एमपी के समसगढ़ की सदियों पुरानी बावड़ियां - आज भी सींच रही हैं खेतों को

फ़ोटो - सयाली पराते 

एमपी के समसगढ़ की सदियों पुरानी बावड़ियां - आज भी सींच रही हैं खेतों को

भारत की प्राचीन बावड़ियां जल संरक्षण का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, लेकिन सही रखरखाव नहीं होने की वजह से हजारों बावड़‍ियां खंडहर हो चुकी हैं… ऐसे में एमपी के समसगढ़ की बावड़‍ियां आज भी खेतों को सीच रही हैं।
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  • सदियों पुरानी ये जल संरचनाएं न केवल भूजल पुनर्भरण में मदद करती हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियां वर्तमान जल संकट का प्रभावी समाधान बन सकती हैं। 

  • एक समय था जब समसगढ़ क्षेत्र में लगभग 50 से 52 बावड़ियां हुआ करती थीं, लेकिन आज मात्र दर्जन भर बावड़‍ियां जीवित हैं। 

  • यह कहानी है उस बावड़ी की जिसको एक स्थानीय किसान ने नया जीवन दिया। 

भोपाल से लगभग बाईस किलोमीटर दूर, जहाँ शहर की चकाचौंध धीरे-धीरे खेतों की हरियाली में बदलने लगती है, वहां बसा है समसगढ़। समसगढ़ भोपाल जिले में का एक छोटा सा गांव है, भोपाल जिला प्रशासन के पर्यटन लिस्ट में समसगढ़ का उल्लेख ऐतिहासिक स्थलों में किया गया है। 

देश के अनेक हिस्से इस समय जल संकट की गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं। कहीं भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, तो कहीं अनियमित वर्षा और बढ़ती गर्मी के कारण जल स्रोत सूखने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में पारंपरिक जल संरचनाओं और स्थानीय जल प्रबंधन प्रणालियों का महत्व एक बार फिर सामने आ रहा है।

फ़ोटो - सयाली पराते 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप स्थित समसगढ़ गांव में रहने वाले अजय मालवीय के लिए पानी की कहानी कुछ अलग है। जब आसपास के कई किसान सिंचाई के लिए पानी की कमी से जूझते हैं, तब अजय अपने खेत में मौजूद एक पुरानी बावड़ी से पानी निकालकर फसलों की सिंचाई करते हैं। यह बावड़ी केवल उनके खेत की जल आवश्यकता पूरी नहीं करती, बल्कि पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों की उपयोगिता का भी जीवंत उदाहरण है।

किसान की पहल -  जब ज़रूरत ने विरासत को बचाया

समसगढ़ में एक किसान के खेत में बावड़ी अभी भी सुरक्षित है। इसके पीछे सबसे बड़ी  वजह है, उनका बावडियों के प्रति प्रेम और अपनी धरोहर को बचाने की लगन है। 

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समसगढ़ के किसान अजय मालवीय पिछले करीब 15–16 वर्षों से एक प्राचीन बावड़ी को अपने निजी खर्च पर संरक्षित कर रहे है। उन्होंने बताया कि यहां पहले केवल एक छोटा सा गड्ढा दिखाई देती थी। जब उन्होंने पानी स्टोर करने के उद्देश्य से खुदाई करवाई तो अंदर से पूरी बावड़ी निकल आई।

अजय मालवीय (23) बताते है पहले इसमें बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी हुई थी। पूरी बावड़ी दब चुकी थी। हमने पत्थर निकलवाए, उन्हें तुड़वाया और बावड़ी को फिर से तैयार किया। तब करीब एक लाख रुपए खर्च हुए थे। उनके मुताबिक समसगढ़ में कभी लगभग 52 बावड़ियां हुआ करती थीं, लेकिन अब केवल पांच बावड़ियां ही बची हैं। बाकी अधिकतर मिट्टी में दब चुकी हैं या खत्म हो गईं। 

वे कहते हैं -

अब तो बस कहावत रह गई है कि यहां 52 बावड़ियां थीं। जो बची हैं, उन्हीं को लोग अपने स्तर पर संभाल रहे है।

किसान अजय मालवी, समसगढ़

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अजय के अनुसार बावड़ी का सबसे बड़ा फायदा पानी के संरक्षण में मिलता है। समसगढ़ में गर्मियों के दौरान 600 से 800 फीट तक बोरिंग करने पर भी पानी नहीं निकलता है। जबकि उनकी लगभग 35-40 फीट गहरी बावड़ी साल भर पानी बनाए रखती है। 

