यमुना में रसायनों के छिड़काव से झाग जाएगा लेकिन प्रदूषण नहीं

ओखला पक्षी विहार के पास प्रदूषित यमुना

ओखला पक्षी विहार के पास प्रदूषित यमुना

आफ़ी / विकिमीडिया कॉमन्स / CC BY-SA 4.0

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Summary
  • दिल्ली के कालिंदी कुंज के पास यमुना में फिर सफेद झाग दिखाई दिया है। छठ पूजा से पहले इसे हटाने के लिए रसायनों के छिड़काव की तैयारी है।

  • यमुना में झाग बनने की एक बड़ी वजह डिटर्जेंट और गंदे पानी में मौजूद रासायनिक पदार्थ हैं।

  • झाग हटाने वाले रसायनों से नदी की सतह पर जमा झाग कम हो सकता है, लेकिन इससे पानी का प्रदूषण खत्म नहीं होता।

  • जून 2025 में दिल्ली का लगभग 64.1 करोड़ लीटर सीवेज प्रतिदिन बिना उपचार के नदी या नालों में जा रहा था।

दिल्ली के कालिंदी कुंज के पास यमुना नदी में एक बार फिर सफेद झाग दिखाई दिया है। छठ पूजा से पहले इसे हटाने के लिए रसायनों के छिड़काव की तैयारी हो रही है। यमुना में झाग की समस्या कई साल पुरानी है। खासकर सर्दियों की शुरुआत में ओखला बैराज और कालिंदी कुंज के आसपास नदी की सतह पर झाग की मोटी परत दिखाई देती है।

इस झाग को हटाने के लिए पहले भी कई बार रसायनों का इस्तेमाल किया गया है। इससे कुछ समय के लिए झाग कम हो जाता है, लेकिन समस्या फिर लौट आती है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि नदी में झाग बनाने वाले पदार्थों का पहुंचना बंद नहीं हुआ है।

दिल्ली में घरों और कारखानों से निकलने वाला गंदा पानी लंबे समय से यमुना को प्रदूषित कर रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या झाग हटाने से नदी का पानी भी साफ हो जाएगा या प्रदूषण रोकने के लिए कुछ और करना होगा?

किस राज्य में कितनी प्रदूषित है यमुना नदी 

यमुना नदी में पानी की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए घुलित ऑक्सीजन (DO), जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) और मल कोलीफॉर्म जैसे मानकों की निगरानी की जाती है। उपलब्ध आंकड़ों में नदी के ऊपरी हिस्से में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है, जबकि दिल्ली में प्रदूषण की गंभीरता बढ़ जाती है। उत्तराखंड के यमुनोत्री और हनुमानचट्टी में घुलित ऑक्सीजन का अधिकतम स्तर 11.2 mg/L और BOD 1 mg/L दर्ज किया गया। इसके विपरीत, दिल्ली के आईटीओ ब्रिज पर BOD 70 mg/L और मल कोलीफॉर्म 92 लाख MPN/100 mL तक दर्ज हुआ। शाहदरा नाले के पास ओखला में मल कोलीफॉर्म का स्तर 1.6 करोड़ MPN/100 mL रहा। 

2025 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा एकत्र किए गए ये आंकड़े नदी के अलग-अलग हिस्सों में पानी की गुणवत्ता में बड़े अंतर को दर्शाते हैं।

यमुना में झाग क्यों बनता है?

यमुना में झाग बनने की एक बड़ी वजह साबुन और डिटर्जेंट में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक पदार्थ हैं। इन्हें सर्फैक्टेंट (Surfactants) कहा जाता है।

ये पदार्थ पानी में आसानी से झाग बनने में मदद करते हैं। जब पानी तेजी से बहता है या ऊंचाई से नीचे गिरता है, तो उसमें हवा मिलती है। ऐसे में पानी में मौजूद ये पदार्थ झाग बना सकते हैं।

