मामल्लन जलाशय: चेन्नई की जल सुरक्षा और प्राकृतिक आर्द्रभूमि के बीच क्या सवाल हैं?

मामल्लन जलाशय: चेन्नई की जल सुरक्षा और प्राकृतिक आर्द्रभूमि के बीच क्या सवाल हैं?

फोटो: सिरुदावूर झील, तमिलनाडु | टिमोथी ए. गोंसाल्वेस / विकिमीडिया कॉमन्स | सीसी बाय-एसए 4.0

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Summary
  • मामल्लन जलाशय को चेन्नई और उसके दक्षिणी इलाकों की बढ़ती पेयजल जरूरत पूरी करने के लिए बनाया जा रहा है।

  • तमिलनाडु के आधिकारिक रिकॉर्ड में परियोजना स्थल को प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र बताया गया है।

  • परियोजना क्षेत्र में दलदली जमीन, नमक के मैदान और खारे पानी से प्रभावित हिस्से मौजूद हैं।

  • परियोजना से चेन्नई को करीब 170 मिलियन लीटर प्रतिदिन अतिरिक्त पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।

चेन्नई के दक्षिण में नया मामल्लन जलाशय बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य मानसून के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त पानी को जमा करना और चेन्नई महानगरीय क्षेत्र की बढ़ती पेयजल जरूरत में उसका इस्तेमाल करना है।

तमिलनाडु सरकार ने 2025-26 के बजट में कोवलम उप-बेसिन में नया जलाशय बनाने की घोषणा की थी। सरकार के अनुसार इससे चेन्नई को हर साल करीब 170 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा। लेकिन मामल्लन का मामला केवल एक नया जलाशय बनाने तक सीमित नहीं है।

जिस जगह यह बनाया जा रहा है, वह पहले से एक प्राकृतिक तटीय जल व्यवस्था का हिस्सा है। यहां दलदली जमीन, नमक के मैदान, उथला पानी और समुद्र से प्रभावित क्षेत्र मौजूद हैं। बारिश के समय आसपास का पानी भी इसी क्षेत्र की ओर आता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नया जलाशय कितना पानी जमा करेगा। यह समझना भी जरूरी है कि जिस प्राकृतिक जल क्षेत्र में यह बनाया जा रहा है, वहां अभी पानी कैसे आता-जाता है और बारिश व बाढ़ के समय यह इलाका किस तरह काम करता है।

क्या है मामल्लन जलाशय परियोजना?

मामल्लन जलाशय चेंगलपट्टू जिले में ईस्ट कोस्ट रोड और ओल्ड महाबलीपुरम रोड के बीच कोवलम उप-बेसिन में बनाया जा रहा है। तमिलनाडु राज्य तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण (TNSCZMA) के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार परियोजना करीब 4,375 एकड़ क्षेत्र में फैली है। प्रस्तावित जलाशय में लगभग 1.655 टीएमसी पानी रखा जा सकेगा। इसके चारों ओर करीब 30 किलोमीटर लंबा तटबंध बनाने की योजना है।

दस्तावेज के अनुसार जलाशय का जलग्रहण क्षेत्र करीब 41,408 हेक्टेयर है। इस पूरे क्षेत्र में 69 ऊपरी तालाब और जलाशय भी शामिल हैं। यानी मामल्लन जलाशय को आसपास की मौजूदा जल व्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

यह पहले से मौजूद तालाबों, नालों और पानी के बहाव के रास्तों से जुड़ी एक बड़ी जल व्यवस्था का हिस्सा होगा। इसीलिए इस परियोजना को केवल जलाशय की सीमा तक देखकर नहीं समझा जा सकता।

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जिस जमीन पर जलाशय बनेगा, वहां अभी क्या है?

TNSCZMA के रिकॉर्ड में प्रस्तावित जगह को प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र (natural floodplain) बताया गया है जो कि महत्वपूर्ण है। बाढ़ क्षेत्र वह जगह होती है जहां अधिक बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी फैल सकता है। पानी यहां कुछ समय तक रुकता है और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। तटीय इलाकों में ऐसे क्षेत्रों का संबंध समुद्र की ओर जाने वाली जल निकासी से भी हो सकता है।

सरकारी रिकॉर्ड में इस इलाके की जमीन को कझुवेली, उप्पलम और उप्पनगझी जैसी अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया गया है। इनमें दलदली जमीन, नमक से प्रभावित हिस्से और खारे या ज्वारीय पानी वाले क्षेत्र शामिल हैं। यानी यह जमीन पूरी तरह सूखी या पानी से अलग कोई खाली जगह नहीं है।

तटीय आर्द्रभूमि की जल व्यवस्था कैसे काम करती है?

