उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में नौला सदियों से जल संरक्षण की एक अद्भुत पारंपरिक प्रणाली रही है।

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में नौला सदियों से जल संरक्षण की एक अद्भुत पारंपरिक प्रणाली रही है।

चित्र: peoplesscienceinstitute.org

कुमाऊं का नौला: उत्तराखंड की प्राचीन जल विरासत कैसे आज भी पहाड़ों की प्यास बुझा रही है।

कुमाऊं के पहाड़ों में सदियों पुरानी यह जल संरचना आज भी जल सुरक्षा, सामुदायिक स्मृति और जलवायु अनुकूलन का रास्ता दिखाती है।
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पहाड़ों में पानी की कहानी मैदानों से अलग होती है। यहां नदी पास दिखती है, पर हर घर तक उसका पानी पहुंचना आसान नहीं होता। तेज़ ढलान, बिखरी बसावट, अनिश्चित बारिश और बदलता मौसम मिलकर जीवन की संवेदनशीलता को बढ़ा देते हैं।

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सदियों से लोग इस चुनौती के साथ जीते आए हैं। इस इलाक़े के लोगों ने पानी को केवल उपयोग की चीज नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और सामुदायिक बुद्धिमत्ता का हिस्सा माना। इसी साझा समझ और सूझबूझ से एक अद्भुत पारंपरिक जल संरचना का जन्म हुआ जिसे स्थानीय भाषा में नौला का नाम दिया गया।

क्या है नौला

विशेषज्ञों का मानना है कि नौला हिमालयी क्षेत्रों की स्थानीय जल-वैज्ञानिक समझ का उत्कृष्ट उदाहरण है।

नौला उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सदियों से जल संरक्षण की एक अद्भुत पारंपरिक प्रणाली रही है। पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक चुनौतियों, तेज़ ढलानों, सीमित सतही जल और मौसम की अनिश्चितता के बीच यह संरचना स्थानीय समुदायों के लिए जीवनरेखा की तरह काम करती रही है। 

सरल शब्दों में कहा जाए तो नौला एक पत्थरों से घिरा, ढका हुआ छोटा जलाशय होता है, जिसमें प्राकृतिक झरनों या भूमिगत रिसाव से आने वाला पानी इकट्ठा किया जाता है। इसे आमतौर पर पहाड़ी ढलानों पर उस जगह बनाया जाता है जहां जमीन के भीतर से पानी लगातार रिसता रहता है। 

जल को सुरक्षित रखने के लिए इसकी दीवारें पत्थर की चिनाई से बनाई जाती हैं और कई बार ऊपर से इसे ढक भी दिया जाता है, ताकि पानी स्वच्छ रहे और उसका वाष्पीकरण भी कम हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि नौला हिमालयी क्षेत्रों की स्थानीय जल-वैज्ञानिक समझ का उत्कृष्ट उदाहरण है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के अनुसार, नौला उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की विशिष्ट पारंपरिक जल-संरचना है, जो प्राकृतिक स्रोतों से रिसने वाले जल को समुदायों के उपयोग के लिए सुरक्षित रखती है। 

स्थानीय समाज में नौला केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का केंद्र भी रहा है। इनकी सफाई, मरम्मत और संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी मानी जाती थी। कई गांवों में आज भी पाइपलाइन व्यवस्था के कमजोर होने पर नौले पेयजल के भरोसेमंद स्रोत बने हुए हैं।

दरअसल, नौला हमें यह समझाता है कि जल संरक्षण की टिकाऊ प्रणालियां हमेशा आधुनिक तकनीक से ही नहीं आतीं, बल्कि कई बार उनका आधार सदियों पुराना स्थानीय ज्ञान और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन-पद्धति होती है।

नौला कैसे काम करता है?

