

तीस्ता नदी, रंगपो के पास, सिक्किम
फोटो: पिनकपानी | CC BY 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स
सिक्किम की दो प्रमुख नदियां तीस्ता और रंगीत हैं। राज्य की अधिकांश नदियां और पहाड़ी जलधाराएं तीस्ता नदी प्रणाली से जुड़ी हैं।
तीस्ता का उद्गम उत्तरी सिक्किम के चो लामो झील क्षेत्र से जुड़ा है, जबकि रंगीत पश्चिमी सिक्किम के राथोंग हिमनद क्षेत्र से निकलती है।
सिक्किम की नदियां आगे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश तक बहती हैं। तीस्ता बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ती है।
हिमनदीय झीलों से अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन, नदी कटाव और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा राज्य की प्रमुख जल प्रबंधन चुनौतियां हैं।
सिक्किम पूर्वी हिमालय में स्थित एक पहाड़ी राज्य है। यहां की नदियों को हिमनदों, बर्फ, बारिश और पहाड़ी जलधाराओं से पानी मिलता है। ये नदियां संकरी घाटियों और तेज ढलानों से होकर बहती हैं। इनका पानी पेयजल, खेती, सिंचाई, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
सिक्किम सरकार के अनुसार राज्य का क्षेत्रफल 7,096 वर्ग किलोमीटर है। पहाड़ियों की तेज ढलानों के कारण बारिश का पानी तेजी से नदियों में पहुंचता है। इससे भारी बारिश के दौरान नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। हिमनदों और हिमनदीय झीलों में बदलाव से भी नदियों का बहाव प्रभावित हो सकता है।
सिक्किम सरकार के जल संसाधन एवं नदी विकास विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 में तीस्ता और रंगीत को राज्य की दो प्रमुख नदियों के रूप में दर्ज किया गया है।
सिक्किम सरकार के अनुसार राज्य का क्षेत्रफल 7,096 वर्ग किलोमीटर है। यहां पहाड़ियों की तेज ढलानों के कारण बारिश का पानी तेजी से नदियों में पहुंचता है। इससे भारी बारिश के दौरान नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। हिमनदों और हिमनदीय झीलों में बदलाव से नदियों का बहाव भी प्रभावित हो सकता है।
सिक्किम सरकार के जल संसाधन एवं नदी विकास विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 में तीस्ता और रंगीत को राज्य की दो प्रमुख नदियों के रूप में दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार तीस्ता का संबंध चो लामो झील और रंगीत का राथोंग हिमनद से है।
सिक्किम की अधिकांश नदियां तीस्ता नदी बेसिन का हिस्सा हैं। रंगीत इसकी प्रमुख सहायक नदी है। दोनों में कई छोटी नदियां और पहाड़ी जलधाराएं मिलती हैं।
तीस्ता नदी प्रणाली: यह सिक्किम की मुख्य नदी प्रणाली है। इसका ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र उत्तरी सिक्किम में स्थित है। लाचेन छू, लाचुंग छू, जेमू छू और रंगयोंग छू जैसी नदियां इस प्रणाली का हिस्सा हैं। आगे दिक छू, बाकचा छू, रंगपो छू, रानी खोला और कई दूसरी जलधाराएं इससे जुड़ती हैं। तीस्ता सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की ओर बहती है।
रंगीत नदी प्रणाली: रंगीत, तीस्ता की प्रमुख सहायक नदी है। इसका जलग्रहण क्षेत्र मुख्य रूप से पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी सिक्किम में फैला है। राथोंग छू, रांगभांग, रेल्ली और कालेज खोला इसकी प्रमुख सहायक नदियों में शामिल हैं। रंगीत आगे तीस्ता में मिलती है।
सिक्किम सरकार की वार्षिक रिपोर्ट 2016–17 में तीस्ता और रंगीत की प्रमुख सहायक नदियां दर्ज हैं। दूसरी सरकारी रिपोर्टों में इनके अलावा कई स्थानीय नदियों और जलधाराओं का भी उल्लेख मिलता है।
सिक्किम में कई छोटी-बड़ी नदियां और पहाड़ी जलधाराएं हैं। राज्य की दो प्रमुख नदियां तीस्ता और रंगीत हैं। इनके अलावा लाचेन छू, लाचुंग छू, जेमू छू, रंगयोंग छू और कई दूसरी नदियां तीस्ता नदी प्रणाली का हिस्सा हैं। सिक्किम सरकार की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 और पर्यावरण संबंधी दस्तावेजों के आधार पर 22 प्रमुख नदियों और जलधाराओं की चयनित सूची नीचे दी गई है। इसमें उनके उद्गम या ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र, प्रमुख प्रवाह क्षेत्र और संबंधित नदी प्रणाली की जानकारी शामिल है।
