डंबूर झील, त्रिपुरा
फोटो - थॉमस मैल्सन
भारत में कितने तालाब और कितनी झीलें हैं?
भारत में जल संकट अब केवल पानी की कमी का प्रश्न नहीं रह गया है; यह उन जल स्रोतों के सिकुड़ने की कहानी भी है जिन्होंने सदियों तक हमारी बस्तियों, खेती और भूजल को सहारा दिया। खेतों में सिंचाई हो या फिर हर घर जल जैसी योजनाओं के माध्यम से घर-घर पाइप बिछाना। पानी लाना है तो जल निकाय चाहिए ही चाहिए। क्योंकि मीठे पानी के वही एक मात्र विकल्प हैं।
ऐसे में अगर भारत में मीठे पानी के स्रोतों की बात करें तो देश् में करीब 24 लाख जल निकाय हैं। ये वो जल निकाय हैं जिनका डाटा सरकारी आंकड़ों में दर्ज है। इन आंकड़ों में आप देख सकते हैं कि देश में कितनी झीलें हैं, कितने तालाब हैं, कितने टैंक हैं, कितने जलाशय या चेक डैम हैं। इन सबकी गणना जल निकाय गणना 2023 के तहत की गई थी।
जल निकाय गणना
देश की पहली “जल निकाय गणना 2023 (Water Bodies Census) की रिपोर्ट अप्रैल 2023 में जारी की गई थी। 33 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वेक्षण के बाद तैयार इस रिपोर्ट में झील, तालाब, जलाशय, टैंक, स्टेप वेल, आदि की गणना की गई। 5 फरवरी 2026 को जब सदन में अपडेटेड डाटा पर एक सवाल किया गया तो जल शक्ति मंत्री कौशलेंद्र कुमार ने 2023 की गणना का डाटा प्रस्तुत किया।
जल-निकायों की संख्या में तेज़ी से आ रही गिरावट के पीछे का कारण भूमि उपयोग के तरीक़ों में आने वाले बदलाव हैं।
चित्र: पीआईबी
क्या कहती है जल निकाय जनगणना 2023 की रिपोर्ट?
भारत के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा की गई गणना के अनुसार:
देश में 24,24,540 जल निकाय (water bodies) हैं।
इनमें से 97.1 फ़ीसद यानि 23,55,055 जल-निकाय ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, और 2.9 फ़ीसद (69,485) शहरी क्षेत्रों में।
देश में तालाबों की संख्या सबसे अधिक लगभग 59.5 फ़ीसद (14,42,993) है।
टैंक - 3,81,805, रिज़र्वायर - 2,92,280, जल संरक्षण संरचनाएं/चेक डेम - 2,26,217 और झीलें - 22,361 हैं।
सदन में आधिकारिक उत्तर के अनुसार, इन कुल 24,24,540 जल निकायों में से 20,30,040 जल निकाय वर्तमान में उपयोग में हैं। इसका मतलब है कि लगभग 3.94 लाख जल स्रोत या तो निष्क्रिय हो चुके हैं, सूख चुके हैं, या उपयोग करने लायक़ नहीं रह गए हैं।
झीलों की स्थिति विशेष रूप से अधिक चिंताजनक है। कुल 22,361 झीलों में से केवल 9,558 ही उपयोग में दर्ज की गई हैं।
सेंसस के दौरान जल स्रोतों की गिनती वैज्ञानिक और सर्वे‑आधारित तरीके से की गई। इस गिनती के परिणाम स्वरूप कुछ निष्कर्ष निकाले गए जिनमें से कुछ प्रमुख निष्कर्ष हैं:
इस गणना में प्राकृतिक और मानव-निर्मित (man-made) दोनों प्रकार के जल निकायों को शामिल किया गया है।
झीलों की संख्या की तुलना में तालाब और टैंकों की संख्या अधिक है।
जल निकायों का विभाजन सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत दोनों प्रकार के मालिकाना हक़ों के अनुसार किया गया है।
देश में लगभग 55.2 फ़ीसद जल-निकाय निजी हैं वहीं सार्वजनिक निकायों की संख्या 44.8 फ़ीसद है।
भौगोलिक स्थिति के अनुसार भी जल-निकायों का विभाजन स्पष्ट है। ज़्यादातर जल निकाय ग्रामीण इलाकों में हैं।
पिछली गणना से क्या बदलाव आए हैं?