नौला दरअसल पहाड़ की जल-प्रणाली को समझकर बनाया गया एक अत्यंत सूझबूझ भरा एक ढांचा है जिसे जल-संग्रह के लिए बनाया जाता है। इसे आमतौर पर उन स्थानों पर बनाया जाता है जहां पहाड़ी ढलानों के भीतर से पानी धीरे-धीरे रिसकर बाहर आता है।

अध्ययन बताते हैं कि बारिश का पानी और ऊपरी इलाकों से आने वाली नमी मिट्टी और चट्टानों की परतों से छनकर नीचे पहुंचती है। यही पानी भूमिगत स्तर पर जमा होकर छोटे प्राकृतिक स्रोतों के रूप में बाहर निकलता है। स्थानीय समुदाय इन रिसाव बिंदुओं की पहचान कर वहां पत्थरों से घिरा एक संरक्षित जलाशय बना देते थे। यह जलाशय ही नौला कहलाता है। 

नौलों की संरचना भी अपने आप में अनोखी होती है। इनमें अक्सर नीचे जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती हैं, जिससे लोग पानी तक आसानी से पहुंच सकें। कई पुराने नौले दिखने में इतने सुंदर हैं कि दिखने में छोटे मंदिरों जैसे लगते हैं। पत्थर के स्तंभ, नक्काशीदार छज्जे और कभी-कभी देवी-देवताओं की आकृतियां इस बात का संकेत देती हैं कि पानी को इन इलाक़ों में केवल संसाधन नहीं, बल्कि पवित्र तत्व माना गया है।

दरअसल, यह एक तरह का प्राकृतिक फिल्ट्रेशन और स्टोरेज सिस्टम है। पानी चट्टानों और मिट्टी की परतों से छनकर आता है, जिससे उसमें स्वाभाविक शुद्धता बनी रहती है।

यह संरचना इस बात का भी प्रमाण है कि स्थानीय समाज को पहाड़ के भूगोल, जल-चक्र और मिट्टी की प्रकृति की कितनी गहरी समझ थी। बिना आधुनिक उपकरणों के भी उन्होंने ऐसे जल स्रोत विकसित किए, जो मौसम और भू-आकृति के अनुकूल टिकाऊ साबित हुए।

नौला दरअसल पहाड़ की जल-प्रणाली को समझकर बनाया गया एक अत्यंत सूझबूझ भरा एक ढांचा है जिसे जल-संग्रह के लिए बनाया जाता है।

जल संरचना से आगे: एक सांस्कृतिक विरासत

नौले इस बात का प्रमाण हैं कि पारंपरिक समाजों के पास स्थानीय भूगोल और जल-चक्र की गहरी समझ थी। हिमालयी जल संरचनाओं पर हालिया अध्ययनों में नौलों को “हेरिटेज वॉटर आर्किटेक्चर” यानी जल विरासत स्थापत्य के रूप में भी देखा गया है, जो पारंपरिक जल ज्ञान, स्थानीय स्थापत्य कला और सामुदायिक जीवन के अद्वितीय संगम का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हिमालयी ढलानों पर वर्षा का पानी चट्टानों और मिट्टी से रिसकर नीचे आता है। इसी रिसाव को पहचानकर नौले बनाए जाते थे। इनका स्थान चुनना कोई साधारण काम नहीं था, इसके लिए स्थानीय लोगों के पास पीढ़ियों से संचित अनुभव और ज्ञान होता था।

यह एक तरह से प्राकृतिक एक्विफ़ायर (aquifer recharge system) प्रणाली का स्थानीय संस्करण था।

दरअसल नौला केवल एक तकनीकी जल संरचना नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति, आस्था और सामुदायिक जीवन का भी अभिन्न हिस्सा रहा है।

नौले इस बात का प्रमाण हैं कि पारंपरिक समाजों के पास स्थानीय भूगोल और जल-चक्र की गहरी समझ थी।

पारंपरिक जल प्रबंधन पर किए गए अध्ययनों में यह स्पष्ट है कि पहाड़ों में जल स्रोतों को केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि पवित्र और जीवनदायी तत्व माना जाता था। इसी कारण कई नौलों का निर्माण मंदिरों, देवस्थलों, पवित्र वृक्षों या पवित्र गुफाओं के आसपास किया गया। कई पुराने नौलों की दीवारों और प्रवेश द्वारों पर देवी-देवताओं, विशेषकर भगवान विष्णु और स्थानीय देवताओं की नक्काशी भी देखने को मिलती है।