घरों में कपड़े और बर्तन धोने के बाद निकलने वाले पानी में डिटर्जेंट होता है। इसी तरह कपड़े धोने वाले बड़े केंद्रों और कुछ कारखानों से निकलने वाले पानी में भी ये पदार्थ मौजूद हो सकते हैं। बिना पर्याप्त उपचार के यह पानी नालों के रास्ते नदी तक पहुंच जाता है।

दिल्ली में ओखला बैराज के पास यह समस्या अधिक दिखाई देती है। यहां पानी ऊंचाई से नीचे गिरता है। इस दौरान पानी में हवा मिलती है और झाग बनने लगता है। पानी में डिटर्जेंट जैसे पदार्थ अधिक हों, तो झाग भी अधिक बन सकता है।

हालांकि, नदी में दिखाई देने वाला हर झाग प्रदूषण के कारण नहीं बनता। कुछ प्राकृतिक पदार्थ भी झाग पैदा कर सकते हैं। लेकिन यमुना में घरेलू और औद्योगिक गंदे पानी के साथ पहुंचने वाले रसायन चिंता का विषय हैं।

यमुना के झाग पर हुए अध्ययन में क्या सामने आया?

दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने यमुना में झाग बनने के कारणों का पता लगाने के लिए द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) से अध्ययन कराया था। यह अध्ययन अप्रैल 2024 से जून 2025 के बीच किया गया।

TERI के अध्ययन में नदी के पानी, उसमें मिलने वाले नालों, कपड़े धोने वाले क्षेत्रों और गंदे पानी के उपचार संयंत्रों की जांच की गई। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि झाग बनाने वाले पदार्थ नदी में कहां से पहुंच रहे हैं।

अध्ययन में पाया गया कि घरों और दूसरे स्थानों से निकलने वाले गंदे पानी के साथ नदी में सर्फैक्टेंट पहुंच रहे हैं। पानी में अमोनिया और फॉस्फेट जैसे पदार्थ भी मिले।

खासकर कपड़े धोने वाले स्थानों से निकलने वाला गंदा पानी इस समस्या की एक बड़ी वजह पाया गया। इन जगहों पर अधिक मात्रा में डिटर्जेंट इस्तेमाल होता है। जब यह पानी बिना उपचार के नालों में छोड़ा जाता है, तो उसके साथ झाग बनाने वाले पदार्थ भी नदी तक पहुंच सकते हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि झाग बनने के पीछे कुछ प्राकृतिक कारण भी हैं। यानी केवल डिटर्जेंट ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।

TERI ने गंदे पानी के बेहतर उपचार और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों की नियमित जांच की जरूरत बताई है। साथ ही ऐसे डिटर्जेंट के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की सलाह दी है, जिनसे पर्यावरण को कम नुकसान हो।

इस अध्ययन से पता चलता है कि यमुना में झाग की समस्या दूर करने के लिए उन जगहों पर ध्यान देना होगा, जहां से गंदा पानी नदी में पहुंचता है।

झाग हटाने के लिए रसायनों का इस्तेमाल कैसे होता है?

यमुना की सतह पर जमा झाग हटाने के लिए डिफोमर (Defoamer) नाम के रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनका काम झाग के बुलबुलों को तोड़ना है।

जब पानी की सतह पर इन रसायनों का छिड़काव किया जाता है, तो झाग की परत टूटने लगती है। इससे कुछ समय के लिए नदी की सतह साफ दिखाई दे सकती है।

लेकिन ये रसायन गंदे पानी को साफ नहीं करते। इनसे पानी में मौजूद सभी हानिकारक पदार्थ खत्म नहीं होते। इसलिए यदि नदी में पहले की तरह गंदा पानी पहुंचता रहे, तो झाग फिर बन सकता है।

इन रसायनों के इस्तेमाल को लेकर कुछ सवाल भी हैं। अलग-अलग डिफोमर में अलग रासायनिक पदार्थ होते हैं। इसलिए पानी और जलीय जीवों पर उनका असर भी अलग हो सकता है।

यमुना
की सतह पर जमा झाग हटाने के लिए डिफोमर (Defoamer) नाम के रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनका काम झाग के बुलबुलों को तोड़ना है।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि नदी में किस रसायन का छिड़काव हो रहा है, उसकी कितनी मात्रा इस्तेमाल की जा रही है और उसका पानी पर क्या असर पड़ रहा है। इसके लिए नियमित जांच जरूरी है।

क्या झाग हटने से नदी का पानी साफ हो जाता है?

