हरियाणा का नदी तंत्र चार प्रमुख नदी उप-बेसिनों - यमुना, घग्गर, सतलुज तथा चौटांग एवं अन्य नदियां - में विभाजित है।

हरियाणा का नदी तंत्र चार प्रमुख नदी उप-बेसिनों - यमुना, घग्गर, सतलुज तथा चौटांग एवं अन्य नदियां - में विभाजित है।

चित्र: इंडियन एक्सप्रेस

हरियाणा में नदियों व उपनदियों की पूरी सूची, उद्गम स्थल और विशेषताएं

इस लेख में पढ़ें हरियाणा की सभी नदियों व उप-नदियों की पूरी सूची। साथ में जानिए नदियों की उत्पत्ति, नदी तंत्र के बारे में और कैसे ये राज्य में जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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  • यमुना हरियाणा की एकमात्र प्रमुख बारहमासी नदी है, जबकि घग्गर, साहिबी, चौटांग, मारकंडा, आदि में अधिकांश मौसमी नदियां हैं।

  • हरियाणा का नदी तंत्र चार प्रमुख नदी उप-बेसिनों - यमुना, घग्गर, सतलुज तथा चौटांग एवं अन्य नदियां - में विभाजित है।

  • राज्य की नदियां सिंचाई, भूजल रिचार्ज, बाढ़ प्रबंधन और स्थानीय पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

हरियाणा की पहचान अक्सर नहरों और सिंचित कृषि वाले राज्य के रूप में की जाती है। लेकिन राज्य की जल व्यवस्था केवल नहरों पर आधारित नहीं है। इसकी प्राकृतिक नदी प्रणाली आज भी भूजल रिचार्ज, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और स्थानीय पारिस्थितिकी की आधारशिला है। 

राज्य में केवल यमुना ऐसी प्रमुख नदी है जिसमें वर्ष भर जल प्रवाह बना रहता है। इसके अलावा 10 अन्य नदियां हैं, जिनमें अधिकांश नदियां मौसमी हैं। इनका प्रवाह मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करता है, इसलिए वर्षा के पैटर्न में बदलाव का इन पर सीधा असर पड़ता है। 

हरियाणा में नदियां और भूजल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जहां नदियों का प्रवाह घटता है, वहां सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ जाती है। वहीं भूजल स्तर गिरने से नदियों को मिलने वाला आधार प्रवाह भी कम हो जाता है। इसलिए राज्य की जल सुरक्षा में नदी और भूजल दोनों की भूमिका साथ-साथ देखी जाती है।

हरियाणा में नदियां और भूजल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जहां नदियों का प्रवाह घटता है, वहां सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ जाती है।

हरियाणा की जल उपलब्धता का बड़ा हिस्सा मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहता है। यदि मानसून कमजोर हो, तो इसका असर नदी प्रवाह, भूजल रिचार्ज और सिंचाई, तीनों पर पड़ता है।

हरियाणा का नदी बेसिन तंत्र

हरियाणा की सभी नदियां एक ही दिशा में नहीं बहतीं और न ही उनका जल एक ही नदी तंत्र में मिलता है। इसी कारण राज्य को जल प्रवाह और जलग्रहण क्षेत्र के आधार पर चार प्रमुख नदी उप-बेसिनों में बांटा गया है।

राज्य के अलग-अलग हिस्सों में वर्षा, भू-आकृति और नदियों का स्वरूप भी अलग है। उत्तर-पूर्वी भाग में यमुना और शिवालिक से निकलने वाली नदियां प्रमुख हैं, जबकि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम में अरावली से निकलने वाली मौसमी नदियां अधिक मिलती हैं। यही भौगोलिक अंतर विभिन्न क्षेत्रों में नदी प्रवाह, भूजल रिचार्ज और जल उपलब्धता को भी प्रभावित करता है।

हरियाणा जल संसाधन एटलस 2025 (HWRA 2025) के अनुसार राज्य के चार प्रमुख नदी उप-बेसिन - यमुना, घग्गर, सतलुज तथा चौटांग एवं अन्य नदियां, जल संसाधन प्रबंधन की महत्वपूर्ण इकाइयां हैं। नीचे दी गई तालिका इन उप-बेसिनों और उनकी प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय देती है।