तीस्ता सिक्किम की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। सिक्किम सरकार के जल संसाधन एवं नदी विकास विभाग की रिपोर्ट के अनुसार तीस्ता का उद्गम उत्तरी सिक्किम की चो लामो झील से होता है। चुंगथांग में लाचेन छू और लाचुंग छू के संगम के बाद यह दक्षिण की ओर बहती है। मेल्ली के पास रंगीत नदी इसमें मिलती है। आगे तीस्ता पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश पहुंचती है और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ती है।
रंगीत, तीस्ता की प्रमुख सहायक नदी है। इसका उद्गम पश्चिमी सिक्किम के राथोंग हिमनद क्षेत्र से जुड़ा है। रांगभांग, रेल्ली, राथोंग और कालेज जैसी नदियां इसमें मिलती हैं। रंगीत मेल्ली के पास तीस्ता में मिलती है। इस नदी पर 60 मेगावाट की रंगीत-III जलविद्युत परियोजना स्थापित है।
लाचेन छू और लाचुंग छू उत्तरी सिक्किम की प्रमुख हिमनदीय नदियां हैं। लाचेन छू लाचेन घाटी और लाचुंग छू लाचुंग घाटी से होकर बहती है। दोनों चुंगथांग में मिलती हैं। ल्होनक छू जैसी जलधाराएं लाचेन छू की ऊपरी नदी प्रणाली का हिस्सा हैं।
जेमू छू उत्तरी सिक्किम की प्रमुख हिमनदीय जलधारा है। इसका उद्गम कंचनजंघा क्षेत्र के जेमू हिमनद से जुड़ा है। जेमू छू इस हिमनद से निकलकर तीस्ता नदी प्रणाली में मिलती है।
ल्होनक छू उत्तरी सिक्किम की जलधारा है, जो लाचेन छू नदी प्रणाली से जुड़ी है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में दक्षिण ल्होनक जैसी हिमनदीय झीलें मौजूद हैं। अक्टूबर 2023 में दक्षिण ल्होनक झील से अचानक पानी निकलने के कारण तीस्ता घाटी में विनाशकारी बाढ़ आई थी।
रंगयोंग छू और तालुंग छू उत्तरी सिक्किम की जलधाराएं हैं। इनका जलग्रहण क्षेत्र ऊंचे हिमालयी इलाकों में है। ये जलधाराएं तीस्ता नदी प्रणाली का हिस्सा हैं।
दिक छू सिक्किम की प्रमुख नदियों में शामिल है। यह पहाड़ी क्षेत्रों से होकर बहती है और तीस्ता में मिलती है। इस नदी पर 96 मेगावाट की दिकचू जलविद्युत परियोजना स्थापित है।
रोंगनी छू और रंगपो छू पूर्वी सिक्किम की महत्वपूर्ण नदियां हैं। दोनों तीस्ता नदी प्रणाली से जुड़ी हैं। रंगपो छू रंगपो क्षेत्र से होकर बहती है, जबकि रोंगनी छू पर 113 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना स्थापित है।
रानी खोला, रोरो छू और राते छू गंगटोक क्षेत्र की महत्वपूर्ण जलधाराएं हैं। रानी खोला गंगटोक और रानीपूल से होकर बहती है। रोरो छू स्थानीय जलनिकासी प्रणाली का हिस्सा है, जबकि राते छू गंगटोक की पेयजल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है।
राथोंग छू पश्चिमी सिक्किम के राथोंग हिमनद क्षेत्र से निकलती है। यह रंगीत नदी प्रणाली की महत्वपूर्ण जलधारा है। इसका जलग्रहण क्षेत्र हिमनदों, पहाड़ी ढलानों और वन क्षेत्रों में फैला है।
रांगभांग, रेल्ली और कालेज खोला पश्चिमी सिक्किम की प्रमुख नदियां हैं। सिक्किम सरकार की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 में इन्हें रंगीत की सहायक नदियों के रूप में दर्ज किया गया है। ये नदियां पश्चिमी सिक्किम की पहाड़ी घाटियों से होकर बहती हैं।
सिक्किम की बड़ी नदियों में कई छोटी नदियां और पहाड़ी जलधाराएं मिलती हैं। सिक्किम सरकार के जल संसाधन एवं नदी विकास विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 में तीस्ता और रंगीत की दस प्रमुख सहायक नदियां दर्ज हैं। राज्य की पर्यावरण संबंधी रिपोर्टों और नदी जलग्रहण क्षेत्र के अध्ययन में दूसरी छोटी नदियों और जलधाराओं का भी उल्लेख है।
सिक्किम की नदियों का सामाजिक और आर्थिक महत्व
सिक्किम की नदियां पेयजल, खेती, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी इलाकों में कई गांवों की जलापूर्ति प्राकृतिक झरनों और छोटी जलधाराओं पर निर्भर करती है। वहीं, तीस्ता और रंगीत जैसी नदियों का उपयोग जलविद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है।
नदियों और उनसे जुड़ी घाटियों का स्थानीय खेती, मत्स्य पालन और पर्यटन में भी महत्व है। हालांकि ऊंचाई पर बसी बस्तियों तक नियमित पानी पहुंचाना आसान नहीं है।
सिक्किम में प्राकृतिक झरनों के संरक्षण के लिए धारा विकास (Dhara Vikas) कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके तहत झरनों के जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान और भूजल पुनर्भरण के उपायों पर काम किया गया। पहाड़ी इलाकों में पेयजल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह पहल महत्वपूर्ण है।