तटीय आर्द्रभूमि में पानी एक जैसा नहीं रहता। बरसात में मीठे पानी की मात्रा बढ़ सकती है। समुद्र के ज्वार का असर दूसरे समय अधिक हो सकता है। कुछ हिस्सों में बहुत उथला पानी रहता है और कुछ हिस्से मौसमी रूप से सूख जाते हैं। इस तरह मीठे और खारे पानी के बीच लगातार बदलाव होता रहता है।

इसी कारण आर्द्रभूमि के अलग-अलग हिस्सों की प्रकृति भी अलग होती है। कहीं कीचड़ वाली उथली जमीन होती है, कहीं दलदली क्षेत्र, कहीं नमक से प्रभावित जमीन और कहीं खुला पानी। इन्हीं अलग-अलग हिस्सों में पक्षियों, मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को भोजन और रहने की जगह मिलती है।

जलाशय बनने पर क्या बदल सकता है?

किसी प्राकृतिक आर्द्रभूमि और मानव निर्मित जलाशय की जल व्यवस्था एक जैसी नहीं होती। जलाशय का मुख्य उद्देश्य पानी को निश्चित स्तर तक रोकना और जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल करना है। इसके लिए तटबंध बनाए जाते हैं और पानी के आने-जाने तथा उसके स्तर को नियंत्रित किया जाता है।

दूसरी ओर प्राकृतिक आर्द्रभूमि में पानी का स्तर मौसम और स्थान के अनुसार बदलता रहता है। इसलिए किसी तटीय आर्द्रभूमि को मीठे पानी के जलाशय में बदलने से वहां की मौजूदा जल व्यवस्था बदल सकती है। पानी की गहराई, खारापन और उसके आने-जाने के तरीके में बदलाव का असर आसपास की पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है।

आधिकारिक समिति ने किन बातों पर अध्ययन मांगा?

TNSCZMA की तकनीकी विशेषज्ञ समिति ने परियोजना के लिए कई अतिरिक्त अध्ययन जरूरी बताए हैं। इनमें पानी के बहाव, बाढ़ के असर, पानी के खारेपन, भूजल, जैव विविधता और नदी के मुहाने से जुड़े तटीय क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का अध्ययन शामिल है।

समुद्र के पास स्थित किसी जल तंत्र में ऊपर रोका गया पानी नीचे के हिस्सों को भी प्रभावित कर सकता है। इसका असर नदी के मुहाने और आसपास के तटीय क्षेत्र तक पहुंच सकता है।

समिति ने यह भी कहा कि यह साफ होना चाहिए कि जलाशय में कितना पानी आएगा, कितना निकाला जाएगा और बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी किस रास्ते से आगे जाएगा। यह इसलिए अहम है क्योंकि जलाशय में ऊपर का पानी रोकने से नीचे की ओर जाने वाले प्राकृतिक प्रवाह में भी बदलाव हो सकता है।

समिति ने यह भी कहा है कि जलाशय में पानी रोकने के बाद नीचे की ओर जाने वाला प्राकृतिक प्रवाह पूरी तरह बाधित नहीं होना चाहिए। नदी के मुहाने और तटीय क्षेत्र तक जरूरी मात्रा में पानी पहुंचता रहे, इसका ध्यान भी योजना में रखना होगा।

समुद्र के पास स्थित किसी जल तंत्र में ऊपर रोका गया पानी नीचे के हिस्सों को भी प्रभावित कर सकता है। इसका असर नदी के मुहाने और आसपास के तटीय क्षेत्र तक पहुंच सकता है।

खारे पानी से मीठे पानी की ओर बदलाव

मामल्लन परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस क्षेत्र में अभी कई जगह खारा या हल्का खारा पानी मौजूद है, वहां भविष्य में मुख्य रूप से मीठा पानी जमा किया जाएगा।

यह बदलाव केवल ऊपर दिखाई देने वाले पानी तक सीमित नहीं रहेगा। खारे या हल्के खारे क्षेत्र में बड़ी मात्रा में मीठा पानी जमा होने से मिट्टी और भूजल की स्थिति भी बदल सकती है। इसलिए विशेषज्ञ समिति ने पानी के खारेपन और भूजल की अलग निगरानी और अध्ययन की जरूरत बताई है।

 यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समुद्र के नजदीक भूजल में खारे पानी का प्रवेश एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसलिए यह देखना जरूरी होगा कि मीठा पानी जमा होने के बाद आसपास की मिट्टी, भूजल और तटीय जल व्यवस्था में क्या बदलाव आते हैं।

3,500 जलपक्षियों का सर्वे क्या बताता है?

पल्लुयिर ट्रस्ट फॉर नेचर एजुकेशन एंड रिसर्च ने 29 सितंबर 2026 को इस इलाके में एक सर्वे किया। मीडिया में प्रकाशित ट्रस्ट के सर्वे के विवरण के अनुसार, इसमें मामल्लन जलाशय परियोजना क्षेत्र में करीब 3,500 जलपक्षी और 51 प्रजातियां दर्ज की गईं।

जलपक्षियों की मौजूदगी से यह समझने में मदद मिलती है कि आर्द्रभूमि के अलग-अलग हिस्से किस तरह काम कर रहे हैं। कुछ पक्षियों को बहुत उथला पानी चाहिए। कुछ कीचड़ वाले खुले हिस्सों में भोजन तलाशते हैं। कुछ नमक से प्रभावित जमीन और दलदली क्षेत्रों का इस्तेमाल करते हैं।