इससे पहले भारत में पहले कभी “जल निकाय गणना” जैसी राष्ट्रीय‑स्तर की विस्तृत गणना नहीं हुई थी। 2023 के इस केंद्रीय डेटाबेस में हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के तालाब, झील और जलाशयों रिकॉर्ड किया गया।
भारत में जल निकायों की राज्य-वार संख्या
साल 2023 की यह रिपोर्ट वास्तव में पहली राष्ट्रीय जनगणना है जिसे जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन विभाग (जल शक्ति मंत्रालय) ने छठी लघु सिंचाई गणना (2018-19) के साथ मिलकर तैयार किया।
इसमें देश भर में मौजूद सभी प्रकार के जल निकायों की उनके आकार, उपयोग, स्थिति, अधिकांश के GPS‑आधारित रिकॉर्ड और शहरी‑ग्रामीण विभाजन सहित जानकारी इकट्ठा की गई।
सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि कुल जल निकायों में लगभग 16 फ़ीसद जल स्रोत उपयोग से बाहर हैं।
चित्र: पीआईबी
इसका मतलब यह है कि पहली बार ऐसा सर्वे हुआ है, और इसलिए जल-निकाय गणना से जुड़ी कोई संख्या उपलब्ध नहीं थी, जिससे सीधे इसकी तुलना की जा सके। पिछली बार की “पंक्तिगत या क्षेत्रीय सर्वे रिपोर्ट” के बजाय अब पहली बार एक अखिल भारतीय, वैज्ञानिक आधार वाला डेटाबेस उपलब्ध हुआ है।
हालांकि इससे पहले सरकार के पास कुछ इन्वेंटरी डेटासेट थे (जैसे जलाशयों को मरम्मत‑पुन:निर्माण के लिए इंडेक्स किया जाता था, या केवल उन्हीं जल निकायों का रिकॉर्ड था जो केंद्रीय योजनाओं के दायरे में आते थे), लेकिन वह एक व्यापक, सर्वत्र लागू गणना नहीं थी जैसा कि 2023 में पहली बार हुआ है।
इसलिए, पिछली गणना से तुलना वाली बात इस अर्थ में सही है कि अब तक ऐसा कोई देशव्यापी रिकॉर्ड नहीं था जिससे निकायों की संख्या घटने या बढ़ने का तुलनात्मक आंकड़ा मिल सके। इसीलिए 2023 रिपोर्ट को भारत की पहली राष्ट्रीय जल निकाय गणना कहा जाता है।
जल स्रोतों की वर्तमान स्थिति कितनी चिंताजनक है?
