रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षाजल संचयन) कोई नई तकनीक नहीं है। भारत के कई हिस्सों में लोग सदियों से छतों का पानी टंकियों, कुंडों और भूमिगत जलाशयों में जमा करते रहे हैं।

रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षाजल संचयन) कोई नई तकनीक नहीं है। भारत के कई हिस्सों में लोग सदियों से छतों का पानी टंकियों, कुंडों और भूमिगत जलाशयों में जमा करते रहे हैं।

फ़ोटो: IWP Flickr Photos

चाबुआ से सीख: बदलते मानसून में घर-घर में रेन वाटर हार्वेस्टिंग क्यों जरूरी है?

असम के चाबुआ की पहल बताती है कि बदलते मानसून के दौर में वर्षाजल संचयन जल सुरक्षा का एक अहम आधार बन सकता है।
Published on
13 min read

बारिश का व्यवहार अब पहले जैसा नहीं रहा। कई जगह लंबे समय तक सूखा रहता है, तो कहीं कुछ ही घंटों में इतनी तेज बारिश होती है कि सड़कें और फुटपाथ डूब जाते हैं। वहीं, बारिश का पानी भारी मात्रा में नालों के रास्ते बह जाता है। इसी पानी को अगर बचाना है तो असम के चाबुआ से सीख लेनी चाहिए, जहां पर रेनवाटर हार्वेस्टिंग की अनूठी मिसाल पेश की गई है। 

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार अनुसार दक्षिण एशिया (जिसमें भारत भी शामिल है) में कम समय में होने वाली भारी बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में पानी के ठहरने की संभावना कम हो जाती है और एक जगह ठहर नहीं पाने के काराण भूजल रिचार्ज कम होता है या नहीं हो पाता है।

जल विशेषज्ञ अब केवल अधिक पानी लाने की नहीं, बल्कि जहां बारिश होती है, वहीं उसे सहेजने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। 

भारत की बात करें तो केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के अनुसार देश में औसतन लगभग 4,000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी वर्षा और हिमपात से उपलब्ध होता है। इसके बावजूद पीने के पानी की कमी बरकरार है। 

जल विशेषज्ञ अब केवल अधिक पानी लाने की नहीं, बल्कि जहां बारिश होती है, वहीं उसे सहेजने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। 

इसी सोच के साथ असम के डिब्रूगढ़ जिले के चाबुआ में कैच द रेन अभियान के तहत लोगों को घरों की छतों से रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए प्रेरित किया जा रहा है। 

यह अभियान जल शक्ति मंत्रालय के राष्ट्रीय Catch the Rain अभियान का हिस्सा है। जिसका उद्देश्य है “जहां बारिश हो, जब बारिश हो, वहां पानी को सहेजें।” 

इसके तहत लोगों को छत पर गिरने वाले पानी को जमा करने और अतिरिक्त पानी को सुरक्षित तरीके से भूजल में पहुंचाने की जानकारी दी जा रही है।

रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षाजल संचयन) कोई नई तकनीक नहीं है। भारत के कई हिस्सों में लोग सदियों से छतों का पानी टंकियों, कुंडों और भूमिगत जलाशयों में जमा करते रहे हैं। 

फर्क केवल इतना है कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और भूजल पर बढ़ती निर्भरता ने इस पारंपरिक उपाय को फिर से प्रासंगिक बना दिया है।

बदलता मानसून, बदलती जल चुनौती

भारत में जलवायु परिवर्तन का असर मानसून पर साफ दिखाई देने लगा है। IMD और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की रिपोर्ट बताती हैं कि कई क्षेत्रों में अब बारिश का स्वरूप बदल रहा है। 

यानी बारिश कम दिनों में अधिक तीव्रता से हो रही है, जबकि वर्षा के बीच सूखे अंतराल भी लंबे हो सकते हैं। इसका असर शहरों में साफ दिखाई देता है। कुछ घंटों की तेज बारिश से जलभराव हो जाता है और कुछ सप्ताह बाद वही शहर पानी की कमी से जूझने लगते हैं।

तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने इस चुनौती की गंभीरता को बढ़ा दिया है। शहरों में कंक्रीट की सड़कें, इमारतें, पार्किंग और दूसरी पक्की सतहें लगातार बढ़ रही हैं। इससे बारिश के पानी का जमीन में प्राकृतिक रूप से समाना कम हो जाता है और वह सीधे नालों और नदियों में बह जाता है। CGWB भी इसकी पुष्टि करता है। 