नदी की सतह से झाग हटाना और पानी से प्रदूषण दूर करना दो अलग-अलग बातें हैं।

मान लीजिए किसी नाले से बिना उपचार वाला गंदा पानी यमुना में पहुंच रहा है। इस पानी में साबुन और डिटर्जेंट के अलावा मल से आने वाले जीवाणु और दूसरे प्रदूषक भी हो सकते हैं।

यदि नदी में झाग हटाने वाले रसायनों का छिड़काव किया जाए, तो झाग कम हो सकता है। लेकिन इससे नाले से आने वाला गंदा पानी बंद नहीं होगा। पानी में मौजूद दूसरे प्रदूषक भी बने रह सकते हैं।

यमुना कितनी प्रदूषित है, यह जानने के लिए पानी की जांच की जाती है। इसमें मुख्य रूप से तीन मानकों को देखा जाता है।

  • जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD): इससे पता चलता है कि पानी में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को सड़ाने-गलाने के लिए सूक्ष्मजीवों को कितनी ऑक्सीजन चाहिए। BOD अधिक होने का मतलब आमतौर पर पानी में कार्बनिक प्रदूषण अधिक होना है।

  • घुली ऑक्सीजन (DO): पानी में घुली ऑक्सीजन मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के लिए जरूरी है। इसकी कमी से उन्हें नुकसान हो सकता है।

  • फीकल कोलीफॉर्म: ये ऐसे जीवाणु हैं, जिनकी मौजूदगी पानी में मल से होने वाले प्रदूषण का संकेत देती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार नहाने के लिए उपयुक्त पानी में BOD अधिकतम 3 मिलीग्राम प्रति लीटर और घुली ऑक्सीजन कम से कम 5 मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए।

इसलिए केवल झाग हटने से यह नहीं माना जा सकता कि नदी का पानी नहाने के लिए सुरक्षित हो गया है। इसके लिए पानी की जांच जरूरी है।

दिल्ली में कितना गंदा पानी बिना उपचार के नदी तक पहुंच रहा है?

दिल्ली में यमुना के प्रदूषण की एक बड़ी वजह बिना उपचार वाला घरेलू सीवेज है। घरों, बाजारों और दूसरे प्रतिष्ठानों से निकलने वाला गंदा पानी सीवर लाइनों और नालों में जाता है। कई जगह सीवर की व्यवस्था अधूरी होने के कारण यह पानी उपचार संयंत्रों तक नहीं पहुंच पाता।

31 जुलाई 2025 को लोकसभा में दी गई जल शक्ति मंत्रालय की जानकारी के अनुसार दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 359.6 करोड़ लीटर सीवेज निकलने का अनुमान था।

केवल सीवेज उपचार संयंत्र बनाना पर्याप्त नहीं है। घरों और दूसरे प्रतिष्ठानों से निकलने वाला गंदा पानी उन तक पहुंचना भी जरूरी है। साथ ही उपचार के बाद निकलने वाला पानी निर्धारित मानकों के अनुसार साफ होना चाहिए।

उस समय दिल्ली जल बोर्ड के 37 चालू सीवेज उपचार संयंत्रों (STP) की कुल क्षमता लगभग 347.4 करोड़ लीटर प्रतिदिन थी। लेकिन जून 2025 में इन संयंत्रों में प्रतिदिन लगभग 295.5 करोड़ लीटर सीवेज का ही उपचार हो रहा था।

इनमें से 23 संयंत्रों से निकलने वाला पानी दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के निर्धारित मानकों के अनुरूप था। बाकी 14 संयंत्र इन मानकों पर खरे नहीं उतर रहे थे।

