मारकंडा नदी में प्रदूषण: घरेलू सीवेज की समस्या वर्षों बाद भी क्यों बनी हुई है?

मारकंडा नदी, हरियाणा

मारकंडा नदी, हरियाणा

फोटो: अनूप सादी | 10 अगस्त 2016 | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

Published on: 
7 min read
Summary
  • हिमाचल प्रदेश सरकार ने NGT को सौंपी रिपोर्ट में मारकंडा नदी के प्रदूषण का प्रमुख कारण घरेलू सीवेज को बताया है।

  • हिमाचल प्रदेश से हरियाणा की ओर प्रतिदिन लगभग 1.16 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल बहने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।

  • काला अंब क्षेत्र में सीवर कनेक्शन का काम अधूरा है। एक क्षेत्र में प्रस्तावित 443 घरेलू कनेक्शनों में से केवल 55 दिए गए हैं।

  • दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 की जांच में मारकंडा नदी का BOD निर्धारित मानक से अधिक मिला।

हिमाचल प्रदेश से निकलकर हरियाणा में बहने वाली मारकंडा नदी में वर्षों से गंदा पानी छोड़ा जा रहा है। नदी के प्रदूषण को लेकर कई बार शिकायतें हुईं और मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुंचा। 

अब हिमाचल प्रदेश सरकार ने NGT को सौंपी अपनी ताजा रिपोर्ट में घरेलू सीवेज को प्रदूषण का प्रमुख कारण बताया है। यानी घरों और दूसरे प्रतिष्ठानों से निकलने वाला गंदा पानी नदी की स्थिति बिगाड़ रहा है।

रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश से हरियाणा की ओर बहने वाले अपशिष्ट जल की मात्रा लगभग 1.16 करोड़ लीटर प्रतिदिन बताई गई है। इसमें घरेलू और दूसरे स्रोतों से निकलने वाला पानी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार कई जगह सीवर लाइन का काम अधूरा है। इस कारण गंदे पानी को उपचार संयंत्र तक पहुंचाने में भी परेशानी आ रही है।

मारकंडा में प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कई साल पहले हो चुकी थी। इसके बाद सीवेज उपचार और नालों की निगरानी के लिए योजनाएं भी बनीं। इसके बावजूद समस्या बनी हुई है। ऐसे में सवाल है कि गंदे पानी को नदी में जाने से रोकने का काम अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?

कहां से निकलती है मारकंडा नदी?

मारकंडा नदी हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की शिवालिक पहाड़ियों से निकलती है। इसके उद्गम क्षेत्र को नाहन तहसील के जोगीबन गांव के पास बताया जाता है। हिमाचल प्रदेश में कुछ दूरी तय करने के बाद यह हरियाणा में प्रवेश करती है। आगे अंबाला, कुरुक्षेत्र और कैथल जिलों से बहते हुए घग्गर नदी में मिल जाती है।

हरियाणा विधानसभा में उपलब्ध मारकंडा नदी संबंधी जानकारी के अनुसार नदी में मुख्य रूप से मानसून के दौरान पानी बहता है। बाकी महीनों में इसके कई हिस्सों में पानी का प्रवाह बहुत कम हो जाता है।

मारकंडा का संबंध स्थानीय धार्मिक मान्यताओं से भी है। हरियाणा का शाहाबाद मारकंडा शहर इसी नदी के किनारे बसा है। नदी के आसपास कई गांव और कृषि क्षेत्र भी हैं।

पानी का प्रवाह कम होने पर नदी में मिलने वाले गंदे पानी का असर बढ़ सकता है। ऐसे समय में पानी में प्रदूषकों की सांद्रता बढ़ सकती है। इससे मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

जट्टांवाला नाले से नदी में कैसे पहुंच रहा है गंदा पानी?

हिमाचल प्रदेश और हरियाणा की सीमा के पास काला अंब औद्योगिक क्षेत्र है। यहां कारखानों के साथ कई आवासीय बस्तियां, होटल, ढाबे और दूसरे प्रतिष्ठान भी हैं। इनसे निकलने वाला गंदा पानी स्थानीय नालों में पहुंचता है। इन्हीं में एक जट्टांवाला नाला है, जिसका पानी आगे मारकंडा नदी में मिलता है।

सरकारी दस्तावेज़ों में जट्टांवाला नाले से बहने वाले अपशिष्ट जल की मात्रा लगभग 56 लाख लीटर प्रतिदिन भी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा नाले के एक मापन से संबंधित है, जबकि 1.16 करोड़ लीटर का आंकड़ा व्यापक अपशिष्ट जल प्रवाह को दर्शाता है। इसमें घरेलू सीवेज के साथ कुछ औद्योगिक अपशिष्ट जल भी शामिल है।

नाले के पानी की जांच में फीकल कोलीफॉर्म जीवाणु अधिक पाए गए। इनकी मौजूदगी पानी में मल से होने वाले प्रदूषण का संकेत देती है। इससे पता चलता है कि नाले में मलयुक्त गंदा पानी पहुंच रहा है। हालांकि, केवल इस जांच से यह तय नहीं किया जा सकता कि प्रदूषण का कितना हिस्सा घरेलू सीवेज से आया है।

प्रदूषण की पहचान वर्षों पहले हुई, फिर भी समस्या क्यों बनी है?

