

मुजफ्फरपुर के कोठिया इलाके में रहने वाले राजू निषाद हर सुबह बूढ़ी गंडक नदी में जाल डालते हैं… इस आस में कि मछलियां मिलेंगी तो घर में दो रोटी का जुगाड़ हो जाएगा। लेकिन उनके लिए हर दिन एक जैसा नहीं होता, कभी जाल में मछलियां आती हैं, तो कभी कूड़ा-करकट, तो कभी नदी की सतह पर जमी काई। नदी में लगातार बढ़ते प्रदूषण ने राजू निषाद जैसे सैंकड़ों मछुआरों व उनके परिवारों को जीवन के उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां उन्हें केवल अंधेरा दिखाई देता है।
राजू निषाद ही नहीं पूरा मछुआरा समुदाय तनाव भरी जिंदगी जीने को मजबूर है। आलम यह है कि बूढ़ी गंडक का पानी और आस-पास के इलाके में प्रदूषण का बढ़ता स्तर लोगों की जिंदगी को बदहाल बना रहा है। और तो और नदी के दूषित पानी की वजह से मछुआर महिलाओं का स्वास्थ्य निरंतर गिर रहा है। भागलपुर की तरह यहां भी गर्भाशय संबंधी बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं।
बूढ़ी गंडक पश्चिमी चंपारण में सोमेश्वर की पहाड़ियों से निकलकर लगभग 320 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद खगड़िया में गोगरी जमालपुर के पास गंगा नदी में मिल जाती है। इस बीच मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पूर्व चंपारण, पश्चिम चंपारण, मेहसी और बेगूसराय जिलों से गुज़रती है।
मुजफ्फरपुर शहर का वजूद बूढ़ी गंडक नदी की जलधारा से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह नदी केवल मुजफ्फरपुर की भौगोलिक सीमा तय नहीं करती बल्कि इस शहर की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक रीढ़ भी है। सदियों से उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों को सींचने वाली इस नदी पर घनी आबादी रोजमर्रा के जीवन, सिंचाई और भूजल के लिए निर्भर है।
बूढ़ी गंडक में दैनिक कार्य करतीं स्थानीय महिलाएं
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
मुजफ्फरपुर का पारंपरिक मछुआरा समाज पीढ़ी दर पीढ़ी आजीविका के लिए इसी नदी के पानी पर आश्रित रहा है। इसके अलावा बांध से सटे इलाकों में तरबूज,नेनुआ, केले की खेती भी की जाती है, तो वहीं छठ पर्व जैसे लोक-उत्सवों में शहरवासी इसके घाटों पर ही अपनी हगरी आस्था और अपनेपन को व्यक्त करते आए हैं। इस शहर के पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने में बूढ़ी गंडक नदी लाइफलाइन की भूमिका निभाती है।
बूढ़ी गंडक गंगा की सात धाराओं में से एक है जिसे गंडक या सप्तगंडकी भी कहा जाता है। ऊपरी इलाकों में बूढ़ी गंडक को सिकराना के नाम से जाना जाता है, जिसमें मसान और रामरेखा नदियों का पानी भी आता है। सिकराना नदी को मोतिहारी के पास धनौती नदी के संगम के बाद बूढ़ी गंडक के नाम से जाना जाता है।
मुजफ्फरपुर में आश्रम घाट सिकंदरपुर और अखाड़ा घाट क्षेत्र बूढ़ी गंडक के किनारे स्थित हैं। ये मुख्य रुप से आवासीय हिस्सा है, जहां लगातार आवागमन होता रहता है। इसके अलावा धार्मिक अवसरों जैसे- छठ पूजा, मूर्ति विसर्जन के लिए बूढ़ी गंडक के इस हिस्से का उपयोग किया जाता है। यहां से लगभग 2-3 किलोमीटर की दूरी पर प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र स्थित है, जहां कई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, टेक्सटाइल और बैग क्लस्टर काम करते हैं।
