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400 एमएलडी का मिंजूर प्लांट चेन्नई की जल-सुरक्षा के लिए बड़ा कदम है।
RO से समुद्र का पानी मीठा होगा, लेकिन इसकी कीमत ऊर्जा के रूप में भी चुकानी होगी।
ब्राइन और समुद्री पानी खींचने का असर डेसिलेशन की बड़ी पर्यावरणीय चुनौती है।
समुद्र के साथ बारिश, भूजल और पुन: उपयोग, तटीय शहरों को जल-सुरक्षा के लिए सभी विकल्प साथ रखने होंगे।
समुद्र के किनारे बसे शहरों के लिए पानी की कमी एक बढ़ती चुनौती है। बारिश और भूजल पर निर्भरता के बीच समुद्र एक ऐसे जलस्रोत के रूप में सामने आ रहा है, जो मौसम पर कम निर्भर है। तमिलनाडु सरकार ने 2 सितंबर 2026 को मिंजूर में 400 एमएलडी यानी रोज 40 करोड़ लीटर क्षमता वाले नए डेसिलेशन संयंत्र की घोषणा की। परियोजना की अनुमानित लागत 4,800 करोड़ रुपये है और इससे उत्तर चेन्नई, अवाडी, पोन्नेरी और मिंजूर की पानी की जरूरत पूरी करने की योजना है।
डेसिलेशन में समुद्री पानी से नमक और दूसरे घुले पदार्थ हटाकर उसे उपयोग योग्य बनाया जाता है। चेन्नई में डेसिलेशन कोई नई व्यवस्था नहीं है। शहर में समुद्री पानी से पेयजल तैयार करने वाले संयंत्र पहले से काम कर रहे हैं और प्रस्तावित 400 एमएलडी परियोजना इसी व्यवस्था को विस्तार देगी। चेन्नई के मिंजूर में 100 एमएलडी क्षमता वाला समुद्री पानी डेसिलेशन संयंत्र पहले से मौजूद है। इस संयंत्र में समुद्री पानी से नमक अलग करने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन समुद्र से पानी लेना सिर्फ तकनीक का सवाल नहीं है। इस पानी की कीमत कितनी होगी, इसे बनाने में कितनी ऊर्जा लगेगी और प्रक्रिया के बाद निकलने वाले अत्यधिक खारे पानी (brine) का समुद्री पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा? संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने भी डिसेलिनेशन से जुड़े प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों में brine discharge और समुद्री पानी के इंटेक को शामिल किया है।
इसलिए मिंजूर की परियोजना को सिर्फ चेन्नई की एक नई जल परियोजना के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इससे यह सवाल भी जुड़ता है कि भारत के तटीय शहरों के लिए डेसिलेशन कितना व्यावहारिक, किफायती और पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ विकल्प है। इसकी शुरुआत यह समझने से होती है कि समुद्र का खारा पानी आखिर पीने योग्य पानी में बदलता कैसे है।
समुद्र के पानी को पीने लायक़ बनाने की विधि
समुद्र का पानी देखने में पानी ही है, लेकिन उसमें घुले नमक और दूसरे खनिजों के कारण वह सीधे पीने या रोज़मर्रा के इस्तेमाल लायक नहीं होता। समुद्री पानी से इन घुले पदार्थों को अलग करके उसे मीठा पानी बनाने की प्रक्रिया को डेसिलेशन कहते हैं। चेन्नई के मिंजूर संयंत्र में इसके लिए Reverse Osmosis (RO) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
RO को सरल तरीके से समझें तो समुद्री पानी को बहुत अधिक दबाव के साथ एक बेहद महीन झिल्ली से गुजारा जाता है। यह झिल्ली पानी के अणुओं को तो आगे निकलने देती है, लेकिन नमक और दूसरे घुले पदार्थों को रोकती है। इस प्रक्रिया से एक तरफ कम नमक वाला पानी मिलता है और दूसरी तरफ अधिक नमक वाला पानी बचता है, जिसे ब्राइन कहा जाता है।
लेकिन समुद्र से पानी खींचकर सीधे RO की झिल्ली में डाल देना इतना आसान नहीं है। सबसे पहले समुद्री पानी को प्रारंभिक उपचार से गुजारा जाता है। इसमें पानी से रेत, गाद, शैवाल, सूक्ष्म जीव और दूसरे कण हटाए जाते हैं, ताकि वे RO की झिल्ली को नुकसान न पहुंचाएं या उसकी क्षमता कम न करें। इसके बाद पानी को उच्च दबाव पर झिल्ली से गुजारा जाता है। RO के बाद मिले पानी का भी उपचार किया जाता है, ताकि उसकी गुणवत्ता पीने योग्य पानी के मानकों के अनुरूप हो सके।