सिक्किम की पहाड़ी नदियों में तेज बहाव और ऊंचाई का अंतर जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। तीस्ता और रंगीत नदी प्रणाली पर कई बड़ी और छोटी जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित की गई हैं।
सिक्किम सरकार के ऊर्जा विभाग और एनएचपीसी की परियोजना सूचियों में निम्न परियोजनाओं की स्थापित क्षमता दर्ज है।
नोट: तालिका में जलविद्युत परियोजनाओं की स्थापित क्षमता दी गई है। अक्टूबर 2023 की बाढ़ और उसके बाद हुए नुकसान के कारण कुछ परियोजनाओं का संचालन प्रभावित हुआ। उनकी मौजूदा उत्पादन स्थिति अलग हो सकती है।
अक्टूबर 2023 की तीस्ता बाढ़ में तीस्ता-III और तीस्ता-V जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुई थीं। इस घटना ने पहाड़ी नदी घाटियों में जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा और नियमित निगरानी की जरूरत को सामने रखा।
सिक्किम में हिमनदीय झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ एक गंभीर खतरा है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (Glacial Lake Outburst Flood-GLOF) कहा जाता है।
3-4 अक्टूबर 2023 को उत्तरी सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से अचानक पानी निकलने के कारण तीस्ता घाटी में विनाशकारी बाढ़ आई थी। तेज बहाव के साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी और मलबा भी नदी में पहुंचा।
इस बाढ़ से सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं। चुंगथांग के पास स्थित 1,200 मेगावाट की तीस्ता-III परियोजना को भी गंभीर नुकसान पहुंचा।
सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की आपदा-पश्चात आवश्यकता आकलन रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ से लगभग 88,400 लोग प्रभावित हुए। रिपोर्ट में प्रभावित बस्तियों, सड़क संपर्क, जलापूर्ति और दूसरे बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का भी विवरण है।
यह घटना बताती है कि सिक्किम में नदी प्रबंधन के लिए केवल भारी बारिश की निगरानी पर्याप्त नहीं है। हिमनदीय झीलों की नियमित निगरानी भी जरूरी है।
सिक्किम में भारी बारिश के दौरान भूस्खलन का खतरा रहता है। पहाड़ियों से गिरने वाली मिट्टी, पत्थर और मलबा नदियों तक पहुंच सकता है।
कई बार भूस्खलन से नदी का रास्ता आंशिक रूप से बंद हो जाता है। इससे पानी जमा होने और बाद में अचानक तेज बहाव का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए संवेदनशील नदी घाटियों में पहाड़ी ढलानों, नदी के जलस्तर और मलबे के जमाव की नियमित निगरानी जरूरी है।
सिक्किम की नदियां तेज ढलानों से होकर बहती हैं। भारी बारिश के समय पहाड़ियों की मिट्टी बहकर नदी में पहुंच सकती है। जंगलों की कटाई, सड़क निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव से कुछ क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है।
नदियों के साथ बहकर आने वाली मिट्टी जलाशयों में गाद के रूप में जमा होती है। इससे जलाशयों की भंडारण क्षमता कम हो सकती है।
जलाशयों में गाद जमने से बिजली उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। एनएचपीसी ने तीस्ता नदी की पश्चिम बंगाल स्थित एक जलविद्युत परियोजना के जलाशय में भारी गाद जमने और भंडारण क्षमता प्रभावित होने का उल्लेख किया है। इससे तीस्ता नदी प्रणाली में गाद प्रबंधन की जरूरत स्पष्ट होती है।
सिक्किम की नदियों और छोटी जलधाराओं के लिए घरेलू गंदा पानी और ठोस कचरा चिंता का विषय हो सकते हैं। खासकर शहरी इलाकों में इनसे होने वाला प्रदूषण आगे बड़ी नदियों तक पहुंच सकता है।
सिक्किम राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राज्य में प्रदूषित नदी खंडों के सुधार के लिए नदी पुनर्जीवन कार्ययोजना तैयार की है। इसके तहत पानी की गुणवत्ता सुधारने और प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण के उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
गंगटोक और दूसरे आबादी वाले क्षेत्रों में सीवेज उपचार, कचरा प्रबंधन और पानी की नियमित जांच जरूरी है।