आर्द्रभूमि केवल जमीन के एक हिस्से का नाम नहीं है। वहां पानी कब आता है, कितनी देर रहता है, कितना खारा है और आसपास के जल क्षेत्रों से कैसे जुड़ा है, इन सब से उसकी प्रकृति तय होती है।

अगर पानी की गहराई या खारापन बदलता है तो उनके भोजन और आवास पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए यहां पक्षियों की स्थिति को आर्द्रभूमि की जल व्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

यहां जरूरी होगा कि जलाशय बनने से पहले और बाद में पक्षियों के साथ मछलियों, पानी की तलहटी में रहने वाले छोटे जीवों, वनस्पतियों और दूसरे जलीय जीवों की नियमित निगरानी की जाए।

कृत्रिम आवास क्या प्राकृतिक आवास की जगह ले सकता है?

परियोजना में पक्षियों और दूसरे जीवों के लिए कृत्रिम द्वीप और उथले पानी वाले क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव है। ऐसे उपाय कुछ नुकसान कम कर सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक कीचड़ वाले क्षेत्र, नमक से प्रभावित जमीन या दलदली हिस्से को केवल दूसरी जगह उथला पानी बनाकर पूरी तरह दोहराना आसान नहीं होता।

आर्द्रभूमि केवल जमीन के एक हिस्से का नाम नहीं है। वहां पानी कब आता है, कितनी देर रहता है, कितना खारा है और आसपास के जल क्षेत्रों से कैसे जुड़ा है, इन सब से उसकी प्रकृति तय होती है। इसीलिए परियोजना शुरू होने से पहले वहां के पानी, मिट्टी, पक्षियों, मछलियों, वनस्पतियों और दूसरे जीवों की मौजूदा स्थिति का ठीक से अध्ययन करना जरूरी है।

आर्द्रभूमि केवल पक्षियों के लिए नहीं

आर्द्रभूमियों को अक्सर केवल पक्षियों और जैव विविधता से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन उनकी भूमिका इससे कहीं बड़ी है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 से जुड़ी गाइडलाइन कहती है कि किसी आर्द्रभूमि को केवल पानी भरी जगह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसके आसपास की जमीन, जीव-जंतु, वनस्पतियां और पानी आने-जाने के रास्ते भी उसका हिस्सा हैं।

आर्द्रभूमियां पानी को कुछ समय के लिए रोकने, अतिरिक्त पानी को फैलने की जगह देने और कई तरह के जीव-जंतुओं तथा पौधों को सहारा देने का काम करती हैं। इसलिए किसी आर्द्रभूमि की अहमियत केवल उसमें मौजूद पानी या उसके क्षेत्रफल से तय नहीं की जा सकती।

शहर की जल सुरक्षा का मतलब क्या है?

चेन्नई को अतिरिक्त पानी की जरूरत है। तेजी से बढ़ती आबादी और शहर के फैलाव के साथ नई जल आपूर्ति व्यवस्था जरूरी होगी। मामल्लन इसी जरूरत का एक जवाब है। लेकिन किसी शहर की जल सुरक्षा केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसके पास कितने जलाशय हैं या वह कितना पानी जमा कर सकता है।

यह भी देखना जरूरी है कि उसके आसपास मौजूद झीलें, आर्द्रभूमियां, बाढ़ क्षेत्र, नाले और तटीय जलमार्ग किस हालत में हैं। इन प्राकृतिक जल क्षेत्रों की अपनी भूमिका होती है। ऐसे क्षेत्र कई जगह अतिरिक्त पानी को फैलने की जगह देते हैं और पानी के तेज बहाव को कम करने में मदद कर सकते हैं।

कई जगह इनका संबंध भूजल, आसपास के तालाब-नालों और वहां रहने वाले जीवों से भी होता है। इसलिए किसी प्राकृतिक जल क्षेत्र को बदलकर नया जल ढांचा बनाने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह जगह अभी किस तरह काम कर रही है।

मामल्लन से क्या सवाल उठता है?

मामल्लन जलाशय चेन्नई को अतिरिक्त पेयजल दे सकता है। यह शहर की बढ़ती जरूरत को देखते हुए महत्वपूर्ण परियोजना है। लेकिन जिस जगह यह जलाशय बनाया जा रहा है, वह पहले से एक प्राकृतिक बाढ़ और तटीय जल क्षेत्र का हिस्सा है।

यही इस परियोजना का मूल सवाल है। नया जलाशय बनाते समय यह देखना जरूरी होगा कि प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र की भूमिका कितनी बनी रहती है, समुद्र और जमीन के बीच पानी का प्रवाह कैसे प्रभावित होता है और आर्द्रभूमि पर निर्भर जीवों के लिए कितनी जगह बचती है।

मामल्लन का मामला एक बात साफ करता है कि शहर के लिए पानी जुटाने की योजना बनाते समय वहां की प्राकृतिक आर्द्रभूमि और जल निकासी को भी साथ में देखना होगा। शहर के लिए नया पानी जुटाना जरूरी है, लेकिन पानी को संभाल रही प्राकृतिक जगहों को बचाना भी उसी जल सुरक्षा का हिस्सा है।

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