मुजफ्फरपुर के आश्रम घाट के आसपास बूढ़ी गंडक में पहुंचने वाले प्रदूषित पानी का सवाल केवल नदी के किनारे दिखने वाली गंदगी तक सीमित नहीं है। यहां घरेलू सीवेज, शहरी अपशिष्ट जल और औद्योगिक प्रदूषण इन सभी की भूमिका है।
नक्शे में बूढ़ी गंडक
2021–22 में आश्रम घाट के आसपास किए गए एक अध्ययन में नदी के एक सैंपलिंग साइट पर शहरी नगरपालिका अपशिष्ट जल के सीधे नदी में पहुंचने का उल्लेख किया गया था। यानी नदी तक पहुंचने वाला प्रदूषण केवल ठोस कचरे तक सीमित नहीं है बल्कि अपशिष्ट जल भी इसका हिस्सा है।
CPCB के पोस्ट-मानसून 2022 के रिकॉर्ड में मुजफ्फरपुर के बूढ़ी गंडक में गिरने वाले तीन नालों क्रमशः सिंकदरपुर ड्रेन, बालू घाट ड्रेन, हरपुर-लोहरी ड्रेन और सोडा गोदाम स्लुइस घाट ड्रेन को ‘untapped’ दर्ज किया गया है। इनका दर्ज प्रवाह क्रमशः 8.3 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) , 9.1 MLD, 2.6 MLD और 3.7 MLD है। यानी इन नालों से कुल दर्ज प्रवाह 23.7 MLD है। CPCB के रिकॉर्ड में इन नालों का प्रदूषण के स्रोत (घरेलू/मिश्रित/औद्योगिक) दर्ज है।
वहीं, मुजफ्फरपुर में सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था विकसित करने की योजनाएं मौजूद हैं लेकिन CPCB के 2023 के रिकॉर्ड में बूढ़ी गंडक में मिलने वाले कई प्रमुख नाले अभी भी ‘Untapped’ दर्ज हैं। इससे सवाल उठता है कि नदी में पहुंच रहे सीवेज के कितने हिस्से का वास्तव में उपचार हो रहा है और कितना बिना उपचार नदी तक पहुंच रहा है।
बूढ़ी गंडक नदी में प्रदूषण की वजह से झाग वाला पानी
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
चूंकि ये नदी बारिश के पानी पर निर्भर है, तो जैसे ही बारिश कम होती है, तब प्रदूषण का स्तर और बढ़ जाता है। इस हिस्से में प्रमुख शहरी इलाके बालु घाट, चंदवारा, हनुमंत नगर, लकड़ी ढाई, बांध रोड हैं। ये इलाके वार्ड 14, 15 और 16 के अंतर्गत आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि औद्योगिक इलाकों से निकलने वाला पानी नदी के प्रदूषण को बढ़ाता है।
बात अगर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की करें तो मुजफ्फरपुर में मात्र एक मात्र एसटीपी है, वो भी सिकंदरपुर मन में जाने वाले पानी का शुद्धीकरण करता है। यह प्लांट भी इसी महीने चालू किया गया है।
वहीं वार्ड 14 के पार्षद अमित रंजन बताते हैं कि मिट्टी कटाई के कारण अब नाला का पानी सीधे आश्रम घाट के हिस्सों में गिर रहा है, जिससे आसपास के इलाके भी प्रदूषित हो रहे हैं। इस स्थिति को ठीक करने के लिए निगम स्तर पर काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि National Mission for Clean Ganga (NMCG) के URMP (Urban River Management Plan) फ्रेमवर्क के तहत शहर के नालों, उद्योगों एवं वार्ड के नागरिकों को साथ लाकर निगरानी और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाना पड़ेगा ताकि ड्रेनेज और नदी प्रदूषण पर टिकाऊ समाधान निकाला जा सके।
