नर्मदा जैसी नदियों में होने वाली धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में दूध, फूल और अन्य जैविक पदार्थों का अर्पण प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह जल में अतिरिक्त कार्बनिक बोझ को बढ़ाता है।

नर्मदा जैसी नदियों में होने वाली धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में दूध, फूल और अन्य जैविक पदार्थों का अर्पण प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह जल में अतिरिक्त कार्बनिक बोझ को बढ़ाता है।

चित्र: Dreamstime.com

नदियों में आस्था और विज्ञान का टकराव: दूध प्रवाह से उत्पन्न जल-प्रदूषण और पारिस्थितिक संकट

सीहोर में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध प्रवाहित करने की घटना ने जल-गुणवत्ता और पारिस्थितिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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पिछले दिनों मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में आयोजित एक धार्मिक अनुष्ठान में लगभग 11 हज़ार लीटर दूध नर्मदा नदी में प्रवाहित किया गया। यह घटना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह इस सवाल को भी सामने लाती है कि बड़े पैमाने पर जैविक पदार्थों का नदियों में प्रवेश जल-गुणवत्ता और पारिस्थितिक संतुलन को कैसे प्रभावित करता है।

दूध: उच्च जैविक भार वाला तरल प्रदूषक

एक पोषक आहार के रूप में देखा जाने वाला दूध जल-निकायों में एक उच्च जैव-अपघटनीय (biodegradable organic load) पदार्थ के रूप में व्यवहार करता है। जल में उपस्थित सूक्ष्मजीव दूध के लैक्टोज, कैसीन प्रोटीन, वसा और अन्य घुलनशील कार्बनिक यौगिकों का तीव्र अपघटन करते हैं, जिससे जल में ऑक्सीजन की मांग अचानक बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया को BOD-DO इंटरैक्शन के रूप में समझा जाता है। जैविक भार बढ़ने पर सूक्ष्मजीव गतिविधि बढ़ती है, जिससे घुलित ऑक्सीजन (DO) स्तर घटता है।

शोध के अनुसार डेयरी अपशिष्टों का BOD सामान्यतः 1,000 mg/L से अधिक पाया जाता है, जो घरेलू सीवेज की तुलना में कई गुना अधिक होता है। इसी कारण डेयरी अपशिष्टों को जल-निकायों में अत्यधिक ऑक्सीजन-ह्रासकारी (oxygen depleting) जैविक भार माना जाता है।

जल में उपस्थित सूक्ष्मजीव दूध के लैक्टोज, कैसीन प्रोटीन, वसा और अन्य घुलनशील कार्बनिक यौगिकों का तीव्र अपघटन करते हैं, जिससे जल में ऑक्सीजन की मांग अचानक बढ़ जाती है।

इस जैविक अपघटन के दौरान सूक्ष्मजीव घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen, DO) का तीव्र उपयोग करते हैं, जिससे जल में ऑक्सीजन स्तर तेजी से गिरता है और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ता है। सामान्यतः स्वच्छ नदी जल में BOD का स्तर 1–3 mg/L के भीतर होता है, जो नदी की प्राकृतिक आत्म-शोधन क्षमता के संतुलन को दर्शाता है।

इसके विपरीत, दूध जैसे उच्च जैविक भार वाले पदार्थों का अचानक प्रवेश (pulse input) स्थानीय स्तर पर BOD में तेज वृद्धि करता है। इससे सूक्ष्मजीव गतिविधि असामान्य रूप से बढ़ जाती है और ऑक्सीजन की खपत तेज हो जाती है, जिससे जल-स्तंभ में अस्थायी रूप से ऑक्सीजन तनाव क्षेत्र (oxygen stress zone) विकसित हो सकता है। यह स्थिति जलीय जीवों के लिए प्रतिकूल वातावरण तैयार करती है।

