशयों की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। अध्ययन दिखाता है कि प्रदूषण पानी से तलछट तक पहुंचता है। फिर जलीय पौधों में जमा होता है और अंततः इंसानों की भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर जाता है।
कश्मीर की झीलों से जुड़ी आजीविका का आधार है सिंघाड़ा
डल, होकर्सर, मानसबल और वुलर जैसी झीलें कश्मीर में सिंघाड़े का प्रमुख स्रोत हैं। कश्मीर में इसे स्थानीय तौर पर गोर या गाएर कहा जाता है। जबकि देश के दूसरे हिस्सों में यही फल सिंघाड़े के नाम से जाना जाता है। इन झीलों से सिंघाड़ा निकालने और बेचने का काम हज़ारों परिवारों की आजीविका का आधार है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इन झीलों से मिलने वाले सिंघाड़ों में कई भारी धातुओं (हेवी मेटल्स) की उपस्थिति खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। इन धातुओं में कैडमियम (Cd), क्रोमियम (Cr), कॉपर (Cu), कोबाल्ट (Co), आयरन (Fe), मैंगनीज़ (Mn), निकेल (Ni) और ज़िंक (Zn) शामिल हैं।
शोध के अनुसार, कश्मीर की झीलों के पानी की गुणवत्ता तेज़ी से बिगड़ रही है। घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और खेतों से बहकर आने वाले रसायन बड़ी मात्रा में झीलों में पहुंच रहे हैं। इसका असर मीठे पानी के पूरे इकोसिस्टम पर पड़ रहा है।
प्रदूषण बढ़ने से झीलों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। इससे पोषक तत्वों का प्राकृतिक चक्र प्रभावित हो रहा है। साथ ही, यूट्रोफिकेशन (पोषक तत्वों की अधिकता से जलाशयों का प्रदूषित होना) की समस्या भी बढ़ रही है और झीलों के पानी और तलछट में प्रदूषक जमा हो रहे हैं। इनमें जहरीली भारी धातुओं की मात्रा सबसे अधिक चिंता का विषय है।
सिंघाड़ा एक पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसमें स्टार्च, प्रोटीन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में यह लोगों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। साथ ही, स्थानीय बाजारों में बिकने वाली एक अहम उपज भी है।
सिंघाड़ा सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं है। यह वेटलैंड के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करता है। यह पोषक तत्वों के चक्र और कार्बन संग्रहण में अहम भूमिका निभाता है।
लेकिन सिंघाड़े की यही क्षमता अब चिंता बढ़ा रही है। यह पानी और तलछट में मौजूद प्रदूषकों को अपने भीतर जमा कर लेता है। यह गुण प्रदूषण कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन यही भारी धातुएं बाद में भोजन के जरिए इंसानी शरीर तक भी पहुंच सकती हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, कश्मीर घाटी में सिंघाड़े पर अब तक बहुत कम अध्ययन हुए हैं। यह भी पर्याप्त रूप से नहीं समझा गया है कि सिंघाड़ा खाने के लिए कितना सुरक्षित है और क्या यह झीलों में बढ़ते प्रदूषण का संकेत दे सकता है। खासकर उन झीलों और वेटलैंड्स पर पर्याप्त शोध नहीं हुआ है, जो सीवेज, खेती और दूसरी मानवीय गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के दबाव में हैं।
प्रदूषण कैसे बदल रहा है कश्मीर की झीलों का स्वरूप
इस अध्ययन में डल झील, होकर्सर वेटलैंड, मानसबल झील और वुलर झील में भारी धातुओं की मात्रा का आकलन किया गया। साथ ही यह भी देखा गया कि ये धातु सिंघाड़े के पौधों में किस तरह जमा हो रही हैं।
इसके लिए शोधकर्ताओं ने झीलों से पानी, तलछट (सेडिमेंट) और सिंघाड़े के विभिन्न हिस्सों के नमूने इकट्ठे किए। इनमें जड़, तना और फल शामिल थे। इसके बाद इन सभी नमूनों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में आठ प्रकार की भारी धातुओं की जांच की गई। इन जांचों की मदद से यह समझने की कोशिश की गई कि झीलों का प्रदूषण सिंघाड़े के पौधों में कितनी मात्रा में जमा हो रहा है। शोधकर्ता यह भी जानना चाहते थे कि ये प्रदूषक भोजन श्रृंखला में कितनी मात्रा में पहुंच रहे हैं।
अध्ययन में कई चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं:
डल झील का पानी सबसे अधिक प्रदूषित