इन्हीं अध्ययनों में इसे सामुदायिक संरक्षकता का एक सशक्त उदाहरण भी बताया गया है। दरअसल कुमाऊं की जल संस्कृति में पानी के प्रति यह सम्मान केवल प्रतीकात्मक नहीं था। जल स्रोतों की देखभाल को सामाजिक अनुशासन का हिस्सा माना जाता था। स्थानीय समुदाय समय-समय पर नौलों की सफाई, मरम्मत और आसपास के क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करते थे।

इस सांस्कृतिक जुड़ाव का असर स्थानीय रीति-रिवाजों में भी दिखाई देता है। कुछ क्षेत्रों में विवाह के बाद नवविवाहित जोड़े का नौले पर जाकर जल अर्पित करना या वहां पहली बार साथ में पानी भरना एक परंपरा मानी जाती रही है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि नया परिवार भी समुदाय के साझा जल स्रोत और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी से जुड़ रहा है।

यही सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध नौलों के संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत था। जब किसी जल स्रोत को पवित्र माना जाता है, तो उसके प्रति उपेक्षा की संभावना कम हो जाती है। यही कारण है कि सदियों तक ये संरचनाएं न केवल जीवित रहीं, बल्कि स्थानीय जीवन का केंद्र भी बनी रहीं।

दूसरे शब्दों में, नौला हमें यह सिखाता है कि जल संरक्षण केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और सामूहिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है।

आज नौले क्यों संकट में हैं?

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार उत्तराखंड में लगभग 2.6 लाख स्प्रिंग्स राज्य के 90 फ़ीसद पेयजल स्रोतों का आधार हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या का डिस्चार्ज लगातार घट रहा है और कई perennial स्रोत अब मौसमी होते जा रहे हैं।

कुमाऊं और हिमालय के दूसरे इलाक़ों में सदियों तक जल सुरक्षा का भरोसेमंद आधार रह चुके ये नौले आज कई स्तरों पर संकट का सामना कर रहे हैं।

इनके विलुप्त होने का सबसे पहला कारण है प्राकृतिक जल पुनर्भरण में कमी। नौले मूलतः पानी के सोतों (springs) और भूमिगत रिसाव पर निर्भर होते हैं। जब जंगलों की कटाई होती है, ढलानों पर कंक्रीटीकरण बढ़ता है या भूमि के उपयोग में बदलाव आता है, तो वर्षा का पानी जमीन में पहले की तरह समाहित नहीं हो पाता। इसका सीधा असर उन जलधाराओं पर पड़ता है, जो नौलों को जीवित रखती हैं। 

शोध बताते हैं कि भूमि उपयोग में बदलाव और वनावरण में कमी ने कुमाऊं क्षेत्र में पानी के कई सोतों के पुनर्भरण (recharge) को कम किया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार उत्तराखंड में लगभग 2.6 लाख स्प्रिंग्स राज्य के 90 फ़ीसद पेयजल स्रोतों का आधार हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या का डिस्चार्ज लगातार घट रहा है और कई perennial स्रोत अब मौसमी होते जा रहे हैं।

हाल की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के कई जिलों में नौला एवं जलधाराओं सहित अन्य परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्भरण में तेज गिरावट दर्ज की गई है।

जलवायु परिवर्तन के कारण यह संकट और भी गहराता जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता बढ़ी है, कहीं बहुत कम बारिश होती है तो कहीं-कहीं लंबे समय तक पानी बरसता ही रहता है। ऐसी स्थितियों में जल का प्राकृतिक पुनर्भरण चक्र बाधित होता है।

हाल की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के कई जिलों में नौला एवं जलधाराओं सहित अन्य परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्भरण में तेज गिरावट दर्ज की गई है। कुछ इलाकों में यह गिरावट 80 फ़ीसद तक बताई गई है।

इसके साथ ही पाइप्ड वाटर सप्लाई सिस्टम के विस्तार ने भी नौलों के सामाजिक महत्व को कम किया है। नई पीढ़ी के बीच नौलों के निर्माण और रखरखाव का पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

एक अन्य गंभीर चुनौती है पारंपरिक ज्ञान का क्षरण। नौलों का निर्माण और रखरखाव केवल स्थापत्य कौशल नहीं, बल्कि स्थानीय भूगोल, मिट्टी और जलधाराओं की समझ पर आधारित था। नई पीढ़ियों में इस ज्ञान का हस्तांतरण लगातार कम हो रहा है, जिससे इन संरचनाओं की मरम्मत और पुनर्जीवन कठिन होता जा रहा है।