नदियों में बढ़ता जैविक और पोषक-तत्वों का भार एक क्रमिक लेकिन गहरी पारिस्थितिक प्रक्रिया को जन्म देता है, जिसमें ऑक्सीजन-सैग से लेकर हाइपोक्सिया और आगे यूट्रोफिकेशन तक की स्थितियां शामिल हैं। यह श्रृंखला बताती है कि नदियों की प्राकृतिक आत्मसात् करने की क्षमता सीमित है और वह अनियंत्रित प्रदूषण को लंबे समय तक संतुलित नहीं कर सकती।

BOD-DO संतुलन और नदी की ऑक्सीजन प्रणाली

नदी के स्वास्थ्य का सबसे महत्वपूर्ण संकेत उसका घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen, DO) स्तर होता है। सामान्यतः 5 mg/L या उससे अधिक DO को स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उपयुक्त माना जाता है, जबकि इससे नीचे गिरता स्तर तनाव की स्थिति को दर्शाने लगता है।

जब नदी में दूध जैसे आसानी से अपघटनीय जैविक पदार्थ प्रवेश करते हैं, तो सूक्ष्मजीव इन्हें तोड़ने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। इस प्रक्रिया में वे बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। परिणामस्वरूप पानी में उपलब्ध घुलित ऑक्सीजन तेजी से घटने लगती है।

इस घटना का एक विशिष्ट पैटर्न होता है। प्रदूषण के बाद नदी में ऑक्सीजन स्तर तेजी से गिरता है, फिर न्यूनतम बिंदु तक पहुंचकर धीरे-धीरे पुनः बढ़ने लगता है। इस पूरे व्यवहार को जल-गुणवत्ता विज्ञान में ऑक्सीजन सैग (Oxygen Sag) कहा जाता है।

इसे समझाने के लिए एक गणितीय मॉडल विकसित किया गया है, जिसे Streeter - Phelps मॉडल (1925) कहा जाता है। यह मॉडल बताता है कि जैविक पदार्थों के प्रवेश के बाद नदी में दो प्रक्रियाएं एक साथ चलती हैं। एक तरफ ऑक्सीजन की खपत बढ़ती है और दूसरी तरफ प्राकृतिक पुनः-ऑक्सीजनकरण (reaeration) धीरे-धीरे उसे वापस बढ़ाता है।

इसी संतुलन के कारण नदी में ऑक्सीजन का स्तर पहले गिरता है, फिर एक “सैग पॉइंट” पर न्यूनतम होता है और उसके बाद पुनर्प्राप्ति चरण शुरू होता है।

प्रदूषण के बाद नदी में
ऑक्सीजन स्तर तेजी से गिरता है, फिर न्यूनतम बिंदु तक पहुंचकर धीरे-धीरे फिर से बढ़ने लगता है। इस पूरे व्यवहार को जल-गुणवत्ता विज्ञान में ऑक्सीजन सैग (Oxygen Sag) कहा जाता है।

जलीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव और श्रृंखलाबद्ध असंतुलन

घुलित ऑक्सीजन (DO) में गिरावट का सबसे प्रत्यक्ष और तात्कालिक प्रभाव जलीय जीवों पर पड़ता है। इस स्थिति में नदी पारिस्थितिकी तंत्र में सबसे पहले संवेदनशील प्रजातियाँ (sensitive fish species) अपेक्षाकृत अधिक ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित होने लगती हैं। इसे पारिस्थितिकी विज्ञान में आवास विस्थापन (habitat displacement) कहा जाता है, जो केवल स्थानिक बदलाव नहीं बल्कि स्थानीय जैव-विविधता संरचना में असंतुलन का संकेत भी है।