जल गुणवत्ता के विश्लेषण से पता चला कि कश्मीर की झीलों की स्थिति लगातार बिगड़ रही है। इनमें डल झील सबसे अधिक प्रदूषित पाई गई। इसके पीछे मुख्य कारण जैविक प्रदूषण (ऑर्गेनिक पॉल्यूशन) है। वहीं मानसबल और वुलर झीलों में प्रदूषण का स्तर अपेक्षाकृत कम मिला।
अध्ययन में पाया गया कि डल झील और होकर्सर वेटलैंड में कुल घुलित ठोस पदार्थ (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स), नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की मात्रा तय मानकों से अधिक है। पानी कितना प्रदूषित है, यह समझने के लिए बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (COD) जैसे मानकों का इस्तेमाल किया जाता है।
इन सभी जलाशयों में BOD और COD का स्तर WHO के मानकों से अधिक पाया गया। डल झील में इनका स्तर सबसे ज्यादा था। इससे यह पता चलता है कि झील में जैविक प्रदूषण अधिक है और पानी की खुद को साफ करने की क्षमता कमजोर पड़ रही है।
डल झील के पानी में सबसे अधिक भारी धातुएं
अध्ययन में पाया गया कि डल झील के पानी में भारी धातुओं का स्तर सबसे अधिक है। इसके बाद होकर्सर वेटलैंड का स्थान आता है।
कैडमियम (Cd), क्रोमियम (Cr), आयरन (Fe), मैंगनीज़ (Mn) और निकेल (Ni) जैसी धातुओं की मात्रा सुरक्षित सीमा से ऊपर दर्ज की गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि बिना उपचार वाला सीवेज, खेतों से बहकर आने वाले रसायन और हाउसबोट्स से निकलने वाला अपशिष्ट इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।
इसके विपरीत मानसबल और वुलर झीलों में प्रदूषण का स्तर कम मिला। इसका कारण इन झीलों में पानी का बेहतर प्रवाह और अपेक्षाकृत कम मानवीय हस्तक्षेप माना गया है।
डल झील की तलछट में भी भारी धातुओं का जमाव सबसे ज्यादा
पानी की तरह डल झील की तलछट (सेडिमेंट) में भी भारी धातुओं की मात्रा सबसे अधिक पाई गई। इसके बाद होकर्सर वेटलैंड का स्थान रहा।
मानसबल और वुलर झीलों में तलछट का प्रदूषण अपेक्षाकृत कम मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका कारण बेहतर जल आदान-प्रदान और कम मानवीय दबाव है।
डल झील के सिंघाड़ों में सबसे अधिक प्रदूषण
अध्ययन में डल झील से लिए गए सिंघाड़ों में भारी धातुओं का जमाव सबसे अधिक पाया गया। वहीं वुलर झील के सिंघाड़ों में यह स्तर सबसे कम था।
सिंघाड़े के पौधे के अलग-अलग हिस्सों की जांच में पता चला कि सबसे अधिक भारी धातुएं जड़ों में जमा होती हैं। इसके बाद तनों और फिर फलों का स्थान आता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जड़ें प्रदूषित पानी और तलछट के सीधे संपर्क में रहती हैं। इसलिए सबसे पहले और सबसे अधिक प्रदूषण वहीं जमा होता है। यह इस बात का संकेत है कि झीलों का प्रदूषण जलीय तंत्र के भीतर कितनी गहराई तक पहुंच चुका है।
डल झील के सिंघाड़ों की जड़ों में आयरन, कैडमियम, कॉपर, कोबाल्ट, निकेल और ज़िंक का जमाव सबसे अधिक पाया गया। चिंता की बात यह है कि खाने योग्य फलों में भी ज़िंक और कैडमियम की मात्रा काफी अधिक दर्ज की गई।
होकर्सर वेटलैंड की स्थिति भी कुछ ऐसी ही पाई गई, हालांकि वहां डल झील की तुलना में भारी धातुओं का जमाव कुछ कम था। दूसरी ओर मानसबल और वुलर झीलों में भारी धातुओं का स्तर अपेक्षाकृत कम मिला।
कैडमियम सबसे बड़ा स्वास्थ्य जोखिम
शोधकर्ताओं ने सिंघाड़े के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों का भी आकलन किया। अध्ययन में पाया गया कि कैडमियम सबसे बड़ा गैर-कैंसरकारी (नॉन-कार्सिनोजेनिक) स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है।
डल झील से लिए गए नमूनों में कैडमियम की मात्रा सामान्य सीमा से अधिक पाई गई। अध्ययन के अनुसार, यदि ऐसे सिंघाड़ों का नियमित सेवन किया जाए, तो यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
प्रदूषण का संकेत भी, ज़हर का वाहक भी
अध्ययन बताता है कि सिंघाड़ा एक तरफ़ प्रदूषण का संकेत दे रहा है, तो दूसरी तरफ़ जहरीली धातुओं को लोगों तक पहुंचाने का माध्यम भी बन रहा है।