यहां एक अहम बात समझने वाली है कि समुद्र का सारा पानी मीठे पानी में नहीं बदलता। RO के बाद एक हिस्सा कम नमक वाला पानी बनता है, जबकि दूसरा हिस्सा अधिक खारे पानी के रूप में बचता है। यही brine आगे डेसिलेशन की पर्यावरणीय बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है।
दूसरी बड़ी चुनौती ऊर्जा की है। समुद्री पानी में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण उसे झिल्ली से गुजारने के लिए काफी दबाव पैदा करना पड़ता है। इसलिए RO आधारित डेसिलेशन में बिजली की खपत और उसकी लागत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए सिर्फ समुद्र का पानी उपलब्ध होना डेसिलेशन को सस्ता जलस्रोत नहीं बना देता।
फिर भी RO तकनीक की एक बड़ी खूबी यह है कि पिछले कुछ दशकों में इसकी दक्षता बढ़ी है और ऊर्जा पुनर्प्राप्ति जैसी व्यवस्थाएं विकसित हुई हैं। इनमें पानी के दबाव में मौजूद कुछ ऊर्जा को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, जिससे बिजली की जरूरत कम की जा सकती है।
इस तरह एक डेसिलेशन प्लांट असल में सिर्फ पानी साफ करने वाली मशीन नहीं है। यह समुद्र से पानी लेने, उसे कई चरणों में उपचारित करने, उच्च दबाव पर झिल्ली से गुजारने, तैयार पानी को फिर से उपचारित करने और बचे हुए खारे पानी को संभालने वाली पूरी व्यवस्था है।
और यहीं से अगला सवाल उठता है कि इस पानी की लागत कितनी पड़ती है? और क्या तटीय शहर लंबे समय तक इतना महंगा पानी खरीद सकते हैं?
समुद्र में पानी की मात्रा बहुत ज़्यादा है, लेकिन उसे पीने लायक़ बनाने की प्रक्रिया सस्ती नहीं है। डेसिलेशन प्लांट बनाने, समुद्र से पानी लेने, उसे साफ करने, RO के जरिए नमक हटाने और फिर शहर तक पहुंचाने में हर चरण पर खर्च होता है। इसलिए किसी प्लांट की लागत समझने के लिए सिर्फ उसके निर्माण पर खर्च हुई रकम देखना पर्याप्त नहीं है।
लेकिन महंगा कितना महंगा है: डेसिलेशन की लागत संयंत्र की तकनीक, क्षमता, बिजली की कीमत, समुद्री पानी की गुणवत्ता और तैयार पानी को शहर तक पहुंचाने की दूरी पर निर्भर करती है। इसलिए अलग-अलग संयंत्रों की प्रति लीटर लागत एक जैसी नहीं होती। मिंजूर की नई परियोजना की 4,800 करोड़ रुपये की अनुमानित निर्माण लागत को सीधे पानी की प्रति लीटर लागत नहीं माना जा सकता।
इस लागत में बिजली की भूमिका खास है। RO प्रक्रिया में समुद्री पानी को बहुत दबाव से मेम्ब्रेन से गुजारना पड़ता है, जिसके लिए ऊर्जा चाहिए। इसके अलावा मेम्ब्रेन और दूसरे उपकरणों की देखभाल, रसायन, कर्मचारियों का खर्च और पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचाने की लागत भी जुड़ती है।
चेन्नई के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शहर ने डेसिलेशन को अपने जलस्रोतों में शामिल कर लिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समुद्र का पानी दूसरे स्रोतों की जगह पूरी तरह ले सकता है। एक शहर को यह देखना पड़ता है कि डेसिलेशन से मिलने वाले अतिरिक्त पानी की कीमत उसके दूसरे विकल्पों की तुलना में कितनी है।
यहीं पानी की उत्पादन लागत और उपभोक्ता से ली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी संयंत्र में पानी तैयार करने की वास्तविक लागत और घरों तक पानी पहुंचने के बाद उपभोक्ता से लिया जाने वाला शुल्क एक जैसा होना जरूरी नहीं है। इसका अर्थ है कि महंगे डेसिलेशन वाले पानी को शहर की जलापूर्ति में शामिल करने पर सरकार या स्थानीय निकाय को उसकी लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाना पड़ सकता है।
इसलिए डेसिलेशन को लेकर सवाल सिर्फ पानी की महंगाई का नहीं है, बल्कि यह भी है कि इस पानी की कीमत के बदले शहर को क्या मिल रहा है। अगर किसी शहर को ऐसा जलस्रोत मिल जाता है जो बारिश कम होने पर भी चलता रहे, तो उसकी अधिक लागत को जल-सुरक्षा की कीमत के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन इस गणित का एक और हिस्सा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इतनी मात्रा में पानी बनाने के लिए कितनी ऊर्जा चाहिए? यही हमें डेसिलेशन की अगली बड़ी चुनौती तक ले जाता है।
पानी बनाने में कितनी ऊर्जा लगती है?