यही कारण है कि बोर्ड रेन वाटर हार्वेस्टिंग और कृत्रिम भूजल रिचार्ज को भूजल स्तर बनाए रखने के महत्वपूर्ण उपायों में शामिल करने पर ज़ोर देता है।

यहीं पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग का महत्व बढ़ जाता है। छतों, खुले परिसरों और सार्वजनिक इमारतों से इकट्ठा किया गया पानी घरेलू उपयोग में लाया जा सकता है। साथ ही इसे सुरक्षित तरीके से जमीन में पहुंचाकर भूजल रिचार्ज किया जा सकता है। 

केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी संगठन (CPHEEO) के Manual on Storm Water Drainage Systems में शहरी जल निकासी की योजना बनाते समय रेन वाटर हार्वेस्टिंग और स्थानीय स्तर पर पानी रोकने (stormwater retention) पर जोर दिया गया है। 

इसलिए बदलते मानसून के दौर में रेन वाटर हार्वेस्टिंग केवल पानी बचाने का उपाय नहीं रह गया है। अब इसे शहरों और कस्बों में जल सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण रणनीति माना जा रहा है।

चाबुआ की पहल क्यों महत्वपूर्ण है?

असम के डिब्रूगढ़ जिले के चाबुआ में नगर प्रशासन ने 'कैच द रेन' अभियान के तहत लोगों से अपने घरों की छतों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपनाने की अपील की है। 

अभियान के दौरान लोगों को छत का पानी टंकी में जमा करने और अतिरिक्त पानी को सुरक्षित तरीके से भूजल तक पहुंचाने की जानकारी दी जा रही है। 

चाबुआ की यह पहल जल शक्ति मंत्रालय के राष्ट्रीय अभियान कैच द रेन - Where it Falls, When it Falls की भावना से भी जुड़ी है। इस अभियान का उद्देश्य केवल नए ढांचे खड़े करना नहीं है। इसका लक्ष्य लोगों को बारिश के पानी को जमा करने और भूजल संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। 

आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के अनुसार AMRUT 2.0 के तहत देशभर के 900 से अधिक शहरी स्थानीय निकाय रेन वाटर हार्वेस्टिंग, भूजल रिचार्ज और जलाशयों के संरक्षण से जुड़े काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य शहरों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सक्षम बनाना है। 

यह पहल इसलिए भी अहम है क्योंकि असम जैसे अधिक वर्षा वाले राज्य में भी वर्षाजल संचयन पर जोर दिया जा रहा है।

इससे यह संदेश मिलता है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग केवल सूखे से प्रभावित या कम बारिश वाले इलाकों की जरूरत नहीं है। अच्छी बारिश वाले इलाकों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग पानी का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है और बाद में भूजल तथा स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव बढ़ता है।

दरअसल, बदलते मानसून के दौर में सबसे बड़ी चुनौती केवल कितनी बारिश हुई, यह नहीं है, बल्कि बारिश के पानी के ठहरने की अवधि है।

चाबुआ की यह पहल दिखाती है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग केवल तकनीक का सवाल नहीं है। यदि लोगों को सही जानकारी और तकनीकी सहयोग मिले, तो यह सामुदायिक प्रयास भी बन सकता है।

आखिर रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग है क्या?

रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (Rooftop Rainwater Harvesting) का मतलब है किसी घर, स्कूल, अस्पताल, दफ़्तर या अन्य इमारत की छत पर गिरने वाले बारिश के पानी को पाइपों के जरिए जमा कर उसे उपयोग में लाना। 

CGWB के अनुसार, इस व्यवस्था में आमतौर पर छत (कैचमेंट), पाइप, जाली या फिल्टर, पहली बारिश का पानी अलग करने की व्यवस्था (फर्स्ट फ्लश), टंकी और भूजल रिचार्ज ढांचे जैसे हिस्से शामिल होते हैं।

इसका उद्देश्य केवल बारिश का पानी जमा करना नहीं है, बल्कि उसे बिना बेकार बहने दिए स्थानीय स्तर पर उपयोग में लाना है। आमतौर पर इसके दो तरीके अपनाए जाते हैं।

पहला, वर्षाजल को फिल्टर कर टंकी में संग्रहित किया जाता है। इस पानी का उपयोग बागवानी, सफाई, शौचालय, वाहन धोने या अन्य घरेलू कार्यों में किया जा सकता है। यदि इसे पीने के लिए इस्तेमाल करना हो, तो इसके लिए अतिरिक्त जल शोधन और स्थानीय जल गुणवत्ता मानकों का पालन जरूरी होता है। 