शोधकर्ताओं ने सिंघाड़े की जड़ों और फलों दोनों में भारी धातुओं की मौजूदगी दर्ज की है। इससे लंबे समय तक इसे खाने के असर को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
सिंघाड़ा प्रदूषित पानी में मौजूद भारी धातुओं को अपने भीतर खींच लेता है। यही वजह है कि इसे पानी साफ करने वाले पौधों में गिना जाता है। लेकिन मुश्किल यह है कि यही सिंघाड़ा लोगों के भोजन का भी हिस्सा है।
अध्ययन में पाया गया कि कैडमियम, क्रोमियम, निकेल, कॉपर और दूसरी भारी धातुएं सिर्फ जड़ों तक सीमित नहीं रहतीं। वे पौधे के अन्य हिस्सों और खाने योग्य फलों तक भी पहुंच जाती हैं। इसका मतलब है कि झीलों के प्रदूषित पानी से सोखी गई ये धातुएं आखिरकार लोगों की थाली तक पहुंच सकती हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाने की जरूरत है।
झीलों से मिलने वाली मछलियों और अन्य जलीय खाद्य पदार्थों की नियमित जांच की जाए। साथ ही, इसके नतीजे स्थानीय समुदायों के लिए उपलब्ध किए जाएं।
सीवेज और औद्योगिक अपशिष्टों के पानी में बहाने को लेकर तय किए गए नियमों को सख्ती से लागू किया जाए।
खेतों से बहकर आने वाले प्रदूषकों को कम किया जाए। इसके अलावा, अपशिष्ट जल के उपचार और तलछट की सफाई पर गभीरता से काम हो।
सिंघाड़े जैसी जलीय खाद्य फसलों के लिए नियंत्रित संग्रहण क्षेत्र (कंट्रोल्ड हार्वेस्टिंग ज़ोन) बनाए जाएं और उनकी नियमित जांच हो।
प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण उपाय लागू होने तक डल झील से मिलने वाले सिंघाड़ों के सेवन पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जाए।
लंबे समय तक भारी धातुओं के संपर्क का सिंघाड़े और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित असर को जानने के लिए इस विषय पर और शोध किए जाएं।
लोगों को संभावित स्वास्थ्य जोखिमों और सुरक्षित उपभोग के तरीकों के बारे में जागरूक किया जाए।
सिंघाड़ा निकालने वाले परिवारों को सुरक्षित फसलों, इको-टूरिज्म या अन्य आय के स्रोतों की ओर बढ़ने में सहायता दी जाए।
झीलों पर प्रदूषण के दबाव को कम करने वाले उपाय अपनाए जाएं। इसके लिए प्राकृतिक फिल्टर का काम करने वाले सरकंडों (रीड बेड्स), जलीय वनस्पतियों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी वाले संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा दिया जाए।
कश्मीर की झीलों का भविष्य यहां के लोगों के भविष्य से जुड़ा है
यह अध्ययन याद दिलाता है कि प्रदूषण सिर्फ झीलों या नदियों तक सीमित नहीं रहता। यह पानी से तलछट तक पहुंचता है। उसके बाद पौधों में जमा होता है और आखिरकार लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगता है।
कश्मीर की झीलें सिर्फ़ पानी के स्रोत नहीं हैं। पीढ़ियों से यहां के लोगों का जीवन इनसे जुड़ा रहा है। इन्हीं झीलों ने लोगों को भोजन दिया, रोज़गार दिया और स्थानीय संस्कृति को आकार दिया। सिंघाड़ा भी इसी रिश्ते का हिस्सा रहा है। लेकिन आज यही फसल झीलों की बिगड़ती सेहत की चेतावनी बनकर सामने आ रही है।
अध्ययन बताता है कि यह समस्या सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण की नहीं है। इसका सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा, जन-स्वास्थ्य और उन हज़ारों लोगों की आजीविका से भी है, जिनका जीवन इन झीलों और वेटलैंड पर निर्भर है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि कश्मीर की झीलों को बचाने के लिए केवल प्रदूषण कम करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए इन मीठे पानी के इकोसिस्टम की सेहत को बहाल करना भी जरूरी है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो प्रदूषण का असर स्थायी रूप ले सकता है।
कश्मीर की पहचान मानी जाने वाली इन झीलों का भविष्य सिर्फ उनकी सुंदरता बचाने भर का सवाल नहीं है। इन झीलों का भविष्य और इन पर निर्भर लोगों का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा है। अगर झीलें स्वस्थ रहेंगी, तभी लोगों की आजीविका और जीवन भी सुरक्षित रह पाएगा।
इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।
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