समुद्र का पानी उपलब्ध होने के बावजूद उसे मीठा पानी बनाने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। इसकी सबसे बड़ी वजह RO प्रक्रिया है, जिसमें समुद्री पानी को बहुत अधिक दबाव के साथ झिल्ली से गुजारना पड़ता है। आधुनिक समुद्री पानी आधारित रिवर्स ऑस्मोसिस संयंत्रों में ऊर्जा की खपत पहले की तुलना में काफी कम हुई है, लेकिन फिर भी पानी को झिल्ली से गुजारने के लिए पर्याप्त बिजली की जरूरत होती है। यह खपत संयंत्र की तकनीक और उसकी दक्षता के अनुसार बदलती है।
यहां ऊर्जा पुनर्प्राप्ति (energy recovery) महत्वपूर्ण हो जाती है। RO से निकलने वाला खारा पानी भी दबाव में होता है। आधुनिक संयंत्र इस दबाव में मौजूद ऊर्जा के एक हिस्से को वापस लेकर दोबारा इस्तेमाल करते हैं। इससे बिजली की खपत पुराने RO संयंत्रों की तुलना में काफी कम की जा सकती है।
लेकिन किसी शहर के लिए असली ऊर्जा-खर्च केवल संयंत्र के अंदर पानी बनाने तक सीमित नहीं होता। समुद्र से पानी खींचना, उसका शुरुआती उपचार करना और फिर तैयार पानी को शहर तक पहुंचाना भी ऊर्जा मांगता है। इसलिए तटीय शहर में डेसिलेशन की योजना बनाते समय यह देखना जरूरी है कि पानी कहां से लिया जाएगा और कितनी दूर तक पहुंचाना पड़ेगा।
इसका सीधा संबंध पर्यावरण से भी है। अगर डेसिलेशन के लिए बिजली जीवाश्म ईंधन से आती है, तो ज्यादा पानी बनाने का मतलब अप्रत्यक्ष रूप से अधिक ऊर्जा इस्तेमाल और अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी हो सकता है। इसके उलट, अक्षय ऊर्जा के साथ डेसिलेशन जोड़ने से इस प्रभाव को कम किया जा सकता है।
यानी समुद्र से पानी लेने की चुनौती सिर्फ यह नहीं कि क्या हम नमक निकाल सकते हैं? बल्कि यह भी है कि कितनी ऊर्जा खर्च करके निकाल सकते हैं? और इसके बाद एक और बड़ा सवाल सामने आता है कि RO में नमक अलग करने के बाद बचने वाले बेहद खारे पानी यानी ब्राईन का क्या किया जाए?