एक नज़र में: हरियाणा के नदी उप-बेसिन

इन चारों उप-बेसिनों में बहने वाली नदियों की प्रकृति अलग-अलग है। इसी कारण राज्य के विभिन्न हिस्सों में जल प्रबंधन की चुनौतियां भी अलग हैं। कहीं बाढ़ का जोखिम अधिक है, तो कहीं वर्षा के बाद भी पानी की कमी बनी रहती है।

हरियाणा की प्रमुख नदियां और उनकी प्रमुख सहायक नदियां

हरियाणा की प्रमुख नदियां

हरियाणा की नदियों को समझने के लिए सबसे पहले उनके उद्गम और प्रवाह क्षेत्र पर एक नज़र डालना उपयोगी होगा।

प्रमुख नदियों का संक्षिप्त परिचय: उद्गम और प्रवाह क्षेत्र

इन नदियों का स्वरूप एक जैसा नहीं है। कुछ नदियां पूरे वर्ष बहती हैं, जबकि अधिकांश केवल मानसून के दौरान सक्रिय रहती हैं। नीचे दी गई तालिका उनकी प्रकृति और प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय देती है।

हरियाणा की प्रमुख नदियां: प्रकार और विशेषताएं

यमुना

यमुना हरियाणा की सबसे बड़ी और एकमात्र प्रमुख बारहमासी नदी है। इसका उद्गम उत्तराखंड के यमुनोत्री ग्लेशियर से होता है। यह राज्य की पूर्वी सीमा के साथ बहते हुए यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल जैसे जिलों को प्रभावित करती है। 

सिंचाई, पेयजल और पश्चिमी यमुना नहर प्रणाली के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण नदी मानी जाती है। राज्य की जलापूर्ति और सिंचाई का बड़ा हिस्सा इस नदी पर निर्भर होने के कारण इसके प्रवाह में होने वाला कोई भी बदलाव व्यापक असर डाल सकता है।

घग्गर

घग्गर हरियाणा की सबसे बड़ी मौसमी नदी है। इसका उद्गम हिमाचल प्रदेश की शिवालिक पहाड़ियों में होता है। यह पंचकूला, अंबाला, कैथल, फतेहाबाद और सिरसा से होकर बहती है। मानसून के दौरान इसमें तेज़ जल प्रवाह आता है, जबकि शुष्क मौसम में इसका अधिकांश भाग सूखा रहता है। 

उत्तर-पश्चिम हरियाणा के जल निकासी तंत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। चूंकि इसका प्रवाह पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है, इसलिए मानसून में बदलाव का प्रभाव सबसे पहले इसी नदी तंत्र में दिखाई देता है। मारकंडा, टांगरी, कौशल्या और सरसूती जैसी कई मौसमी नदियां घग्गर नदी तंत्र का हिस्सा हैं।

मारकंडा

मारकंडा नदी हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले से निकलती है और अंबाला तथा कुरुक्षेत्र से होकर बहती है। यह घग्गर नदी तंत्र की प्रमुख सहायक नदी है। वर्षा के मौसम में इसमें अचानक जलस्तर बढ़ने से आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ और कटाव की स्थिति बन सकती है।

टांगरी

टांगरी, जिसे कुछ स्थानों पर डांगरी भी कहा जाता है, शिवालिक क्षेत्र से निकलने वाली मौसमी नदी है। यह पंचकूला और अंबाला के मैदानों से होकर बहती है तथा घग्गर नदी तंत्र में शामिल होती है। वर्षा जल की निकासी और भूजल रिचार्ज में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

सोम

सोम नदी शिवालिक क्षेत्र से निकलकर यमुनानगर के पास हरियाणा में प्रवेश करती है। यह यमुना की सहायक नदी है और मानसून के दौरान स्थानीय जल प्रवाह तथा भूजल रिचार्ज में योगदान देती है।

कौशल्या

कौशल्या नदी पंचकूला जिले की मोरनी पहाड़ियों से निकलती है। यह घग्गर नदी तंत्र का हिस्सा है और इसी पर कौशल्या बाँध स्थित है। यह नदी स्थानीय जलापूर्ति, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण में भी उपयोगी मानी जाती है।