तालाब, झीलों और नदियों जैसे हमारे पारंपरिक जल स्रोत तेजी से घट रहे हैं:
बहुत से जल निकाय सूख रहे या भरे नहीं हो रहे।
शहरों में नालों और भूमि उपयोग के दबाव से जल स्रोत दब रहे हैं।
कुछ महानगरों में झीलें और कुएं अतिक्रमण और प्रदूषण से जूझ रहे हैं।
ये संकेत है कि जल स्रोतों की गुणवत्ता, भराव और उपयोगिता पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि कुल जल निकायों में लगभग 16 फ़ीसद जल स्रोत उपयोग से बाहर हैं, जो इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करता है। यदि झीलों को अलग से देखें, तो आधे से भी कम सक्रिय हैं। यह केवल संख्या में कमी नहीं, बल्कि जल संरचनाओं की कार्यक्षमता में गिरावट का संकेत है।
तालाबों, झीलों और नदियों की संख्या घटने के कारण
जल-निकायों की संख्या में तेज़ी से आ रही गिरावट के पीछे का कारण भूमि उपयोग में बदलाव और बुनियादी समस्याएं हैं:
अतिक्रमण: नदियों- तालाबों के किनारे निर्माण। जल शक्ति मंत्रालय ने लोकसभा में यह भी स्वीकार किया है कि कई राज्यों में जल निकायों पर अवैध अतिक्रमण और निर्माण एक गंभीर समस्या है, और राज्यों को भूमि अभिलेखों तथा शहरी नियोजन प्रक्रिया में जल स्रोतों को अनिवार्य रूप से शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रदूषण: कचरा और औद्योगिक उत्सर्जन झीलों को प्रभावित कर रहे हैं।
गैर‑वैज्ञानिक विकास योजनाएं: जल निकायों की मरम्मत कम और उनकी अनदेखी ज़्यादा।
वर्षा पैटर्न में बदलाव: कम वर्षा और कभी‑कभी अत्यधिक सूखा।
इन कारणों से जल स्रोतों का अस्तित्व घटता जा रहा है।
भूजल पर पड़ने वाला असर
तालाब, झीलें और नदियां भूजल रिचार्ज के मुख्य स्रोत हैं। जब ये जल स्रोत कमजोर होने लगते हैं तो:
जल का भू‑स्तर गिरता है।
किसानों को गहरी बोरिंग करनी पड़ती है,
पेयजल संकट बढ़ता है।
ख़ास कर पश्चिमी और दक्षिणी भारत जैसे हिस्सों में भूमिगत जलस्तर गिरने की समस्या दिन‑प्रतिदिन बढ़ रही है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) ने National Aquifer Mapping (NAQUIM) के तहत देश के लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर मापनीय क्षेत्र की aquifer mapping पूरी कर ली है, ताकि recharge planning और भूजल प्रबंधन को वैज्ञानिक आधार दिया जा सके।
जल संरक्षण और जल निकायों को पुनर्जीवित करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार मिल कर कार्य कर रही हैं।
चित्र: पीआईबी
सरकार के संरक्षण और पुनर्जीवन प्रयास
सरकार कई योजनाओं के माध्यम से प्रयास कर रही है:
अमृत सरोवर योजना: गांवों में तालाब और जलाशयों का पुनर्निर्माण।
अटल भूजल योजना: भूजल संरक्षक नीतियां।
जीयो-टैगिंग और निगरानी अभियान: जैसे कि उत्तर प्रदेश में तालाबों के जीयो-टैगिंग और पुनर्जीवित करने के आदेश दिए गए।
फरवरी 2026 में लोकसभा मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत डाटा के अनुसार पिछले पांच वर्षों में जल निकायों की मरम्मत, नवीनीकरण और पुनर्जीवन के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना - हर खेत को पानी (PMKSY-HKKP) के अंतर्गत 376.12 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की गई है। इसके अलावा वित्त वर्ष 2025-26 में 218.265 करोड़ रुपये की अतिरिक्त स्वीकृति भी जारी की गई है।
पुनर्जीवन के प्रयास के सफल उदाहरण
केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर उपलब्ध विभिन्न आंकड़ों के अनुसार ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट के लिए -
देश के अलग-अलग राज्यों में हजारों की संख्या जल निकायों को पुनर्जीवित किया गया। इस कार्य के लिए केंद्र की ओर से धनराशि भी उपल्ब्ध करायी गई।