CPHEEO भी वर्षाजल के सुरक्षित उपयोग के लिए उचित फिल्टर, नियमित सफाई और रखरखाव पर जोर देता है।

दूसरा, अतिरिक्त पानी को रिचार्ज पिट, रिचार्ज कुएं, पानी सोखने वाली खाई या बंद पड़े बोरवेल जैसी संरचनाओं के जरिए जमीन में पहुंचाया जाता है। इससे भूजल को दोबारा भरने में मदद मिलती है।

CGWB का कहना है कि शहरों में कंक्रीट की वजह से पानी का जमीन में समाना कम हो गया है। ख़ासकर वहां ऐसी व्यवस्थाएं भूजल संरक्षण में अहम योगदान दे सकती हैं।

इस व्यवस्था के सभी हिस्से सही ढंग से काम करें, तभी वर्षाजल का सुरक्षित संग्रहण या भूजल रिचार्ज संभव हो पाता है। इसलिए प्रणाली बनाते समय तकनीकी मानकों का पालन जरूरी होता है।

शहरों में इसकी जरूरत पहले से ज्यादा क्यों है?

देश के कई शहर आज एक अजीब स्थिति का सामना कर रहे हैं। एक तरफ़ बरसात के दौरान कुछ घंटों की तेज बारिश से सड़कें और निचले इलाके डूब जाते है। फिर कुछ ही महीनों बाद वही शहर पानी की कमी और गिरते भूजल स्तर की समस्या से परेशान हो जाते हैं। 

इसकी एक बड़ी वजह शहरों में कंक्रीट की सड़कें, इमारतें और पार्किंग की जगहों का लगातार बढ़ना है। इससे बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय सीधे नालों और नदियों में बह जाता है। इसकी पुष्टि CGWB भी करता है।

ऐसी स्थिति में रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग शहरों की जल सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इससे छत का पानी स्थानीय जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अतिरिक्त पानी को जमीन में पहुंचाकर भूजल को दोबारा भरने में भी मदद मिलती है।

बड़ी संख्या में इमारतों में ऐसी व्यवस्था हो, तो तेज बारिश के समय जल निकासी व्यवस्था पर दबाव भी कम पड़ सकता है। CPHEEO ने भी अपनी Storm Water Drainage Manual में वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर रोकने, जमीन में समाने देने और उसके दोबारा उपयोग पर जोर दिया है। ऐसे करने के पीछे का उद्देश्य शहरों में जलभराव और पानी की कमी, दोनों समस्याओं से बेहतर ढंग से निपटना है। 

हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग अकेले शहरों की पानी की समस्या का समाधान नहीं है। इससे काफी मदद मिल सकती है। भूजल को बचाना भी जरूरी है। तालाबों और झीलों को सुरक्षित रखना होगा। इस्तेमाल किए गए पानी का दोबारा उपयोग बढ़ाना होगा। साथ ही, पानी की बर्बादी भी कम करनी होगी।

सिन्हा भी इसी ओर ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार, "यह मान लेना सही नहीं है कि कृत्रिम भूजल रिचार्ज अकेले ही भूजल संकट का समाधान है या इससे बहुत कम समय में भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार आ जाएगा।"

रेन वाटर हार्वेस्टिंग अकेले शहरों की पानी की समस्या का समाधान नहीं है।

अलग-अलग राज्यों से मिले अलग अनुभव

भारत के अलग-अलग राज्यों ने अपनी जरूरत और भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाया है। इन अनुभवों से यह भी पता चलता है कि सिर्फ नियम बना देना काफी नहीं है। अच्छी योजना, लोगों की भागीदारी और नियमित रखरखाव भी उतने ही जरूरी हैं।

तमिलनाडु को इस क्षेत्र में अग्रणी माना जाता है। वर्ष 2003 में राज्य ने अधिकांश भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया। इसके बाद चेन्नई समेत कई इलाकों में बड़ी संख्या में इमारतों में ऐसी व्यवस्थाएं बनाई गईं।

CGWB की रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती वर्षों में कई जगह भूजल स्तर में सुधार देखा गया। लेकिन बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि जहां इन संरचनाओं की नियमित सफाई और देखभाल नहीं हुई, वहां उनका असर धीरे-धीरे कम हो गया।

साल 2019 में चेन्नई को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा था। शहर के चार प्रमुख जलाशय लगभग सूख गए थे और कई इलाकों में टैंकरों से पानी पहुंचाना पड़ा। 