मारकंडा नदी में घरेलू सीवेज पहुंचने की समस्या कई वर्ष पुरानी है। घग्गर नदी के प्रदूषण पर गठित कार्यकारी समिति की अंतरिम रिपोर्ट में भी जट्टांवाला नाले का उल्लेख मिलता है। रिपोर्ट में बताया गया था कि काला अंब क्षेत्र की बस्तियों से निकलने वाला बिना उपचार वाला सीवेज इस नाले के रास्ते मारकंडा नदी तक पहुंच रहा था।

नवंबर 2019 में NGT के आदेश के तहत काला अंब क्षेत्र में सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार की व्यवस्था सुधारने का मुद्दा उठाया गया था। इसके बावजूद अगले वर्षों में भी जट्टांवाला नाले से गंदा पानी मारकंडा नदी तक पहुंचने की समस्या सामने आती रही।

इससे पता चलता है कि समस्या की पहचान कई साल पहले हो चुकी थी। इसके बावजूद सीवर लाइन और गंदे पानी के उपचार की व्यवस्था अब तक पूरी नहीं हो पाई है।

सीवेज उपचार की व्यवस्था कहां अटकी है?

सीवेज उपचार संयंत्र बनने से ही नदी में गंदा पानी जाना बंद नहीं होता। इसके लिए जरूरी है कि घरों और प्रतिष्ठानों से निकलने वाला पानी सीवर लाइन के जरिए संयंत्र तक पहुंचे।

अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश सरकार ने बताया है कि काला अंब क्षेत्र में करीब 85 प्रतिशत सीवर कनेक्शन का काम पूरा हो चुका है। लेकिन कुछ इलाकों में घर अब भी सीवर लाइन से नहीं जुड़े हैं।

रिपोर्ट में एक विशेष क्षेत्र में 443 घरेलू सीवर कनेक्शन देने का लक्ष्य भी बताया गया है। इनमें से अभी तक 55 कनेक्शन दिए जाने की जानकारी है। शेष काम 31 दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

काला अंब में प्रतिदिन 17 लाख लीटर गंदे पानी के उपचार की क्षमता वाला सीवेज उपचार संयंत्र (STP) है। लेकिन अधूरे सीवर कनेक्शनों के कारण कई घरों का गंदा पानी संयंत्र तक नहीं पहुंच पाता। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि संयंत्र में प्रतिदिन कितना पानी पहुंच रहा है और उसमें से कितना उपचारित हो रहा है।

रिपोर्ट में सीवेज व्यवस्था के संचालन और रखरखाव पर होने वाले खर्च को लेकर विवाद का भी उल्लेख है। खर्च कौन उठाएगा, इसे लेकर संबंधित विभागों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। इस वजह से कुछ इलाकों को सीवेज उपचार व्यवस्था से जोड़ने का काम प्रभावित हुआ। मई 2026 में इस मुद्दे पर संबंधित पक्षों की बैठक भी हुई।

जल शक्ति विभाग को जट्टांवाला नाले में पहुंचने वाले अपशिष्ट जल को रोककर उपचार संयंत्र तक ले जाने की व्यवस्था पूरी करने की जिम्मेदारी दी गई है। अब देखना होगा कि दिसंबर 2026 तक यह काम पूरा हो पाता है या नहीं।

पानी की जांच में क्या सामने आया?

हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में मारकंडा नदी के अलग-अलग हिस्सों से पानी के नमूने लिए थे। इनकी जांच में कई स्थानों पर प्रदूषण के संकेत मिले।

पानी में कार्बनिक प्रदूषण का पता लगाने के लिए जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD) मापी जाती है। इससे पता चलता है कि पानी में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों को कितनी ऑक्सीजन चाहिए। BOD अधिक होने से आमतौर पर पानी में कार्बनिक प्रदूषण अधिक होने का संकेत मिलता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार नहाने के लिए उपयुक्त पानी में BOD अधिकतम 3 मिलीग्राम प्रति लीटर और घुली ऑक्सीजन (DO) कम से कम 5 मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। इसके मुकाबले मारकंडा नदी के कुछ हिस्सों में दर्ज BOD अधिक और DO कम थी।

स्रोत: हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की NGT में जमा रिपोर्ट। आंकड़े दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में लिए गए नमूनों पर आधारित हैं।

जनवरी 2026 में पेहोवा के पास नदी के पानी में घुली ऑक्सीजन 3 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। यह स्नान-जल के निर्धारित मानक से कम है। पानी में ऑक्सीजन की कमी मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के लिए नुकसानदेह हो सकती है।

क्या नदी में औद्योगिक कचरा भी पहुंच रहा है?