सरकारी जानकारी के अनुसार उस समय लगभग 64.1 करोड़ लीटर सीवेज प्रतिदिन बिना उपचार के नदी या नालों में जा रहा था।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि केवल सीवेज उपचार संयंत्र बनाना पर्याप्त नहीं है। घरों और दूसरे प्रतिष्ठानों से निकलने वाला गंदा पानी उन तक पहुंचना भी जरूरी है। साथ ही उपचार के बाद निकलने वाला पानी निर्धारित मानकों के अनुसार साफ होना चाहिए।

यदि उपचार संयंत्र से निकलने वाले पानी में भी प्रदूषण अधिक है, तो वह नदी की स्थिति खराब कर सकता है।

क्या पानी का कम बहाव भी प्रदूषण बढ़ाता है?

यमुना में प्रदूषण की समस्या का संबंध नदी में बहने वाले पानी की मात्रा से भी है।

मानसून के दौरान यमुना में पानी का बहाव अधिक होता है। लेकिन बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद दिल्ली में नदी के कई हिस्सों में पानी कम हो जाता है।

ऐसे समय में यदि नालों से लगातार गंदा पानी मिलता रहे, तो नदी में प्रदूषकों की मात्रा बढ़ सकती है। पानी कम होने से प्रदूषण का असर भी अधिक हो सकता है।

दिल्ली सरकार की यमुना संबंधी रिपोर्ट में भी वजीराबाद के बाद नदी के हिस्सों में प्रदूषण की समस्या का उल्लेख है।

पानी का बहाव कम होने और प्रदूषण बढ़ने से उसमें घुली ऑक्सीजन भी कम हो सकती है। इससे मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को नुकसान पहुंच सकता है।

इसलिए नदी में पर्याप्त पानी का बहाव बनाए रखना जरूरी है। लेकिन केवल अधिक पानी छोड़ना भी प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए गंदे पानी को नदी में जाने से रोकना होगा।

यमुना में झाग की समस्या कैसे दूर होगी?

यमुना में बार-बार झाग बनने की समस्या दूर करने के लिए सबसे पहले उन जगहों पर ध्यान देना होगा, जहां से डिटर्जेंट और दूसरे रसायन नदी में पहुंच रहे हैं।

घरेलू सीवेज और कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी के उपचार की व्यवस्था बेहतर करनी होगी। कपड़े धोने वाले बड़े केंद्रों से निकलने वाले पानी का भी उचित उपचार जरूरी है।

TERI ने अपने अध्ययन में ऐसी तकनीक अपनाने की सिफारिश की है, जिससे गंदे पानी में मौजूद सर्फैक्टेंट जैसे पदार्थों को अधिक प्रभावी ढंग से हटाया जा सके।

यमुना में मिलने वाले प्रमुख नालों की नियमित जांच भी जरूरी है। इससे यह पता चलेगा कि किस नाले से कितना प्रदूषण पहुंच रहा है और उसे रोकने के लिए क्या करना होगा।

इसके अलावा झाग हटाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायनों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। छिड़काव से पहले और बाद में पानी की जांच भी होनी चाहिए। इससे पता चलेगा कि पानी की गुणवत्ता में कोई सुधार हुआ है या केवल झाग कम हुआ है।

यमुना में झाग हर साल दिखाई देता है। छठ पूजा से पहले इसे हटाने की कोशिश भी की जाती है। लेकिन त्योहार समाप्त होने के बाद भी नदी में गंदा पानी पहुंचता रहता है।

यमुना को साफ रखने के लिए सालभर काम करना जरूरी है। इसके लिए सीवेज उपचार, नालों की निगरानी और नदी में पर्याप्त पानी का बहाव बनाए रखने पर ध्यान देना होगा।

यमुना कितनी साफ हुई है, इसका पता केवल झाग कम होने से नहीं चलेगा। असली सुधार तभी माना जाएगा, जब नदी में प्रदूषकों की मात्रा घटे और पानी की गुणवत्ता बेहतर हो।

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