उदाहरण के लिए, कच्छ (गुजरात) ने लगभग 910 पुराने जल स्रोतों को पुनः पंजीकृत/पुनर्स्थापित किया।
उपलब्ध डाटा के अनुसार पांच राज्यों में केवल बिहार, गुजारत, मणिपुर, नागालैंड, ओडिशा, राजस्थान और तमिलनाडु को ही 376.12 करोड़ रुपए की सहायता प्रदान की गई।
ओडिशा को सबसे अधिक केंद्रीय सहायता प्रदान की गई - 2020-21 में 34.54 करोड़ रुपए, 2022-23 में 11.10 करोड़, 2023-24 में 56.25 करोड़ और 2024-25 में 46.67 करोड़, यानि कि पांच वर्षों में 148.67 करोड़ रुपए राज्य को जल निकायों की मरम्मत के लिए दिए गए।
तमिलनाडु को 2020-21 में 1.25 करोड़ रुपए, 2021-22 में 17.43 करोड़, 2022-23 में 27.70 करोड़, 2023-24 में 49.6 करोड़ और 2024-25 में 26.98 करोड़, यानि कि पांच वर्षों में 122.96 करोड़ रुपए दिए गए।
राष्ट्रीय स्तर पर जल शक्ति अभियान: कैच द रेन के तहत कृत्रिम भूजल रिचार्ज और जल भंडारण के 27.62 लाख कार्य शुरू किए गए, जिनमें से 23.83 लाख कार्य 31 मई 2025 तक पूरे किए जा चुके थे। यह दर्शाता है कि जल संरक्षण को अब मिशन मोड में लिया जा रहा है।
परंपरागत जल संरचनाओं की भूमिका
भारत की पारंपरिक प्रणालियां - बावड़ी, कुएं, जोहड़ और तालाब - सदियों से पानी से जुड़ी स्थानीय समस्याओं का हल रही हैं।
ये पानी को भूजल में वापस रिचार्ज करने में मदद करती हैं।
स्थानीय जीवन, खेती और घरेलू ज़रूरतों का आधार रही हैं।
पारंपरिक संरचनाओं की प्रासंगिकता
जल भंडारण की पारंपरिक संरचनाएं आज भी बेहद प्रासंगिक और उपयोगी हैं:
पानी का सुरक्षित भंडारण
मानसून के दौरान रिचार्ज का सर्वोत्तम माध्यम
स्थानीय पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखना
उनके डिजाइन सरल, प्रभावी और टिकाऊ होते हैं।
भारत की पारंपरिक प्रणालियां - बावड़ी, कुएं, जोहड़ और तालाब - सदियों से पानी से जुड़ी स्थानीय समस्याओं का हल रही हैं।
चित्र: पीआईबी
जल निकायों के संरक्षण के लिए क्या कर रही है सरकार?
जल संरक्षण और जल निकायों को पुनर्जीवित करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार मिल कर कार्य कर रही हैं। इनमें केंद्र द्वारा चलायी जा रहीं योजनाएं व अभियान इस प्रकार हैं-
जल निकायों का रीयल-टाइम डाटा कलेक्शन
भारत सरकार
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) द्वारा वाटर बॉडी इन्फॉर्मेशन सिस्टम के तहत देश भर में 10 हेक्टेयर से अधिक बड़े जल निकायों की रीयल टाइम मॉनीटरिंग सेटेलाइट द्वारा की जाती है। इसके तहत हर महीने डाटा को अपडेट किया जाता है। अगर आप वर्तमान में जल निकायों - मेजर रिज़रवॉयर, मीडिय रिज़रवॉयर और छोटे जल निकायों के पानी से कवर क्षेत्रफल को जानना चाहते हैं तो https://bhuvan-wbis.nrsc.gov.in/ पर देख सकते हैं। इस वेबसाइट पर आप वर्ष व महीना चुन कर बीते वर्षों से तुलना भी कर सकते हैं। यह वेबसाइट केवल राष्ट्रीय डाटा ही नहीं बल्कि राज्य-वार डाटा और बेसिन - वार डाटा भी उपलब्ध कराती है।
22 मार्च 2025 को “जल संचय, जन भागीदारी: जन जागरूकता की ओर” थीम के साथ इस अभियान की शुरुआत की गई। जल संचय-जन भागीदारी (JSJB) का उद्देश्य समाज और सरकार के साझा प्रयासों के माध्यम से पानी की हर बूंद को संरक्षित करना है, ताकि जल संरक्षण को एक जन-आंदोलन का रूप दिया जा सके।
इस अभियान के तहत समाज-व्यापी और सरकार-व्यापी दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिससे जल संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी न रहकर आम लोगों की भागीदारी से भी आगे बढ़े।
JSJB 1.0 के अंतर्गत देश भर में कृत्रिम भूजल पुनर्भरण और जल भंडारण से जुड़े कुल 27.62 लाख कार्य शुरू किए गए, जिनमें से 31 मई 2025 तक 23.83 लाख कार्य पूरे किए जा चुके थे।