हालांकि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी केवल बारिश के मौसम में ही उपलब्ध होता है, लेकिन बाकी समय यह बावड़ी बोरवेल के पानी को स्टोर करने का काम करती है। वे बताते है, अगर बावड़ी नहीं होती तो मुझे अलग से कुआं खोदना पड़ता। हम बोरवेल का पानी इसमें भरते है और फिर चार-पांच घंटे तक खेत की सिंचाई हो जाती है। इससे बहुत फायदा मिलता है।

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वे बावड़ी को जिंदा रखने के पीछे सफाई को सबसे जरूरी बताते है । अजय कहते हैं अगर सफाई नहीं होगी तो बारिश की मिट्टी अंदर जमा हो जाएगी और पानी का स्रोत बंद हो जाएगा। इसी वजह से हर साल बारिश के बाद बावड़ी की सफाई करवाई जाती है, जिस पर लगभग 5 से 10 हजार रुपए खर्च आते है। 

वे बताते हैं कि बावड़ी में सामान्य सीमेंट प्लास्टर नहीं किया जाता क्योंकि उससे बारिश का पानी अंदर नहीं जा पाएगा। हमने पत्थरों के जॉइंट जानबूझकर खुले छोड़े हैं ताकि पानी रिसकर अंदर आता रहे।

अजय मालवी मानते हैं कि बावड़ियों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि उन्हें खोजा जाए और लोग उनमें रुचि लें। वे कहते हैं, अब लोगों की इन चीजों में दिलचस्पी नहीं रही। जमीन बिक रही है और बावड़ियां खत्म हो रही है। लेकिन अगर सरकार चाहे तो इन्हें ढूंढकर बचाया जा सकता है।

वे आगे कहते है पुरानी बावड़ियों में आज भी पानी है, जबकि यहां की बोरें सूख चुकी है। अगर बाकी बावड़ियां भी बचा ली जाती तो पानी की इतनी समस्या नहीं होती। उनके अनुसार बावड़ियां केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि आज भी जल संकट का व्यावहारिक समाधान है।

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जल संरक्षण और इतिहास दोनों के लिए बावड़ियों का संरक्षण बेहद जरूरी 

भोपाल की समसगढ़ बावड़ियों को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान कहते है कि ये बावड़ियां केवल जल स्रोत नहीं बल्कि भोपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जिन्हें संरक्षित करना बेहद जरूरी है। 

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उनके अनुसार समसगढ़ क्षेत्र में कभी लगभग 50 से 52 बावड़ियां हुआ करती थीं, लेकिन समय के साथ कई बावड़ियां निजी जमीनों में खत्म कर दी गईं। आज जो बावड़ियां बची है, उनकी हालत भी बेहद खराब है।

राशिद नूर खान कहते है की यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी पुरानी और ऐतिहासिक बावड़ियों की सुरक्षा के लिए न तो उचित फेंसिंग है, न चौकीदार और न ही संरक्षण की कोई ठोस व्यवस्था है। दरअसल सम्स्गढ़ में  एक पुराणी जगह है, जहां कुछ पुरातन मूर्तियाँ और पुराणी बावड़ी है।

उन्होंने बताया कि कुछ वर्ष पहले प्रस्तावित भोपाल बाईपास सड़क का रास्ता इन बावड़ियों के ऊपर से गुजर रहा था। जब हमें इसकी जानकारी मिली तो हमने शिकायत की। बाद में प्रशासन ने रास्ते में बदलाव किया।

मरम्मत की लागत ज्यादा

समसगढ़ में वर्तमान में 4-5 बावड़ियां बंची है। यहाँ की बावड़ियां प्राचीन है, लेकिन बावडियों को समय समय पर मरम्मत की जरुरत होती है। इस सम्बन्ध में चर्चा करते हुए गांव के शेख नवाब (55) बताते है की यहाँ पहले लगभग 52 बावड़ियां थी, लेकिन वर्तमान में यहां केवल 4 बावड़ियां बची है। दोपहर लगभग 12 बजे जब हम उनके घर पहुंचे तो पारा लगभग 40 डिग्री तक पहुंच चुका था। घर के सामने इशारा करते हुए वे कहते है की यहां पर भी पहले बावड़ी हुआ करती थी, लेकिन प्रायवेट लैंड पर होने के कारण अब वो बावड़ी नहीं बची है। 