प्रदूषण का असर मछुआरा समुदाय पर भी काफी पर रहा है। देखा जाए, तो बिहार में मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने ‘विजन 2030 - बिहार मत्स्य प्राथमिकता परियोजना’ शुरू किया है, जिसका उद्देश्य आने वाले सालों में बिहार को देश के प्रमुख अंतर्देशीय मछली पालन राज्यों में शामिल करना है। इससे ना केवल खाद्य सुरक्षा को मजबूती बल्कि सतत विकास लक्ष्य 2 (SDG 2) को प्राप्त करने में भी बिहार आगे बढ़ेगा, जिसका लक्ष्य साल 2030 तक दुनिया भर में भूख को खत्म करना, खाद्य सुरक्षा हासिल करना, पोषण में सुधार करना और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना है।
नाव लेकर बूढ़ी गंडक में मछलियों की तलाश करता मछुआरा
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
कॉलेज ऑफ फिशरीज, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर में किए गए शोध Assessment of Fish Diversity Associated with Water Quality Parameters of Burhi Gandak River, North Bihar, India से अलग ही सच्चाई सामने आती है। इस शोध से पता चला है कि मुजफ्फरपुर स्थित बूढ़ी गंडक नदी में मछलियों की सबसे कम विविधता पाई गई, जिसका कारण पानी में ज़्यादा प्रदूषण और तलछट का जमा होना हो सकता है।
इस शोध को अगर विस्तृत तरीके से समझने की कोशिश करें, तो इस अध्ययन में बूढ़ी गंडक के आस-पास के हिस्सों को 6 भागों - चकिया, मुजफ्फरपुर, अब्दुलपुर रैनी, पूसा, समस्तीपुर और खगड़िया में बूढ़ी गंडक के पानी को लेकर उसकी सैंपलिंग की गई और मछलियों के विविधता को समझने की कोशिश की गई। इन सैंपलिंग साइट्स में 71 तरीकों के मछलियों की पहचान की गई।
अध्ययन के दौरान पूसा में मछलियों की सबसे अधिक विविधता देखी गई, जहां सर्वाधिक 50 प्रजातियां दर्ज की गईं। इसके बाद समस्तीपुर और खगड़िया में से प्रत्येक पर 43 प्रजातियां, चकिया में 42 प्रजातियां, तथा अब्दुलपुर रैनी पर 39 प्रजातियां पाई गईं।
मछली पकड़ने की तैयारी में मछुआरे
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
इसी शोध में सबसे चिंताजनक परिणाम मुजफ्फरपुर में मिले जहाँ सबसे कम 33 प्रजातियां पायी गईं। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ये भी दर्ज किया कि मुजफ्फरपुर में मछलियों के कम होने का प्रमुख करण बूढ़ी गंडक में शहर के नालों से आने वाला दूषित पानी है। इस पानी मैं शहरी कचरे, मानव अपशिष्ट के अलावा फैक्ट्रियों से निकालने वाला प्रदूषण भी शामिल है।
इससे भी अधिक चिंता का विषय ये है कि मुजफ्फरपुर में गिरने वाले नाले केवल यहाँ के पानी को प्रदूषित नहीं कर रहे हैं, बल्कि अब्दुलपुर रैनी में मछलियों के कम होने की वजह भी यहीं से निकालने वाला दूषित पानी है। और तो और दोनों स्थलों पर रेत का अत्यधिक खनन और औद्योगिक कचरा दिन प्रति दिन बढ़ ही रहा है।
बूढ़ी गंडक नदी का हिस्सा
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
दूषित पानी के कारण मछलियों पर पड़ने वाले प्रभावों पर फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी, कर्नाटक में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर डॉ. रंजीत कुमार साहनी ने कहा, “कुछ मछलियां, जैसे- बगारियस, बैलोनी, गगरी, बोआरी, बतासी और टेंगड़ा हमेशा अच्छे वातावरण में ही जीवित रहती हैं। पानी की गुणवत्ता खराब होने पर इनकी संख्या कम होने लगती है इसलिए ये मछलियां साफ पानी की द्योतक मानी जा सकती हैं। अगर बूढ़ी गंडक में इन मछलियों के मरने के मामले आये हैं, इसका साफ मतलब है कि पानी दूषित हो चुका है।”