समुद्री पानी से नमक अलग करने के बाद उसका एक हिस्सा कम नमक वाले पानी में बदलता है, जबकि बाकी पानी अधिक नमक वाले पानी के रूप में बचता है, जिसे ब्राइन कहते हैं। इसे आम तौर पर वापस समुद्र में छोड़ दिया जाता है। समस्या यह है कि इस पानी में सामान्य समुद्री पानी की तुलना में नमक की मात्रा ज्यादा होती है। अगर इसे समुद्र में ठीक तरीके से फैलाए बिना छोड़ा जाए तो आसपास के पानी में नमक की मात्रा बढ़ सकती है।
इसका समुद्री जीवों पर कितना असर होगा, यह हर जगह एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि ब्राइन कितनी मात्रा में निकल रहा है, उसे समुद्र में कहां और किस तरीके से छोड़ा जा रहा है, समुद्र का पानी कितनी तेजी से बहता है और ब्राइन कितनी जल्दी सामान्य समुद्री पानी में मिल जाता है। इसलिए सिर्फ ब्राइन निकलना ही नुकसान की निशानी नहीं है; उसके निपटारे का तरीका और उस जगह की समुद्री परिस्थितियां ज्यादा अहम हैं।
नमक की मात्रा और तापमान बढ़ने से समुद्री पानी में घुली ऑक्सीजन कम हो सकती है, जिससे समुद्री जीवों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
मंज़ूर क़ादिर, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय जल, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य संस्थान
एक दूसरी चिंता समुद्र से पानी खींचने की प्रक्रिया को लेकर है। बड़े संयंत्रों में रोज करोड़ों लीटर समुद्री पानी लिया जाता है। इसके साथ छोटे समुद्री जीव और सूक्ष्म समुद्री जीव भी पानी खींचने वाली व्यवस्था में आ सकते हैं। इसलिए संयंत्र में समुद्र से पानी लेने की जगह और उसका तरीका भी महत्वपूर्ण है। समुद्री पानी खींचने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आसपास के समुद्री जीवों पर उसका असर कम से कम हो।
भारत में यह मुद्दा खास तौर पर उन संयंत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जो घनी आबादी वाले तटीय इलाकों के पास लगाए जा रहे हैं। अगर डेसिलेशन को बड़े पैमाने पर बढ़ाना है तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि संयंत्र कितना पानी बनाएगा, बल्कि यह भी कि समुद्र से कितना पानी लिया जाएगा और वापस कितना खारा पानी छोड़ा जाएगा।
यहीं डेसिलेशन की एक बड़ी चुनौती सामने आती है कि शहर को मीठा पानी देने के लिए समुद्र से पानी लिया जाता है, लेकिन उसी प्रक्रिया में समुद्र में ज्यादा नमक वाला पानी वापस जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि डेसिलेशन अपने आप में पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है।
इसलिए किसी बड़े डेसिलेशन संयंत्र के लिए समुद्र में ब्राइन छोड़ने की जगह, उसका फैलाव और आसपास के समुद्री पानी की गुणवत्ता की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। मिंजूर परियोजना के मामले में यह देखना खास तौर पर जरूरी होगा कि पर्यावरणीय मंजूरी में इसके लिए क्या शर्तें तय की गई हैं।
और यहीं से यह सवाल उठता है कि अगर डेसिलेशन की अपनी लागत, ऊर्जा की जरूरत और पर्यावरणीय चुनौतियां हैं, तो क्या हर तटीय शहर के लिए समुद्र से पानी बनाना सही विकल्प है?
समुद्र के पास होना अपने आप में यह तय नहीं करता कि किसी शहर के लिए डेसिलेशन सबसे अच्छा जलस्रोत होगा। किसी संयंत्र की उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करती है कि शहर को कितने पानी की जरूरत है, दूसरे जलस्रोत कितने भरोसेमंद हैं, पानी कितनी दूर पहुंचाना है और उसे बनाने तथा पहुंचाने की लागत कितनी आती है।
इसलिए डेसिलेशन को पानी की कमी का अकेला समाधान मानने के बजाय अतिरिक्त जलस्रोत के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। मसलन, बारिश अच्छी होने पर जलाशय और भूजल कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबे सूखे या कमजोर मानसून के समय समुद्र से पानी लेने वाला संयंत्र चलता रह सकता है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। अगर शहर की पाइपलाइन में बहुत पानी रास्ते में ही रिस जाता है, भूजल का जरूरत से ज्यादा दोहन जारी रहता है या इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा उपयोग करने की व्यवस्था कमजोर है, तो केवल नए डेसिलेशन संयंत्र जोड़ते जाना समस्या का स्थायी हल नहीं होगा। नया पानी पैदा करने के साथ उपलब्ध पानी की बर्बादी रोकना भी उतना ही जरूरी है।
यही कारण है कि किसी तटीय शहर के लिए डेसिलेशन का फैसला करते समय बारिश का पानी बचाने, भूजल को सुरक्षित रखने, इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करके दोबारा काम में लेने और पाइपलाइन की लीकेज कम करने जैसे विकल्पों को भी साथ देखना जरूरी है।
मिंजूर का नया 400 एमएलडी संयंत्र इसलिए एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है। क्या चेन्नई समुद्र से मिलने वाले पानी को अपनी जल-व्यवस्था का एक मजबूत हिस्सा बना रहा है, या धीरे-धीरे महंगी और ऊर्जा-आधारित जलापूर्ति पर उसकी निर्भरता बढ़ रही है?