DO में गिरावट के साथ अवायवीय स्थितियां विकसित होती हैं। इसमें सूक्ष्मजीव वैकल्पिक चयापचय मार्ग अपनाते हैं, जिससे H₂S और NH₃ जैसे यौगिक उत्पन्न हो सकते हैं। ये न केवल जल में दुर्गंध पैदा करते हैं, बल्कि जलीय जीवों के लिए विषाक्त प्रभाव भी उत्पन्न करते हैं, जिससे जल-तंत्र की रासायनिक स्थिरता और अधिक अस्थिर हो जाती है।

ऑक्सीजन तनाव नदी की पारिस्थितिक गुणवत्ता (ecological integrity) को कमजोर करता है और उसकी प्राकृतिक पुनर्जनन क्षमता को सीमित करता है।

यह परिवर्तन केवल कुछ प्रजातियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे जलीय आहार जाल (aquatic food web) को प्रभावित करता है। प्राथमिक उत्पादक (जैसे phytoplankton) से लेकर उच्च ट्रॉफिक स्तर तक ऊर्जा प्रवाह बाधित होने लगता है। परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्र धीरे-धीरे एक ऐसे समुदाय की ओर बढ़ सकता है जो कम विविध (low diversity) लेकिन अधिक सहनशील (high tolerance) प्रजातियों पर आधारित होता है।

इस प्रकार बार-बार होने वाला ऑक्सीजन तनाव नदी की पारिस्थितिक गुणवत्ता (ecological integrity) को कमजोर करता है और उसकी प्राकृतिक पुनर्जनन क्षमता को सीमित करता है।

इसी क्रम में आगे चलकर पोषक-तत्वों का बढ़ता भार यूट्रोफिकेशन (eutrophication) की स्थिति उत्पन्न करता है। जल में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की अधिकता शैवाल (algal) और सूक्ष्मजीवों की असामान्य वृद्धि को बढ़ावा देती है। NOAA के अनुसार, ऐसे पोषक-समृद्ध जल में हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन (Harmful Algal Blooms, HABs) तेजी से विकसित हो सकते हैं, जो जल-गुणवत्ता और जलीय जीवन दोनों के लिए जोखिम पैदा करते हैं।

जैसे ही शैवाल की परत जल सतह पर बढ़ती है, सूर्य का प्रकाश नीचे तक नहीं पहुंच पाता, जिससे जलीय पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया बाधित होती है। आगे चलकर जब यह शैवाल मरते हैं, तो उनके अपघटन के लिए बैक्टीरिया पुनः बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उपभोग करते हैं, जिससे जल में DO की कमी और गहरी हो जाती है तथा ऑक्सीजन-सैग जैसी स्थितियां फिर से सक्रिय हो सकती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यूट्रोफिकेशन पेयजल गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है और विषैले यौगिकों के जोखिम को बढ़ा सकता है।

नर्मदा में असिमिलेटिव क्षमता और सांस्कृतिक गतिविधिय का प्रभाव

नर्मदा जैसी बड़ी नदियों की आत्मसात करने की अपनी एक प्राकृतिक क्षमता (assimilative capacity) होती है। यानी वे एक सीमा तक कार्बनिक पदार्थों और पोषक-तत्वों को अपने प्रवाह, विलयन (dilution) और आत्म-शुद्धीकरण (self-purification) प्रक्रिया के जरिए संभाल सकती हैं। CPCB और विभिन्न जल-गुणवत्ता से जुड़े अध्ययन बताते हैं कि यह क्षमता नदी के प्रवाह, मौसम और प्रदूषण-भार पर निर्भर करती है, और सीमित होती है।

नर्मदा जैसी नदियों में होने वाली धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में दूध, फूल और अन्य जैविक पदार्थों का अर्पण प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह जल में अतिरिक्त कार्बनिक बोझ को बढ़ाता है। यदि यह गतिविधियां बड़े पैमाने पर और बार-बार हों, तो स्थानीय जल-गुणवत्ता पर दबाव बढ़ सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यूट्रोफिकेशन पेयजल गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है और विषैले यौगिकों के जोखिम को बढ़ा सकता है।