डॉ. रंजीत ने आगे कहा, “अगर तिलापिया, कैटफिश या चाइनीज मांगुर जैसी मछलियों की संख्या बढ़ रही है तो इसका मतलब ना भी पानी की गुणवत्ता खराब हो रही है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि किस तरह की मछलियों की संख्या घट रही है और किन प्रजातियों की संख्या बढ़ रही है।”
अध्यक्ष जिला मत्सयजीवी संघ नरेश कुमार सहनी बताते हैं कि बूढ़ी गंडक में विभिन्न तरह की मछलियां मिलती हैं। जैसे- टेंगरा, बचवा, बोआरी, धवई, पोठिया, रोहू, कतला आदि लेकिन प्रदूषित होने के कारण मछलियों की तादाद कम होती जा रही है। अभी मछलियों के प्रजनन का समय है लेकिन गंदे पानी के कारण मछलियों के प्रजनन में दिक्कत होती है। और कई बार मछलियों के बच्चे मर जाते हैं। इससे केवल नुकसान हो रहा है क्योंकि नदी में जब मछली ही नहीं होगी, तब मछुआरे अपनी जीविका कैसा चला पाएंगे। सरकार से लगातार मांग की गई कि नदी में गिरने वाले पानी को ट्रीटमेंट प्लान के मध्यम से साफ करके बहाया जाए लेकिन इस पर सुनवाई नहीं होती है।
नरेश कुमार साहनी, अध्यक्ष जिला मत्सयजीवी संघ, मुजफ्फरपुर
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
उन्होंने आगे बताया कि 10-15 सालों स्थिति और बद्तर हो गई है। जब अच्छी बारिश होती है, तब पानी का स्तर काफी बढ़ा रहता है, उस वक्त मछलियां मिलती हैं लेकिन जैसे-जैसे बूढ़ी गंडक में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, ये समस्या बढ़ती जा रही है। मुजफ्फरपुर जिले के करीब 5-10 हज़ार मछुआरे केवल बूढ़ी गंडक नदी पर ही निर्भर है। ये नदी जहां-जहां चौर या मन बनाती है, वहां भी मछुआरे मछली पकड़ने के लिए जाते हैं मगर पानी की कमी और प्रदूषण के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पहले हमें मैदानी इलाकों से सटे हिस्सों में ही जाल बिछाने पर मछलियां मिल जाती थीं लेकिन अब जाल को बड़ा करके लंबी दूरी पर लगाना पड़ता है। वहीं, जब मछलियां कम मिलती हैं, तब उस दौरान मछुआरों को अन्य जीविका देखनी पड़ती है।
मछलियों की बीमारियों के विषय में नरेश कुमार सहनी ने आगे बताया कि दूषित पानी के कारण मछलियों में तरह-तरह की बीमारियां हो जाती हैं। जैसे- ऑक्सीजन का स्तर कम होने के कारण मछलियों का मरना। उसके अलावा कवक का रोग, घाव और सड़ने की समस्या, मछलियों के आकार में गड़बड़ी यानी कि हड्डियों का टेढ़ा-मेढ़ा हो जाना। इस तरह की परेशानियां दूषित पानी के कारण बूढ़ी गंडक में देखने को मिलती है।
बूढ़ी गंडक नदी
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
कोठिया, मुजफ्फरपुर के रहने वाले 72 वर्षीय रामजी सहनी ने कहा, “हमारे पूवर्ज भी इसी नदी से मछलियां पकड़ते थे लेकिन उस वक्त बहुत तरह-तरह की मछलियां मिलती थीं और तादाद भी काफी होती थी लेकिन जितनी प्रजातियां पहले थीं, उसमें अब कमी हो गई है।”