इसके बाद रेन वाटर हार्वेस्टिंग की पुरानी संरचनाओं को दोबारा चालू करने, नई प्रणालियां बनाने और झीलों व तालाबों के संरक्षण पर फिर से जोर दिया गया।

दिल्ली में भी सरकारी भवनों, स्कूलों और बड़े परिसरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था की गई है। CGWB ने राजधानी के लिए रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग के मानक डिज़ाइन भी तैयार किए हैं। इसके बावजूद कई विशेषज्ञ मानते हैं कि निजी मकानों और छोटी आवासीय कॉलोनियों में इसका उपयोग अभी भी सीमित है। जहां प्रणालियां बनी भी हैं, वहां नियमित देखभाल एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

राजस्थान में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की कहानी आधुनिक तकनीक से कहीं पुरानी है। राज्य के कई हिस्सों में लोग सदियों से टांका, कुंड और दूसरी पारंपरिक जल संरचनाओं के जरिए छतों का पानी सहेजते रहे हैं। 

कम बारिश वाले इलाकों में ये व्यवस्थाएं आज भी कई परिवारों के लिए पानी का भरोसेमंद स्रोत हैं। पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर जैसे जिलों में आज भी कई घरों में छत का पानी टांकों में जमा किया जाता है। 

बरसात के बाद यही पानी कई महीनों तक पीने और घरेलू जरूरतों के लिए इस्तेमाल होता है। यह परंपरा बताती है कि कम बारिश वाले इलाकों में भी हर बूंद सहेजने से पानी की उपलब्धता बेहतर हो सकती है। आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का मेल ऐसे प्रयासों को और मजबूत बना सकता है।

इन अनुभवों से साफ है कि पूरे देश में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का एक ही मॉडल लागू नहीं किया जा सकता। हर शहर और हर इलाके की जलवायु, मिट्टी और भूजल की स्थिति अलग होती है। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान तैयार करना जरूरी है।

साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग की सफलता सिर्फ तकनीक पर नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी और नियमित रखरखाव पर भी निर्भर करती है। जहां लोगों ने इन प्रणालियों को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया, वहां इसके बेहतर परिणाम देखने को मिले।

<div class="paragraphs"><p>रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षाजल संचयन) कोई नई तकनीक नहीं है। भारत के कई हिस्सों में लोग सदियों से छतों का पानी टंकियों, कुंडों और भूमिगत जलाशयों में जमा करते रहे हैं। </p></div>

रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षाजल संचयन) कोई नई तकनीक नहीं है। भारत के कई हिस्सों में लोग सदियों से छतों का पानी टंकियों, कुंडों और भूमिगत जलाशयों में जमा करते रहे हैं।

फ़ोटो: रंजीथ सीजीi/ विकिमीडिया कॉमन्स

लेकिन हर जगह एक जैसा समाधान नहीं

रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली हर जगह एक जैसा काम नहीं करती। इसकी सफलता स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है। CGWB के अनुसार रिचार्ज संरचना बनाने से पहले स्थानीय मिट्टी, भूजल और पानी की गुणवत्ता का आकलन जरूरी है। इसलिए एक ही डिज़ाइन हर शहर या हर इलाके के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है।

यदि किसी इलाके में भूजल पहले से प्रदूषित है या आसपास कूड़ा भराव स्थल, फ़ैक्ट्री या सीवर का रिसाव है, तो बिना सही फिल्टर और जांच के बारिश के पानी को सीधे जमीन में पहुंचाना नुकसानदायक हो सकता है।

यही वजह है कि विशेषज्ञ किसी भी रिचार्ज ढांचे को बनाने से पहले स्थानीय भूजल, मिट्टी और पानी की गुणवत्ता का आकलन करने की सलाह देते हैं।

पूर्व वरिष्ठ भूजल सलाहकार (विश्व बैंक की उत्तर प्रदेश जल क्षेत्र पुनर्गठन परियोजना) रवींद्र स्वरूप सिन्हा कहते हैं "पिछले लगभग 25 वर्षों के अपने अनुभव में मैंने देखा है कि कृत्रिम भूजल रिचार्ज पर काफी चर्चा होती रही है, लेकिन अक्सर एक्विफर की प्रकृति और उसकी गतिशीलता को समझे बिना। हर एक्विफर की भूगर्भीय बनावट और विशेषताएं अलग होती हैं। इसलिए एक ही तरह के रिचार्ज उपाय हर जगह उपयुक्त नहीं हो सकते।"