आगे की राह और नीति: नर्मदा के संरक्षण के लिए संतुलित दृष्टिकोण

नर्मदा जैसी नदियों पर बढ़ता जैविक भार यह स्पष्ट करता है कि केवल जागरूकता आधारित दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि वैज्ञानिक समझ, नीति-निर्माण और सामुदायिक भागीदारी को एकीकृत करते हुए एक बहु-स्तरीय प्रबंधन ढांचा विकसित किया जाए।

इस संदर्भ में नदी-प्रबंधन नीचे बताए गए कुछ प्रमुख स्तरों पर देखा जा सकता:

  • स्रोत-स्तर पर नियंत्रण (Source-level regulation): नदी में सीधे प्रवेश करने वाले जैविक पदार्थों, जैसे दूध, फूल, प्रसाद जैसी चीजों के अनियंत्रित प्रवाह को नियंत्रित करना सबसे पहले ज़रूरी है। इसके लिए घाट-स्तर पर स्पष्ट दिशानिर्देश, नियंत्रण तंत्र और व्यवहारिक व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे जैविक भार सीधे नदी में प्रवेश न करे।

  • सीमित आत्मसात क्षमता का पालन: हर नदी की सीमित प्राकृतिक आत्म-शोधन क्षमता होती है, जिसे ध्यान में रखते हुए प्रदूषण-भार को नियंत्रित करना आवश्यक है ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।

  • वैकल्पिक एवं पर्यावरण अनुकूलन व्यवस्थाएं (Eco-friendly practices): धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से पैदा होने वाले जैविक सामग्री के लिए नदी पर निर्भरता को ख़त्म करके एक विकल्प को विकसित करना आवश्यक है। इसमें अलग संग्रह प्रणाली, कम्पोस्टिंग व्यवस्था और घाटों पर नियंत्रित विसर्जन ढांचा शामिल हो सकता है, जिससे प्रत्यक्ष नदी प्रदूषण को न्यूनतम किया जा सके।

  • रियल-टाइम जल-गुणवत्ता निगरानी: घुलित ऑक्सीजन (DO), BOD, pH और पोषक-तत्वों के स्तर की निरंतर निगरानी के लिए तकनीक-आधारित प्रणाली विकसित करना ज़रूरी है। इससे प्रदूषण के शुरुआती संकेतों की पहचान संभव हो सकेगी और समय रहते हस्तक्षेप किया जा सकेगा।

  • समुदाय आधारित प्रबंधन (Community participation): UNEP के अनुसार, जल संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं, स्थानीय नागरिकों और प्रशासन को एक साझा ढांचे में शामिल करना आवश्यक है, जिससे व्यवहारिक स्तर पर बदलाव सुनिश्चित हो सके।

  • आस्था और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन: सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखते हुए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे नदी की पारिस्थितिक सीमाओं का उल्लंघन न करें। यही संतुलन दीर्घकालिक जल-स्थिरता और पारिस्थितिक सुरक्षा का आधार है।

नदियों में बढ़ता जैविक और पोषक-तत्वों का भार एक क्रमिक लेकिन गहरी पारिस्थितिक प्रक्रिया को जन्म देता है, जिसमें ऑक्सीजन-सैग से लेकर हाइपोक्सिया और आगे यूट्रोफिकेशन तक की स्थितियां शामिल हैं। यह श्रृंखला बताती है कि नदियों की प्राकृतिक आत्मसात् करने की क्षमता सीमित है और वह अनियंत्रित प्रदूषण को लंबे समय तक संतुलित नहीं कर सकती।

अंततः, नदी प्रदूषण केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि विज्ञान, नीति और सामाजिक व्यवहार के बीच संतुलन का प्रश्न है। टिकाऊ समाधान तभी संभव है जब मानवीय गतिविधियां नदी की पारिस्थितिक सीमाओं को समझते हुए, जिम्मेदार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ संचालित की जाएं।

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