Priyadarshee et al. (2024) )सिविल इंजीनियरिंग विभाग, एमआईटी मुजफ्फरपुर और मोतिहारी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, मोतिहारी, बिहार) ने बूढ़ी गंडक के अलग-अलग हिस्सों पर पानी की गुणवत्ता को लेकर अध्ययन किया। शोध में मुजफ्फरपुर सहित पांच जगहों से पानी के सैंपल लिए और pH, TDS, hardness, BOD और dissolved oxygen (DO) जैसे मानकों की जांच की। इससे पता चला कि लगातार हो रहे औद्योगीकरण के कारण पानी की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
सिकंदरपुर कुंडल, मुजफ्फरपुर में नदी किनारे बसे 60 वर्षीय राजेंद्र सहनी ने कहा, “पिछले कुछ सालों में नदी के पानी में प्रदूषण का स्तर काफी तेजी से बढ़ा है। बारिश खत्म होते ही पानी की रंगत बदलने लगती है। दिसंबर से पानी की रंगत बदलने लगती है, जो अगले साल अच्छी बारिश होने तक बनी रहती है। अभी तो बारिश हो जा रही है इसलिए पानी की रंगत थोड़ी साफ है।”
“उन्होंने आगे कहा, “एक समय बूढ़ी गंडक नदी का पानी पीने लायक हुआ करता था लेकिन प्रदूषण से दूषित होने के कारण जो मछलियां मिल रही हैं, उनकी भी हालत उतनी अच्छी नहीं है। जैसे- पहले इस नदी से रोहू-कतला मछली जो निकलती थी, उसका साइज बहुत अच्छा रहता था। इन मछलियों का वजन कम से कम 10-25 किलो का हुआ करता था लेकिन अब मछली का वजन 5-10 किलो में सिमट गया है।”
बूढ़ी गंडक में बर्तन धोकर लाती महिला
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
बूढ़ी गंडक के प्रदूषित होने के कारण महिलाओं को भी काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि वे रोजमर्रा के कामों जैसे- कपड़े धोना, बर्तन धोना, स्नान करना इत्यादि के लिए नदी के पानी पर ही निर्भर हैं। स्थानीय महिला अंगुरी देवी (लगभग 47 वर्षीय) बताती हैं, “हमारा पूरा जीवन इसी नदी पर निर्भर है। रोजमर्रा के काम तो होते ही हैं, त्योहारों तक में भी इसी पानी का इस्तेमाल होता है। छठ हो या होली-दीवाली, हमारे घरों में प्रसाद बनाने में इसी नदी से पानी लिया जाता है।”
अंगूरी देवी ने आगे बताया कि उनके पति यहीं से मछली पकड़ते हैं और बाज़ार में बेचते हैं लेकिन जब पानी बहुत प्रदूषित होने लगता है और बारिश नहीं होती है, तब दूसरा काम देखना पड़ता है। उन्होंने आगे बताया कि नदी में बाढ़ की स्थिति हो या नदी प्रदूषित होने लगे, उनके पति मछली पकड़ने का काम करते हैं लेकिन मछलियां कम मिलने के कारण उन्हें भी घरों में जाकर बर्तन धोने, झाड़ू-पोंछा करने और खाना बनाने का काम करना पड़ता है।
बूढ़ी गंडक नदी, मुुजफ्फरपुर
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
अंगूरी ने आगे बताया कि पहले (लगभग 5-10 साल पहले तक) परिवार उतना बड़ा नहीं था और ना महंगाई इतनी थी, तो कम पैसों में गुजारा हो जाता था लेकिन अब दो बेटियां हैं और एक बेटा है। सभी स्कूल जाने की उम्र में है लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है और हम कुछ ट्युशन का इंतजाम भी नहीं करवा पाते हैं। वो जहां काम करती हैं, वहां बच्चे अच्छे स्कूल में जाते हैं और फिर ट्युशन पढ़ने भी जाते हैं लेकिन अभी तो दोनों पति-पत्नी मिला लें, तो भी महीने का 15 हज़ार निकालना मुश्किल हो जाता है। आगे छठ-दिवाली का त्यौहार आने वाला है, उसके लिए अभी से कोई दूसरा काम देखना पड़ेगा ताकि जरूरत की चीज़ें कम से कम पूरी की जा सके। पानी का होना तो जरूरी है लेकिन अगर पानी प्रदूषित रहेगा, तो हम कैसे अपनी ज़िंदगी चला पाएंगे?