अब सवाल है कि चेन्नई के मौजूदा डेसिलेशन संयंत्रों ने शहर की जलापूर्ति में वास्तव में कितनी मदद की है और क्या मिंजूर का मॉडल भारत के दूसरे तटीय शहरों में भी अपनाया जा सकता है?
चेन्नई ने डेसिलेशन को अचानक नहीं अपनाया। शहर में समुद्री पानी से पेयजल बनाने की शुरुआत मिंजूर के 100 एमएलडी संयंत्र से हुई और बाद में नेम्मेली में भी संयंत्र लगाए गए। इस तरह समुद्र का पानी चेन्नई की जलापूर्ति के लिए एक अतिरिक्त स्रोत बनता गया।
इसका महत्व उन वर्षों में ज्यादा दिखाई देता है जब मानसून कमजोर रहता है और शहर के जलाशयों में पानी कम हो जाता है। डेसिलेशन का फायदा यह है कि समुद्र का पानी मौसम पर उतना निर्भर नहीं है जितना बारिश और जलाशयों का पानी। इसलिए इसे जल-सुरक्षा के लिए एक भरोसेमंद अतिरिक्त स्रोत के रूप में देखा जाता है।
लेकिन चेन्नई का अनुभव यह भी बताता है कि डेसिलेशन अकेले शहर की पानी की समस्या हल नहीं करता। संयंत्र बनाने के बाद भी पानी को शहर तक पहुंचाने के लिए पाइपलाइन और वितरण व्यवस्था चाहिए। इसके अलावा संयंत्र को लगातार चलाने के लिए बिजली और रखरखाव पर खर्च करना पड़ता है।
मिंजूर में प्रस्तावित 400 एमएलडी डेसिलेशन संयंत्र से रोज 40 करोड़ लीटर पानी मिलने की उम्मीद है। लेकिन समुद्र से पानी लेना सिर्फ तकनीक का सवाल नहीं है। इसकी कीमत, ऊर्जा की जरूरत और समुद्र में लौटने वाले खारे पानी का पर्यावरणीय असर भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यही वजह है कि दूसरे तटीय शहर चेन्नई के मॉडल को ज्यों का त्यों नहीं अपना सकते। हर शहर की अपनी जल-जरूरत, समुद्र की स्थिति, दूसरे जलस्रोत और आर्थिक क्षमता अलग है। किसी शहर के लिए डेसिलेशन उपयोगी हो सकता है, जबकि दूसरे शहर में बारिश के पानी को बचाना या इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है।
मिंजूर में प्रस्तावित 400 एमएलडी का नया संयंत्र इसी बड़े प्रयोग का अगला चरण है। अगर यह योजना पूरी होती है तो चेन्नई की समुद्र पर आधारित जलापूर्ति क्षमता और बढ़ेगी। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा कि शहर अपनी बढ़ती पानी की मांग का कितना हिस्सा डेसिलेशन से पूरा करना चाहता है और कितना पानी दूसरे जलस्रोतों और पानी के पुन: उपयोग से जुटाया जा सकता है।
यहीं से तुलना जरूरी हो जाती है। अगर समुद्र के पानी को मीठा करने में ऊर्जा और पैसा दोनों लगते हैं, तो क्या बारिश के पानी को बचाना, पाइपलाइन का रिसाव रोकना और इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा उपयोग में लाना ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है? यही अगला सवाल डेसिलेशन की वास्तविक उपयोगिता को समझने में मदद करेगा।
डेसिलेशन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका स्रोत यानी समुद्र खत्म होने वाला नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शहर की पानी की हर जरूरत का जवाब समुद्र से पानी बनाना ही हो। कई मामलों में जो पानी पहले से उपलब्ध है, उसे बचाना और दोबारा इस्तेमाल करना डेसिलेशन के साथ महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है। इससे शहर की नए पानी की जरूरत कम की जा सकती है।
बारिश के पानी को बचाना भी तटीय शहरों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है। छतों, सड़कों और दूसरी सतहों से मिलने वाले बारिश के पानी को जमा करना या जमीन में पहुंचाना भूजल को दोबारा भरने में मदद कर सकता है। इससे शहर की जलापूर्ति में उपलब्ध स्थानीय जलस्रोतों की भूमिका मजबूत हो सकती है।
डेसिलेशन ऊर्जा-गहन प्रक्रिया है और इससे निकलने वाला खारा पानी समुद्री जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए शहर को पानी की मांग घटाने, पानी को दोबारा इस्तेमाल करने और उपलब्ध जलस्रोतों को बेहतर ढंग से संभालने पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए।