जलभृत (Aquifers) की मैपिंग
जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (CGWB) ने ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट एंड रेगुलेशन योजना के तहत एक्विफर मैपिंग और प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया है।
नेशनल एक्विफर मैपिंग (NAQUIM) परियोजना के अंतर्गत देश के लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर के समूचे मानचित्रण योग्य क्षेत्र का कार्य पूरा किया जा चुका है। इसके माध्यम से भूजल भंडारों की स्थिति, उनकी क्षमता और प्रबंधन से जुड़ी जानकारी एकत्र की गई है, ताकि जल संसाधनों के संरक्षण और बेहतर उपयोग की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकें।
जल संचय-जन भागीदारी (JSJB) का उद्देश्य समाज और सरकार के साझा प्रयासों के माध्यम से पानी की हर बूंद को संरक्षित करना है, ताकि जल संरक्षण को एक जन-आंदोलन का रूप दिया जा सके।
जल निकायों पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई
जल निकायों पर रिपोर्ट किए गए अतिक्रमण के मामलों में कार्रवाई करना संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
हालांकि, केंद्र सरकार लगातार राज्य सरकारों को जल निकायों के महत्व के प्रति संवेदनशील और जागरूक कर रही है। इसके साथ ही समय-समय पर राज्यों को यह भी जोर देकर कहा जाता रहा है कि जल निकायों को अतिक्रमण मुक्त रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएँ।
इन कदमों में अवैध निर्माण पर रोक, जल निकायों को भूमि अभिलेखों (लैंड रिकॉर्ड्स) में दर्ज करना, उन्हें शहरी एवं नगर नियोजन प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाना, तथा अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जैसे उपाय शामिल हैं।
इस तरह केंद्र सरकार नीति और मार्गदर्शन के स्तर पर राज्यों के साथ मिलकर जल निकायों के संरक्षण पर जोर दे रही है।
जल संरक्षण के लिए आगे का रास्ता
जल संकट से निपटने के लिए एक बहु‑आयामी दृष्टिकोण चाहिए:
नीति स्तर पर सुधार की जरूरत
हर जल निकाय का नियमित डेटा बेस अपडेट - यानि कि 2023 के सेंसस के बाद अब अगले सेंसस की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए
अतिक्रमण को रोकने के लिए सख़्त क़ानून - केवल अतिक्रमण हटाने से बात नहीं बनेगी, सख़्त क़ानून भविष्य में इसे रोकने के लिए कारगर होगा।
सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय पहल
ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण - इस कार्य के लिए वाटर वॉलेंटियर नियुक्त करके कार्य में तेजी लायी जा सकती है।
स्थानीय समुदायों की जिम्मेदारी तय - यह बेहद जरूरी है, क्योंकि जमीनी स्तर पर कार्य की जिम्मेदारी नगर निकायों व पंचायत निकायों की होती है।
शिक्षण और जागरूकता - स्कूली पाठयक्रमों को और अधिक व्यवहारिक बनाने की जरूरत है।
यह संकट केवल जल उपलब्धता का नहीं, बल्कि जल संरचनाओं की कार्यक्षमता, संरक्षण और शासन व्यवस्था का संकट है। जब लगभग चार लाख जल स्रोत उपयोग से बाहर हों, तब यह स्पष्ट है कि चुनौती केवल नए जल स्रोत बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा जल निकायों को बचाने की भी है।
जल स्रोतों का संरक्षण अब केवल एक पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है। बल्कि जीवन, कृषि, भूजल सुरक्षा और भविष्य की डेटा‑आधारित नीति निर्माण का आधार भी है। जल निकाय गणना 2023 ने पहली बार देश को इसकी वास्तविक तस्वीर दी है, अब ज़रूरत है इस दिशा में ठोस कदम उठाने की।
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