वहीं एक अन्य महिला जो अपनी बेटी के साथ वहां बर्तन धोने आईं थी। उन्होंने बताया कि नदी का पानी केवल बरसात के दौरान थोड़ा साफ रहता है। लेकिन ज्यादा बारिश होने पर बाढ़ के डर से हम यहां नहीं आते हैं। कई बार हमें अपनी जगह भी बदलनी पड़ती है लेकिन हम खुद नहीं जानते कि हम कहां जाएंगे। बगल के उद्योग से निकलने वाला झाग वाला पानी नदी में गिरता है। हमें डर भी लगता है कि कहीं इससे हमारी तबीयत खराब ना हो जाए लेकिन हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इतने पैसे नहीं हैं कि पानी खरीद करके पी सकें।
नव अस्तित्व फाउंडेशन (बिहार में महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए काम करने वाला एक प्रमुख गैर-सरकारी संगठन) की संस्थापक अमृता सिंह बताती हैं कि लगातार दूषित पानी का इस्तेमाल करने से महिलाओं को ना केवल युरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) बल्कि लिकोरिया (सफेद पानी की समस्या) होने का खतरा भी बढ़ जाता है। Waterborne Urinary Tract Infections: Have We Overlooked an Important Source of Exposure? शोध से भी पता चलता है लगातार गंदे पानी के उपयोग से यूटीआई की समस्या होने का खतरा बढ़ जाता है। नदी चाहे प्रदूषित हो या बाढ़ की समस्या हो, महिलाओं के पास कोई विकल्प नहीं होता है और ना ही वे इतनी जागरूकता होती हैं कि बार-बार पेशाब लगना, निचले हिस्से से बदबू आने या किसी तरह के छाले या घाव होने का एक कारण नदी का गंदा पानी भी हो सकता है, जिसमें उतर कर वो रोज़ बर्तन वि कपड़े धोती हैं या नहाती हैं।
उन्होंने आगे बताया, “चूंकि कई महिलाओं के पास आज भी सैनिटरी पैड लेने की सुविधा नहीं होती है क्योंकि एक तरफ वे आर्थिक तौर पर अपने पति पर निर्भर होती हैं और दूसरी तरफ उन्हें अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता भी नहीं होती। बार-बार अगर आप कपड़ा इस्तेमाल करोगे, जिसे आप गंदे पानी में ही धो रहे हो, तो भी संक्रमण या अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जैसे- अगर पानी में भारी मात्रा में आर्सेनिक होगा, तो इससे निचले हिस्से में जलन, लालिमा, pH का स्तर बिगड़ना जिससे बैक्टीरियल वेजिनोसिस (BV) और यीस्ट इन्फेक्शन (Fungal Infection) का खतरा बढ़ जाता है। इस तरह के कई केस मुजफ्फरपुर और दरभंगा में भी देखे गए हैं।”
बूढ़ी गंडक के पासमछुआर बस्ती
फोटो- सौम्या ज्योत्सना
गर्भाशय से जुड़ी बीमारियां बहुत गंभीर समस्या है। यहां की महिलाओं को डर रहता है कि कहीं उनका हाल भी भागलपुर की मछुआर महिलओं के जैसा न हो। दरअसल भागलपुर व आस-पास गंगा नदी से सटे इलाकोें में महिलाओं द्वारा गर्भाशय निकलवाने के मामले बड़ी संख्या में सामने आये हैं। उन महिलाओं में बीमारी का मुख्य कारण गंगा नदी का दूषित जल पाया गया है।