सरसूती

सरसूती एक मौसमी नदी है, जिसे कई ऐतिहासिक और पौराणिक परंपराओं में प्राचीन सरस्वती नदी से जोड़ा जाता है। यह यमुनानगर और कुरुक्षेत्र क्षेत्र से होकर बहती है। इसके प्राचीन प्रवाह मार्ग को लेकर आज भी शोध जारी हैं।

चौटांग

चौटांग हरियाणा की ऐतिहासिक नदी धाराओं में से एक है। वर्तमान में इसका अधिकांश भाग मौसमी है और यह जींद तथा हिसार क्षेत्र के जल निकासी तंत्र का हिस्सा है। कई शोध इसे प्राचीन नदी मार्गों से भी जोड़ते हैं। वर्तमान में इसका अधिकांश हिस्सा मौसमी या शुष्क नदी मार्ग के रूप में दिखाई देता है।

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साहिबी

साहिबी नदी राजस्थान की अरावली पर्वतमाला से निकलती है और रेवाड़ी, गुरुग्राम तथा झज्जर से होकर बहती है। शहरीकरण, अतिक्रमण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण इसके प्राकृतिक प्रवाह पर दबाव बढ़ा है। यह दक्षिण हरियाणा के जलग्रहण क्षेत्र की महत्वपूर्ण नदी है। शहरी विस्तार और भूमि उपयोग में बदलाव से इस नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है। इससे जल निकासी और भूजल रिचार्ज दोनों पर असर पड़ा है।

दोहान

दोहान नदी अरावली क्षेत्र से निकलने वाली मौसमी नदी है। यह मुख्यतः महेंद्रगढ़ जिले में बहती है और साहिबी नदी तंत्र की सहायक मानी जाती है। वर्षा जल के प्रवाह और भूजल रिचार्ज में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।

कृष्णावती

कृष्णावती नदी का उद्गम भी राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में होता है। यह महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी क्षेत्रों से होकर बहती है। वर्तमान में इसका अधिकांश प्रवाह मानसून तक सीमित है, लेकिन दक्षिण हरियाणा के नदी तंत्र और जल निकासी में इसका योगदान बना हुआ है।

एक नज़र में: हरियाणा की नदी प्रणाली

हरियाणा का नदी तंत्र बारहमासी और मौसमी दोनों तरह की नदियों से मिलकर बना है। नीचे दी गई तालिका राज्य की प्रमुख नदियों और नदी तंत्र की मुख्य विशेषताओं को संक्षेप में प्रस्तुत करती है।

हरियाणा की नदियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

हरियाणा का नदी तंत्र पहले से ही सीमित जल प्रवाह पर निर्भर है। राज्य की अधिकांश नदियां मौसमी हैं और उनका बहाव मानसून पर टिका है। ऐसे में तेज़ शहरीकरण, भूजल का अत्यधिक दोहन, नदी तटों पर बढ़ते अतिक्रमण और बदलते वर्षा पैटर्न ने इन नदियों पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। इसका असर केवल नदियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिंचाई, भूजल, पेयजल और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी दिखाई देता है।

यमुना में घटता प्राकृतिक प्रवाह

हरियाणा की एकमात्र प्रमुख बारहमासी नदी यमुना है, लेकिन इसका प्राकृतिक प्रवाह भी लगातार दबाव में है। हथिनीकुंड बैराज से यमुना का जल पश्चिमी यमुना नहर और पूर्वी यमुना नहर प्रणाली में छोड़ा जाता है। 

इन नहरों के माध्यम से हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में सिंचाई तथा पेयजल की जरूरतें पूरी की जाती हैं। इसके कारण गर्मियों में हरियाणा से होकर बहने वाले कई हिस्सों में नदी का प्राकृतिक बहाव काफी कम हो जाता है। कम प्रवाह होने से नदी की स्वयं को साफ़ रखने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

मौसमी नदियों का सिकुड़ता जलग्रहण क्षेत्र

घग्गर, मारकंडा, टांगरी, सरसूती, साहिबी, दोहान और कृष्णावती जैसी अधिकांश नदियां वर्षा पर निर्भर हैं। शिवालिक और अरावली क्षेत्रों में भूमि उपयोग में बदलाव, निर्माण गतिविधियों और अतिक्रमण के कारण वर्षा का पानी तेजी से बह जाता है। इससे इन नदियों में पानी कम समय तक टिकता है और भूजल रिचार्ज भी घटता है। कई स्थानों पर इनका स्वरूप बरसाती नालों जैसा हो गया है।