ई. नंदकुमार, CEO, International Centre for Clean Water, IIT मद्रास
दूसरा विकल्प है इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करके फिर काम में लेना। घरों और उद्योगों से निकलने वाले पानी को उपचारित करके उसे बागवानी, सफाई, उद्योग या दूसरे गैर-पेय कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पीने योग्य पानी की मांग कम होती है और शहर को हर जरूरत के लिए नया पानी तैयार नहीं करना पड़ता।
तीसरा रास्ता है पाइपलाइन से पानी का रिसाव रोकना। शहरों में उपचारित पानी का कुछ हिस्सा लोगों तक पहुंचने से पहले ही पाइपलाइन से बाहर निकल जाता है। ऐसे में एक ओर नया पानी बनाने के लिए महंगे संयंत्र लगाए जाएं और दूसरी ओर तैयार पानी रास्ते में ही बर्बाद होता रहे, तो जल-सुरक्षा की लागत और बढ़ जाती है।
इसका मतलब यह नहीं कि डेसिलेशन की जरूरत नहीं है। चेन्नई जैसे तटीय शहरों में यह सूखे और कमजोर मानसून के समय एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त स्रोत बन सकता है। लेकिन बेहतर जल-व्यवस्था वह होगी जिसमें समुद्र से नया पानी बनाने के साथ बारिश के पानी को बचाया जाए, भूजल पर दबाव घटाया जाए, इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा काम में लिया जाए और पानी की बर्बादी कम की जाए।
यानी सवाल डेसिलेशन या दूसरे विकल्प का नहीं, बल्कि डेसिलेशन कहां और कितना, और उसके साथ कौन-से दूसरे विकल्प का है।
मिंजूर का प्रस्तावित संयंत्र इसी बहस को आगे ले जाता है। अगर चेन्नई समुद्र से हर दिन करोड़ों लीटर नया पानी हासिल करता है, तो अगला सवाल यही होगा कि क्या यह बढ़ती जल-जरूरत को लंबे समय तक पूरा करने की सबसे टिकाऊ राह है?
तो क्या डेसिलेशन भारत के तटीय शहरों का भविष्य है?
डेसिलेशन भारत के तटीय शहरों के लिए एक उपयोगी विकल्प जरूर हो सकता है, लेकिन इसे पानी की समस्या का अकेला समाधान नहीं माना जा सकता। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि समुद्र का पानी बारिश पर निर्भर नहीं है। सूखे या कमजोर मानसून के दौरान भी संयंत्र चलाया जा सकता है। लेकिन इसके साथ अधिक लागत, बिजली की जरूरत और ब्राइन के निपटारे जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हैं।
इसलिए किसी शहर के लिए डेसिलेशन का फैसला केवल यह देखकर नहीं होना चाहिए कि उसके पास समुद्र है या नहीं। यह भी देखना होगा कि बारिश का पानी कितना बचाया जा सकता है, भूजल की स्थिति क्या है, इस्तेमाल किए गए पानी को कितना दोबारा काम में लाया जा सकता है और पाइपलाइन में पानी की कितनी बर्बादी हो रही है।
मिंजूर में प्रस्तावित 400 एमएलडी संयंत्र इस बहस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसकी सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि संयंत्र रोज कितने करोड़ लीटर पानी बनाता है। यह भी देखना होगा कि उस पानी की पूरी लागत कितनी है, उसे बनाने में कितनी ऊर्जा लगती है और समुद्री पर्यावरण पर उसका असर कितना है।
तटीय शहरों के लिए आगे की राह समुद्र या बारिश में से किसी एक को चुनने की नहीं है। डेसिलेशन जरूरत के समय भरोसेमंद अतिरिक्त पानी दे सकता है, जबकि बारिश के पानी का संरक्षण, भूजल का पुनर्भरण, पानी का पुन: उपयोग और रिसाव रोकना भी साथ चलता रहे। यानी डेसिलेशन भविष्य का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पूरा भविष्य नहीं।
तटीय शहरों के लिए असली चुनौती समुद्र से पानी निकालना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलन बनाना है जिसमें पानी की जरूरत, लागत, ऊर्जा और समुद्री पर्यावरण, चारों का ध्यान रखा जा सके।
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