डॉ. कुलदीप कौर स्त्री रोग विशेषज्ञ मुजफ्फरपुर बिहार बताती हैं, “लंबे समय तक दूषित पानी के संपर्क में रहने से महिलाओं में त्वचा और जननांग क्षेत्र में जलन, खुजली तथा संक्रमण की समस्या बढ़ सकती है। खासकर जब महिलाएं इसी पानी से स्नान करती हैं या कपड़े धोती हैं, तो स्वच्छता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा संक्रमण के पीछे स्वच्छता, सैनिटेशन और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकते हैं। बार-बार असामान्य डिस्चार्ज, खुजली, जलन या पेशाब में दर्द होने पर महिलाओं को चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए।”
अनु कुमारी (ANM) वरिष्ठ सहायक नर्स मिडवाइफ सदर अस्पताल मुजफ्फरपुर ने बताया, “अगर महिलाओं को स्वच्छता से समझौता करना पड़ता है, तो यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) होने का खतरा बढ़ जाता है। बूढ़ी गंडक से सटे इलाके जैसे- चंदवारा, बांध रोड, लकड़ी ढ़ाई इत्यादि से भी महिलाएं सदर में इलाज के लिए आती हैं, जिनमें से अधिकांश महिलाओं को सफेद स्त्राव की समस्या होती है, जो अमूमन गंदे पानी के संपर्क में आने या गंदे कपड़ों के बार-बार इस्तेमाल से होती है क्योंकि संक्रमण होने के कारण वजाइनल हिस्से से ये स्त्राव उस बैक्टिरिया को मारने के लिए होता है, जिससे ये समस्या होती है लेकिन यही स्त्राव आगे चलकर बदबूदार भी हो सकता है, जो गंभीर संक्रमण का लक्षण है। अगर जननांगों या वजाइनल हिस्से को सही से साफ ना रखा जाए, दूषित पानी से कपड़े धोकर बार-बार उसका इस्तेमाल किया जाए, तो सूक्ष्म बैक्टिरिया जैसे- E. coli एस्चेरिचिया कोलाई) रह जाता है, जो UTI होने का एक प्रमुख कारण है। इन इलाकों से ऐसी शिकायतों के साथ करीब 25-30 महिलाएं रोजाना अस्पताल आती हैं।”
सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार सदर अस्पताल मुजफ्फरपुर बताते हैं, लगातार गंदे एवं प्रदूषित पानी के संपर्क में रहने से पेट संबंधित और त्वचा संबंधित समस्याएं बढ़ जाती है। बूढ़ी गंडक के आसपास रहने वाले लोग, जो मूलरुप से नदी के पानी पर निर्भर हैं, उनके लिए जरूरी है कि वे पानी को उबाल करके पिएं और जब भी पानी की रंगत बदली लगे या उसमें से दुर्गंध आए, तब नदी का पानी पीना छोड़ दें क्योंकि कई बार जो रसायन होते हैं, वे केवल उबाल देने से नहीं खत्म हो जाते।
साथ ही, जब हमने डॉ. सुधीर कुमार से इस विषय पर जानने की कोशिश की कि बाढ़ एवं प्रदूषण के दौरान मरीजों की संख्या में कितना इजाफा होता है, तब उन्होंने बताया कि बरसात के दिनों में मरीजों की संख्या बढ़ जाती है लेकिन जब बारिश का मौसम नहीं होता है, तब भी दूषित पानी के कारण पेट एवं आंत संबंधित समस्याओं को लेकर मरीजों का सिलसिला लगा रहता है।
एकलव्य प्रसाद, प्रबंध न्यासी, मेघ पाईन अभियान, जो लंबे समय से पूर्वी भारत में नदियों, पानी और स्वच्छता प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। वे बताते हैं कि बूढ़ी गंडक के हर हिस्से में पानी की गति एक जैसी नहीं रहती। मोड़ के बाहर पानी तेज बहता है, जिससे कटाव हो सकता है। मोड़ के अंदर पानी धीमा पड़ता है इसलिए वहां मिट्टी, कचरा और दूसरे तत्व जमा होने की संभावना अधिक रहती है।