मारकंडा नदी में औद्योगिक प्रदूषण को लेकर भी शिकायतें होती रही हैं। वर्ष 2022 में हरियाणा के नारायणगढ़ निवासी धर्मवीर ने NGT में शिकायत की थी। उनका आरोप था कि काला अंब की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषित पानी नदी में पहुंच रहा है। शिकायत में आसपास के लोगों और पशुओं पर इसके असर का सवाल भी उठाया गया था।

अक्टूबर 2025 में NGT ने संबंधित विभागों से नदी में मिलने वाले नालों, औद्योगिक इकाइयों और अपशिष्ट जल उपचार की जानकारी माँगी थी। अब हिमाचल प्रदेश सरकार की रिपोर्ट घरेलू सीवेज को प्रदूषण का प्रमुख कारण बता रही है।

हालांकि, इससे औद्योगिक प्रदूषण की भूमिका पूरी तरह खारिज नहीं होती। नदी के अलग-अलग हिस्सों में प्रदूषण के स्रोत अलग हो सकते हैं। इसलिए घरेलू सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट जल, दोनों की नियमित जांच जरूरी है।

नालों में जमा कचरा भी बढ़ा रहा है परेशानी

जट्टांवाला नाले में गंदे पानी के साथ प्लास्टिक और दूसरा कचरा भी जमा हो रहा है। हिमाचल प्रदेश सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इस कचरे के कारण कुछ जगह पानी का रास्ता रुक रहा है। इससे नाले में पानी का बहाव प्रभावित होता है और गंदगी जमा होने लगती है।

हिमाचल प्रदेश सरकार की रिपोर्ट के अनुसार कुछ स्थानों पर कचरा संग्रह केंद्र बनाए गए हैं और घरों से कचरा उठाने की व्यवस्था भी शुरू की गई है। इसके बावजूद नाले में प्लास्टिक और दूसरा कचरा पहुंचने से रोकने के लिए नियमित निगरानी और सफाई जरूरी है।

मारकंडा को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या करना होगा?

मारकंडा नदी में प्रदूषण रोकने के लिए हिमाचल प्रदेश और हरियाणा, दोनों को मिलकर काम करना होगा। हिमाचल प्रदेश में नदी और नालों में मिलने वाला गंदा पानी आगे हरियाणा तक पहुंच सकता है। वहीं हरियाणा के गांवों और कस्बों से निकलने वाला अपशिष्ट जल भी नदी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

हरियाणा विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार कुरुक्षेत्र जिले के मदनपुर, झांसा और रोहटी गांवों से नदी में गंदा पानी जाने की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। संबंधित पंचायतों को इसे रोकने के लिए नोटिस भी दिए गए थे।

दोनों राज्यों को नदी में मिलने वाले प्रमुख नालों की निगरानी करनी होगी। इसके साथ ही काला अंब में जिन घरों और प्रतिष्ठानों के सीवर कनेक्शन बाकी हैं, उनका काम पूरा करना जरूरी है। सीवेज उपचार संयंत्रों में आने वाले और उपचार के बाद निकलने वाले पानी की नियमित जांच भी होनी चाहिए।

मारकंडा की समस्या केवल एक नदी की नहीं है। देश की कई छोटी और मौसमी नदियों में आसपास की बस्तियों का गंदा पानी पहुंच रहा है। इनमें सालभर पर्याप्त पानी नहीं बहता। ऐसे में प्रदूषण का असर बढ़ सकता है।

मारकंडा में प्रदूषण रोकने के लिए कई साल से योजनाएं बन रही हैं। अब जरूरत इन योजनाओं को पूरा करने और उनके असर की नियमित जांच करने की है। नदी में सुधार का आकलन केवल सीवर लाइन बिछने या उपचार संयंत्र बनने से नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता में आए बदलाव से होना चाहिए।

Also Read
नदियों में घटती ऑक्सीजन: मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के लिए कितना बड़ा खतरा?
<div class="paragraphs"><p>मारकंडा नदी, हरियाणा</p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org