दरअसल, नौलों का संकट केवल जल स्रोतों के सूखने का संकट नहीं है। यह एक पूरी सामुदायिक जल-संस्कृति के कमजोर पड़ने का संकेत भी है।

वर्तमान में नौलों की प्रासंगिकता

कुमाऊं और उत्तराखंड
के कई गांवों में आज भी ये नौले पेयजल के महत्त्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं, ख़ासकर गर्मियों और सूखे के महीनों में।

आज जब देश के कई हिस्से जल संकट, भूजल स्तर में गिरावट और अनिश्चित वर्षा के दौर से गुजर रहे हैं, ऐसे समय में नौला जैसी पारंपरिक जल संरचनाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती हैं।

विशेषकर हिमालयी और पहाड़ी क्षेत्रों में, जहां पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति अक्सर भौगोलिक चुनौतियों के कारण अस्थिर रहती है, वहां स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण जल सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद आधार बन सकता है।
कुमाऊं और उत्तराखंड के कई गांवों में आज भी ये नौले पेयजल के महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं, खासकर गर्मियों और सूखे के महीनों में।

इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण चिराग (CHIRAG) नामक संस्था द्वारा कुमाऊं क्षेत्र में किए गए अध्ययन में मिलता है, जहां नावली स्प्रिंग से जुड़े नौले से 17 परिवारों को जून 2012 में प्रतिदिन लगभग 200 लीटर पानी उपलब्ध हो रहा था। अध्ययन के अनुसार कुछ वर्ष पहले जलस्तर में भारी गिरावट के कारण लोगों को धारा से पानी लाना पड़ता था, लेकिन पुनर्भरण कार्यों के बाद इस स्रोत में जल उपलब्धता फिर से बढ़ी।

इसी अध्ययन में चोपड़ा भौना नौला को सूखा या कम बारिश वाले मौसमों में गांव का एकमात्र भरोसेमंद जल स्रोत बताया गया है, जो यह दर्शाता है कि सूखे महीनों में भी पारंपरिक जल संरचनाएं स्थानीय जल सुरक्षा की रीढ़ बनी रहती हैं।

नौले की सबसे बड़ी प्रासंगिकता इसकी स्थानीयता और टिकाऊपन में है। यह किसी बाहरी ऊर्जा, मोटर या बड़े बुनियादी ढांचे पर निर्भर नहीं होता। प्राकृतिक रिसाव, वर्षा जल पुनर्भरण और सामुदायिक देखभाल के आधार पर यह लंबे समय तक इसके माध्यम से पानी की उपलब्धता बनी रहती है।

ऐसे समय में, जब जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का पैटर्न लगातार अनिश्चित हो रहा है, स्थानीय स्तर पर जल संचयन और पुनर्भरण की ऐसी प्रणालियां अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन आधुनिक जल प्रबंधन रणनीतियों का पूरक बन सकता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) भी इस बात पर ज़ोर देता है कि स्थानीय भूगोल के अनुरूप विकसित पारंपरिक जल प्रणालियां आज के जल संकट के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

इसके अलावा, नौले केवल जल संग्रह की तकनीक नहीं, बल्कि जल-सोतों के पुनर्भरण (spring recharge) और जल-विभाजन प्रबंधन (watershed management) की व्यापक समझ का हिस्सा हैं।

अगर इनके आसपास के जलग्रहण क्षेत्र (catchment area), पेड़-पौधे और जलधाराओं को बचाया जाए, तो यह स्रोत फिर से सक्रिय हो सकते हैं।

आगे की राह

CHIRAG की कुमाऊं क्षेत्र में की गई अध्ययन रिपोर्ट में बल्याली शिवमंदिर नौला के संदर्भ में यह दर्ज किया गया कि पुनर्भरण हस्तक्षेपों के बाद लगातार दो गर्मियों तक नौला सूखा नहीं और नीचे स्थित एक पहले से सूखा स्रोत भी पुनः जल देने लगा।