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लगभग 6 साल पहले उस बावड़ी को हटा दिया गया। वे बताते है की उस बावड़ी को बचाने का प्रयास किया गया, लेकिन उसकी लागत बहुत थी। इसलिए बावड़ी ख़तम हो गयी। अब मात्र 4 बावड़ियां बची है। कुछ बावड़ियां निजी ज़मीनों पर थीं, तो मालिकों ने उन्हें समतल करके खेत बना लिए। कुछ सरकारी जमीन पर थीं, तो वे यूं ही उपेक्षित रहीं या तो समतल कर दी गयी है। 

राशिद नूर खान कहते है कि भोपाल को झीलों की नगरी कहा जाता है, यहां की बावड़ियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शहरी क्षेत्रों की कुछ बावड़ियों पर सरकार काम कर रही है, लेकिन शहर के बाहरी हिस्सों में स्थित प्राचीन बावड़ियां उपेक्षा का शिकार है। अगर ये बावड़ियां बची रहतीं तो आज समसगढ़ में भूजल स्तर इतना नीचे नहीं जाता। गर्मियों में यहां 700 से 800 फीट तक पानी नहीं निकलता और किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। राशिद नूर खान ने कहा कि जल संरक्षण और इतिहास दोनों को बचाने के लिए इन बावड़ियों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

जल संरक्षण योजनाओं में बावड़ियों का महत्व

जल संसाधन से जुड़े सरकारी दस्तावेजों में स्टेपवेल (बावड़ी) को भूजल रिचार्ज और सिंचाई के लिए उपयोगी बताया गया है। एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार बांध और जल संरक्षण परियोजनाओं से बावड़ियों के रिचार्ज होने की संभावना बढ़ती है तथा उनका उपयोग पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए किया जा सकता है।

बावड़ी क्या है ?

यूनेस्को के अनुसार, बावड़ियां भारतीय उपमहाद्वीप की विशिष्ट भूमिगत जल संग्रहण और जल संसाधन संरचनाएं है, जिनका विकास प्राचीन काल से होता आया है। ये साधारण जल गड्ढों से विकसित होकर बहु-स्तरीय स्थापत्य संरचनाओं में बदल गईं है।

यूनेस्को के अनुसार, बावड़ियां जल संग्रहण, जल प्रबंधन और सामुदायिक उपयोग की संरचनाएं थी। इन्हें पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने और जल संरक्षण के लिए बनाया जाता था। 

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बावड़ियां वर्षा जल को संग्रहित करने और भूजल स्तर को बनाए रखने में सहायक रही है। आधुनिक जल संकट के संदर्भ में इन पारंपरिक संरचनाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन की आवश्यकता पर विभिन्न सरकारी जल संरक्षण कार्यक्रम भी बल देते है।

यूनेस्को के अनुसार रानी की वाव जैसी बावड़ियां केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं बल्कि पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों का उत्कृष्ट उदाहरण है। आज भूजल संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में इनका संरक्षण और पुनर्जीवन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 

क्यों खत्म होने लगीं बावड़ियां?

ब्रिटिश शासन और आधुनिक जलापूर्ति प्रणालियों के विस्तार के बाद कई बावड़ियां उपेक्षित हो गईं। अनेक संरचनाएं गाद से भर गईं, कुछ कचरा स्थलों में बदल गईं और कई पर अतिक्रमण हो गया। आधुनिक जल प्रणालियों और रखरखाव की कमी के कारण भारत की हजारों बावड़ियां उपयोग से बाहर हो गईं।

ठीक ऐसी ही हालत समसगढ़ की बावड़ियों की रही है, जब हम यहाँ पहुचे और बावडियों की बात कर रहे थे तो  वहा पर उपस्थित लोगों में एक कहते है की अब बावडियों की देखभाल कोई नहीं करता है, जिसके करना अब बव्दियाँ बची नहीं है।

आज भारत में भूजल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन जल सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। अजय द्वारा बावड़ी को बचने का उठाया गया यह कदम उसके लिए जल समस्या का निराकरण है, उसे अब पानी के लिए ज्यादा भटकना नहीं पड़ता है।

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