जब शहर के नालों से सीवेज नदी में आता है, तो धीमे बहाव वाले हिस्सों में वह कुछ समय तक रुका रह सकता है। सीवेज के साथ आया जैविक कचरा और मिट्टी नदी के तल में जमा हो सकते हैं। बाद में बाढ़ या तेज बहाव के समय यही जमा तत्व फिर पानी में मिलकर पानी को अधिक गंदा कर सकते हैं।
फिर भी, नदी में गाद जमा होने का कारण केवल उसका घुमावदार होना नहीं है। नदी किनारे का कटाव, खेतों से बहकर आने वाली मिट्टी, निर्माण कार्य, मिट्टी खनन, कचरा, उद्योग और नालों से आने वाला गंदा पानी भी इसमें योगदान देते हैं इसलिए बूढ़ी गंडक की समस्या को केवल पानी की सफाई के रूप में नहीं बल्कि नदी के पानी और उसके तल में जमा तत्व दोनों की समस्या के रूप में देखना चाहिए।
डॉ. रंजीत साहनी, जो खुद कोसी तटबंध क्षेत्र के निवासी हैं, बताते हैं कि बढ़ता प्रदूषण मछुआरों के लिए परेशानी खड़ी करने वाला हो सकता है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो उनके लिए कल्चर फिशिंग एक बेहतर विकल्प हो सकता है, लेकिन उसके लिए खुद का तालाब और जमीन चाहिए, जिसके लिए बहुत पैसों की जरूरत होगी। उससे भी गंभीर बात यह कि बिहार में लोग कल्चर तकनीक के जरिए उत्पादित की गई मछलियों को खाना उतना पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में ये आधुनिक विकल्प भी इसके जीवन को नहीं संवार सकते। अगर इन मछुआरों को आथिक तंगी से बाहर निकालना है तो नदी की सफाई ही एक मात्र विकल्प है।
मुजफ्फरपुर में बूढ़ी गंडक नदी
इससे पहले कि हम मछुआरों की बदहाल जिंदगी पर प्रकाश डालें, एक नज़र बूढ़ी गंडक के इतिहास पर डालते हैं। इस नदी का इतिहास केवल जलधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की लोक-संस्कृति, कृषि और व्यापार के पोषण का हिस्सा भी है। पश्चिमी चंपारण में सोमेश्वर की पहाड़ियों से निकलकर लगभग 400 किलोमीटर का सफर तय करते हुए यह नदी मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पूर्व चंपारण, पश्चिम चंपारण, मेहसी और बेगूसराय से होते हुए खगड़िया में गोगरी जमालपुर के पास गंगा नदी में मिलती है।
यह भारत की अत्यधिक घुमावदार (सर्पिलाकार) नदियों में से एक है। इसके प्रवाह क्षेत्र में प्वांइट बार (बालू के टीले), प्राकृतिक तटबंध (Natural Levees), गोखुर झीले (Oxbow lake), सर्पिल निशान (Meander scars) और छोड़ी हुई पुरानी जलधाराएं स्पष्ट रुप से दिखाई देती हैं। आप इसे गुगल अर्थ पर आसानी से देख सकते हैं। ये नदी चौड़ी घाटी के भीतर एक संकीर्ण चैनल में बहती है।
सदियों से उत्तर बिहार के मैदानों को सींचने वाली यह नदी ना केवल लाखों किसानों का सहारा रही है बल्कि मल्लाह (मछुआरा) समुदाय की आजीविका का मुख्य आधार भी रही है। लेकिन इतिहास में अपनी निर्मल धारा के लिए दर्ज बूढ़ी गंडक आज मुजफ्फरपुर के आश्रम घाट क्षेत्र में पहुंचकर अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। जबकि ये वो नदी है जो बाढ़ नियंत्रण, भूजल को बनाए रखने, खाद्य और मत्स्य पालन को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदाय के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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