पिछले लगभग 25 वर्षों के अपने अनुभव में मैंने देखा है कि कृत्रिम भूजल रिचार्ज पर काफी चर्चा होती रही है, लेकिन अक्सर एक्विफर की प्रकृति और उसकी गतिशीलता को समझे बिना। हर एक्विफर की भूगर्भीय बनावट और विशेषताएं अलग होती हैं। इसलिए एक ही तरह के रिचार्ज उपाय हर जगह उपयुक्त नहीं हो सकते।

रवींद्र स्वरूप सिन्हा, पूर्व वरिष्ठ भूजल सलाहकार, विश्व बैंक की उत्तर प्रदेश जल क्षेत्र पुनर्गठन परियोजना/UPWSRP

रखरखाव से मिली एक सीख

दिल्ली का एक अनुभव यह भी दिखाता है कि केवल ढांचे को खड़ा कर देना काफी नहीं होता। द्वारका की कई ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग संरचनाओं की जांच के दौरान पानी में प्रदूषण के संकेत मिले।

जांच के दौरान कई रिचार्ज पिटों में पानी की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएं सामने आईं। DJB ने NGT को बताया कि कई मामलों में इसकी वजह तकनीक नहीं, बल्कि खराब रखरखाव और सीवर के पानी का प्रवेश था।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पहली बारिश का पानी अलग करने की व्यवस्था (फर्स्ट फ्लश), ओवरफ्लो पाइप और नियमित सफाई जैसी व्यवस्थाएं ठीक से काम करें, तभी ऐसी संरचनाएं सुरक्षित और प्रभावी रहती हैं।

गलत रखरखाव से क्या हो सकते हैं नुकसान?

रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की सबसे बड़ी चुनौती उसका रखरखाव है। CGWB और CPHEEO दोनों का मानना है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग ऐसी प्रणालियों की नियमित देखभाल न हो, तो उनसे मिलने वाला लाभ धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसलिए इन्हें एक बार बनाकर छोड़ देने के बजाय समय-समय पर उनकी जांच करना और साफ करना जरूरी है।

रेन वाटर हार्वेस्टिंग छत, पाइप और फिल्टर की नियमित सफाई न हो, तो धूल, पेड़ों की पत्तियां, पक्षियों की बीट और दूसरी गंदगी बारिश के पानी के साथ टंकी या रिचार्ज पिट तक पहुंच सकती है।

इसी तरह, यदि पहली बारिश का गंदा पानी अलग करने की व्यवस्था (फर्स्ट फ्लश) ठीक से काम न करे, तो छत पर जमा धूल और प्रदूषक भी जमा हो रहे पानी में मिल सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञों की सलाह है कि हर मानसून से पहले पूरी व्यवस्था की जांच और सफाई कर लेनी चाहिए।

समय के साथ दूसरी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। फिल्टर जाम होने, रिचार्ज पिट में मिट्टी भरने और पाइप के टूटने या बंद हो जाने की संभावना भी होती है। 

ऐसी स्थिति में बारिश का पानी या तो ठीक से जमा नहीं हो पाता या सीधे नालियों में बह जाता है। ऐसी समस्याओं से बचने के लिए ही विशेषज्ञ हर मानसून से पहले पूरी व्यवस्था की जांच और सफाई की सलाह देते हैं।

इसलिए विशेषज्ञ रेन वाटर हार्वेस्टिंग को केवल निर्माण का काम नहीं, बल्कि नियमित देखभाल वाली व्यवस्था मानते हैं।

चाबुआ की पहल दिखाती है कि यदि स्थानीय स्तर पर लोगों को सही जानकारी और तकनीकी सहयोग मिले, तो रेन वाटर हार्वेस्टिंग केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामुदायिक प्रयास भी बन सकता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में जिस तरह बिना पर्याप्त वैज्ञानिक समझ के रिचार्ज उपाय किए जा रहे हैं, उससे लंबे समय में एक्विफर, खासकर उसकी जल गुणवत्ता, प्रभावित हो सकती है।

रवींद्र स्वरूप सिन्हा, पूर्व वरिष्ठ भूजल सलाहकार, विश्व बैंक की उत्तर प्रदेश जल क्षेत्र पुनर्गठन परियोजना/UPWSRP