भूजल और नदियों का कमजोर होता संबंध

हरियाणा देश के उन राज्यों में है जहां सिंचाई का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के नवीनतम आकलन के अनुसार हरियाणा के कई आकलन ब्लॉक 'अतिदोहित (Over-exploited)' श्रेणी में हैं, जो राज्य में भूजल पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है। 

जब नदियों में प्रवाह घटता है तो सिंचाई के लिए भूजल का दोहन बढ़ जाता है। दूसरी ओर भूजल स्तर गिरने से नदियों को मिलने वाला आधार प्रवाह भी कम हो जाता है। इस कारण नदी और भूजल दोनों पर एक साथ दबाव बढ़ता है।

एनसीआर और औद्योगिक क्षेत्रों का बढ़ता दबाव

हरियाणा की कई नदियां तेजी से शहरी होते क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के इलाकों में शहरी विस्तार ने साहिबी नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र को प्रभावित किया है। वहीं CPCB के अनुसार यमुना के कई हिस्सों में अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट जल के कारण जल गुणवत्ता प्रभावित होती है। 

केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियां समय-समय पर इसकी निगरानी करती हैं। नदी तटों पर अतिक्रमण और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों में बदलाव से बाढ़ का जोखिम भी बढ़ता है।

बदलता वर्षा पैटर्न और बाढ़ का खतरा

हाल के वर्षों में कम समय में अधिक वर्षा (अत्यधिक वर्षा की घटनाएं) देखने को मिली हैं। इसका असर विशेष रूप से घग्गर, मारकंडा और टांगरी जैसी नदियों में दिखाई देता है, जहां अचानक बाढ़ की स्थिति बन जाती है। दूसरी ओर लंबे शुष्क मौसम में यही नदियां लगभग सूखी रहती हैं। वर्षा का यह असंतुलित स्वरूप कृषि, ग्रामीण बुनियादी ढाँचे और जल प्रबंधन के लिए नई चुनौती बन रहा है।

संरक्षण के प्रयास और आगे की जरूरत

राज्य में नदी संरक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में राज्य सरकार ने नदी संरक्षण और भूजल प्रबंधन से जुड़े कई कदम उठाए हैं। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) ने Water Resources Atlas तैयार किया है। जबकि वर्षा जल संचयन, भूजल रिचार्ज और यमुना की जल गुणवत्ता सुधारने से जुड़ी योजनाएँ भी चल रही हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। इनके प्रभावी क्रियान्वयन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

आगे की राह

हरियाणा की नदियां राज्य की जल सुरक्षा, कृषि और भूजल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश नदियां मौसमी हैं और बढ़ते शहरीकरण, भूजल दोहन तथा बदलते वर्षा पैटर्न का दबाव झेल रही हैं। ऐसे में केवल नदी तटों का संरक्षण पर्याप्त नहीं होगा।

राज्य में नदी संरक्षण को भूजल प्रबंधन और जलग्रहण क्षेत्र के विकास के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। शिवालिक और अरावली क्षेत्रों में वर्षा जल को रोकने, नदी तटों को अतिक्रमण से बचाने और शहरी अपशिष्ट जल के बेहतर प्रबंधन जैसे कदम नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

हरियाणा की जल सुरक्षा के लिए नदियों और भूजल को साथ लेकर योजना बनानी होगी। नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना, जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण करना और भूजल रिचार्ज बढ़ाना जरूरी है। इससे राज्य का नदी तंत्र अधिक टिकाऊ बन सकता है और भविष्य की जल चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।

नोट: इस लेख में दी गई सभी तालिकाएं हरियाणा जल संसाधन एटलस 2025 तथा India-WRIS में उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई हैं।

स्रोत

मुख्य स्रोत

  • Haryana Water Resources Atlas 2025

  • India-WRIS

जल गुणवत्ता एवं भूजल

  • CGWB

  • CPCB

अन्य संदर्भ

  • IMD

  • Upper Yamuna River Board

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