उत्तराखंड में नौलों के पुनर्जीवन को स्प्रिंगशेड प्रबंधन (springshed management) और स्रोत स्थिरता कार्यक्रमों के साथ जोड़कर अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। दरअसल, नौला स्वयं किसी जल स्रोत का अंतिम संग्रह बिंदु होता है, जबकि उसकी वास्तविक जीवनरेखा उसके ऊपर स्थित जलग्रहण क्षेत्र और भूमिगत जलधाराओं में छिपी होती है। 

इसी कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल संरचना की मरम्मत पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके recharge zone की वैज्ञानिक पहचान, वर्षाजल के जमीन में समावेशन और ढलानों पर जल संरक्षण उपायों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। 

उत्तराखंड में CHIRAG, Himmotthan और राज्य स्तर की springshed initiatives ने यह दिखाया है कि खाल, कंटूर ट्रेंच, परकोलेशन पिट, loose boulder check dam और recharge pits जैसे उपायों से सूखते जल स्रोतों को फिर से सक्रिय किया जा सकता है। CHIRAG की कुमाऊं क्षेत्र में की गई अध्ययन रिपोर्ट में बल्याली शिवमंदिर नौला के संदर्भ में यह दर्ज किया गया कि पुनर्भरण हस्तक्षेपों (Recharge Interventions) के बाद लगातार दो गर्मियों तक नौला सूखा नहीं और नीचे स्थित एक पहले से सूखा स्रोत भी पुनः जल देने लगा।

इसी दिशा में उत्तराखंड में Himmotthan Pariyojana और Tata Water Mission के तहत 145 से अधिक स्प्रिंग्स को पुनर्जीवित किया जा चुका है, जिससे 40 हज़ार से अधिक लोगों को स्थायी रूप से पानी मिलने लगा है। 

पिथौरागढ़ जिले के 300 से अधिक गांवों में समुदाय-आधारित स्प्रिंगशेड प्रबंधन (community-based springshed management) के माध्यम से जल पुनर्भरण और गुरुत्वाकर्षण-आधारित जल प्रणालियों को मजबूत किया गया।

इन सभी सफल प्रयासों के उदाहरण से कहा जा सकता है कि नौलों का संरक्षण केवल विरासत संरचना की मरम्मत नहीं, बल्कि व्यापक watershed और aquifer recharge planning का हिस्सा होना चाहिए। यही वह मॉडल है जिसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जल विज्ञान मिलकर हिमालयी क्षेत्रों के लिए जल सुरक्षा का स्थायी रास्ता तैयार करते हैं।

उत्तराखंड में Himmotthan Pariyojana और Tata Water Mission के तहत 145 से अधिक स्प्रिंग्स को पुनर्जीवित किया जा चुका है, जिससे 40 हज़ार से अधिक लोगों को स्थायी रूप से पानी मिलने लगा है। 

आज जब जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन पर वैश्विक स्तर पर चर्चा तेज़ है, नौले हमें टिकाऊ जल भविष्य के लिए अतीत के ज्ञान को वर्तमान की नीतियों से जोड़ने की ज़रूरत और उसकी महत्ता के बारे में बताते हैं। 

नौला केवल एक प्राचीन जल संरचना नहीं, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जल संरक्षण की टिकाऊ समझ हमारे समाज में सदियों से मौजूद रही है। आज जब हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, सूखते जल स्रोतों और अनिश्चित वर्षा के बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है, तब नौले जैसी पारंपरिक प्रणालियां केवल सांस्कृतिक विरासत भर नहीं रह जातीं, बल्कि भविष्य के जल-सुरक्षित समाधान के रूप में भी सामने आती हैं।

इनका पुनर्जीवन दरअसल केवल एक जल स्रोत को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि उस सामुदायिक जल-संस्कृति को फिर से जीवित करने की पहल है, जिसमें पानी को जीवन के साझा आधार और सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता था।

शायद नौला जैसे पारंपरिक ढांचों और व्यवस्थाओं की सबसे बड़ी सीख यही है कि जल का भविष्य सुरक्षित करने के लिए हमें तकनीक से पहले भूगोल, समुदाय और स्मृति की भाषा समझनी होगी।

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