सिक्किम में कई नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाई गई हैं। इनसे बिजली उत्पादन होता है, लेकिन बांध, जलाशय और पानी मोड़ने वाली संरचनाएं नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं।
बिजली उत्पादन के लिए नदी का पानी मोड़ने या जलाशय में जमा करने से कुछ हिस्सों में पानी की मात्रा बदल सकती है। इसलिए परियोजनाओं के संचालन में पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखना जरूरी है।
अक्टूबर 2023 की बाढ़ ने हिमालयी नदी घाटियों में बांधों और दूसरी बड़ी संरचनाओं की सुरक्षा के प्रश्न को भी सामने रखा। ऐसे क्षेत्रों में बाढ़ जोखिम, भूस्खलन और संभावित मलबा प्रवाह को ध्यान में रखकर परियोजनाओं की सुरक्षा का आकलन जरूरी है।
सिक्किम में अच्छी बारिश होने के बावजूद सभी क्षेत्रों में नियमित पेयजल आपूर्ति आसान नहीं है।
राज्य की कई बस्तियां ऊंचाई पर हैं, जबकि मुख्य नदियां घाटियों में बहती हैं। ऐसे क्षेत्रों में पानी को ऊपर तक पहुंचाने के लिए अतिरिक्त ढांचे की जरूरत पड़ती है।
कई गांवों में पेयजल के लिए प्राकृतिक झरनों पर निर्भरता है। यदि इन झरनों के जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचता है, तो स्थानीय जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है।
सिक्किम में नदियों, झरनों और जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण के लिए विभिन्न कार्यक्रम और योजनाएं बनाई गई हैं। इनमें नदी तट संरक्षण, सिंचाई सुविधाओं का विकास, जल गुणवत्ता की निगरानी, प्राकृतिक झरनों का पुनर्जीवन और आपदा जोखिम कम करने के उपाय शामिल हैं।
सिक्किम सरकार की जल संसाधन एवं नदी विकास विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 के अनुसार विभाग ने नदी तट संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, जलनिकासी और छोटी सिंचाई योजनाओं पर काम किया था।
रिपोर्ट में राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना के तहत नदियों, जलाशयों और आर्द्रभूमियों का मानचित्रण करने तथा जल संबंधी आंकड़े जुटाने की व्यवस्था विकसित करने का भी उल्लेख है।
सिक्किम की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2016 में धारा विकास कार्यक्रम को प्राकृतिक झरनों के पुनर्जीवन की महत्वपूर्ण पहल के रूप में दर्ज किया गया है।
अक्टूबर 2023 की तीस्ता बाढ़ के बाद हिमनदीय झीलों की निगरानी और बाढ़ से पहले चेतावनी देने वाली व्यवस्थाओं का महत्व और बढ़ गया है।
सिक्किम की नदियों के संरक्षण के लिए उनके पूरे जलग्रहण क्षेत्र पर ध्यान देना जरूरी है। यहां नदियों का पानी हिमनदों, झरनों, जंगलों और छोटी पहाड़ी जलधाराओं से आता है। इसलिए केवल मुख्य नदी की सफाई या तट संरक्षण से सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।
हिमनदीय झीलों की नियमित निगरानी, भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान और संवेदनशील नदी घाटियों में पूर्व चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। इससे अचानक आने वाली बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।
जलविद्युत परियोजनाओं के आसपास नदी प्रवाह, गाद, जल गुणवत्ता और बांधों की सुरक्षा की नियमित जांच होनी चाहिए। इसके साथ नदी का स्वाभाविक बहाव और स्थानीय लोगों की पानी की जरूरतें भी ध्यान में रखनी होंगी।
शहरी क्षेत्रों में गंदे पानी और कचरे को नदियों तक पहुंचने से रोकना भी महत्वपूर्ण है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक झरनों और उनके जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण पेयजल की उपलब्धता बनाए रखने में मदद कर सकता है।
सिक्किम की नदियां राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। तीस्ता और रंगीत का पानी आगे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश तक पहुंचता है। इसलिए नदी प्रबंधन में राज्य की सीमाओं के बाहर के क्षेत्रों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
नदियों और उनके जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण केवल पानी की उपलब्धता का सवाल नहीं है। इससे खेती, पेयजल, बिजली उत्पादन, स्थानीय आजीविका और नदी किनारे रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी जुड़ी हुई है।
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