नीति से लेकर लोगों की भागीदारी तक

रेन वाटर हार्वेस्टिंग को सफल बनाने के लिए सिर्फ नियम बना देना काफी नहीं है। कई राज्यों के अनुभव बताते हैं कि अच्छी योजनाएं भी तब तक पूरी तरह सफल नहीं होतीं, जब तक उनका सही तरीके से पालन और रखरखाव न हो। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार, स्थानीय निकाय और लोगों, तीनों की साझी जिम्मेदारी जरूरी है।

सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि नई इमारतों में वर्षाजल संचयन केवल कागजों तक सीमित न रहे। निर्माण के समय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सही डिज़ाइन अपनाया जाए।

CGWB की गाइडलाइन भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार डिज़ाइन तैयार करने की सलाह देती है।

चाबुआ का अभियान इसी सोच का उदाहरण है। वहां लोगों को केवल रेन वाटर हार्वेस्टिंग लगाने के लिए नहीं कहा जा रहा, बल्कि उसकी कार्यप्रणाली और रखरखाव के बारे में भी जानकारी दी जा रही है।

इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण है रखरखाव। स्थानीय निकाय समय-समय पर निरीक्षण करें और लोगों को यह जानकारी दें कि छत, पाइप, फिल्टर और रिचार्ज पिट की सफाई कब और कैसे करनी है। यदि व्यवस्था बनने के बाद उसकी देखभाल न हो, तो कुछ ही वर्षों में उसका लाभ कम हो सकता है।

लोगों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। कई शहरों के अनुभव बताते हैं कि जहां लोगों ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अपनी रोजमर्रा की आदत बनाया, वहां इसके बेहतर नतीजे मिले। 

वहीं, जहां इसे केवल भवन निर्माण की औपचारिकता समझा गया, वहां कई संरचनाएं कुछ वर्षों में ही बंद हो गईं। 'कैच द रेन' अभियान भी इसी सोच की पहल है। 

इसी तरह AMRUT 2.0 के तहत भी शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग, भूजल रिचार्ज और जलाशयों के संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे यह साफ़ होता है कि अब रेन वाटर हार्वेस्टिंग को केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि शहरी जल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

रेन वाटर हार्वेस्टिंग की सफलता केवल अच्छी तकनीक पर निर्भर नहीं करती। यह सही योजना, नियमित रखरखाव और लोगों की भागीदारी, इन तीनों पर समान रूप से टिकी है। जब ये तीनों साथ आते हैं, तभी छत पर गिरने वाला पानी भविष्य की जल सुरक्षा का मजबूत आधार बन सकता है।

<div class="paragraphs"><p>आंध्रा यूनिवर्सिटी इंजीनियरिंग कॉलेज में बारिश का पानी जमा करने के लिए तैयार किया जाने वाला ढांचा। </p></div>

आंध्रा यूनिवर्सिटी इंजीनियरिंग कॉलेज में बारिश का पानी जमा करने के लिए तैयार किया जाने वाला ढांचा।

फ़ोटो: पर्यावरण मार्गदर्शी वैसाखी

जलवायु अनुकूलन की दिशा में एक जरूरी कदम

जलवायु परिवर्तन के साथ भारत के सामने पानी की चुनौती लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में केवल जल आपूर्ति से जुड़ी नई योजनाएं काफ़ी नहीं होंगी। इनके साथ-साथ रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसे स्थानीय और विकेंद्रीकृत उपायों को भी बड़े पैमाने पर अपनाना होगा। 

हर घर, स्कूल, अस्पताल, कार्यालय और सार्वजनिक भवन की छत बारिश के पानी को सहेजने का एक अवसर बन सकती है।

असम के चाबुआ की पहल बताती है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग केवल बारिश का पानी बचाने का तरीका नहीं, बल्कि बदलते मानसून के बीच जल सुरक्षा को मजबूत करने की एक व्यावहारिक दिशा भी है। 

यदि हर घर, स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक भवन अपनी छत पर गिरने वाला पानी सहेजने लगे, तो ऐसी छोटी पहलें मिलकर भविष्य की बड़ी जल चुनौतियों का सामना करने में मदद कर सकती हैं।

Also Read
हवा से पानी: क्या एटमॉस्फेरिक वाटर हार्वेस्टिंग भारत के जल संकट का समाधान बन सकती है?
<div class="paragraphs"><p>रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (वर्षाजल संचयन) कोई नई तकनीक नहीं है। भारत के कई हिस्सों में लोग सदियों से छतों का पानी टंकियों, कुंडों और भूमिगत जलाशयों में जमा करते रहे हैं। </p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org